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Monday, August 10, 2026

एफसीआरए बिल का विरोध या समर्थन,लेकिन विदेशी फंड पर पहरा जरूरी

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शरद कटियार
विदेशी धन देश की संप्रभुता से बड़ा नहीं हो सकता, लेकिन सरकार की शक्ति भी नागरिक समाज की स्वतंत्रता से बड़ी नहीं होनी चाहिए। यही वह बुनियादी कसौटी है जिस पर प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 यानी एफसीआरए बिल को परखा जाना चाहिए।
विदेशी धन भारत में आए, लेकिन उसका इस्तेमाल किस काम में हो रहा है, किसके हाथ में जा रहा है और उससे देश की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा,इसकी निगरानी सरकार का अधिकार ही नहीं, जिम्मेदारी भी है। मौजूदा एफसीआरए इसी उद्देश्य से विदेशी अंशदान को नियंत्रित करता है। प्रस्तावित विधेयक का सरकारी तर्क भी यही है कि मौजूदा कानून में कुछ प्रशासनिक और कानूनी खामियां हैं, जिन्हें दूर किया जाना जरूरी है।लेकिन सवाल यह है कि नियमन और नियंत्रण के बीच की रेखा कहां खींची जाएगी?
प्रस्तावित कानून में यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त, रद्द, सरेंडर या नवीनीकरण न होने की स्थिति में विदेशी अंशदान और उससे बनी परिसंपत्तियों को एक नामित प्राधिकरण के अधीन रखने की व्यवस्था की जाती है, तो यह बेहद गंभीर शक्ति है। किसी संस्था की इमारत, अस्पताल, स्कूल, उपकरण अथवा अन्य संपत्ति केवल इसलिए सरकारी नियंत्रण में चली जाए कि उसका एफसीआरए दर्जा समाप्त हो गया,तो इसके लिए स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायिक रूप से परखी जा सकने वाली प्रक्रिया अनिवार्य होनी चाहिए।

सरकार का पक्ष भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल यदि धर्मांतरण, राजनीतिक प्रभाव, राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध गतिविधियों या कानून के उल्लंघन में होता है तो कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। भारत कोई ऐसा देश नहीं हो सकता जहां विदेशी धन के नाम पर कोई भी संस्था मनमानी करे। पारदर्शिता हो, हिसाब हो और कानून का पालन हो,इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
आपत्ति तब पैदा होती है जब कानून की भाषा इतनी व्यापक हो जाए कि उसका इस्तेमाल विवेकाधीन कार्रवाई के लिए किया जा सके।
इसीलिए सरकार को विपक्ष और नागरिक समाज की आशंकाओं को केवल राजनीतिक विरोध कहकर खारिज नहीं करना चाहिए। दूसरी तरफ विपक्ष को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह विदेशी धन के नियमन का विरोध कर रहा है या केवल उन प्रावधानों का, जिनसे सरकारी अधिकार अत्यधिक बढ़ सकते हैं।
एफसीआरए जैसा कानून हजारों संस्थाओं, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं के काम को प्रभावित कर सकता है। विधेयक के आधिकारिक विवरण के अनुसार वर्तमान व्यवस्था के तहत लगभग 16,000 संस्थाएं एफसीआरए के तहत पंजीकृत हैं और करीब 22,000 करोड़ वार्षिक विदेशी अंशदान प्राप्त करती हैं। इतनी बड़ी व्यवस्था में एक छोटी कानूनी अस्पष्टता भी हजारों संस्थाओं के लिए बड़ी प्रशासनिक समस्या बन सकती है।
इसलिए सरकार को तीन बातें सुनिश्चित करनी चाहिए,
पहली,हर कार्रवाई का स्पष्ट कारण हो।किसी संस्था का पंजीकरण समाप्त करने या उसकी परिसंपत्तियों पर नियंत्रण लेने से पहले उसे सुनवाई का पर्याप्त अवसर मिले।
दूसरी,मिश्रित धन से बनी संपत्तियों का स्पष्ट समाधान हो।
यदि किसी अस्पताल, स्कूल या भवन के निर्माण में विदेशी धन के साथ भारतीय दान या संस्था का अपना पैसा भी लगा है, तो पूरी संपत्ति को सरकारी नियंत्रण में लेने का सवाल अत्यंत संवेदनशील है। कानून में ऐसी परिस्थितियों का स्पष्ट और न्यायसंगत समाधान होना चाहिए।
तीसरी,न्यायिक समीक्षा का रास्ता मजबूत हो।सरकारी निर्णय अंतिम सत्य नहीं हो सकता। किसी संस्था के अस्तित्व और उसकी संपत्ति पर असर डालने वाले फैसले के खिलाफ प्रभावी अपील और स्वतंत्र न्यायिक जांच का अधिकार होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है।
आज देश को न विदेशी धन की अराजकता चाहिए और न सरकारी शक्ति की निरंकुशता।
भारत की सुरक्षा से समझौता नहीं हो सकता। विदेशी फंडिंग में पारदर्शि

