नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर को रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से संबंधित नए कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस कानून के तहत अमेरिका को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार मिल गया है। हालांकि, कानून लागू होते ही भारत पर 100 फीसदी शुल्क लगना तय नहीं है; यह अमेरिकी राष्ट्रपति के निर्णय और कानून में तय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
इस पूरे मामले में अमेरिका की नीति पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि इसी कानून में अमेरिकी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए रूस से कम संवर्धित यूरेनियम के आयात को विशेष छूट दी गई है। आंकड़ों के मुताबिक 2025 में अमेरिका ने रूस से करीब 1.02 अरब डॉलर का संवर्धित यूरेनियम खरीदा, जो उसके कुल संवर्धित यूरेनियम आयात का करीब 23.42 फीसदी था। रूस अमेरिकी परमाणु उद्योग के लिए संवर्धित यूरेनियम का सबसे बड़ा विदेशी स्रोत बना हुआ है।
भारत की रूसी तेल पर बड़ी निर्भरता
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है। पश्चिम एशिया में आपूर्ति संबंधी संकट के बीच रूस से आने वाला कच्चा तेल भारतीय ऊर्जा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाली कंपनी के आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में भारत ने रूस से करीब 20.8 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो भारत के कुल तेल आयात का लगभग 45 फीसदी था। इससे पहले जून और जुलाई में रूसी तेल की हिस्सेदारी 50 फीसदी से अधिक रही थी।
अमेरिका का नया कानून रूस से तेल खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदार देशों पर 100 फीसदी तक शुल्क लगाने का अधिकार देता है। भारत और चीन इस व्यवस्था के दायरे में आ सकते हैं। लेकिन फिलहाल इसे भारत पर लगाया गया 100 फीसदी शुल्क नहीं माना जा सकता, क्योंकि अंतिम निर्णय अमेरिकी प्रशासन को करना है और कानून में कुछ परिस्थितियों में छूट देने का प्रावधान भी है।
भारत सरकार ने इस मामले में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता बताया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत बदलती वैश्विक परिस्थितियों और बाजार के आधार पर अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है। नई दिल्ली ने अमेरिका के साथ बातचीत में इस कानून के भारत-अमेरिका संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित प्रभाव को भी स्पष्ट किया है।
अमेरिका की नीति पर उठे सवाल
एक ओर अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर उसके परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में रूसी संवर्धित यूरेनियम की महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है। अमेरिकी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की ईंधन जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से होने वाले यूरेनियम आयात को नए कानून में विशेष छूट मिलना इसी अंतर को उजागर करता है।
भारत के लिए आगे की चुनौती दोहरी है—एक तरफ सस्ती और लगातार ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना और दूसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को संतुलित रखना। यदि अमेरिकी प्रशासन भारत पर भारी शुल्क लागू करता है तो इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ सकता है, क्योंकि अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान महंगा हो जाएगा। हालांकि वास्तविक प्रभाव शुल्क की दर, किन वस्तुओं पर शुल्क लगाया जाता है और इसे कब लागू किया जाता है, इन बातों पर निर्भर करेगा।


