नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदोन्नति की कोलेजियम व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि सिफारिशों के पीछे कारण सार्वजनिक न किए जाने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि इससे एक ओर योग्य और ईमानदार न्यायाधीशों के साथ अन्याय होता है, वहीं दूसरी ओर ऐसे लोगों के न्यायपालिका में आने की संभावना बढ़ जाती है, जिनकी टिप्पणियां संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं होतीं।
शनिवार को आयोजित एक विधिक परिचर्चा में जस्टिस भुइयां ने कहा कि उन्होंने कोलेजियम के हालिया प्रस्तावों में देखा है कि न्यायाधीशों की पदोन्नति के पीछे कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटने जैसा नहीं है। उनके अनुसार, नियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया में कारणों का उल्लेख किया जाना चाहिए, ताकि योग्य उम्मीदवारों का उचित मूल्यांकन हो सके और पूरी प्रक्रिया अधिक जवाबदेह बने।
उन्होंने कहा कि कारणों के अभाव में कई उत्कृष्ट न्यायाधीशों की अनदेखी हो जाती है, जबकि कुछ ऐसे लोगों को अवसर मिल जाता है, जो बाद में समाज के किसी वर्ग के बारे में असंवैधानिक और आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हैं। जस्टिस भुइयां ने नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और गंभीर विमर्श की आवश्यकता बताते हुए कहा कि इससे न्यायपालिका में जनता का विश्वास और मजबूत होगा।
इस दौरान उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से एक पूर्व उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की विवादित टिप्पणी का भी उल्लेख किया। वहीं, मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत के पूर्व बयान का हवाला देते हुए बताया गया कि कोलेजियम किसी भी नाम की सिफारिश करते समय न्यायाधीश के कार्य, अनुभव, वरिष्ठता, ईमानदारी और पेशेवर रिकॉर्ड सहित कई पहलुओं पर विचार करता है। हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट में भी न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा प्रमुखता से उठता रहा है।


