— संजय अग्रवाला, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल
[लेखक पिछले 19 वर्षों से वाणिज्य-अर्थशास्त्र के शिक्षक, वित्तीय एवं कर सलाहकार हैं]
डिजिटल युग में उपभोक्ताओं का व्यवहार और उनके निर्णय लेने की प्रक्रिया काफी हद तक ऑनलाइन रिव्यू और समीक्षाओं पर निर्भर हो गई है। चाहे यह किसी उत्पाद को खरीदने का सवाल हो, किसी सेवा का चयन करना हो या फिर किसी स्थान पर यात्रा करने का निर्णय लेना हो लोग अक्सर दूसरों के अनुभवों और राय पर भरोसा करते हैं। लेकिन जब ये समीक्षाएं नकली या फेक होती हैं तो यह न केवल उपभोक्ता को गुमराह करती हैं, बल्कि उनके विश्वास और अनुभव को भी क्षति पहुंचाती हैं। फेक रिव्यू का मुद्दा नई डिजिटल अर्थव्यवस्था में एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। इसे समझने के लिए, पहले यह समझना जरूरी है कि रिव्यू और फीडबैक का ऑनलाइन दुनिया में क्या महत्व है। ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म, रेस्टोरेंट बुकिंग साइट्स, होटल रेटिंग्स और यहां तक कि डॉक्टरों या वकीलों की सेवाओं तक में रिव्यू एक बड़ा आधार बनते हैं। रिव्यू एक संभावित उपभोक्ता के लिए पहला स्त्रोत होता है, जिससे वह किसी उत्पाद या सेवा के बारे में जानकारी प्राप्त करता है। यही कारण है कि अधिकांश व्यवसायों ने इसे अपनी मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा बना लिया है।
हालांकि, जहां रिव्यू की यह प्रणाली उपभोक्ता को सशक्त बनाती है वहीं इसका दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ी है। फेक रिव्यू का निर्माण प्रायः व्यवसायों द्वारा अपने उत्पादों को अधिक विश्वसनीय और आकर्षक दिखाने के लिए किया जाता है। कई बार प्रतिस्पर्धा में एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए नकारात्मक रिव्यू का सहारा लिया जाता है। इसके लिए विशेष रूप से ‘रिव्यू बॉट्स’ या ‘पेड रिव्यूजर्स’ की सेवाएं ली जाती हैं। इस संदर्भ में, उपभोक्ता की विश्वसनीयता का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। जब कोई उपभोक्ता किसी सेवा या उत्पाद पर भरोसा करता है और उसे खरीदने का निर्णय लेता है, तो वह उस पर खर्च किए गए पैसे और समय का मोल लगाता है। लेकिन जब वह फेक रिव्यू के कारण गलत निर्णय लेता है, तो उसे न केवल वित्तीय नुकसान होता है, बल्कि उसकी उम्मीदों को भी चोट पहुंचती है।
फेक रिव्यू की समस्या का सबसे बड़ा प्रभाव उपभोक्ता और व्यवसाय के बीच के रिश्ते पर पड़ता है। रिव्यू की विश्वसनीयता कम होने से उपभोक्ताओं का भरोसा हिल सकता है। इसके अलावा, यह डिजिटल प्लेटफॉर्म की साख को भी नुकसान पहुंचाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी ई-कॉमर्स वेबसाइट पर बार-बार फेक रिव्यू का सामना होता है, तो उपयोगकर्ता उस प्लेटफ़ॉर्म पर भरोसा करना छोड़ सकता है। इस समस्या को जड़ से समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि फेक रिव्यू का निर्माण कैसे होता है। आज इंटरनेट पर कई ऐसे एजेंसियां और व्यक्ति मौजूद हैं, जो पैसे लेकर रिव्यू लिखने का काम करते हैं। इसके अलावा, एआई आधारित बॉट्स का उपयोग कर हजारों रिव्यू मिनटों में