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Wednesday, May 27, 2026

यूपी की सत्ता पर पिछड़ों की राजनीति तेज

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=मजबूत विपक्ष की भूमिका में तो लगातार सक्रिय सपा
=लेकिन सत्ता मे बापसी के लिए अभी तैयारी आधी भी नहीं
यूथ इंडिया। लखनऊ।
शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर पिछड़ों की सामाजिक इंजीनियरिंग के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले झटके के बाद अब बीजेपी के चाणक्य केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सीधे यूपी पर फोकस बढ़ा दिया है। और उनके सारथी सुनील वंसल का पूरा ध्यान देश के सबसे बड़े निर्णायक राज्य पर है।दूसरी ओर अखिलेश यादव लगातार मजबूत विपक्ष की भूमिका में खुद को स्थापित करने में जुटे ही हैं, सत्ता को पाने की उनकी कोई विशेष चाहत न देख उनका एक बड़ा समर्थक तबका मज़बूरी मे सही लेकिन बीजेपी के ही सहारे होता जा रहा ।
सपा का पीडीए यानी “पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक” फार्मूला लोकसभा चुनाव में असरदार साबित हुआ। खासकर यादवों के साथ गैर-यादव पिछड़ों और दलित वोट के हिस्से में आई हलचल ने भाजपा नेतृत्व को नई रणनीति पर मजबूर कर दिया। यही वजह है कि भाजपा अब जातीय संतुलन और पिछड़े नेतृत्व को नए तरीके से आगे बढ़ाने में जुट गई है। क्योंकि पीडीए के मुताबिक अखिलेश के पास खुद के चेहरे को छोड़ अन्य दो धड़ों के राजनैतिक चेहरे हैं ही नहीं, पीडीए की आग नें उनसे सवर्ण नेता पहले ही अलग कर दिए, दलित माया और चंद्रशेखर के इर्दगिर्द पहले से ही हैं, मुश्लिम का झुकाव बीजेपी की ओर बढ़ ही रहा, जिसका जीता जागता उदाहरण बंगाल चुनाव भी है, जहाँ मुश्लिम बीजेपी की ओर बढ़ता मिला।
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को लेकर है। सात बार सांसद रहे और केंद्र मे वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी को प्रदेश संगठन की कमान सौंपना केवल संगठनात्मक फैसला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पूर्वांचल और उनके सजातीय कुर्मी वोट बैंक को साधने की बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि बीजेपी नें पूर्व मे स्वतंत्रत देव सिंह, राकेश सचान जैसे नेताओं को दिग्गज की श्रेणी मे लाने की कोशिश की लेकिन वह लोग अपने सजातियों में कोई जगह नहीं बना सके जिसका नुकसान पार्टी को भुगतना पड़ा । लोकसभा चुनाव में कई क्षेत्रों में सपा के प्रति कुर्मी वोट के झुकाव ने भाजपा को चिंतित किया था।
भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि बिहार जैसे बड़े राज्य में यूपी के डिप्टी सीएम केशव मौर्य की अगुवाई में सम्राट चौधरी के रूप में मौर्य-कुशवाहा नेतृत्व को स्थापित कर पार्टी को सामाजिक लाभ मिला। यूपी में भी उसी मॉडल पर काम करने की तैयारी दिखाई दे रही है। पहले से ही उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या को संगठन और सरकार दोनों में आक्रामक भूमिका दी जा रही है। भाजपा के भीतर यह संदेश साफ है कि गैर-यादव पिछड़ों की राजनीति को और धार दी जाएगी।
इसी रणनीति के तहत अब लोध वोट बैंक पर भी भाजपा की नजरें टिकी हैं। राजनीतिक चर्चाओं में यह लगभग तय माना जा रहा है कि केंद्र सरकार के अगले विस्तार में एटा सांसद राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया या फिर साक्षी महाराज जैसे बड़े लोध चेहरे को अहम जिम्मेदारी मिल सकती है। उत्तर प्रदेश में जनपद कन्नौज की कृपा विधानसभा के चौथी बार विधायक कैलाश राजपूत को पार्टी ने राज्य मंत्री बना ही दिया है। सूत्रों की माने तो भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी में हर बड़े पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व सुरक्षित है।
उधर अखिलेश यादव लगातार भाजपा की इसी सामाजिक रणनीति को चुनौती देने में जुटे हैं। सपा प्रमुख अब केवल यादव राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहते। लोकसभा चुनाव और बाद मे सपा ने पीडीए के जरिए जिस तरह गैर-यादव पिछड़ों और दलितों में पैठ बनाने की कोशिश की , वह ना काफी रही क्योंकि अन्य वर्गों से अच्छे चेहरों का प्रतिनिधित्व सपा को आज तक नहीं मिल सका, पीडीए फार्मूले के कारण उनसे ठाकुर और ब्राह्मण, वैश्य भी छिटक गया। भाजपा के पारंपरिक समीकरणों में हलचल हुई। यही वजह है कि भाजपा अब “अति पिछड़ा बनाम यादव वर्चस्व” की नई बहस को फिर हवा देने की तैयारी में दिखाई दे रही है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओबीसी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में केशव प्रसाद मौर्य के नाम पर ओबीसी नें बीजेपी को वोट किया था हालांकि बाद में संगठन ने योगी आदित्यनाथ को प्रदेश की बाग- डोर सौंप दी थी। प्रदेश में पिछड़ा वर्ग की आबादी लगभग 50 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है। इनमें कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी, निषाद, लोध, यादव और राजभर जैसी जातियां अलग-अलग क्षेत्रों में चुनावी परिणाम बदलने की ताकत रखती हैं। 2024 के लोस चुनाव में भाजपा को कई सीटों पर इसी सामाजिक समीकरण में नुकसान उठाना पड़ा था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में असली लड़ाई “हिंदुत्व बनाम पीडीए ” नहीं, बल्कि “पिछड़ों के भीतर नेतृत्व की लड़ाई” बनने जा रही है। भाजपा जहां जातीय प्रतिनिधित्व के जरिए गैर-यादव ओबीसी को साधने में जुटी है, वहीं अखिलेश यादव सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी के मुद्दे को और तेज करने की तैयारी करते रहे, लेकिन उनकी पार्टी के साथ अन्य ओबीसी के मजबूत चेहरे आज तक साथ नहीं खड़े हो सके ।
इधर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक भाजपा संगठन में हो रहे बदलाव इस बात का संकेत हैं कि पार्टी अब केवल मोदी-योगी चेहरे के भरोसे नहीं रहना चाहती, बल्कि सामाजिक समीकरणों की बिसात भी नए सिरे से बिछाई जा रही है। वहीं सपा इस माहौल को “सत्ता बनाम सामाजिक न्याय” की लड़ाई में बदलने की कोशिश कर रही है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब हर नियुक्ति, हर विस्तार और हर बयान के पीछे जातीय गणित पढ़ा जा रहा है। आने वाले महीनों में यही समीकरण तय करेंगे कि 2027 की लड़ाई में पिछड़ों का सबसे बड़ा राजनीतिक ठिकाना कौन बनता है। वहीं बीजेपी की नई इंजीनियरिंग में पंकज चौधरी को फिलहाल पेंतरे सीखने के अंदर खाने निर्देश मिले हैं।

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