शरद कटियार
बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर केंद्र सरकार की प्रस्तावित नई पहल महत्वपूर्ण बहस को जन्म देती है। स्कूलों के आसपास हाई फैट, शुगर और साल्ट यानी एचएफएसएस वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री और उनके विज्ञापन पर रोक लगाने की तैयारी का उद्देश्य स्पष्ट रूप से बच्चों को कम उम्र से ही अस्वास्थ्यकर खानपान की आदतों से बचाना है। चिप्स, मीठे पेय, बर्गर, नूडल्स और पैकेज्ड स्नैक्स जैसे उत्पाद बच्चों के बीच खासे लोकप्रिय हैं और इनकी आसान उपलब्धता उनकी खानपान की पसंद को प्रभावित करती है।
बच्चों के लिए स्कूल केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि उनके व्यवहार और जीवनशैली के निर्माण की जगह भी है। ऐसे में स्कूल परिसर और उसके आसपास मिलने वाले खाद्य पदार्थों का उनकी आदतों पर असर पड़ना स्वाभाविक है। यदि किसी बच्चे को स्कूल से बाहर निकलते ही ऐसे खाद्य पदार्थ आसानी से उपलब्ध हों, तो केवल कक्षा में स्वास्थ्य और पोषण की शिक्षा देना पर्याप्त नहीं होगा। इसलिए स्कूलों के आसपास स्वस्थ खानपान का वातावरण बनाना भी जरूरी है।
प्रस्तावित व्यवस्था में स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में एचएफएसएस खाद्य पदार्थों की बिक्री और विज्ञापन पर रोक लगाने की बात कही जा रही है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो बच्चों को अत्यधिक नमक, चीनी और वसा वाले खाद्य पदार्थों से दूरी बनाने में मदद मिल सकती है। लेकिन किसी भी प्रतिबंध को लागू करने से पहले उसके व्यावहारिक पक्ष पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
स्कूलों के आसपास छोटी-छोटी दुकानें, ठेले और खाने-पीने के स्टॉल चलाने वाले अनेक परिवारों की आजीविका इन्हीं गतिविधियों पर निर्भर रहती है। ऐसे में अचानक प्रतिबंध लगाने से छोटे कारोबारियों की आय प्रभावित हो सकती है। इसलिए नीति का उद्देश्य केवल बिक्री रोकना नहीं, बल्कि स्वस्थ विकल्प उपलब्ध कराना भी होना चाहिए।
जरूरत इस बात की है कि दुकानदारों और स्टॉल संचालकों को स्वस्थ खाद्य पदार्थ बेचने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। स्थानीय स्तर पर फल, दूध, दही, अंकुरित अनाज, पौष्टिक स्नैक्स और अन्य स्वास्थ्यवर्धक विकल्पों को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे बच्चों को बेहतर विकल्प मिलेंगे और छोटे कारोबारियों की आजीविका पर भी अनावश्यक दबाव नहीं पड़ेगा।
इसके साथ ही जिम्मेदारी केवल दुकानदारों की नहीं हो सकती। माता-पिता, स्कूल प्रशासन, खाद्य कंपनियां और सरकार,सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। बच्चों को स्वस्थ भोजन के फायदे समझाने के साथ अभिभावकों को भी घर में संतुलित आहार की आदत विकसित करनी होगी। स्कूलों में भी पोषण संबंधी जागरूकता को पाठ्यक्रम और गतिविधियों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रतिबंध केवल कागजों तक सीमित न रहे। स्पष्ट नियम, पारदर्शी मानक, नियमित निगरानी और दुकानदारों को पर्याप्त जानकारी के बिना किसी व्यवस्था का प्रभावी क्रियान्वयन कठिन होगा। साथ ही विज्ञापनों पर रोक के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जरूरी होंगे।
बच्चों का स्वास्थ्य किसी भी समाज की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में होना चाहिए। इसलिए स्कूलों के आसपास अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की उपलब्धता कम करने की पहल का उद्देश्य महत्वपूर्ण है। लेकिन इसका रास्ता ऐसा होना चाहिए जिसमें बच्चों का स्वास्थ्य सुरक्षित हो, अभिभावकों को बेहतर विकल्प मिलें और छोटे कारोबारियों की आजीविका पर भी संतुलित तरीके से विचार किया जाए।
स्वस्थ बचपन केवल बीमारी से बचने का नाम नहीं है। यह ऐसी जीवनशैली विकसित करने का प्रयास है, जिसका लाभ व्यक्ति को पूरी जिंदगी मिले। यदि प्रस्तावित नीति इसी व्यापक सोच के साथ लागू होती है, तो स्कूलों के आसपास का माहौल बच्चों के लिए अधिक स्वस्थ और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक सार्थक कदम साबित हो सकता है।


