– मनोज अग्रवाल की पीएम से सीधी बातचीत, सदर सीट पर दावेदारी तेज
हरदोई/फर्रुखाबाद। गंगा एक्सप्रेसवे के उद्घाटन समारोह ने सिर्फ विकास का संदेश नहीं दिया, बल्कि सियासी गलियारों में नए समीकरण भी खड़े कर दिए हैं। कार्यक्रम के दौरान पूर्व एमएलसी मनोज अग्रवाल की प्रधानमंत्री से हुई विशेष वार्ता ने राजनीतिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। इसे आगामी विधानसभा चुनाव के लिए संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, पार्टी की ओर से कराई गई इस विशेष बातचीत के बाद यह चर्चा जोर पकड़ चुकी है कि फर्रुखाबाद सदर विधानसभा सीट से मनोज अग्रवाल को भाजपा का संभावित प्रत्याशी बनाया जा सकता है। खास बात यह है कि हालिया एसआईआर (एसआईआर ) सर्वे के बाद सदर सीट का जातीय समीकरण पूरी तरह बदल गया है।
राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार, पहले ब्राह्मण बहुल मानी जाने वाली इस सीट से करीब 90 हजार वोट गंगा पार के क्षेत्रों—शाहजहांपुर, हरदोई और जलालाबाद—से जुड़े मतदाताओं के थे, जिनमें अधिकांश ब्राह्मण समाज से थे। नए परिसीमन और सर्वे के बाद यह वोट बैंक अब प्रभावी रूप से सीट से बाहर हो चुका है, जिससे चुनावी गणित पूरी तरह बदल गया है।
ऐसे बदले हुए परिदृश्य में भाजपा को एक ऐसे चेहरे की तलाश है जो जातीय संतुलन के साथ-साथ संगठन और विकास की छवि भी मजबूत कर सके। मनोज अग्रवाल इस समीकरण में फिट बैठते नजर आ रहे हैं। उन्हें फर्रुखाबाद में “विकास पुरुष” के रूप में पहचान मिली हुई है और उनकी साफ-सुथरी छवि पार्टी के लिए प्लस पॉइंट मानी जा रही है।
गौरतलब है कि बीते लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने उन्हें पार्टी में शामिल कराया था, जिसके बाद संगठन को स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ मिली। वहीं नगर पालिका परिषद फर्रुखाबाद में उनकी पत्नी बत्सला अग्रवाल लगातार चौथी बार काबिज हैं, जिससे उनका जनाधार और मजबूत माना जा रहा है। यह नगर क्षेत्र लगभग पूरे विधानसभा क्षेत्र को कवर करता है, जो चुनावी लिहाज से बेहद अहम है।
भाजपा संगठन के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अग्रवाल को लेकर सकारात्मक माहौल है और शीर्ष नेतृत्व भी उन्हें गंभीरता से देख रहा है। हालांकि आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है, लेकिन गंगा एक्सप्रेसवे के मंच से मिले संकेतों ने उनकी दावेदारी को मजबूत कर दिया है।
फर्रुखाबाद सदर सीट पर बदलते जातीय समीकरण और नए राजनीतिक संतुलन ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है। भाजपा यदि मनोज अग्रवाल पर दांव खेलती है, तो यह “छवि + संगठन + समीकरण” का मिश्रण होगा। लेकिन असली चुनौती होगी क्या यह नया समीकरण जमीनी वोट में तब्दील हो पाएगा? आने वाले दिनों में टिकट वितरण इस सीट की सियासत का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होगा।
गंगा एक्सप्रेसवे मंच से बदला सियासी समीकरण


