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Monday, June 1, 2026

बच्चों की आज़ादी या डिजिटल कैद? मलेशिया का फैसला दुनिया के लिए चेतावनी

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मोबाइल की स्क्रीन पर झुकी हुई एक पीढ़ी तैयार हो रही है। हाथ में किताब की जगह स्मार्टफोन है, खेल के मैदान की जगह सोशल मीडिया की टाइमलाइन है और दोस्तों से आमने-सामने बातचीत की जगह वर्चुअल चैट ने ले ली है। ऐसे दौर में मलेशिया का 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रतिबंध लगाने का फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

दुनिया भर में तकनीक को विकास का प्रतीक माना जाता है, लेकिन तकनीक का दूसरा चेहरा भी उतना ही भयावह है। सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों को उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक ऐसे उत्पाद के रूप में देखती हैं जिनका ध्यान (Attention) बेचकर अरबों डॉलर कमाए जा सकते हैं। जितना अधिक समय बच्चा स्क्रीन पर बिताएगा, उतना अधिक मुनाफा इन कंपनियों की तिजोरियों में जाएगा। यही कारण है कि एल्गोरिद्म इस तरह तैयार किए जाते हैं कि बच्चा बार-बार उसी प्लेटफॉर्म पर लौटकर आए।

मलेशिया ने इसी खतरे को पहचानते हुए आयु सत्यापन को अनिवार्य कर दिया है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक अधिकांश देशों में सोशल मीडिया कंपनियां केवल औपचारिक नियम बनाकर अपनी जिम्मेदारी से बचती रही हैं। कोई भी बच्चा अपनी उम्र गलत दर्ज करके आसानी से अकाउंट बना लेता है और फिर उसके सामने ऐसी सामग्री पहुंचने लगती है जो उसकी मानसिकता, व्यवहार और भविष्य को प्रभावित कर सकती है।

आज साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण, अश्लील सामग्री, फर्जी खबरें, नफरत फैलाने वाले संदेश और मानसिक तनाव बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों के रूप में मौजूद हैं। विश्व स्तर पर हुए अनेक अध्ययनों में यह सामने आया है कि सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों में अवसाद, चिंता, अकेलापन और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लाइक्स और फॉलोअर्स की दौड़ ने बचपन की सहजता को प्रतिस्पर्धा और तुलना के दबाव में बदल दिया है।

भारत में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। गांव से लेकर महानगर तक लाखों बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त रहते हैं। माता-पिता अक्सर इसे आधुनिकता समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि डिजिटल लत धीरे-धीरे बच्चों की रचनात्मकता, सामाजिक व्यवहार और शारीरिक गतिविधियों को प्रभावित कर रही है। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे पढ़ाई से अधिक समय रील्स, शॉर्ट वीडियो और गेमिंग प्लेटफॉर्म पर बिताने लगे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल परिवारों की है? मलेशिया ने इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से दिया है। वहां सरकार ने माता-पिता के बजाय सोशल मीडिया कंपनियों को जिम्मेदार ठहराया है। यह सोच महत्वपूर्ण है क्योंकि अरबों डॉलर कमाने वाली कंपनियां यदि बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म पर लाने में रुचि रखती हैं, तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी होनी चाहिए।

हालांकि इस फैसले के आलोचक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकारों का तर्क दे रहे हैं। उनका कहना है कि प्रतिबंध समाधान नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि जब कोई तकनीक बच्चों के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बनने लगे तो सरकारों को हस्तक्षेप करना पड़ता है। जैसे सड़क पर वाहन चलाने के लिए आयु सीमा तय है, वैसे ही डिजिटल दुनिया में प्रवेश के लिए भी कुछ सीमाएं तय करना अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता।
मलेशिया का निर्णय आने वाले वर्षों में वैश्विक बहस का विषय बनेगा। संभव है कि कई देश इसी तरह के कानून लागू करें। भारत में भी इस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। आखिर वह समय आ गया है जब यह तय करना होगा कि तकनीक बच्चों की सेवक बनेगी या उनका भविष्य नियंत्रित करने वाली शक्ति।
डिजिटल युग में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि बच्चे सोशल मीडिया पर हैं या नहीं, बल्कि यह है कि सोशल मीडिया बच्चों के दिमाग और जीवन पर कितना नियंत्रण स्थापित कर चुका है। मलेशिया ने इस नियंत्रण को चुनौती देने की शुरुआत की है। अब देखना यह है कि दुनिया उसके पीछे चलती है या फिर आने वाली पीढ़ियों को एल्गोरिद्म के हवाले छोड़ देती है।

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