डॉ. विजय गर्ग
ग्रामीण महिलाओं के पास हमेशा से ही बहुमूल्य हुनर रहे हैं, लेकिन उनकी बहुत-सी प्रतिभाएँ घरों, खेतों और स्थानीय समुदायों तक ही सीमित रही हैं। कृषि और पशुपालन से लेकर कढ़ाई, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण और पारंपरिक कलाओं तक, ग्रामीण महिलाएँ परिवार और समाज के जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। चुनौती योग्यता की कमी नहीं, बल्कि ऐसे अवसर पैदा करने की है, जो उनके हुनर को टिकाऊ रोजगार और आय में बदल सकें।
आज कौशल विकास, डिजिटल तकनीक, स्वयं सहायता समूहों और बेहतर बाजार तक पहुँच के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं। प्रशिक्षण पारंपरिक ज्ञान को बाजार में बिकने वाले उत्पादों और सेवाओं में बदलने में मदद कर सकता है, जबकि उद्यमिता महिलाओं को अधिक आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान कर सकती है।
स्वयं सहायता समूह (SHGs) इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुके हैं। दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के माध्यम से लाखों ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा गया है और आजीविका, वित्तीय समावेशन तथा उद्यम विकास के लिए सहायता दी जा रही है। अगस्त 2026 तक इस कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 10.08 करोड़ महिलाओं को 92.30 लाख स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा गया था।
कौशल विकास की वास्तविक ताकत प्रशिक्षण को वास्तविक बाजार से जोड़ने में है। सिलाई, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी प्रबंधन, हस्तशिल्प या डिजिटल सेवाएँ सीखना महत्वपूर्ण है, लेकिन महिलाओं को वित्त, तकनीक, पैकेजिंग, परिवहन, ब्रांडिंग और ग्राहकों तक पहुँच की भी आवश्यकता होती है। इन कड़ियों के अभाव में प्रशिक्षण केवल एक प्रमाण-पत्र बनकर रह सकता है, आय का साधन नहीं।
डिजिटल तकनीक नए दरवाजे खोल सकती है। गाँव में रहने वाली महिला अपने हाथों से बनाए उत्पादों को स्थानीय बाजार से बाहर भी बेच सकती है, डिजिटल भुगतान का उपयोग कर सकती है, सोशल मीडिया के माध्यम से अपने उत्पादों का प्रचार कर सकती है और ग्राहकों से सीधे संपर्क कर सकती है। इसलिए डिजिटल साक्षरता भी व्यावसायिक कौशल जितनी ही महत्वपूर्ण बनती जा रही है।
पारंपरिक हुनर को भी आधुनिक रूप दिया जा सकता है। स्थानीय कढ़ाई, बुनाई, मिट्टी के बर्तन, खाद्य उत्पाद, प्राकृतिक सामग्री और क्षेत्रीय हस्तशिल्प को आधुनिक डिजाइन और पेशेवर पैकेजिंग के साथ नए उत्पादों के रूप में विकसित किया जा सकता है। इस प्रकार सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसे आर्थिक संसाधन में भी बदला जा सकता है।
उद्यमिता महिलाओं के आत्मविश्वास को भी मजबूत कर सकती है। अपनी आय होने से घरेलू निर्णयों में उनकी भागीदारी बढ़ सकती है और बच्चों की शिक्षा तथा परिवार के कल्याण में निवेश के अवसर बढ़ सकते हैं। हालांकि, महिलाओं के सशक्तीकरण को केवल आय के आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए। ज्ञान तक पहुँच, वित्तीय निर्णय लेने की क्षमता, आवागमन, डिजिटल कौशल और सामुदायिक संस्थाओं में भागीदारी भी इसके महत्वपूर्ण पहलू हैं।
सरकारी कार्यक्रम भी इस बदलाव को समर्थन दे रहे हैं। कौशल विकास और उद्यमिता से जुड़ी पहलें प्रशिक्षण प्रदान करती हैं, जबकि ग्रामीण आजीविका कार्यक्रम महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों, ऋण और उद्यम के अवसरों से जोड़ते हैं।
तकनीक इस यात्रा में एक और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। वूमेन टेक्नोलॉजी पार्क्स (Women Technology Parks) ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की महिलाओं के लिए विज्ञान और तकनीक आधारित आजीविका के समाधान को बढ़ावा देते हैं तथा कौशल विकास, क्षमता निर्माण और स्थानीय आर्थिक अवसरों पर जोर देते हैं।
फिर भी कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। महिलाओं की बाजार, तकनीक, परिवहन, वित्त और व्यावसायिक जानकारी तक पहुँच सीमित हो सकती है। घरेलू जिम्मेदारियाँ भी प्रशिक्षण या उद्यमिता के लिए उपलब्ध समय को सीमित कर सकती हैं। सामाजिक अपेक्षाएँ उनकी आवाजाही और निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए केवल महिलाओं को प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं है; उनके आसपास एक सहायक और अनुकूल वातावरण तैयार करना भी आवश्यक है।
इसलिए ग्रामीण महिलाओं के रोजगार का भविष्य केवल नौकरियाँ उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें क्षमताओं का विकास, उद्यमिता को प्रोत्साहन और हुनर से आय, आय से आत्मनिर्भरता और आत्मनिर्भरता से नेतृत्व तक का मार्ग तैयार करना शामिल होना चाहिए।
हर गाँव में प्रतिभा है। हर महिला में सीखने, सृजन करने और योगदान देने की क्षमता है। आवश्यकता केवल ऐसे वातावरण की है, जहाँ यह क्षमता विकसित हो सके।
जब किसी ग्रामीण महिला का हुनर आय अर्जित करने के अवसर में बदलता है, तो इसका लाभ केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यह परिवार को मजबूत कर सकता है, स्थानीय रोजगार पैदा कर सकता है, पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित कर सकता है और पूरे समुदाय के आर्थिक विकास में योगदान दे सकता है।
हुनर केवल कमाई का साधन नहीं है। यह आत्मविश्वास, सम्मान और अवसरों का स्रोत बन सकता है। ग्रामीण महिलाओं की नई यात्रा केवल रोजगार पाने की यात्रा नहीं, बल्कि अपने हुनर को ताकत में बदलने और अपने तथा अपने समुदायों के लिए नए क्षितिज खोलने की यात्रा है।
डॉ. विजय गर्ग
रिटायर्ड प्रिंसिपल | एजुकेशनिस्ट | एमिनेंट साइंटिस्ट
स्ट्रीट कौर चंद, मलोट, पंजाब – 152107
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