लखनऊ। उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित RO-ARO भर्ती एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग अब इस भर्ती प्रक्रिया को लेकर अदालत में मजबूती से अपना पक्ष रखने की तैयारी में जुट गया है। आयोग का दावा है कि पूरी चयन प्रक्रिया आरक्षण नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप पारदर्शी तरीके से की गई है।
आयोग के आंकड़ों के मुताबिक कुल 419 अभ्यर्थियों का चयन हुआ, जिनमें 176 अभ्यर्थी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी ) से हैं। यानी लगभग 42 प्रतिशत प्रतिनिधित्व ओबीसी वर्ग को मिला है। आयोग इसे सामाजिक न्याय और मेरिट के बीच संतुलन का उदाहरण बता रहा है।
सूत्रों के अनुसार भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं और आरक्षण व्यवस्था पर उठे सवालों के बाद आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और आरक्षण संबंधी आदेशों का अध्ययन शुरू कर दिया है। कानूनी विशेषज्ञों की टीम यह तय कर रही है कि अदालत में किन संवैधानिक बिंदुओं और न्यायिक उदाहरणों के आधार पर आयोग का पक्ष रखा जाए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि रिजल्ट जारी होने के बाद एक दर्जन से अधिक चयनित अभ्यर्थी विभिन्न विभागों में ज्वाइन भी कर चुके हैं। ऐसे में यदि भर्ती प्रक्रिया पर किसी प्रकार का न्यायिक हस्तक्षेप होता है तो प्रशासनिक स्तर पर भी बड़ा असर पड़ सकता है।
भर्ती को लेकर सोशल मीडिया और अभ्यर्थी संगठनों के बीच लगातार बहस चल रही है। एक पक्ष जहां इसे पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ाने वाला फैसला बता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष मेरिट और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे की गूंज सुनाई देने लगी है। विपक्षी दल सरकार और आयोग की कार्यप्रणाली पर नजर बनाए हुए हैं, जबकि आयोग यह संदेश देने की कोशिश में है कि चयन प्रक्रिया पूरी तरह नियमसम्मत और न्यायसंगत रही है।
अब सबकी नजर अदालत की अगली सुनवाई और आयोग की कानूनी रणनीति पर टिकी है, क्योंकि यह मामला केवल एक भर्ती तक सीमित नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में आरक्षण व्यवस्था, सामाजिक प्रतिनिधित्व और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता से भी जुड़ गया है।
ओबीसी प्रतिनिधित्व के आंकड़ों के साथ कोर्ट में उतरेगा आयोग, 42% चयन का दावा


