नई दिल्ली/नोएडा। कानून-व्यवस्था और न्यायिक आदेशों के पालन पर सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए गौतमबुद्ध नगर से जुड़े एक मामले में सीधे DGP को तलब कर दिया। अदालत का संदेश साफ था—“आदेश मानना विकल्प नहीं, संवैधानिक बाध्यता है।”
मामले की सुनवाई के दौरान जब DGP की ओर से व्यस्तता का हवाला दिया गया, तो अदालत ने इसे गंभीरता से लिया और गौतमबुद्ध नगर के पुलिस कमिश्नर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होना पड़ा। कोर्ट ने यहां संविधान के अनुच्छेद 144 का हवाला देते हुए दो टूक कहा कि देश की सभी सिविल और न्यायिक प्राधिकरणों को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करना अनिवार्य है।
इस हाई-प्रोफाइल केस में याचिकाकर्ता सतिंदर सिंह भसीन को लेकर अदालत ने बेहद सख्त निर्देश जारी किए। कोर्ट ने आदेश दिया कि भसीन तत्काल लुकसर जेल, इकोटेक-1 थाने के पुलिस अधीक्षक के समक्ष सरेंडर करें। अगर आदेश का पालन नहीं होता है, तो पुलिस को लुकआउट नोटिस जारी कर सभी एयरपोर्ट्स को हाई अलर्ट पर रखने के निर्देश दिए गए हैं।
सबसे अहम बात यह रही कि अदालत ने नए आपराधिक कानून BNSS, 2023 के तहत तत्काल और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। यह स्पष्ट संकेत है कि अब पुराने ढर्रे पर काम करने वाली पुलिसिंग को अदालत बर्दाश्त नहीं करेगी।
सुनवाई के दौरान गौतमबुद्ध नगर पुलिस कमिश्नर ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि आदेशों का अक्षरशः पालन किया जाएगा। वहीं राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने 4 मई 2026 तक पूरी अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आश्वासन दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और न्यायिक आदेशों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला पुलिस प्रशासन के लिए बड़ा संवैधानिक संकट बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यूपी पुलिस पर सख्त प्रहार: डीजीपी तलब, “आदेश नहीं माने तो कार्रवाई तय”


