शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में वक्फ संपत्तियों के 12,135 पंजीकरण निरस्त होने की कार्रवाई को केवल एक प्रशासनिक कदम मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। यह घटनाक्रम उस गहरे संकट की ओर इशारा करता है, जो वर्षों से रिकॉर्ड प्रबंधन, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही के अभाव में पनपता रहा है। उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड का यह निर्णय एक तरफ सुधार की दिशा में कड़ा कदम प्रतीत होता है, तो दूसरी तरफ यह सवाल भी खड़ा करता है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में गड़बड़ियां सिस्टम में बनी कैसे रहीं।
प्रदेश में 1.26 लाख से अधिक वक्फ संपत्तियों का होना केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि एक विशाल प्रशासनिक जिम्मेदारी है। ऐसे में हजारों पंजीकरण का एक साथ निरस्त होना इस बात का संकेत है कि या तो निगरानी तंत्र लंबे समय से निष्क्रिय था या फिर कहीं न कहीं जानबूझकर ढिलाई बरती गई। यदि रिकॉर्ड में गलत, अधूरे और संदिग्ध ब्यौरे वर्षों तक बने रहे, तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि संस्थागत कमजोरी का स्पष्ट उदाहरण है।
लखनऊ, बिजनौर, सहारनपुर और बाराबंकी जैसे जिलों में बड़ी संख्या में पंजीकरण निरस्त होना यह भी दर्शाता है कि शहरी विस्तार के साथ जमीन से जुड़े विवाद और अनियमितताएं किस हद तक बढ़ चुकी हैं। जब एक ही संपत्ति कई रूपों में दर्ज हो या कागजों और वास्तविक स्थिति में अंतर हो, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि संभावित दुरुपयोग और हितों के टकराव की ओर भी संकेत करता है।
डिजिटलीकरण के नाम पर UMEED पोर्टल का उपयोग निश्चित रूप से एक सकारात्मक पहल है। पारदर्शिता और डेटा प्रबंधन के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म जरूरी हैं, लेकिन केवल पोर्टल पर डेटा अपलोड कर देना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती है—जमीनी सत्यापन, रिकॉर्ड की शुद्धता और समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट। यदि डिजिटल डेटा भी गलत आधार पर तैयार होगा, तो तकनीक केवल भ्रम पैदा करेगी, समाधान नहीं।
इस पूरे मामले का सामाजिक पक्ष भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वक्फ संपत्तियां केवल भूमि नहीं, बल्कि धार्मिक और सामुदायिक आस्था से जुड़ी होती हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर पंजीकरण निरस्त होने से असंतोष की संभावना स्वाभाविक है। प्रशासन के लिए यह आवश्यक है कि वह पारदर्शी संवाद बनाए रखे और हर कार्रवाई के पीछे स्पष्ट तथ्य प्रस्तुत करे, ताकि विश्वास बना रहे और विवाद की स्थिति न उत्पन्न हो।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आगे क्या? क्या यह कार्रवाई केवल कागजी सुधार तक सीमित रहेगी, या उन संपत्तियों की वास्तविक स्थिति की भी गहन जांच होगी? यदि अनियमितताओं में किसी प्रकार का आर्थिक या आपराधिक पहलू सामने आता है, तो क्या जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई की जाएगी? केवल पंजीकरण निरस्त करना पर्याप्त नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करना ही असली सुधार होगा।
वक्फ संपत्तियों पर हुई यह कार्रवाई एक अवसर भी है और चेतावनी भी। अवसर इसलिए कि इससे पारदर्शिता और सुधार की नई शुरुआत हो सकती है, और चेतावनी इसलिए कि यदि अब भी सिस्टम ने खुद को नहीं सुधारा, तो ऐसी गड़बड़ियां दोबारा जन्म लेंगी। जरूरत है सख्त निगरानी, स्पष्ट नीति और ईमानदार क्रियान्वयन की, ताकि प्रशासनिक सुधार केवल कागजों तक सीमित न रह जाए, बल्कि जमीन पर भी दिखाई दे।
वक्फ संपत्तियों पर सख्ती—सुधार की दिशा या सिस्टम की पुरानी विफलताओं का आईना?


