– शरद कटियार
बिहार के वैशाली से आई एक तस्वीर ने देश की न्याय व्यवस्था के सामने ऐसा आईना रख दिया है, जिसमें केवल एक बुजुर्ग आरोपी नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था दिखाई दे रही है। तस्वीर में एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने पैरों पर खड़ा तक नहीं हो पा रहा। उम्र का बोझ उसके कंधों पर साफ दिखाई दे रहा है। दो लोग उसे सहारा देकर अदालत से जेल की ओर ले जा रहे हैं। उसका अपराध? 1992 का एक मामला। फैसला? 34 साल बाद।
कानून की नजर में यह एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है। अदालत ने सबूत देखे, सुनवाई की और दोष सिद्ध होने पर सजा सुना दी। लेकिन समाज की नजर में यह तस्वीर कई ऐसे सवाल छोड़ जाती है जिनका जवाब सिर्फ कानून की किताबों में नहीं मिलता।
कहा जाता है कि “न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के बराबर है।” यह वाक्य वर्षों से दोहराया जाता रहा है, लेकिन वैशाली की यह घटना उस वाक्य को जीवंत कर देती है। जब कोई मुकदमा तीन दशक से अधिक समय तक अदालतों में घूमता रहे, गवाह मर जाएं, आरोपी बूढ़े हो जाएं और पीड़ित भी जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच जाएं, तब फैसला भले आ जाए, लेकिन क्या न्याय भी पहुंच पाता है?
यहां सवाल बुजुर्ग आरोपी के प्रति सहानुभूति का नहीं है। यदि उसने अपराध किया है तो कानून के अनुसार सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि आखिर 34 साल तक न्याय की गाड़ी रेंगती क्यों रही? यदि यही फैसला 5 या 10 वर्षों में आ जाता तो शायद इसका सामाजिक और कानूनी महत्व कहीं अधिक होता।
भारत की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। कई मामले ऐसे हैं जिनमें एक पीढ़ी मुकदमा दायर करती है और दूसरी पीढ़ी फैसला सुनती है। न्यायालयों की कमी, जजों के रिक्त पद, बार-बार स्थगन और जटिल प्रक्रियाएं मिलकर ऐसी स्थिति पैदा करती हैं जहां न्याय का अर्थ केवल फैसला सुनाना रह जाता है, समय पर फैसला सुनाना नहीं।
वैशाली के इस बुजुर्ग की तस्वीर इसलिए भी विचलित करती है क्योंकि यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उन लाखों लोगों की कहानी है जो वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाते रहते हैं। कोई जमीन के विवाद में बूढ़ा हो जाता है, कोई हत्या के मुकदमे में अपनी जवानी अदालत की तारीखों में गंवा देता है और कोई निर्दोष व्यक्ति दशकों तक अपने ऊपर लगे आरोपों का बोझ ढोता रहता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस तरह की घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं। वे व्यवस्था की एक स्थायी बीमारी का लक्षण बन चुकी हैं। अदालतें फैसला तो दे रही हैं, लेकिन अक्सर तब जब जीवन का बड़ा हिस्सा बीत चुका होता है। ऐसे में जनता के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या न्याय केवल कानून की प्रक्रिया का नाम है या समयबद्ध परिणाम का भी?
वैशाली की तस्वीर हमें भावुक होने के लिए नहीं, सोचने के लिए मजबूर करती है। जिस व्यक्ति को आज जेल भेजा जा रहा है, वह अपराधी हो सकता है, लेकिन उससे बड़ा अपराध उस व्यवस्था का भी है जिसने 34 साल तक मामले को लटकाए रखा। यदि अपराध का दंड आवश्यक है तो न्याय में देरी के लिए जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक होनी चाहिए।
देश में न्यायिक सुधारों की चर्चा वर्षों से होती रही है। फास्ट ट्रैक अदालतें, ई-कोर्ट, डिजिटल सुनवाई और न्यायिक नियुक्तियों की बातें होती हैं। लेकिन जब 1992 का मामला 2026 में अपने निष्कर्ष पर पहुंचता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सुधारों की गति अभी भी समस्या की गंभीरता से बहुत पीछे है।
वैशाली की अदालत ने अपना काम कर दिया। बुजुर्ग को सजा मिल गई। लेकिन असली सवाल अभी भी अनुत्तरित है—क्या 34 साल बाद मिला फैसला न्याय की जीत है, या फिर यह उस व्यवस्था की हार का दस्तावेज है जो समय पर न्याय देने में असफल रही?
यह तस्वीर शायद कुछ दिनों बाद सोशल मीडिया से गायब हो जाएगी, लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल देश की न्याय व्यवस्था का पीछा लंबे समय तक करता रहेगा। क्योंकि अदालत ने आरोपी को दोषी ठहरा दिया है, मगर जनता की अदालत में अभी भी व्यवस्था कटघरे में खड़ी है।