एफसीआरए बिल का विरोध या समर्थन,लेकिन विदेशी फंड पर पहरा जरूरी
शरद कटियार
विदेशी धन देश की संप्रभुता से बड़ा नहीं हो सकता, लेकिन सरकार की शक्ति भी नागरिक समाज की स्वतंत्रता से बड़ी नहीं होनी चाहिए। यही वह बुनियादी कसौटी है जिस पर प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 यानी एफसीआरए बिल को परखा जाना चाहिए।
विदेशी धन भारत में आए, लेकिन उसका इस्तेमाल किस काम में हो रहा है, किसके हाथ में जा रहा है और उससे देश की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा,इसकी निगरानी सरकार का अधिकार ही नहीं, जिम्मेदारी भी है। मौजूदा एफसीआरए इसी उद्देश्य से विदेशी अंशदान को नियंत्रित करता है। प्रस्तावित विधेयक का सरकारी तर्क भी यही है कि मौजूदा कानून में कुछ प्रशासनिक और कानूनी खामियां हैं, जिन्हें दूर किया जाना जरूरी है।लेकिन सवाल यह है कि नियमन और नियंत्रण के बीच की रेखा कहां खींची जाएगी?
प्रस्तावित कानून में यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त, रद्द, सरेंडर या नवीनीकरण न होने की स्थिति में विदेशी अंशदान और उससे बनी परिसंपत्तियों को एक नामित प्राधिकरण के अधीन रखने की व्यवस्था की जाती है, तो यह बेहद गंभीर शक्ति है। किसी संस्था की इमारत, अस्पताल, स्कूल, उपकरण अथवा अन्य संपत्ति केवल इसलिए सरकारी नियंत्रण में चली जाए कि उसका एफसीआरए दर्जा समाप्त हो गया,तो इसके लिए स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायिक रूप से परखी जा सकने वाली प्रक्रिया अनिवार्य होनी चाहिए।

