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Friday, April 24, 2026

राजनीति सेवा से व्यवसाय बनी, वेतन, पेंशन और करोड़ों की निधि के बीच जनप्रतिनिधि सेवक या लोकसेवक

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शरद कटियार

भारत में राजनीति को कभी जनसेवा का माध्यम माना जाता था, लेकिन मौजूदा दौर में यह तेजी से एक व्यवस्थित “व्यवसाय” का रूप लेती दिख रही है। सांसद और विधायक, जिन्हें संविधान ने जनता का प्रतिनिधि और सेवक माना, वे आज वेतनभोगी, सुविधाभोगी और पेंशनधारी वर्ग बन चुके हैं। यही बदलाव लोकतंत्र की मूल भावना पर सवाल खड़ा कर रहा है।

आंकड़े साफ तस्वीर पेश करते हैं। एक सांसद को हर महीने करीब एक लाख रुपये वेतन, 70 हजार रुपये से अधिक भत्ते, मुफ्त आवास, यात्रा सुविधा और अन्य विशेषाधिकार मिलते हैं। कई राज्यों में विधायकों का वेतन डेढ़ लाख से लेकर तीन लाख रुपये प्रतिमाह तक पहुंच चुका है। सिर्फ इतना ही नहीं, एक कार्यकाल पूरा करने के बाद भी आजीवन पेंशन की व्यवस्था है, जो हर अतिरिक्त कार्यकाल के साथ बढ़ती जाती है।जब ये सेवा का पैसा लोकसेवक की तरह लेते तो समाजसेवी कैसे खुद को बोलते?

सबसे बड़ा सवाल “सरकारी निधि” को लेकर है। एक सांसद को हर साल लगभग पांच करोड़ रुपये और एक विधायक को औसतन दो से तीन करोड़ रुपये की विकास निधि दी जाती है। यानी पांच साल में एक सांसद करीब 25 करोड़ और एक विधायक 10 से 15 करोड़ रुपये तक की सार्वजनिक धनराशि खर्च करने का अधिकार रखता है। यही वह बिंदु है जहां से भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोप सबसे ज्यादा उठते हैं।

जमीनी हकीकत यह है कि कई क्षेत्रों में विकास कार्यों पर 10 से 30 प्रतिशत तक “कट” की चर्चा आम है। सड़क, नाली, भवन निर्माण जैसे कामों में गुणवत्ता और लागत के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।और अधिकांश यह वो सरकारी निधि भी वही खर्च करते हैं, जहां कमीशन ज्यादा मिलता है।इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या यह धन वास्तव में जनता के हित में खर्च हो रहा है या फिर निजी लाभ का साधन बन चुका है।

राजनीति का चेहरा भी तेजी से बदला है। आज जनप्रतिनिधि अक्सर कई गाड़ियों के काफिले, अंगरक्षकों और दिखावटी प्रभाव के साथ जनता के बीच पहुंचता है। मीठी भाषा और बड़े वादों के जरिए लोगों को प्रभावित किया जाता है, लेकिन जमीनी समस्याएं अक्सर जस की तस बनी रहती हैं। जो नेता जितना अधिक संसाधनों और प्रभाव का प्रदर्शन करता है, उसे उतना ही “सफल” माना जाने लगा है।

चुनावी खर्च भी इस बदलाव की बड़ी वजह है। कई क्षेत्रों में चुनाव लड़ने की लागत दो करोड़ से लेकर दस करोड़ रुपये तक बताई जाती है। ऐसे में जीत के बाद उस खर्च की भरपाई की मानसिकता भी राजनीति को सेवा से व्यवसाय की ओर धकेलती है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जनप्रतिनिधि वेतन, भत्ते और पेंशन के साथ एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बन चुका है, तो क्या वह वास्तव में “लोक सेवक” रह गया है? या फिर वह एक ऐसा पदाधिकारी बन गया है, जो सार्वजनिक धन का प्रबंधन करते हुए निजी लाभ और राजनीतिक प्रभाव को प्राथमिकता देता है।

लोकतंत्र की असली ताकत जनता है। अगर जनता जागरूक होकर जवाबदेही मांगती है, तो राजनीति फिर से सेवा की ओर लौट सकती है। लेकिन अगर चमक-दमक और तात्कालिक लाभ ही प्राथमिकता बने रहे, तो यह “व्यवसाय मॉडल” और मजबूत होता जाएगा।

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