शरद कटियार
देश की प्रगति का सबसे बड़ा पैमाना मजबूत सड़कें और विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा माना जाता है। जब सरकारें हजारों करोड़ रुपये खर्च कर एक्सप्रेस-वे बनाती हैं तो जनता की अपेक्षा केवल तेज रफ्तार सफर की नहीं होती, बल्कि सुरक्षित, टिकाऊ और गुणवत्तापूर्ण निर्माण की भी होती है। ऐसे में यदि 4700 करोड़ रुपये की लागत से बना 63 किलोमीटर लंबा लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस-वे उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद दर्जनों स्थानों पर धंसने लगे, तो सवाल केवल एक सड़क का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का बन जाता है।
उद्घाटन के समय इसे आधुनिक भारत की तस्वीर बताया गया। दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश की सड़कें अमेरिका जैसी होंगी। लेकिन जब कुछ ही दिनों में सड़क पर दरारें पड़ने लगें, मरम्मत का काम शुरू हो जाए और निर्माण एजेंसी पर कार्रवाई करनी पड़े, तो यह स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी की प्रक्रिया कमजोर रही है। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर इतनी बड़ी परियोजना में तकनीकी मानकों का पालन क्यों नहीं हुआ और यदि हुआ तो फिर इतनी जल्दी सड़क खराब कैसे हो गई।
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा निर्माण कंपनी को नॉन-परफॉर्मर घोषित करना, अधिकारियों को हटाना और आईआईटी खड़गपुर से तकनीकी जांच कराना निश्चित रूप से आवश्यक कदम हैं। लेकिन केवल जांच और मरम्मत से बात पूरी नहीं होगी। यदि निर्माण में लापरवाही या भ्रष्टाचार सिद्ध होता है तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो भविष्य की परियोजनाओं के लिए भी मिसाल बने। सरकारी धन किसी सरकार या विभाग का नहीं, बल्कि देश के करोड़ों करदाताओं का होता है। उसकी एक-एक पाई का हिसाब तय होना चाहिए।
इस पूरे मामले ने ठेके देने की प्रक्रिया और परियोजनाओं की निगरानी पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि किसी कंपनी पर पहले भी गंभीर आरोप लगे हों, तो उसकी कार्यप्रणाली की अतिरिक्त निगरानी होना स्वाभाविक है। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं होते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की संपत्ति होते हैं। इसलिए इनमें पारदर्शिता, गुणवत्ता और जवाबदेही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
यह भी आवश्यक है कि जांच निष्पक्ष और तथ्यों के आधार पर हो। किसी व्यक्ति, कंपनी या संस्था को केवल आरोपों के आधार पर दोषी मान लेना उचित नहीं है। अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों पर ही आधारित होना चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि जांच समयबद्ध हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि जनता का विश्वास बना रहे।
एक्सप्रेस-वे केवल कंक्रीट और डामर का ढांचा नहीं होता, बल्कि विकास पर जनता के भरोसे का प्रतीक होता है। यदि वही भरोसा उद्घाटन के कुछ दिनों में दरकने लगे, तो नुकसान केवल सड़क का नहीं बल्कि शासन की विश्वसनीयता का भी होता है। सरकार, निर्माण एजेंसी और निगरानी संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में कोई भी परियोजना जल्दबाजी, लापरवाही या गुणवत्ता से समझौते का शिकार न बने।


