कटौती, ट्रिपिंग और जनता की नाराजगी के बाद सीएम आवास में हाईलेवल बैठक
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली संकट को लेकर बढ़ते राजनीतिक और जनदबाव के बीच आखिरकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को खुद मोर्चा संभालना पड़ा। लगातार कटौती, लो वोल्टेज और ट्रिपिंग की शिकायतों के बाद अब बिजली व्यवस्था सीधे मुख्यमंत्री की निगरानी में आ गई है।
सोमवार को सीएम आवास पर ऊर्जा विभाग की हाईलेवल बैठक हुई, जिसमें मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से जमीनी हकीकत की रिपोर्ट तलब की। बैठक में ऊर्जा विभाग के चेयरमैन आशीष गोयल , तमाम विद्युत निगमों के एमडी, प्रमुख सचिव ऊर्जा और विभागीय मंत्री मौजूद रहे।
राजनीतिक गलियारों में इस बैठक को ऊर्जा मंत्री अरविन्द कुमार शर्मा की कार्यशैली और दावों पर अप्रत्यक्ष सवाल के रूप में भी देखा जा रहा है। क्योंकि एक तरफ मंत्री लगातार “रिकॉर्ड बिजली आपूर्ति” का दावा कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ प्रदेशभर से बिजली संकट की शिकायतें बढ़ती जा रही थीं।
ग्रामीण इलाकों में घंटों कटौती, शहरों में ट्रिपिंग और जले ट्रांसफार्मरों की घटनाओं ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कई जिलों में जनता सड़कों पर उतर चुकी है। विपक्ष भी सरकार को घेरने में जुटा है और “24 घंटे बिजली” के दावों पर सवाल उठा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री ने बैठक में साफ कहा कि बिजली व्यवस्था को लेकर किसी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि फील्ड स्तर पर निगरानी बढ़ाई जाए और उपभोक्ताओं की शिकायतों का तत्काल समाधान कराया जाए।
दरअसल प्रदेश में इस समय बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। हाल ही में यूपी में पीक डिमांड 30,395 मेगावॉट तक दर्ज की गई। भीषण गर्मी के कारण एयर कंडीशनर, कूलर और सिंचाई उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल से सिस्टम पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि जब ऊर्जा मंत्री लगातार व्यवस्था को बेहतर बता रहे थे, तो फिर मुख्यमंत्री को खुद कमान संभालने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या विभागीय दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर है?
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि बिजली का मुद्दा अब केवल विभागीय नहीं बल्कि सीधे सरकार की साख से जुड़ चुका है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री ने अब खुद फ्रंट फुट पर आकर हालात की मॉनिटरिंग शुरू कर दी है।


