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Monday, June 15, 2026

अमेरिका-ईरान समझौते से थमी जंग की आग, लेकिन शांति की राह अब भी कठिन

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नई दिल्ली
108 दिनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते के ऐलान ने दुनिया को बड़ी राहत दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने जन्मदिन पर इस समझौते को कूटनीतिक सफलता बताया, जबकि तेहरान ने भी लंबी वार्ता के बाद समझौते के मसौदे पर सहमति जताई है। हालांकि अभी इस समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर होना बाकी है, लेकिन इसके ऐलान के साथ ही वैश्विक राजनीति में नई बहस छिड़ गई है कि इस संघर्ष में वास्तविक बढ़त किस पक्ष को मिली।

विश्लेषकों के अनुसार समझौते के मौजूदा स्वरूप में ईरान अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है। अमेरिका का प्रमुख उद्देश्य ईरानी सत्ता व्यवस्था पर दबाव बनाकर बड़े राजनीतिक बदलाव लाना था, लेकिन तेहरान का नेतृत्व और शासन व्यवस्था पूरी तरह कायम रही। लंबे सैन्य संघर्ष और भारी दबाव के बावजूद ईरान ने अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखते हुए वार्ता की मेज तक पहुंचने में सफलता हासिल की।

इस पूरे घटनाक्रम में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे अहम केंद्र बना रहा। वैश्विक तेल आपूर्ति पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर ईरान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाया, जिसके चलते अमेरिका को भी अपने रुख में नरमी दिखानी पड़ी। समझौते के तहत समुद्री नाकाबंदी हटाने और होर्मुज मार्ग को पुनः खोलने पर सहमति बनने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद है।

हालांकि कई महत्वपूर्ण मुद्दे अब भी अधूरे हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और इसे भविष्य की वार्ताओं के लिए छोड़ दिया गया है। वहीं ईरान की फ्रीज की गई अरबों डॉलर की संपत्तियों को जारी करने तथा तेल निर्यात पर प्रतिबंधों में राहत की चर्चा ने इस समझौते को तेहरान के लिए आर्थिक रूप से भी लाभकारी बना दिया है।

दूसरी ओर, इजरायल की चुप्पी और उसके कड़े रुख ने समझौते की सफलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इजरायली नेतृत्व ने संकेत दिए हैं कि वह अपने सैन्य अभियानों को रोकने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में मध्य-पूर्व में स्थायी शांति की राह अभी भी आसान नहीं दिखती।

फिलहाल यह समझौता पूर्ण समाधान से अधिक एक प्रारंभिक ढांचा माना जा रहा है। इसके बावजूद युद्ध की विभीषिका से जूझ रही दुनिया के लिए यह राहत का संदेश लेकर आया है। आने वाले दिनों में जब समझौते की पूरी शर्तें सामने आएंगी, तभी यह स्पष्ट होगा कि कूटनीतिक जीत किसके हिस्से में गई, लेकिन इतना तय है कि इस पहल ने युद्ध की आग को शांत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।

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