काम के बिना पाइप खरीदने का क्या औचित्य?
बिल-वाउचर, स्टॉक रजिस्टर और मौके की तस्वीरों की जांच हुई तो खुल सकता है पूरा खेल
सुदीप कुमार
यूथ इंडिया। हरख बाराबंकी
सरकारी धन खर्च करने का मकसद विकास होता है, लेकिन ग्राम पंचायत सराय हिजरा में ह्यूम पाइप की खरीद ने इसी मूल सवाल को सामने ला खड़ा किया है—जिस सामान की जरूरत थी, उसका इस्तेमाल कहां हुआ? ग्रामीणों के मुताबिक पंचायत में खरीदे गए ह्यूम पाइप महीनों से एक जगह पड़े हैं। पाइपों का इस्तेमाल नहीं होने की स्थिति में खरीद और भुगतान की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मामला सिर्फ पाइपों के पड़े रहने तक सीमित नहीं है। असली सवाल उस पूरी प्रक्रिया का है, जिसके तहत आवश्यकता तय हुई, खरीद हुई, भुगतान हुआ और फिर सामान इस्तेमाल के इंतजार में पड़ा रह गया। जांच का सबसे अहम बिंदु यही है कि ह्यूम पाइप किस स्वीकृत कार्य के लिए खरीदे गए थे। क्या संबंधित कार्य योजना में शामिल था? क्या तकनीकी जरूरत का आकलन किया गया था? क्या खरीद से पहले स्थल का सत्यापन हुआ था? अगर पाइप किसी स्वीकृत काम के लिए खरीदे गए थे तो काम की वर्तमान स्थिति क्या है? और यदि काम अभी तक शुरू नहीं हुआ तो पाइप खरीदने की तत्काल जरूरत क्यों पड़ी? इन सवालों का जवाब सचिव अवनीश तिवारी समेत संबंधित जिम्मेदारों के अभिलेखों से ही सामने आ सकता है।
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भुगतान हुआ तो सत्यापन किसने किया?
सरकारी भुगतान से पहले सामान की उपलब्धता और संबंधित कार्य से उसका संबंध जांचना महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में जांच होनी चाहिए कि भुगतान से पहले ह्यूम पाइपों का भौतिक सत्यापन किस अधिकारी या कर्मचारी ने किया था। कितने पाइप खरीदे गए? किस फर्म से? किस दर पर? कुल भुगतान कितना हुआ? स्टॉक रजिस्टर में एंट्री कब हुई? और पाइप किस काम में लगाए जाने थे? इन सवालों का दस्तावेजी मिलान कई अहम तथ्य सामने ला सकता है।
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वाउचर की फोटो भी जांचे जाने की जरूरत
मामले में ऑनलाइन भुगतान से जुड़े वाउचर पर अपलोड तस्वीरों की भी जांच जरूरी है। यदि फोटो अपलोड की गई हैं तो उनका जियो-टैग, तारीख और लोकेशन मौके की वर्तमान स्थिति से मिलाई जा सकती है। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि भुगतान के समय पाइप वास्तव में उसी स्थान पर मौजूद थे या नहीं और तस्वीरें उसी कार्य/सामग्री से संबंधित थीं या नहीं।
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कागज बनाम जमीन—यहीं से निकलेगा सच
इस पूरे मामले में केवल फाइल देखकर जांच पूरी करने के बजाय कागज और जमीन दोनों का मिलान जरूरी है। बिल-वाउचर के साथ स्टॉक रजिस्टर, भुगतान विवरण, कार्ययोजना, स्वीकृति, एमबी और जियो-टैग फोटो की जांच हो। इसके बाद अधिकारी मौके पर पहुंचकर पाइपों की संख्या और उनकी वास्तविक स्थिति का सत्यापन करें। अगर अभिलेखों में कुछ और और मौके पर कुछ और मिलता है तो जवाबदेही तय करने का आधार बनेगा। वहीं रिकॉर्ड और मौके की स्थिति सही पाई जाती है तो लगाए जा रहे आरोपों की वास्तविकता भी स्पष्ट हो जाएगी।
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अब असली सवाल अधिकारियों के सामने
पाइप खरीदे गए तो काम कहां हुआ? काम नहीं हुआ तो खरीद क्यों हुई? भुगतान हुआ तो सत्यापन किसने किया? महीनों से पाइप पड़े हैं तो उनका उपयोग कब होगा? और सरकारी धन खर्च करने से पहले जरूरत का आकलन किस स्तर पर हुआ? सराय हिजरा के ह्यूम पाइप प्रकरण में अब सबसे जरूरी है कि जिम्मेदार अधिकारी दस्तावेजों के साथ मौके पर जांच करें। क्योंकि सरकारी खरीद का हिसाब सिर्फ बिल में नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले काम में भी होना चाहिए।


