सत्ता के गलियारों में अक्सर चेहरे मजबूत दिखाई देते हैं। मंचों पर भाषण देने वाले नेता, हजारों की भीड़ को संबोधित करने वाले राजनेता और हर संकट में संयमित दिखने वाले चेहरे शायद भीतर से कितने टूटे होते हैं, यह बहुत कम लोग देख पाते हैं। लेकिन बुधवार को लखनऊ में एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने राजनीति की कठोर दुनिया के पीछे छिपे एक भाई के दर्द को सबके सामने ला दिया।
अखिलेश यादव जब अपने छोटे भाई प्रतीक यादव के पार्थिव शरीर के सामने पहुंचे, तो उनकी आंखों में सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि एक टूट चुका भाई दिखाई दे रहा था। वर्षों तक संघर्ष, सत्ता और विपक्ष की राजनीति झेलने वाला यह चेहरा उस क्षण पूरी तरह भावनाओं में डूबा हुआ था।
भाई का रिश्ता दुनिया के सबसे खामोश लेकिन सबसे मजबूत रिश्तों में से एक माना जाता है। बचपन की शरारतों से लेकर परिवार की जिम्मेदारियों तक, भाई अक्सर बिना शब्दों के एक-दूसरे की ताकत बन जाते हैं। मुलायम सिंह यादव के बड़े राजनीतिक परिवार में भी प्रतीक यादव हमेशा अपेक्षाकृत शांत और राजनीति से दूर रहने वाले सदस्य माने गए। लेकिन दूरी कभी रिश्तों की गहराई तय नहीं करती। यही कारण था कि प्रतीक के निधन की खबर ने अखिलेश यादव को भीतर तक तोड़ दिया।
जो लोग उस क्षण मौजूद थे, उनके मुताबिक अखिलेश यादव लंबे समय तक भाई के पार्थिव शरीर के पास खड़े रहे। आंखें नम थीं, चेहरा दर्द से भरा था और आसपास मौजूद हर व्यक्ति उस पीड़ा को महसूस कर रहा था। राजनीति में विरोधी हो सकते हैं, विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन एक भाई का दर्द हर सीमा से बड़ा होता है।
यह तस्वीर सिर्फ एक परिवार के शोक की नहीं, बल्कि उस मानवीय सच की भी है कि सत्ता, प्रसिद्धि और राजनीतिक ताकत भी जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा के सामने बेबस हो जाती है। जो व्यक्ति लाखों लोगों के लिए उम्मीद और संघर्ष का चेहरा हो, वह भी अपने भाई को खोने के बाद उतना ही असहाय हो जाता है जितना कोई सामान्य इंसान।
प्रतीक यादव भले राजनीति में सक्रिय नहीं थे, लेकिन परिवार के भीतर उनकी मौजूदगी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती थी। फिटनेस और निजी जीवन में रहने वाले प्रतीक का इस तरह अचानक चले जाना हर किसी को स्तब्ध कर गया।राजनीतिक बयान, आरोप और चर्चाएं समय के साथ बदल जाएंगी, लेकिन एक भाई की आंखों से निकले आंसू इतिहास में हमेशा दर्ज रहते हैं। क्योंकि कुछ रिश्ते राजनीति से नहीं, दिल से चलते हैं।