तैयार किए जा सकते हैं। कुछ व्यवसाय स्वयं इस प्रकार के नकली रिव्यूज बनवाते हैं, जबकि कुछ प्रतिस्पर्धी कंपनियों को नीचा दिखाने के लिए फर्जी नकारात्मक रिव्यू करवाते हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए कानूनी, तकनीकी और उपभोक्ता-आधारित दृष्टिकोणों की आवश्यकता है। कई देशों में फेक रिव्यू को अवैध घोषित किया गया है और इस पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। उदाहरण के लिए, अमेरिका और यूरोप में कई कंपनियों पर फेक रिव्यूज के लिए भारी जुर्माना लगाया गया है। तकनीकी दृष्टि से, एआई और मशीन लर्निंग का उपयोग कर फेक रिव्यू की पहचान करने के प्रयास किए जा रहे हैं। बड़े डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अब ऐसी तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, जो रिव्यू के पैटर्न को समझकर यह बता सकते हैं कि वह वास्तविक है या नकली। साथ ही, उपभोक्ताओं को भी इस बारे में शिक्षित करना जरूरी है कि वे रिव्यू पढ़ते समय सतर्क रहें और एक ही स्रोत पर पूरी तरह भरोसा न करें। इसके अलावा, उपभोक्ताओं को यह समझना होगा कि रिव्यू केवल एक अनुभव आधारित जानकारी है, न कि अंतिम सत्य। किसी भी उत्पाद या सेवा का चुनाव करते समय, उपभोक्ताओं को कई स्रोतों से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए और अपनी समझ का भी उपयोग करना चाहिए। फेक रिव्यू का मुद्दा सिर्फ उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है; यह व्यवसायों के लिए भी एक गंभीर समस्या है। यदि किसी व्यवसाय को फेक रिव्यू के आधार पर बदनाम किया जाता है, तो उसका बाजार में स्थान खो सकता है। साथ ही, फेक रिव्यू के कारण वास्तविक ग्राहक के अनुभव और राय को अनदेखा किया जाता है, जो व्यवसायों के लिए एक बड़ी सीख हो सकती थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि फेक रिव्यू केवल एक आर्थिक या तकनीकी मुद्दा नहीं है; यह नैतिकता और पारदर्शिता का भी प्रश्न है। जिस समाज में सत्य और ईमानदारी के स्थान पर छल और धोखाधड़ी को बढ़ावा मिलता है, वहां दीर्घकालिक विकास संभव नहीं है।
इस विषय में एक सकारात्मक पहल यह हो सकती है कि व्यवसाय और उपभोक्ता दोनों पारदर्शिता को बढ़ावा दें। व्यवसायों को चाहिए कि वे अपने उत्पादों और सेवाओं की वास्तविकता को प्रस्तुत करें, भले ही वह पूरी तरह परफेक्ट न हो। वहीं उपभोक्ताओं को भी चाहिए कि वे केवल रिव्यू लिखने के लिए लिखने से बचें और अपने अनुभव को ईमानदारी से साझा करें। अंततः, यह समस्या केवल कानून या तकनीक के माध्यम से हल नहीं हो सकती। इसके लिए सभी पक्षों की सहभागिता और जागरूकता जरूरी है। उपभोक्ता को सतर्क रहना होगा, व्यवसाय को नैतिकता का पालन करना होगा और प्लेटफ़ॉर्म को पारदर्शी होना होगा। तभी एक ऐसा डिजिटल वातावरण बन सकेगा जहां विश्वास और सत्य की प्रधानता हो। फेक रिव्यू का प्रभाव जितना व्यापक है उससे निपटने के लिए प्रयास भी उतने ही व्यापक होने चाहिए। उपभोक्ता और व्यवसाय के बीच के इस भरोसे के पुल को मजबूत बनाने के लिए हर स्तर पर प्रयास जरूरी हैं। एक ईमानदार और विश्वसनीय डिजिटल दुनिया की स्थापना ही इस समस्या का अंतिम समाधान है।


