फर्रुखाबाद। जिले में लंबे समय से उठ रहे भ्रष्टाचार के मुद्दों ने आखिरकार शासन को निर्णायक कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। “यूथ इंडिया” की लगातार चल रही खोजी मुहिम, जमीनी रिपोर्टिंग और दस्तावेजी खुलासों के बाद अब मामला सीधे सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा, जिसके बाद बड़ा प्रशासनिक बदलाव सामने आया है। मेला श्री रामनगरिया की व्यवस्थाओं से लेकर लोक निर्माण, स्वास्थ्य और अन्य विभागों में कथित गड़बड़ियों की शिकायतें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष रखी गईं।
सूत्रों का दावा है कि शिकायतों में वित्तीय अनियमितताओं, ठेकेदार-प्रशासन गठजोड़, अधूरे विकास कार्यों को पूर्ण दिखाने और गुणवत्ता में भारी कमी जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। खासतौर पर मेला श्री रामनगरिया जैसे बड़े धार्मिक आयोजन में व्यवस्थाओं को लेकर उठे सवालों ने शासन की छवि पर भी असर डाला। बताया जा रहा है कि कई मामलों में भुगतान तो पूरा कर दिया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्य अधूरे या मानकों से नीचे पाए गए।
इन्हीं शिकायतों के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी आशुतोष कुमार द्विवेदी को हटाने का निर्णय लिया गया। यह तबादला सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से अलग माना जा रहा है, क्योंकि इसके पीछे सीधे तौर पर भ्रष्टाचार के आरोपों और लगातार बढ़ते जनदबाव को वजह बताया जा रहा है।
अब जिले की कमान अंकुर लाठर को सौंपी गई है, जिन्हें सख्त और ईमानदार प्रशासनिक छवि के लिए जाना जाता है। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि नए जिलाधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार के जाल को तोड़ना, लंबित परियोजनाओं की निष्पक्ष जांच कराना और दोषियों पर कार्रवाई सुनिश्चित करना होगी।
जिले में यह भी चर्चा है कि “यूथ इंडिया” द्वारा उजागर किए गए मामलों में कई विभागों के अधिकारी और ठेकेदारों की भूमिका संदिग्ध रही है। यदि इन मामलों की निष्पक्ष जांच होती है, तो आने वाले दिनों में बड़े स्तर पर कार्रवाई और कई अधिकारियों पर गाज गिर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में पहले से लागू “जीरो टॉलरेंस” नीति को अब जिलों में जमीन पर उतारने का दबाव बढ़ रहा है। फर्रुखाबाद का यह मामला उसी दिशा में एक संकेत माना जा रहा है, जहां मीडिया और जनदबाव के चलते शासन को सख्त कदम उठाने पड़े।
फिलहाल पूरे जिले की निगाहें नए जिलाधिकारी के पहले कदम पर टिकी हैं। क्या वाकई फर्रुखाबाद में भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई शुरू होगी या फिर यह बदलाव भी केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगा—यही आने वाले समय में तय करेगा कि “यूथ इंडिया” की मुहिम सिस्टम को कितना बदल पाती है।


