लखनऊ। राजधानी में साइबर अपराध का एक खतरनाक और तेजी से फैलता ट्रेंड सामने आया है,‘डिजिटल अरेस्ट’। इस नए जाल में फंसाकर साइबर ठगों ने एक रिटायर्ड महिला डॉक्टर से ₹1.55 करोड़ की भारी-भरकम रकम ठग ली। मामला सामने आने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है और जांच एजेंसियां अब इस हाई-प्रोफाइल साइबर गैंग की तलाश में जुट गई हैं।
जानकारी के अनुसार, ठगों ने खुद को एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड और नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी का अधिकारी बताते हुए डॉक्टर को कॉल किया। बातचीत इतनी सुनियोजित और डर पैदा करने वाली थी कि डॉक्टर को यकीन हो गया कि वह किसी गंभीर कानूनी संकट में फंस चुकी हैं। ठगों ने कहा कि उनके नाम से मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी फंडिंग जैसे गंभीर आरोप जुड़े हैं और उन्हें तुरंत “डिजिटल अरेस्ट” किया जा रहा है।
इसके बाद शुरू हुआ मनोवैज्ञानिक दबाव का खेल। पीड़िता को वीडियो कॉल पर रखा गया, घर से बाहर न जाने और किसी से बात न करने की सख्त हिदायत दी गई। लगातार कई घंटों तक ‘पूछताछ’ के नाम पर उन्हें मानसिक रूप से तोड़ा गया। इस दौरान ठगों ने उन्हें “जांच सहयोग” के नाम पर अपने बैंक खातों से रकम ट्रांसफर करने को कहा।
सूत्रों के अनुसार, अलग-अलग ट्रांजैक्शन में कुल ₹1.55 करोड़ की राशि ठगों के खातों में ट्रांसफर कर दी गई। रकम मिलते ही ठगों ने फोन बंद कर दिया और पूरा नेटवर्क गायब हो गया।
यूपी पुलिस के साइबर सेल अधिकारियों के मुताबिक, ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगी का नया और बेहद खतरनाक तरीका बनकर उभरा है। इसमें ठग खुद को पुलिस, सीबीआई , एनआईए या किसी अन्य केंद्रीय एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ित को डराते हैं। फर्जी आईडी, वर्दी, बैकग्राउंड और वीडियो कॉल के जरिए माहौल इतना वास्तविक बना दिया जाता है कि आम व्यक्ति घबरा जाता है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी ) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2024-25 के दौरान साइबर ठगी के मामलों में लगभग 28% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसमें सबसे ज्यादा मामले “इम्पर्सोनेशन फ्रॉड” यानी किसी अधिकारी बनकर ठगी करने के हैं।
पुलिस जांच में क्या सामने आया?
लखनऊ पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है और ट्रांजैक्शन डिटेल्स के आधार पर खातों को ट्रेस करने का प्रयास किया जा रहा है। शुरुआती जांच में यह गिरोह अंतरराज्यीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ा होने की आशंका जताई जा रही है। कुछ बैंक खाते पूर्वोत्तर राज्यों और विदेशी सर्वरों से लिंक पाए गए हैं।
साइबर एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह के मामलों में ठग पहले पीड़ित की प्रोफाइलिंग करते हैं—जैसे उम्र, पेशा, आर्थिक स्थिति—और फिर उसी हिसाब से स्क्रिप्ट तैयार करते हैं।
यह मामला सिर्फ एक ठगी नहीं, बल्कि सिस्टम और आम नागरिकों के बीच भरोसे के दुरुपयोग की कहानी है। पुलिस बार-बार स्पष्ट कर चुकी है कि कोई भी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर “डिजिटल अरेस्ट” नहीं करती और न ही पैसे ट्रांसफर करने को कहती है।
रिटायर्ड डॉक्टर से ₹1.55 करोड़ की ठगी, एटीएस -एनआईए बनकर साइबर गिरोह का हाईटेक हमला


