शरद कटियार
ग्रेटर नोएडा के यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस का आग का गोला बन जाना और उसमें नौ यात्रियों की मौत महज एक सड़क हादसा नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था के सामने खड़ा हुआ गंभीर सवाल है, जिसके भरोसे हजारों यात्री रोजाना लंबी दूरी की बसों में सफर करते हैं।
रात का समय था। बस दिल्ली से महोबा जा रही थी। यात्री सो रहे थे। अचानक धुआं उठा, जलने की गंध आई और देखते ही देखते बस आग की लपटों में घिर गई। यात्रियों ने कथित तौर पर चालक को बस रोकने के लिए कहा। इसके बाद जो हुआ, वह किसी भयावह त्रासदी से कम नहीं था। कई यात्रियों ने खिड़कियां तोड़कर और कूदकर अपनी जान बचाई, लेकिन नौ लोगों को जिंदगी बचाने का मौका नहीं मिल सका।
यहां सबसे बडी बात केवल यह नहीं है कि आग कैसे लगी? असली बात यह है कि क्या बस में यात्रियों की सुरक्षा के लिए सभी अनिवार्य इंतजाम मौजूद थे?
स्लीपर बसें सामान्य बसों से अलग होती हैं। इनमें यात्री सोते हैं और आपात स्थिति में प्रतिक्रिया देने का समय बेहद कम होता है। ऐसे वाहनों के फिटनेस प्रमाणपत्र, अग्निशमन उपकरण, आपातकालीन निकास, वायरिंग, बैटरी और एसी सिस्टम की जांच कितनी गंभीरता से होती है,यमुना एक्सप्रेसवे का हादसा इस पर सवाल खड़ा करता है।
यदि वाहन फिटनेस के मानकों पर खरा उतरता था, तो फिर इतनी तेजी से आग फैलने की स्थिति कैसे बनी? यदि सुरक्षा उपकरण मौजूद थे, तो क्या वे काम कर रहे थे? यदि आपातकालीन निकास था, तो यात्रियों को बाहर निकलने के लिए खिड़कियां क्यों तोड़नी पड़ीं?
इन सवालों के जवाब परिवहन विभाग, बस संचालक और जांच एजेंसियों को देने होंगे।
देश और प्रदेश में वाहन फिटनेस को लेकर व्यवस्था बनाई गई है। लेकिन यदि फिटनेस जांच केवल कागजी प्रक्रिया बन जाए तो नियमों का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
स्लीपर बसों की जांच केवल टायर, ब्रेक और हॉर्न तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इलेक्ट्रिकल वायरिंग, एसी यूनिट, बैटरी, फायर एक्सटिंग्विशर, इमरजेंसी विंडो, आपातकालीन दरवाजे और यात्रियों की सुरक्षित निकासी की भी गंभीर जांच आवश्यक है।
यमुना एक्सप्रेसवे की यह घटना बताती है कि नियम पुस्तिका में सुरक्षा और वास्तविक सड़क पर सुरक्षा,इन दोनों के बीच की दूरी को खत्म करना जरूरी है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। संकट की घड़ी में यह सहायता परिवारों के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन नौ जिंदगियों की कीमत किसी मुआवजे से पूरी नहीं हो सकती।
मुआवजे के साथ यह भी तय होना चाहिए कि हादसा क्यों हुआ, सुरक्षा व्यवस्था कहां विफल हुई और भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए कौन जिम्मेदार विभाग क्या कदम उठाएगा।
चालक और परिचालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन जांच का दायरा इससे कहीं बड़ा होना चाहिए।
यह भी देखा जाना चाहिए कि बस का फिटनेस प्रमाणपत्र कब जारी हुआ था, अंतिम निरीक्षण कब हुआ था, उसमें अग्निशमन उपकरण और आपातकालीन निकास की स्थिति क्या थी, बस में निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन हुआ था या नहीं और संचालन से पहले संबंधित अधिकारियों ने क्या जांच की थी।
यदि कहीं लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए,चाहे वह बस संचालक की हो या निगरानी तंत्र की।
यमुना एक्सप्रेसवे का यह हादसा चेतावनी है। प्रदेश में चलने वाली प्रत्येक स्लीपर बस को लेकर परिवहन विभाग को विशेष सुरक्षा ऑडिट कराना चाहिए। फिटनेस जांच को पारदर्शी बनाया जाए, पुराने और असुरक्षित वाहनों की दोबारा जांच हो तथा आपातकालीन निकास और अग्निशमन व्यवस्था की मौके पर जांच की जाए।
सड़क पर चलने वाली बस में यात्री सिर्फ किराया नहीं देता, वह अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी व्यवस्था को सौंपता है।
इस भरोसे को टूटने नहीं दिया जा सकता।
यमुना एक्सप्रेसवे पर नौ जिंदगियां चली गईं। अब यह सरकार और परिवहन विभाग पर निर्भर है कि इस हादसे को सिर्फ एक और दुर्घटना मानकर फाइल बंद की जाती है या इसे यात्री सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की शुरुआत बनाया जाता है।
स्लीपर बसें या चलते-फिरते मौत के डिब्बे?


