– डिजिटल मीडिया के भीतर का काला सच
शरद कटियार
चमकती हेडलाइनों और करोड़ों के डिजिटल कारोबार के पीछे एक स्याह हकीकत तेजी से सामने आ रही है। जमीनी रिपोर्टरों के बीच चर्चा है कि बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे एक दो दैनिक के डिजिटल नेटवर्क में “एप डाउनलोड” कराने पर मात्र ₹10 तक का इंसेंटिव दिया जाता है, जबकि खबरों के लिए भी बेहद मामूली भुगतान होता है। सवाल उठता है,जब नीचे इतना सस्ता सिस्टम है, तो ऊपर इतना बड़ा मुनाफा कैसे बनता है?
असल खेल “यूजर संख्या” का है। जितने ज्यादा लोग ऐप डाउनलोड करेंगे, उतने ज्यादा स्क्रीन पर विज्ञापन दिखेंगे। डिजिटल मीडिया में हर क्लिक, हर व्यू और हर सेकंड का पैसा बनता है। आंकड़ों के अनुसार, एक बड़े न्यूज ऐप के लाखों सक्रिय यूजर रोजाना सैकड़ों करोड़ इम्प्रेशन (विज्ञापन दिखना) पैदा करते हैं। विज्ञापन कंपनियां प्रति हजार व्यू (सीपीएम ) के हिसाब से भुगतान करती हैं, जो 50 रुपये से लेकर 500 रुपये या उससे अधिक तक हो सकता है। यही वह जगह है जहां असली कमाई होती है।
इसके साथ ही डेटा का कारोबार भी कम नहीं है। ऐप यूजर क्या पढ़ता है, कितनी देर तक पढ़ता है, किस शहर से है यह सब जानकारी विज्ञापन कंपनियों के लिए सोना है। इसी डेटा के आधार पर “टार्गेटेड एड” बेचे जाते हैं, जिनकी कीमत सामान्य विज्ञापनों से कई गुना ज्यादा होती है।
जमीनी स्तर पर लागत घटाने के लिए “स्ट्रिंगर मॉडल” अपनाया जाता है। यानी स्थायी पत्रकार रखने के बजाय फ्रीलांसर या स्थानीय रिपोर्टर के जरिए खबरें जुटाना। यही वजह है कि कई जगहों पर प्रति खबर 50 से 200 रुपये तक और ऐप डाउनलोड पर ₹10 जैसे इंसेंटिव की बातें सामने आती हैं। इससे मीडिया हाउस का खर्च बेहद कम रहता है, लेकिन कंटेंट की मात्रा तेजी से बढ़ती है।
यही नहीं, “स्पॉन्सर्ड कंटेंट” और “ब्रांडेड न्यूज” भी बड़ा स्रोत बन चुका है। कई खबरें सीधे कंपनियों के साथ समझौते में बनती हैं, जिनमें विज्ञापन और खबर का फर्क आम पाठक समझ नहीं पाता। इसके अलावा इवेंट, कैंपेन और पेड प्रमोशन से भी मोटी कमाई होती है।
लेकिन इस पूरे मॉडल का सबसे बड़ा नुकसान पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर पड़ रहा है। जब रिपोर्टर को मेहनताना ही नहीं मिलेगा, तो वह या तो समझौता करेगा या खबर की गुणवत्ता गिर जाएगी। नतीजा—जमीन की सच्चाई दब जाती है और “क्लिकबाजी” हावी हो जाती है।
डिजिटल मीडिया का यह मॉडल साफ संकेत देता है कि खबर अब “मिशन” से ज्यादा “प्रोडक्ट” बनती जा रही है। अगर जमीनी पत्रकारों का शोषण जारी रहा, तो लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी कमजोर हो जाएगी। सवाल सिर्फ ₹10 का नहीं सवाल है उस सच्चाई का, जो शायद अब बिकने लगी है।
10 में “डाउनलोड”, सस्ती खबर और महंगा कारोबार


