अनुपम दुबे प्रकरण समेत कई गैंगस्टरों पर कार्रवाई का पहिया थमा, सरकारी मशीनरी ने विकास की राह पकड़ी; थानों में भी दिखा ‘नया अवतार’
फर्रुखाबाद। जिले में सरकारी कामकाज का अंदाज इन दिनों कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। कभी अपराध और गैंगस्टरों पर कार्रवाई को लेकर सुर्खियों में रहने वाला जिला अब विकास की ऐसी राह पर दौड़ता दिखाई दे रहा है, मानो कानून-व्यवस्था ने खुद कह दिया हो,“पहले सड़क बनवा लो, अपराध बाद में देख लेंगे।”
तत्कालीन पुलिस अधीक्षक विकास कुमार के कार्यकाल के बाद से अनुपम दुबे समेत उनके गैंग और कई गैंगस्टरों के खिलाफ कार्रवाई का सिलसिला लगभग थम गया। शासन से लेकर जिला स्तर तक कार्रवाई का पहिया धीमा पड़ा तो सरकारी तंत्र ने भी अपना फोकस बदल लिया। अब प्राथमिकता विकास, योजनाओं और आम आदमी से जुड़े काम हैं। यानी जीरो टॉलरेंस की परिभाषा भी शायद समय के साथ ‘जीरो टेंशन’ होती जा रही है।
पुलिस अधीक्षक आरती सिंह के कार्यकाल में पुलिस सुधार पर ज्यादा जोर दिखाई दिया। वर्ष 2026 में तो जिले की पुलिस का मानो नया संस्करण ही सामने आ गया। थानों की कमान से लेकर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी तक युवा पुलिसकर्मियों को मौके दिए गए। इसका असर भी नजर आया और थानों में मुकदमे दर्ज करने को लेकर पुरानी शिकायतों में कमी देखने को मिली।
प्रदेश में कहीं भी कानून-व्यवस्था को लेकर कैसी भी तस्वीर हो, फर्रुखाबाद में सरकारी नजरिए से तस्वीर कुछ ज्यादा ही उजली है। यहां हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि जिला विकास के मामले में ‘रामराज्य की नई मोर’ बनने की ओर अग्रसर है। बस फर्क इतना है कि रामराज्य की चर्चा में पहले न्याय आता था, यहां अब विकास कार्यों की सूची पहले आती है।
बीते दो दशक में जिले के विकास का इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं रहा। शुकरुल्लापुर और भोलेपुर में रेलवे ओवरब्रिज तथा अंडरपास जैसी परियोजनाएं विकास की नजीर के रूप में सामने आईं। इसके अलावा हजारों करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं को स्वीकृति मिल चुकी है। किसानों की जमीनों के अधिग्रहण से लेकर लिंक एक्सप्रेस-वे और औद्योगिक गलियारे की स्थापना की तैयारी चल रही है।
राजनीतिक मोर्चे पर भी सत्तारूढ़ भाजपा ने बुजुर्ग नेताओं को प्रतिनिधित्व और जिम्मेदारियां दीं। इसके बाद जिले में कानून-व्यवस्था में सुधार का दावा भी सामने आया। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी स्वाभाविक है कि जब पुराने अनुभव और नई पुलिसिंग का मेल हो जाए तो विकास की गाड़ी को कौन रोक सकता है।
हालांकि सवाल वही है,क्या विकास और कानून-व्यवस्था एक-दूसरे के विकल्प हैं? अगर किसी बड़े अपराधी या गैंग के खिलाफ कार्रवाई लंबित है तो विकास की चमक उस सवाल को हमेशा के लिए ढक नहीं सकती। जनता को सड़क, पुल, रोजगार और उद्योग भी चाहिए और साथ ही यह भरोसा भी कि कानून सबके लिए बराबर है।
फर्रुखाबाद में फिलहाल सरकारी प्राथमिकता साफ दिखाई देती है,अपराध की फाइलें भले अलमारी में आराम करें, विकास की फाइलें दौड़ती रहें। बस जनता की उम्मीद यही है कि विकास की इस दौड़ में कानून-व्यवस्था पीछे न छूट जाए।


