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Sunday, May 10, 2026

जीरो टॉलरेंस की आड़ में करोड़ों की कहानी? सिपाही सचेन्द्र सिंह नें किये करोड़ों के खेल

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– भू-माफिया कार्रवाई रोकने के बदले पत्नी के नाम कीमती प्लॉट लेने का आरोप

– शासन तक पहुंची शिकायत

फर्रुखाबाद। जीरो टॉलरेंस अभियान के नाम पर चल रही कार्रवाइयों के बीच खाकी पर ही गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। जिले में बीते लगभग दस वर्षों से लगातार नियमों को “ताक पर रखकर” प्रभावशाली तैनाती पाने वाले सिपाही सचेन्द्र सिंह पर ऐसे आरोप लगे हैं, जिन्होंने पुलिस महकमे से लेकर शासन स्तर तक हलचल पैदा कर दी है। साइबर थाने जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर लेकर जिले के चर्चित लोगों की रेकी करने में भी अहम् भूमिका निभाता है। 20 अक्टूबर माह में कुख्यात अपराधी पर की गई पुलिस की कार्रवाई को भी इसी सिपाही ने लीक कर दिया था जिससे वह फरार होने में कामयाब हो गया, इस खेल में सिपाही फतेहगढ़ कोतवाल को भी पुलिस कप्तान के गुस्से का निवाला बनाना चाहता था।

 

हुईं गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि भू-माफिया एक्ट की कार्रवाई की जद में आए एक चर्चित आरोपी से कार्रवाई रोकने और राहत दिलाने के बदले सिपाही ने अपनी पत्नी के नाम फतेहगढ़ जेएनवी रोड क्षेत्र में एक कीमती प्लॉट हासिल किया। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उक्त जमीन की कीमत लाखों नहीं बल्कि करोड़ों में आंकी जा रही है।

 

मामला इसलिए भी चर्चाओं में है क्योंकि जिस समय जिले में भूमाफियाओं और अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रचार किया जा रहा था, उसी दौरान कथित तौर पर “सेटिंग और संरक्षण” का समानांतर खेल भी चलता रहा। आरोप है कि कार्रवाई की फाइलों और रिपोर्टों को दबाने के बदले बड़े स्तर पर सौदेबाजी हुई, जिसमें कुछ प्रभावशाली लोग और स्थानीय नेटवर्क सक्रिय रहे।

 

सूत्रों के अनुसार सिपाही सचेन्द्र सिंह की पत्नी वर्तमान में कीमती चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और परिवार की जीवनशैली को लेकर भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायत में दावा किया गया है कि सीमित वेतन वाली नौकरी के बावजूद आलीशान खर्च, महंगी संपत्तियों और कथित निवेशों ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है। अब यह चर्चा तेज है कि आखिर इतने संसाधनों का स्रोत क्या है?

 

गंभीर आरोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल पुलिस विभाग की आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर उठ रहा है। आखिर एक सिपाही लंबे समय तक जिले में प्रभावशाली तरीके से कैसे बना रहा? क्या उसे राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त था? क्या जीरो टॉलरेंस अभियान की आड़ में चुनिंदा लोगों को निशाना बनाकर दूसरे लोगों से समझौते किए गए? ऐसे तमाम सवाल अब आम चर्चा का विषय बन चुके हैं।

 

जानकारों का कहना है कि यदि शासन स्तर पर शिकायत की निष्पक्ष जांच होती है तो कई और चौंकाने वाले खुलासे सामने आ सकते हैं। क्योंकि मामला केवल एक प्लॉट या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उस पूरे नेटवर्क से जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें कार्रवाई, संरक्षण और कथित लेनदेन की समानांतर व्यवस्था वर्षों से चलती रही।

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