सरकार का पक्ष भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल यदि धर्मांतरण, राजनीतिक प्रभाव, राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध गतिविधियों या कानून के उल्लंघन में होता है तो कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। भारत कोई ऐसा देश नहीं हो सकता जहां विदेशी धन के नाम पर कोई भी संस्था मनमानी करे। पारदर्शिता हो, हिसाब हो और कानून का पालन हो,इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
आपत्ति तब पैदा होती है जब कानून की भाषा इतनी व्यापक हो जाए कि उसका इस्तेमाल विवेकाधीन कार्रवाई के लिए किया जा सके।
इसीलिए सरकार को विपक्ष और नागरिक समाज की आशंकाओं को केवल राजनीतिक विरोध कहकर खारिज नहीं करना चाहिए। दूसरी तरफ विपक्ष को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह विदेशी धन के नियमन का विरोध कर रहा है या केवल उन प्रावधानों का, जिनसे सरकारी अधिकार अत्यधिक बढ़ सकते हैं।
एफसीआरए जैसा कानून हजारों संस्थाओं, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं के काम को प्रभावित कर सकता है। विधेयक के आधिकारिक विवरण के अनुसार वर्तमान व्यवस्था के तहत लगभग 16,000 संस्थाएं एफसीआरए के तहत पंजीकृत हैं और करीब 22,000 करोड़ वार्षिक विदेशी अंशदान प्राप्त करती हैं। इतनी बड़ी व्यवस्था में एक छोटी कानूनी अस्पष्टता भी हजारों संस्थाओं के लिए बड़ी प्रशासनिक समस्या बन सकती है।
इसलिए सरकार को तीन बातें सुनिश्चित करनी चाहिए,
पहली,हर कार्रवाई का स्पष्ट कारण हो।किसी संस्था का पंजीकरण समाप्त करने या उसकी परिसंपत्तियों पर नियंत्रण लेने से पहले उसे सुनवाई का पर्याप्त अवसर मिले।
दूसरी,मिश्रित धन से बनी संपत्तियों का स्पष्ट समाधान हो।
यदि किसी अस्पताल, स्कूल या भवन के निर्माण में विदेशी धन के साथ भारतीय दान या संस्था का अपना पैसा भी लगा है, तो पूरी संपत्ति को सरकारी नियंत्रण में लेने का सवाल अत्यंत संवेदनशील है। कानून में ऐसी परिस्थितियों का स्पष्ट और न्यायसंगत समाधान होना चाहिए।
तीसरी,न्यायिक समीक्षा का रास्ता मजबूत हो।सरकारी निर्णय अंतिम सत्य नहीं हो सकता। किसी संस्था के अस्तित्व और उसकी संपत्ति पर असर डालने वाले फैसले के खिलाफ प्रभावी अपील और स्वतंत्र न्यायिक जांच का अधिकार होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है।
आज देश को न विदेशी धन की अराजकता चाहिए और न सरकारी शक्ति की निरंकुशता।
भारत की सुरक्षा से समझौता नहीं हो सकता। विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता भी अनिवार्य है। लेकिन इसी के साथ संविधान नागरिक स्वतंत्रता, संस्थागत स्वायत्तता और कानून के समान अनुप्रयोग की भी गारंटी देता है।
इसलिए एफसीआरए बिल को ‘सरकार बनाम विपक्ष’ के चश्मे से देखना देशहित के साथ न्याय नहीं होगा। इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता’ की झूठी लड़ाई बनाने के बजाय ऐसा कानून बनाना होगा जिसमें दोनों की रक्षा हो।
सरकार के पास ताकत हो, लेकिन उस ताकत पर कानून की लगाम भी हो। संस्थाओं पर जवाबदेही हो, लेकिन जवाबदेही के नाम पर मनमाना नियंत्रण न हो।
एफसीआरए बिल की असली परीक्षा यही है,क्या यह विदेशी धन को नियंत्रित करते हुए भारतीय लोकतंत्र को भी सुरक्षित रखता है?
संसद को इस सवाल का जवाब जल्दबाजी में नहीं, बल्कि व्यापक बहस, विशेषज्ञों की राय और आवश्यक संसदीय जांच के बाद देना चाहिए। क्योंकि कानून केवल आज की सरकार के लिए नहीं बनते,कल जब सत्ता बदलती है, वही कानून नई सरकार के हाथ में भी होते हैं।
और लोकतंत्र की समझदारी यही है कि हम ऐसी शक्ति किसी सरकार को न दें, जिसका दुरुपयोग भविष्य में कोई भी सरकार कर सके।

ता भी अनिवार्य है। लेकिन इसी के साथ संविधान नागरिक स्वतंत्रता, संस्थागत स्वायत्तता और कानून के समान अनुप्रयोग की भी गारंटी देता है।
इसलिए एफसीआरए बिल को ‘सरकार बनाम विपक्ष’ के चश्मे से देखना देशहित के साथ न्याय नहीं होगा। इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता’ की झूठी लड़ाई बनाने के बजाय ऐसा कानून बनाना होगा जिसमें दोनों की रक्षा हो।
सरकार के पास ताकत हो, लेकिन उस ताकत पर कानून की लगाम भी हो। संस्थाओं पर जवाबदेही हो, लेकिन जवाबदेही के नाम पर मनमाना नियंत्रण न हो।
एफसीआरए बिल की असली परीक्षा यही…

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