लखनऊ। सरकारी विद्यालयों में बच्चों की समस्याओं को लेकर अचानक कई जिलों में सामने आए प्रदर्शन अब केवल शिक्षा व्यवस्था का विषय नहीं रह गए हैं। लखनऊ, उन्नाव, फतेहपुर, हमीरपुर, कन्नौज और अन्य जिलों से बच्चों के सड़क पर बैठने की बातें सामने आने के बाद इसके राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर आम चर्चायें तेज हैं। स्कूलों की वास्तविक समस्याओं का समाधान जरूरी है, लेकिन बच्चों के प्रदर्शन को लेकर जिस तरह एक साथ राजनीतिक बयानबाजी और सामाजिक माध्यमों पर अभियान तेज हुआ, उसने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की सोची समझी रणनीति भी सामने आने लगी है।
सरकार ने मामले को दबाने के बजाय तत्काल प्रशासनिक स्तर पर कदम उठाए। समाज कल्याण निदेशालय ने देर रात आदेश जारी कर सर्वोदय विद्यालयों में अंशकालिक शिक्षकों को पुरानी शर्तों पर दोबारा रखने की प्रक्रिया शुरू की। जिलाधिकारियों और मुख्य विकास अधिकारियों को विद्यालयों में जाकर बच्चों से सीधे बातचीत करने तथा पढ़ाई, भोजन, पानी और दूसरी सुविधाओं की वास्तविक स्थिति जानने के निर्देश दिए गए। लखीमपुर खीरी में जिलाधिकारी का बच्चों के बीच पहुंचना और उन्हें पढ़ाना इसी प्रशासनिक पहल का हिस्सा है।
विपक्ष सवाल दाग रहा है कि यदि सरकार बच्चों की शिकायत सुनकर तत्काल व्यवस्था सुधारने में जुट गई है तो फिर बच्चों को राजनीतिक संघर्ष का चेहरा बनाने की जरूरत क्यों पड़ी, जानकारों की माने तो विपक्षी राजनीति का नया तरीका यही है कि प्रशासनिक स्तर पर समाधान की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही बच्चों के वीडियो को राजनीतिक हथियार बना दिया जाए?
अलग-अलग जिलों में सामने आई घटनाओं की जानकारी इतनी तेजी से एक-दूसरे से जुड़कर सामाजिक माध्यमों पर कैसे फैल गई। क्या किसी संगठन ने इन घटनाओं को एक साझा अभियान का रूप दिया? किन लोगों ने वीडियो रिकॉर्ड किए? इन्हें सबसे पहले किसने प्रसारित किया? अलग-अलग जिलों की घटनाओं को एक ही राजनीतिक मुहाने में जोड़ने की रणनीति चल रहीं,इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी है।
लोगों का मानना है कि विपक्षी दलों को यदि वास्तव में बच्चों की चिंता है तो उन्हें सरकार के साथ मिलकर स्कूलों की समस्याओं का समाधान कराने की पहल करनी चाहिए। बच्चों को सड़क पर बैठाना, उनके वीडियो को राजनीतिक संदेश के साथ प्रसारित करना और फिर सरकार को कठघरे में खड़ा करना शिक्षा के मूल प्रश्न का समाधान नहीं है।
पुलिस पर बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार के वीडियो भी सामने आए हैं। यदि किसी पुलिसकर्मी ने नियमों का उल्लंघन किया है तो जांच के बाद कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन किसी अधूरे या संदर्भ से बाहर वीडियो को आधार बनाकर पूरे पुलिस-प्रशासन को कठघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं होगा। सरकार ने अधिकारियों को स्कूलों में भेजकर जमीनी हकीकत जानने का रास्ता चुना है, जिसका परिणाम तथ्यों के सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम में सरकार की परीक्षा केवल विपक्ष के आरोपों से नहीं, बल्कि उसके काम से होनी है। यदि रास्ता खराब है तो रास्ता बने, शिक्षक कम हैं तो शिक्षक आएं, भोजन और पानी की शिकायत है तो उसका समाधान हो। सरकार ने अधिकारियों को सीधे बच्चों से संवाद का निर्देश देकर कम से कम यह संकेत दिया है कि शिकायतों को कागजी रिपोर्ट तक सीमित रखने के बजाय जमीन पर जाकर देखने की कोशिश की जा रही है।


