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Friday, May 8, 2026

यूपी में अफसरों को नया ‘प्रोटोकॉल आदेश’, सांसद-विधायकों के सम्मान पर सरकार सख्त

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– चुनावी मौसम में बदलेगा प्रशासनिक व्यवहार!
लखनऊ। चुनावी मौसम की घंटी बजते ही सरकार ने नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों के रिश्तों को लेकर बड़ा प्रशासनिक संदेश साफ किया है। अब उत्तर प्रदेश में जिलाधिकारी पुलिस अधीक्षक सहित समेत अफसर को सांसदों और विधायकों के प्रति “विशेष सम्मान” दिखाना अनिवार्य होगा। मुख्य सचिव एसपी गोयल द्वारा जारी आदेश के मुताबिक यदि कोई जनप्रतिनिधि कार्यालय पहुंचे तो संबंधित अधिकारी अपनी सीट से उठकर उनका अभिवादन करेगा, हाथ जोड़कर स्वागत करेगा और पानी पूछना भी उसकी जिम्मेदारी मानी जाएगी।
आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सांसदों और विधायकों के फोन कॉल का जवाब देना अफसरों के लिए अनिवार्य होगा। यदि किसी कारणवश तत्काल कॉल रिसीव न हो सके तो बाद में कॉल बैक करना जरूरी होगा। सरकार ने संकेत दिए हैं कि जनप्रतिनिधियों के साथ असम्मानजनक व्यवहार करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
यह आदेश उत्तर प्रदेश सरकार की राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली के तहत जारी किया गया है। हालांकि राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को केवल “शिष्टाचार निर्देश” नहीं बल्कि चुनावी रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। आगामी चुनावों से पहले सरकार और संगठन दोनों यह संदेश देना चाहते हैं कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की प्रशासनिक उपेक्षा अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
लंबे समय से कई विधायक और सांसद यह शिकायत करते रहे हैं कि जिलों में तैनात अफसर जनप्रतिनिधियों को महत्व नहीं देते, फोन नहीं उठाते और विकास कार्यों में सहयोग नहीं करते। सत्ता पक्ष के कई नेताओं ने बंद कमरों में यह नाराजगी भी जताई थी कि अफसरशाही जनता से ज्यादा शक्तिशाली होती जा रही है। अब सरकार के इस आदेश को उसी असंतोष को शांत करने की कोशिश माना जा रहा है।
हालांकि विपक्ष इस आदेश को लेकर सरकार पर निशाना साध सकता है। आलोचकों का कहना है कि लोकतंत्र में सम्मान जरूरी है, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था को “दरबारी संस्कृति” की ओर धकेलना भी खतरनाक हो सकता है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या आम जनता को भी सरकारी दफ्तरों में वही सम्मान और संवेदनशीलता मिलेगी जो जनप्रतिनिधियों के लिए अनिवार्य की जा रही है?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह आदेश सीधे तौर पर नौकरशाही को संदेश देता है कि चुनावी माहौल में जनप्रतिनिधियों की अनदेखी भारी पड़ सकती है। वहीं सत्ता पक्ष इसे “जनता के प्रतिनिधियों का सम्मान” बता रहा है।

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