डॉ. विजय गर्ग
शब्द केवल बोलने या लिखने का माध्यम नहीं हैं। वे हमारी स्मृतियों, भावनाओं, संस्कृति और पहचान के वाहक होते हैं। किसी भाषा का प्रत्येक शब्द अपने भीतर इतिहास, परंपरा और पीढ़ियों का अनुभव समेटे रहता है। लेकिन बदलते समय के साथ अनेक शब्द धीरे-धीरे हमारी रोजमर्रा की भाषा से गायब होते जा रहे हैं।
आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी, तकनीक और सोशल मीडिया ने संवाद का तरीका बदल दिया है। छोटे संदेश, संक्षिप्त शब्द और मिश्रित भाषा ने अभिव्यक्ति को आसान तो बनाया है, लेकिन कई पारंपरिक और स्थानीय शब्दों का प्रयोग कम कर दिया है। नई पीढ़ी को अपने ही घर, गाँव या क्षेत्र में प्रचलित अनेक पुराने शब्दों का अर्थ तक पता नहीं होता।
किसी शब्द का खो जाना केवल शब्दकोश से एक शब्द का मिटना नहीं है। उसके साथ एक अनुभव, एक परंपरा और जीवन का एक हिस्सा भी धीरे-धीरे धुंधला पड़ जाता है। लोकभाषाओं और बोलियों में ऐसे हजारों शब्द हैं, जो खेतों, मौसम, रिश्तों, लोकगीतों, हस्तकलाओं और ग्रामीण जीवन से जुड़े हैं। जब उनका प्रयोग बंद होता है, तो उनके साथ जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी कमजोर पड़ने लगती हैं।
भाषा का परिवर्तन स्वाभाविक है। नई तकनीक और नए विचार नए शब्दों को जन्म देते हैं। इसलिए हर पुराने शब्द को बचाए रखना संभव भी नहीं और आवश्यक भी नहीं। लेकिन उन शब्दों को बचाना जरूरी है जिनमें हमारी सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक स्मृति सुरक्षित है।
इसके लिए घर, विद्यालय, साहित्य और समाज महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। बच्चों को स्थानीय बोलियों और मातृभाषाओं के शब्दों से परिचित कराया जाए। बुजुर्गों की भाषा और लोककथाओं को दर्ज किया जाए। पुराने शब्दों के अर्थ, उनके इतिहास और उनके प्रयोग को डिजिटल माध्यमों पर सुरक्षित किया जा सकता है।
शब्द तभी जीवित रहते हैं जब उनका प्रयोग होता है। इसलिए भाषा को संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत संवाद का हिस्सा बनाना होगा। हमें नई भाषा सीखनी चाहिए, नए शब्द अपनाने चाहिए, लेकिन अपनी जड़ों के शब्दों को विस्मृत नहीं करना चाहिए।
क्योंकि जब किसी शब्द की अंतिम बार किसी के होंठों पर आवाज़ उठती है और उसके बाद उसे बोलने वाला कोई नहीं बचता, तब केवल एक शब्द नहीं मरता—उसके साथ एक छोटी-सी दुनिया भी मौन हो जाती है।
शब्दों की अंतिम यात्रा को रोकना है तो उन्हें फिर से बोलना होगा, लिखना होगा और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना होगा।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल | शैक्षिक स्तंभकार | प्रख्यात वैज्ञानिक
स्ट्रीट कौर चंद, एम एच आर मलोट, पंजाब


