उत्तर प्रदेश के सीतापुर में सरायन नदी को बचाने के लिए वर्षों से योजनाएं और बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। नदी के पुनर्जीवन, अतिक्रमण हटाने और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) स्थापित करने की घोषणाओं के बावजूद आज भी शहर का गंदा पानी बिना किसी उपचार के सीधे नदी में बहाया जा रहा है। अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि आलमनगर, नई बस्ती, सिविल लाइंस समेत कई इलाकों का घरेलू सीवर सीधे सरायन में गिर रहा है, जबकि पूरे शहर में एक भी एसटीपी मौजूद नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, फैक्टरियों का अपशिष्ट नदी प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बन चुका है। हरगांव और कमलापुर की चीनी मिलों का कचरा तथा अपशिष्ट नालों के जरिए सरायन में पहुंच रहा है। इसके अलावा पेपर मिलों के खतरनाक रसायन भी नदी में छोड़े जा रहे हैं। इन अपशिष्टों में मौजूद शीरा, सल्फेट और अन्य हानिकारक तत्व पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम कर देते हैं, जिससे जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है और नदी का पारिस्थितिक संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है।
शहर के लगभग 36 बड़े और छोटे नालों का गंदा पानी बिना शोधन के सीधे नदी में गिरने से प्राकृतिक जल स्रोत तेजी से प्रदूषित हो रहे हैं। कई स्थानों पर सरायन नदी अब नाले जैसी दिखाई देने लगी है। इसके साथ ही नदी के किनारों और फ्लड प्लेन पर बढ़ते अवैध अतिक्रमण ने नदी के प्राकृतिक फैलाव को सीमित कर दिया है। खेती, निर्माण और अन्य गतिविधियों के कारण नदी का प्रवाह बाधित हो रहा है, जिससे वर्षा जल का प्रवाह और भूजल रिचार्ज भी प्रभावित हो रहा है।
स्थिति को और गंभीर बनाने में प्लास्टिक कचरा और जलकुंभी भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। शहर और आसपास के क्षेत्रों से बहकर आने वाला प्लास्टिक नदी के प्रवाह में रुकावट पैदा कर रहा है, जबकि जलकुंभी पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घटाकर जलीय जीवों और जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही प्रभावी सीवेज प्रबंधन, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण, अतिक्रमण हटाने और नदी की नियमित सफाई जैसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सरायन नदी का अस्तित्व और अधिक संकट में पड़ सकता है।


