– एक ही भवन में दो स्कूल मामला अब सुप्रीम कोर्ट की ओर
– अन्य मसलों मे अवधेश के खिलाफ हाईकोर्ट में 23 अप्रैल को सुनवाई
फर्रुखाबाद। नवाबगंज क्षेत्र का एसकेएम इंटर कॉलेज इन दिनों गंभीर आरोपों के केंद्र में है। आरोप है कि यहां शिक्षा को सेवा नहीं, बल्कि “कमाई के मॉडल” में बदल दिया गया है,जहां बच्चों को स्कूल प्रबंधन द्वारा तय स्रोत से ही किताबें खरीदने के लिए बाध्य किया जा रहा है। एनसीईआरटी की किताबों को न चला कर शासनादेश का खुला उल्लंघन किया जा रहा है। अभिभावकों का कहना है कि खुले बाजार में सस्ती उपलब्ध किताबें लेने की छूट नहीं दी जा रही, जिससे सीधे तौर पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
मामले का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू एक ही भूमि व भवन पर दो अलग-अलग संस्थानों—कृष्णा पब्लिक स्कूल और एसकेएम इंटर कॉलेज, खानपुर—के संचालन का है। सूत्रों के मुताबिक, इसी आधार पर मान्यता से जुड़ी कार्यवाही शुरू हुई थी, लेकिन अवधेश मिश्रा द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत तथ्यों के जरिए कार्रवाई को रुकवा दिया गया। सवाल उठ रहा है कि क्या मान्यता नियमों की अनदेखी कर दो संस्थान एक ही परिसंपत्ति पर संचालित किए जा रहे हैं?
प्रबंधन की भूमिका भी कठघरे में है।
प्रबंधक अवधेश कुमार मिश्रा को लेकर स्थानीय स्तर पर कई आरोप चर्चा में हैं—कथित तौर पर उसके खिलाफ विभिन्न आपराधिक मुकदमे लंबित हैं और प्रशासनिक कार्रवाई से बचने के लिए लगातार न्यायालयों का दरवाजा खटखटाने की बात सामने आई है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच का विषय है, लेकिन विवाद ने शिक्षा तंत्र की साख पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
शासन-प्रशासन के स्तर पर भी इस मामले की गूंज सुनाई दे रही है। शिक्षा विभाग के नियम स्पष्ट कहते हैं कि मान्यता प्राप्त संस्थान को निर्धारित मानकों भूमि, भवन, स्टाफ और संसाधनों का पालन करना अनिवार्य है। एक ही परिसर में अलग-अलग संस्थानों का संचालन, यदि नियमों के विपरीत पाया गया, तो मान्यता निरस्त तक की कार्रवाई संभव है।जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट मे अब मामला पहुंच रहा है।
उधर अवधेश के खिलाफ अन्य मामले न्यायिक कसौटी पर है। 23 अप्रैल को इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई प्रकरण से जुड़े मामलों की सुनवाई प्रस्तावित है।
क्या एक ही भवन पर दो संस्थानों का संचालन वैध है?
उठे ये सवाल सिर्फ एक स्कूल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की पारदर्शिता पर चोट करते हैं। अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला “शिक्षा के नाम पर सिस्टमेटिक शोषण” का उदाहरण बन सकता है। अब नजर 23 अप्रैल की सुनवाई पर है जहां तय होगा कि बच्चों की पढ़ाई का भविष्य नियमों से चलेगा या प्रबंधन की मनमानी से।


