33.4 C
Lucknow
Saturday, August 8, 2026

आजीविका मिशन से मिला प्रशिक्षण तो श्वेता ने अर्जित किया सम्मान

Must read

 

ग्रामीण महिलाओं के लिए योगी सरकार ने खोली आत्मनिर्भरता की राह

घर की चौखट से बाहर निकलीं तो मिली नई पहचान, सेवा से मिला आय का जरिया

पशु सखी श्वेता बनीं गांव का भरोसा, 300 से अधिक बकरियों तक पहुंचाई स्वास्थ्य सेवाएं

लखनऊ, 08 अगस्त : घर-परिवार और खेत की जिम्मेदारियों तक सीमित रहीं कानपुर देहात के अकबरपुर ब्लॉक की रहने वाली श्वेता अब गांव में पशुपालकों की भरोसेमंद साथी बन चुकी हैं। योगी सरकार के आजीविका मिशन से जुड़कर पशु सखी बनीं 32 वर्षीय श्वेता ने पिछले करीब एक वर्ष में 120 घरों की 300 से अधिक बकरियों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई हैं। हालिया कृमिनाशन अभियान में भी उन्होंने करीब 350 से 360 बकरियों तक दवा पहुंचाई। जिससे उन्हें गांव में नई पहचान और सम्मान मिला तो साल भर में करीब 30 हजार रुपये की आय ने परिवार को आर्थिक सहारा भी दिया।

तीन दिन के प्रशिक्षण ने दिखाई नई राह

पति, दो बच्चों और सास-ससुर के साथ रहने वाली श्वेता पहले घर और खेत से जुड़े काम संभालती थीं। पति तहसील में कार्यरत हैं, लेकिन परिवार के बढ़ते खर्च के बीच श्वेता भी आर्थिक जिम्मेदारियों में हाथ बंटाना चाहती थीं। इसी दौरान ग्राम पंचायत की समूह सखी से उन्हें पशु सखी कार्यक्रम की जानकारी मिली। चयन के बाद आजीविका मिशन से मिले तीन दिन के प्रशिक्षण ने उनके लिए आगे बढ़ने का रास्ता खोल दिया। प्रशिक्षण पूरा कर उन्होंने पशु सखी के रूप में काम शुरू किया और बकरी पालने वाले परिवारों तक पहुंचने लगीं।

दवा के साथ बीमारी से बचाव की भी दे रहीं जानकारी

श्वेता का काम केवल पशुपालकों तक दवा पहुंचाने तक सीमित नहीं है। वह उन्हें बकरियों में होने वाली बीमारियों, समय पर टीकाकरण और बेहतर देखभाल के बारे में भी जागरूक करती हैं। लगातार गांव-गांव पहुंचने और पशुपालकों से जुड़ने का असर यह हुआ कि एक साल में उनकी सेवाओं का दायरा 120 परिवारों तक पहुंच गया।

अब तक 300 से अधिक बकरियों तक उनकी सेवाओं का लाभ पहुंचा है। हालिया कृमिनाशन अभियान में श्वेता ने करीब 350 से 360 बकरियों तक दवा पहुंचाई। इससे क्षेत्र में पशुओं की सेहत और समय पर उपचार को लेकर पशुपालकों में जागरूकता भी बढ़ी है।

अब ज्यादा सम्मान देते हैं लोग, लेने आते हैं सलाह

पशु सखी बनने से श्वेता की केवल आमदनी ही नहीं बढ़ी, बल्कि गांव में उनकी पहचान भी बदल गई। कभी लोग उन्हें केवल परिवार की बहू के रूप में जानते थे। अब बकरियों के बीमार पड़ने या उनकी देखभाल से जुड़ी जरूरत होने पर पशुपालक श्वेता से संपर्क करते हैं। उनकी सलाह पर बकरियों को दवा और टीकाकरण कराने वाले पशुपालक जरूरत पड़ने पर दोबारा उनसे संपर्क करते हैं। लोगों का यही भरोसा उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि बन गया है। श्वेता कहती हैं, “अब लोग हमारी बात समझते हैं और सम्मान के साथ बुलाते हैं।”

30 हजार की कमाई से बच्चों की पढ़ाई में मदद

पशुओं की सेवा श्वेता के लिए आय का जरिया भी बनी है। करीब एक वर्ष में उन्होंने लगभग 30 हजार रुपये कमाए हैं। इसका इस्तेमाल उन्होंने दवाओं की व्यवस्था के साथ बच्चों की पढ़ाई और घर की जरूरतों को पूरा करने में किया। श्वेता के लिए अपनी कमाई का महत्व केवल रुपये तक सीमित नहीं है। इससे उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों में भागीदारी करने और अपने फैसले लेने का आत्मविश्वास भी मिला है।

श्वेता के लिए पशु सखी बनने की राह आसान नहीं थी। शुरुआत में कई गांवों तक पैदल पहुंचना भी बड़ी चुनौती थी। इसके बावजूद उन्होंने काम जारी रखा। धीरे-धीरे जब पशुपालकों का भरोसा बढ़ा और काम के बेहतर नतीजे सामने आने लगे तो नजरिया भी बदल गया। जिस काम को लेकर शुरुआत में झिझक थी, उसी काम ने श्वेता को गांव में सम्मान और परिवार में आर्थिक भागीदारी का अवसर दिया।

घर की चौखट से बाहर आने पर मिली आत्मनिर्भरता तक पहुंचने की नई राह

अब श्वेता अपने काम को और आगे बढ़ाना चाहती हैं। उनका सपना अपनी आमदनी बढ़ाकर बच्चों को अच्छी शिक्षा देने और बेहतर भविष्य तैयार करने का है। साथ ही वह चाहती हैं कि गांव में उनकी पहचान अच्छे काम और पशुपालकों की सेवा के लिए हो। आजीविका मिशन से मिली पशु सखी की जिम्मेदारी ने उनके लिए घर की चौखट से आत्मनिर्भरता तक पहुंचने की नई राह खोल दी है।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article