तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी करिश्मे की एंट्री, क्या इतिहास दोहराएंगे विजय?
शरद कटियार
विजय … दक्षिण भारतीय सिनेमा का वह नाम, जिसकी फिल्मों पर करोड़ों फैंस सीटियां बजाते हैं, जिसके डायलॉग सोशल मीडिया पर ट्रेंड बन जाते हैं और जिसकी एक झलक पाने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती है। लेकिन अब यही “थलापति” केवल पर्दे के हीरो नहीं रहना चाहते, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति के सबसे बड़े मैदान में उतरकर सत्ता का नया इतिहास लिखने की तैयारी में हैं।
तमिल सिनेमा में विजय का सफर बेहद संघर्षों और आलोचनाओं के बीच शुरू हुआ था। शुरुआती दौर में उन्हें साधारण अभिनेता कहकर खारिज किया गया, लेकिन धीरे-धीरे उनकी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ने शुरू कर दिए। “घिल्ली”, “थुप्पाक्की”, “मर्सल”, “मास्टर” और “लियो” जैसी फिल्मों ने विजय को केवल अभिनेता नहीं बल्कि जनभावनाओं का चेहरा बना दिया। उनकी फिल्मों में अक्सर भ्रष्ट सिस्टम, राजनीतिक साजिशों और आम आदमी के संघर्ष को दिखाया गया, जिसने युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को विस्फोटक तरीके से बढ़ाया।
तमिलनाडु की राजनीति और सिनेमा का रिश्ता हमेशा बेहद खास रहा है। एम . जी . रामाचंद्रन और जे . ज्याललीठा जैसे दिग्गजों ने फिल्मी लोकप्रियता को सत्ता की ताकत में बदलकर दिखाया था। अब विजय को उसी परंपरा का अगला बड़ा चेहरा माना जा रहा है।
जब विजय ने अपनी राजनीतिक पार्टी “तमिझगा वेत्री कझगम” की घोषणा की, तब यह केवल एक राजनीतिक लॉन्च नहीं बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल माना गया। लंबे समय से डीएमके और एआईएडीएमके के बीच घूमती राजनीति में विजय की एंट्री ने युवाओं, पहली बार वोट देने वालों और फिल्मी फैनबेस को नया राजनीतिक विकल्प देने की कोशिश शुरू कर दी।
सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय केवल स्टार पावर के भरोसे राजनीति में नहीं आए हैं। उनकी रणनीति गांवों, युवाओं, शिक्षा, भ्रष्टाचार विरोध और क्षेत्रीय पहचान के मुद्दों पर मजबूत पकड़ बनाने की दिखाई दे रही है। यही कारण है कि उनकी हर राजनीतिक गतिविधि राष्ट्रीय मीडिया तक सुर्खियां बन रही है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि विजय की लोकप्रियता केवल सिनेमा तक सीमित नहीं है। उनके फैंस क्लब वर्षों से सामाजिक कार्यों, रक्तदान शिविरों, राहत अभियानों और जनसंपर्क गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। यही नेटवर्क अब राजनीतिक संगठन की ताकत में बदलता दिखाई दे रहा है।
हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। तमिलनाडु की राजनीति बेहद जटिल मानी जाती है, जहां जातीय समीकरण, क्षेत्रीय भावनाएं और मजबूत संगठन बड़ी भूमिका निभाते हैं। विजय के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे फिल्मी करिश्मे को वोटों में बदल पाएंगे? क्या जनता उन्हें केवल सुपरस्टार नहीं बल्कि एक गंभीर राजनीतिक नेता के रूप में स्वीकार करेगी?
लेकिन एक बात तय मानी जा रही है ,विजय की एंट्री ने तमिलनाडु की राजनीति को पहले से कहीं ज्यादा रोमांचक बना दिया है। अब नजर इस बात पर है कि पर्दे पर सिस्टम बदलने वाला “थलापति” क्या असल राजनीति में भी बदलाव की पटकथा लिख पाएगा?


