किसी भी देश का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के हाथों में होता है। युवा स्वस्थ, शिक्षित और अनुशासित होंगे तो समाज और राष्ट्र की दिशा भी मजबूत होगी। इसके विपरीत यदि युवा नशे की गिरफ्त में आते हैं तो इसका असर केवल उनके स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक व्यवस्था और अंततः देश की उत्पादक शक्ति पर भी पड़ता है। ऐसे समय में फर्रुखाबाद में ब्रह्माकुमारीज की ओर से चलाया गया 10 करोड़ नशा मुक्ति प्रतिज्ञा महा अभियान एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहल के रूप में सामने आया है।
इस अभियान के तहत जिले के चार विद्यालयों में 1563 विद्यार्थियों ने नशे से दूर रहने का संकल्प लिया। संख्या भले ही 1563 हो, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश कहीं बड़ा है। एक विद्यार्थी का नशे से दूर रहने का निर्णय केवल उसके व्यक्तिगत जीवन को नहीं बदलता, बल्कि उसके परिवार और आसपास के लोगों को भी प्रभावित कर सकता है। यदि यही सोच हजारों और लाखों युवाओं तक पहुंचती है तो समाज में बड़ा सकारात्मक बदलाव संभव है।
बीके बहन ने विद्यार्थियों को नशे के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करते हुए अपनी ऊर्जा शिक्षा, सकारात्मक सोच और रचनात्मक कार्यों में लगाने का संदेश दिया। वास्तव में युवा शक्ति के सामने आज अवसरों की कमी नहीं है। जरूरत केवल इस बात की है कि उनकी ऊर्जा सही दिशा में लगे। नशा उस ऊर्जा को भीतर से कमजोर करता है, जबकि शिक्षा, खेल, कौशल, तकनीक और रचनात्मक गतिविधियां उसे राष्ट्र निर्माण की शक्ति में बदल सकती हैं।
फर्रुखाबाद के चार विद्यालयों में आयोजित कार्यक्रम की खास बात यह रही कि इसमें विद्यार्थियों को केवल नशे के नुकसान बताए ही नहीं गए, बल्कि उन्हें अपने परिवार और समाज को भी नशामुक्त बनाने में सहयोग करने का संकल्प दिलाया गया। स्वामी रामानंद इंटर कॉलेज की 950 छात्राओं समेत गीतिका रस्तोगी हाई सेकेंडरी स्कूल के 225, डॉ. बीआर आंबेडकर आदर्श प्राथमिक विद्यालय के 288 और सनराइज पब्लिक स्कूल के 100 विद्यार्थियों ने इस अभियान में भाग लिया।
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठता है कि क्या केवल शपथ लेने से नशे की समस्या समाप्त हो जाएगी? निश्चित रूप से नहीं। प्रतिज्ञा शुरुआत है, मंजिल नहीं। नशामुक्त समाज के लिए परिवार, विद्यालय, प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और सामाजिक संगठनों को मिलकर लगातार काम करना होगा। बच्चों और युवाओं को नशे से होने वाले नुकसान की जानकारी देने के साथ उन्हें स्वस्थ विकल्प और सकारात्मक वातावरण उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
विद्यालयों की भूमिका इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण है। स्कूल केवल शिक्षा देने की जगह नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण के केंद्र हैं। शिक्षकों को विद्यार्थियों के व्यवहार में होने वाले बदलावों पर नजर रखनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर परिवार से संवाद करना चाहिए। खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों, योग, ध्यान और कौशल विकास जैसे कार्यक्रम युवाओं को सकारात्मक दिशा देने में मददगार हो सकते हैं।
परिवार की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बच्चों के साथ संवाद की कमी कई बार उन्हें गलत संगत की ओर धकेल सकती है। माता-पिता को बच्चों की समस्याएं सुनने, उनकी भावनाओं को समझने और उनके मित्रों व गतिविधियों पर सकारात्मक नजर रखने की जरूरत है। डर या दबाव के बजाय विश्वास और संवाद का वातावरण नशे के खिलाफ अधिक प्रभावी हथियार बन सकता है।
समाज को भी यह समझना होगा कि नशे की समस्या केवल किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं है। इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। आर्थिक नुकसान, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां, घरेलू तनाव और सामाजिक अपराध जैसी कई समस्याओं की जड़ नशे की आदत से जुड़ सकती है। इसलिए नशामुक्ति को केवल अभियान या कार्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय इसे निरंतर सामाजिक आंदोलन बनाने की जरूरत है।
ब्रह्माकुमारीज के इस अभियान में विद्यार्थियों की भागीदारी उम्मीद जगाती है। 1563 विद्यार्थियों का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब यह संदेश उनके घरों और समाज तक पहुंचे। एक विद्यार्थी यदि अपने परिवार के पांच सदस्यों को नशे के नुकसान के बारे में जागरूक करता है तो यह अभियान कई गुना व्यापक हो सकता है।
आज जरूरत ऐसे भारत की है जहां युवा नशे के पीछे नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल, रोजगार, खेल, विज्ञान और नवाचार के पीछे दौड़ें। जिस युवा के हाथ में किताब, कौशल और अवसर होंगे, वह देश को आगे ले जाएगा। इसके लिए समाज को युवाओं पर विश्वास करना होगा और उन्हें सही दिशा, बेहतर अवसर और स्वस्थ वातावरण देना होगा।
“नशामुक्त युवा,सशक्त भारत” केवल एक नारा नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे परिवार से विद्यालय और विद्यालय से पूरे समाज तक पहुंचाने का सामूहिक संकल्प बनाना होगा। फर्रुखाबाद के 1563 विद्यार्थियों की यह प्रतिज्ञा इसी बड़े बदलाव की एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण शुरुआत है।
नशामुक्त युवा ही सशक्त भारत की असली ताकत


