उत्तर प्रदेश ने एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा लक्ष्य तय किया है। 35 करोड़ पौधरोपण महाअभियान केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश भी है। मुख्यमंत्री द्वारा ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के साथ वृक्षारोपण महायज्ञ-2026 का शुभारंभ और पहले ही दिन सुबह 8 बजे तक 11,206 स्थानों पर एक करोड़ पौधे लगाए जाने का दावा निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन हर वर्ष की तरह इस बार भी सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि इन पौधों में से कितने वृक्ष बन पाएंगे?
भारत उन देशों में शामिल है जो जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहे हैं। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, भूजल का लगातार गिरता स्तर, वायु प्रदूषण और घटते वन क्षेत्र भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी हैं। ऐसे में बड़े स्तर पर वृक्षारोपण समय की आवश्यकता है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है पौधों का संरक्षण।
वर्षों से देश के विभिन्न राज्यों में करोड़ों पौधे लगाए जाने के दावे किए जाते रहे हैं। सरकारी आंकड़े लक्ष्य पूरा होने की जानकारी देते हैं, लेकिन कुछ वर्षों बाद उन्हीं स्थानों पर जाकर देखने पर अनेक पौधे सूख चुके मिलते हैं या उनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता। इसका कारण स्पष्ट है—हम पौधे लगाने पर जितना ध्यान देते हैं, उनकी देखभाल पर उतना नहीं।
दरअसल, वृक्षारोपण एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि वर्षों तक चलने वाली जिम्मेदारी है। एक पौधे को वृक्ष बनने में तीन से पाँच वर्ष का समय लगता है। इस दौरान उसे पानी, सुरक्षा, खाद और नियमित देखभाल की आवश्यकता होती है। यदि यह व्यवस्था नहीं होगी, तो करोड़ों पौधों का लक्ष्य केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।
‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भावनात्मक अपील है। माँ केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि पालन-पोषण और संरक्षण का प्रतीक भी होती है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी माँ के सम्मान में एक पौधा लगाए और उसकी देखभाल भी उसी समर्पण से करे, तो यह अभियान वास्तव में जनआंदोलन बन सकता है। केवल सरकारी विभागों के भरोसे हरियाली नहीं बढ़ सकती; इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।
विद्यालयों, महाविद्यालयों, ग्राम पंचायतों, नगर निकायों, औद्योगिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को इस अभियान से स्थायी रूप से जोड़ने की आवश्यकता है। हर पौधे की जिम्मेदारी किसी व्यक्ति, संस्था या समूह को सौंपनी चाहिए और समय-समय पर उसकी निगरानी भी होनी चाहिए। आधुनिक तकनीक के माध्यम से पौधों का जियो-टैगिंग, फोटो रिकॉर्ड और सर्वाइवल ऑडिट जैसी व्यवस्थाएँ इस अभियान को अधिक प्रभावी बना सकती हैं।
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं है। जिस प्रकार हम अपने घर की सुरक्षा करते हैं, उसी प्रकार प्रकृति की सुरक्षा भी हमारी जिम्मेदारी है। एक पेड़ केवल ऑक्सीजन नहीं देता, बल्कि वर्षा चक्र को संतुलित करता है, भूजल संरक्षण में मदद करता है, जैव विविधता को बचाता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करता है।
आज जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु संकट से जूझ रही है, तब उत्तर प्रदेश का यह अभियान एक सकारात्मक पहल है। लेकिन इसकी सफलता पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि वर्षों बाद खड़े होने वाले हरे-भरे वृक्षों से मापी जाएगी।
यदि 35 करोड़ पौधों में से अधिकांश सुरक्षित रहकर वृक्ष बन जाते हैं, तो यह केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश के लिए पर्यावरण संरक्षण का एक ऐतिहासिक उदाहरण होगा। लेकिन यदि पौधरोपण केवल फोटो, रिकॉर्ड और आंकड़ों तक सीमित रह गया, तो प्रकृति हमें एक और अवसर शायद इतनी आसानी से नहीं देगी।
अब समय केवल पौधे लगाने का नहीं, बल्कि उन्हें जीवित रखने का संकल्प लेने का है। क्योंकि एक पौधा लगाना शुरुआत है, लेकिन उसे वृक्ष बनाना ही वास्तविक पर्यावरण सेवा है।


