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Monday, July 6, 2026

हिंद-प्रशांत में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत है प्रधानमंत्री का तीन देशों का दौरा

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शरद कटियार

प्रधानमंत्री का इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का तीन देशों का दौरा केवल एक नियमित विदेश यात्रा नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की रणनीतिक सोच, आर्थिक प्राथमिकताओं और सांस्कृतिक कूटनीति का महत्वपूर्ण प्रतिबिंब है। ऐसे समय में जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है, भारत की सक्रिय भागीदारी इस पूरे क्षेत्र के शक्ति संतुलन में निर्णायक महत्व रखती है।

इंडोनेशिया भारत का केवल एक पड़ोसी समुद्री साझेदार नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों से जुड़ा देश है। रामायण और महाभारत की परंपराएं, मंदिर स्थापत्य, समुद्री व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान दोनों देशों के रिश्तों की गहराई को दर्शाते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का जकार्ता दौरा केवल राजनयिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि साझा विरासत को आधुनिक साझेदारी में बदलने का प्रयास भी है। यदि इस यात्रा के दौरान रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में ठोस समझौते होते हैं, तो दोनों देशों के संबंध नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा का केंद्र है। समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, तकनीकी सहयोग और रणनीतिक संतुलन जैसे विषय अब केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक महत्व के बन चुके हैं। भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और ‘सागर’ (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) की अवधारणा इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा हैं। भारत लगातार यह संदेश दे रहा है कि वह किसी टकराव की राजनीति का पक्षधर नहीं, बल्कि नियम-आधारित, शांतिपूर्ण और सहयोगात्मक व्यवस्था का समर्थक है।

ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा भी इसी रणनीतिक सोच की अगली कड़ी है। ऑस्ट्रेलिया भारत का एक महत्वपूर्ण रक्षा, शिक्षा, ऊर्जा और खनिज साझेदार बन चुका है। वहीं न्यूजीलैंड के साथ कृषि, डेयरी, शिक्षा, पर्यटन और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। इन देशों के साथ संबंधों को मजबूत करना केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की विश्वसनीय उपस्थिति को भी सुदृढ़ करता है।

विदेश नीति का वास्तविक उद्देश्य केवल उच्चस्तरीय बैठकों और संयुक्त घोषणाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। किसी भी विदेश दौरे की सफलता इस बात से तय होती है कि उससे देश के नागरिकों, उद्योगों, किसानों, विद्यार्थियों और युवाओं को कितना प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। यदि इन यात्राओं से व्यापार बढ़ता है, भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर खुलते हैं, निवेश आता है, तकनीक का आदान-प्रदान होता है और रोजगार के नए अवसर सृजित होते हैं, तभी इनका वास्तविक महत्व सिद्ध होगा।

आज भारत विश्व की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। ऐसे में वैश्विक मंचों पर उसकी भूमिका भी लगातार बढ़ रही है। भारत अब केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि विश्वसनीय साझेदार, लोकतांत्रिक शक्ति और वैश्विक दक्षिण की मजबूत आवाज के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। यही कारण है कि विश्व के अनेक देश भारत के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को प्राथमिकता दे रहे हैं।

हालांकि विदेश नीति में बढ़ती सक्रियता के साथ अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों की मजबूती का लाभ देश के विकास, आर्थिक प्रगति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और आम नागरिक के जीवन स्तर में सुधार के रूप में भी दिखाई दे। कूटनीति तभी सफल मानी जाएगी, जब उसका प्रभाव सीमाओं से निकलकर समाज और अर्थव्यवस्था तक पहुंचे।

प्रधानमंत्री का यह तीन देशों का दौरा इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा प्रतीत होता है। यदि इस यात्रा से रणनीतिक सहयोग गहरा होता है, आर्थिक समझौते मजबूत होते हैं और सांस्कृतिक रिश्तों को नई ऊर्जा मिलती है, तो यह न केवल भारत की विदेश नीति की सफलता होगी, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का भी सशक्त प्रमाण बनेगी।यदि चाहें, इसे ‘यूथ इंडिया’ की संपादकीय शैली में और अधिक प्रभावशाली, विश्लेषणात्मक तथा अख़बार के प्रथम पृष्ठ के अनुरूप भी तैयार किया जा सकता है।

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