शरद कटियार
कोलकाता से उठी एक आवाज अब पूरे देश की राजनीति में गूंजने लगी है। पश्चिम बंगाल की सरकार ने राज्य के सभी सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान वंदे मातरम् गाना अनिवार्य कर दिया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की सरकार इसे राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बता रही है, लेकिन इस फैसले ने शिक्षा व्यवस्था से लेकर राजनीतिक गलियारों तक नई बहस छेड़ दी है।
जिस वंदे मातरम् ने आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों की आवाज बनकर अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी, वही गीत अब राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। सवाल यह नहीं है कि वंदे मातरम् गाया जाना चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि क्या राष्ट्रभक्ति को सरकारी आदेशों और अनिवार्यता की बेड़ियों में बांधा जा सकता है? क्या भावनाओं का सम्मान आदेशों से कराया जाएगा, या फिर यह राजनीतिक लाभ लेने की नई रणनीति है?
सरकार का कहना है कि नई पीढ़ी को देशभक्ति और भारतीय संस्कृति से जोड़ना जरूरी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान देश की आत्मा हैं। लेकिन जिस देश में बेरोजगारी, शिक्षा का गिरता स्तर, विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का संकट लगातार बढ़ रहा हो, वहां सरकारें प्रतीकों की राजनीति में अधिक सक्रिय दिखाई देती हैं। बच्चों के हाथों में बेहतर किताबें देने के बजाय उन्हें वैचारिक बहसों के बीच खड़ा करना क्या शिक्षा का उद्देश्य है?
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि विद्यालय अब शिक्षा के केंद्र रहेंगे या राजनीतिक प्रयोगशाला बनते जाएंगे? पहले राष्ट्रगान, फिर राज्य गीत और अब राष्ट्रगीत। विद्यालयों की प्रार्थना सभा क्या राष्ट्रभक्ति की प्रतियोगिता बन जाएगी? शिक्षक संगठनों द्वारा उठाए गए सवाल भी पूरी तरह जायज हैं। यदि हर सरकार अपने राजनीतिक दृष्टिकोण के अनुसार विद्यालयों की प्रार्थना व्यवस्था तय करेगी, तो शिक्षा व्यवस्था स्थिर कैसे रह पाएगी?
यह भी सच है कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता चेतना का प्रतीक है। इसे लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा करना भी दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन राष्ट्रप्रेम का सबसे मजबूत रास्ता सम्मान और प्रेरणा से निकलता है, न कि सख्ती और आदेश से। जब किसी चीज को अनिवार्य बनाया जाता है, तो उसके प्रति स्वाभाविक भावनाएं कमजोर पड़ने लगती हैं।
बंगाल हमेशा विचारों, आंदोलनों और सांस्कृतिक चेतना की भूमि रहा है। ऐसे में यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि आने वाले समय की राजनीतिक दिशा का संकेत भी माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय पहचान और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अब बंगाल की राजनीति नई करवट लेने जा रही है।
देशभक्ति पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता। वंदे मातरम् का सम्मान हर भारतीय के दिल में है, लेकिन उसे राजनीति की तलवार बनाना देश की आत्मा को चोट पहुंचाने जैसा होगा। राष्ट्रगीत तब सबसे अधिक प्रभावी होता है, जब वह दिल से निकले, न कि सरकारी आदेश की मजबूरी बनकर।


