शरद कटियार
इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह सख्त टिप्पणी केवल कुछ अधिवक्ताओं तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। यदि वकालत जैसे सम्मानित पेशे में फर्जी डिग्रीधारी, आपराधिक प्रवृत्ति के लोग और संगठित अपराध से जुड़े व्यक्ति प्रवेश कर रहे हैं, तो इसका सीधा असर आम नागरिक के न्याय पर पड़ता है।
अदालत के समक्ष आए आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में पंजीकृत हजारों अधिवक्ताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित होना और कुछ पर दर्जनों गंभीर मामले होने के बावजूद उनका लगातार वकालत करना व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करता है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अधिवक्ता बनने की प्रक्रिया, सत्यापन व्यवस्था और अनुशासनात्मक कार्रवाई कितनी प्रभावी है।
हाईकोर्ट ने फर्जी डिग्री वाले अधिवक्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने और गंभीर मामलों में लाइसेंस निलंबित करने का जो निर्देश दिया है, वह केवल दंडात्मक कदम नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास बहाल करने का प्रयास है। न्यायपालिका तभी मजबूत मानी जाएगी, जब उसके सभी अंग—न्यायालय, बार काउंसिल और अधिवक्ता—समान रूप से ईमानदारी, पारदर्शिता और नैतिकता का पालन करें।
हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि केवल मुकदमा दर्ज होना किसी व्यक्ति को दोषी नहीं बनाता। अंतिम निर्णय न्यायालय ही करता है। इसलिए कार्रवाई कानून के दायरे में, निष्पक्ष जांच और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए होनी चाहिए। निर्दोष अधिवक्ताओं के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी दोषियों पर कठोर कार्रवाई।
बार काउंसिल की भूमिका अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। अधिवक्ताओं की डिग्रियों का नियमित सत्यापन, आपराधिक मामलों की निगरानी, समयबद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई और पुलिस व न्यायालयों के साथ बेहतर समन्वय ही इस समस्या का स्थायी समाधान बन सकता है।
न्याय केवल अदालतों के फैसलों से नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की ईमानदारी और आचरण से स्थापित होता है। यदि वकालत की गरिमा सुरक्षित रहेगी, तभी संविधान, कानून और लोकतंत्र में जनता का विश्वास भी अटूट बना रहेगा।


