– सेवानिवृत्ति के वर्षों बाद भी आदेशों पर हस्ताक्षर
– सपा विधायक सचिन यादव के निलंबन पत्र ने खड़े किए बड़े सवाल
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ पीठ में लंबित एक मामले में विधानसभा सचिवालय की ओर से दायर जवाब में कहा गया कि प्रदीप दुबे किसी सार्वजनिक पद पर नहीं हैं और संप्रभु कार्यों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर, 4 अगस्त 2026 को समाजवादी पार्टी के विधायक सचिन यादव के निलंबन संबंधी आदेश पर प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे के ही हस्ताक्षर सामने आए हैं।
यहीं से कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
2019 में सेवानिवृत्ति, फिर भी सचिवालय की कमान
उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, प्रदीप कुमार दुबे 30 अप्रैल 2019 को सेवानिवृत्त हो चुके थे। इसके बाद सेवा विस्तार और उनके पद पर बने रहने को लेकर विवाद लगातार बना हुआ है। मामला वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में विचाराधीन है।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान विधानसभा सचिवालय की ओर से अधिवक्ता ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि संबंधित प्रतिवादी “पब्लिक पोस्ट” पर नहीं हैं और संप्रभु कार्यों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं। यह अदालत में रखा गया कानूनी पक्ष है, जिस पर अभी अंतिम फैसला आना बाकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अदालत में यह दलील दी जा रही है कि संबंधित अधिकारी सार्वजनिक पद पर नहीं हैं, तो विधानसभा के आधिकारिक आदेशों पर “प्रमुख सचिव” के रूप में हस्ताक्षर किस वैधानिक अधिकार से किए जा रहे हैं?
4 अगस्त 2026 को जारी आदेश में समाजवादी पार्टी के विधायक सचिन यादव को पूरे सत्र के लिए निलंबित किए जाने की सूचना पर प्रमुख सचिव के हस्ताक्षर हैं। इससे विधानसभा सचिवालय की कार्यप्रणाली पर नए सवाल उठ गए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे विवाद का अंतिम उत्तर हाईकोर्ट के निर्णय से ही मिलेगा। यदि न्यायालय इस मामले में कोई महत्वपूर्ण टिप्पणी या आदेश देता है, तो उसके दूरगामी प्रशासनिक और संवैधानिक प्रभाव हो सकते हैं।
यदि अधिकारी सार्वजनिक पद पर नहीं हैं, तो सरकारी आदेश किस अधिकार से जारी हो रहे हैं?
यदि सार्वजनिक पद पर हैं, तो हाईकोर्ट में ऐसा पक्ष क्यों रखा गया?
यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है। हाईकोर्ट ने अभी इस विवाद पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। उपरोक्त प्रश्न उपलब्ध दस्तावेजों और सार्वजनिक अभिलेखों के आधार पर उठाए जा रहे हैं।
प्रदीप दुबे के अधिकारों पर रीना एन. सिंह के कड़े तेवर

लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय से जुड़े मामले में गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह कहा गया कि प्रदीप कुमार दुबे किसी सार्वजनिक पद पर आसीन नहीं हैं, तो उनके हस्ताक्षर से विधायक के निलंबन संबंधी आदेश किस वैधानिक अधिकार के तहत जारी किए गए।
रीना सिंह ने कहा कि यदि उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार प्रदीप दुबे 30 अप्रैल 2019 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं, तो विधानसभा सचिवालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे किस आदेश, पुनर्नियुक्ति अथवा अधिकृत व्यवस्था के तहत प्रमुख सचिव के रूप में कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले का अंतिम निर्णय न्यायालय में उपलब्ध अभिलेखों और विधिक परीक्षण के आधार पर ही होगा।


