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Wednesday, April 29, 2026

गंगा एक्सप्रेस-वे पर फिर भड़का फर्रुखाबाद: “चूसे गन्ने” से सोशल मीडिया पर ट्रेंड, जनता का फूटा गुस्सा

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– फर्रुखाबाद का ऐसा अपमान पहली बार
– पडोसी जनपद के सामने ख़राब हुआ जिले का इतिहास
– पीएम मोदी के हरदोई मंच पर चुने हुए जनप्रतिनिधियों तक को नहीं मिला स्थान
– सूचना विभाग के विज्ञापन तक से नाम फोटो गायव

फर्रुखाबाद। गंगा एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन से पहले ही फर्रुखाबाद में सियासी और जनाक्रोश का तापमान चरम पर पहुंच गया था । हरदोई में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम से पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर “फर्रुखाबादी चूसे गन्ना” ट्रेंड करनें लगा , जो जिले की उपेक्षा के खिलाफ जनता के गुस्से का प्रतीक बन गया है। ऐसा फर्रुखाबाद के इतिहास में अपमान पहली बार हुआ जब पडोसी जिले मे चुने हुए जनप्रतिनिधियों को प्रधानमंत्री के मंच पर एक साथ बैठने तक की जगह नहीं मिली, ऐसा लगा कि जिले के नेताओं की छवि ज्यादा धूमिल हो चुकी।

दरअसल, गंगा किनारे बसे फर्रुखाबाद को पहले इस महत्वाकांक्षी एक्सप्रेस-वे से जोड़ने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में अचानक रूट बदलकर इसे शाहजहांपुर की ओर मोड़ दिया गया। इस फैसले के बाद से ही जिले में विरोध की चिंगारी सुलग रही थी, जो अब तक सोशल मीडिया पर आग बनकर फैली है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सिर्फ सड़क परियोजना नहीं, बल्कि फर्रुखाबाद के विकास, रोजगार और पहचान से जुड़ा मुद्दा था। एक्सप्रेस-वे से जुड़ने पर जिले में व्यापार, निवेश और रोजगार के नए अवसर खुल सकते थे, लेकिन रूट बदलने से ये सभी संभावनाएं खत्म हो गईं।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही पोस्ट में भाजपा पर तंज कसते हुए लिखा जा रहा था कि “उद्घाटन में बसों से लोग जाएंगे, लेकिन फर्रुखाबाद को सिर्फ चूसा हुआ गन्ना ही मिला।” कई यूजर्स ने यह भी सवाल उठाया कि अगर कुछ बसें पहले ही जिले से एक्सप्रेस-वे के लिए जातीं, तो शायद यह परियोजना फर्रुखाबाद के हिस्से में भी आ सकती थी।

इतना ही नहीं, पहले भी इस मुद्दे पर जिले में बड़े स्तर पर आंदोलन हो चुके हैं धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन और रैलियों के जरिए लोगों ने अपनी आवाज बुलंद की थी। यहां तक कि विधानसभा तक यह मुद्दा गूंजा, लेकिन नतीजा वही फर्रुखाबाद को बाहर का रास्ता।

अब सोशल मीडिया पर उठी यह नई लहर राजनीतिक रूप लेती जा रही है। यूथ इंडिया के लिए यह सिर्फ ट्रेंड नहीं, बल्कि उस आक्रोश की झलक है, जहां जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। सवाल सीधा है क्या फर्रुखाबाद की आवाज फिर अनसुनी कर दी जाएगी, या इस बार यह “चूसे गन्ने” का तंज सत्ता के गलियारों तक असर दिखाएगा?

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