शरद कटियार
दुनिया का इतिहास गवाह है कि जब भी कच्चे तेल की कीमतों में उबाल आता है, उसका असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। महंगे तेल की लपटें परिवहन, उद्योग, कृषि, खाद्य वस्तुओं और आम आदमी की रसोई तक पहुंच जाती हैं। आज एक बार फिर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें चढ़ान पर हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर मंडराते खतरे और आपूर्ति को लेकर बढ़ती अनिश्चितताओं ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बेचैन कर दिया है।
दुबई से लेकर अमेरिका तक ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। संयुक्त अरब अमीरात में पेट्रोल कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है। अमेरिका और यूरोप के देशों में भी तेल कंपनियां और उपभोक्ता बढ़ती कीमतों का दबाव महसूस कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत फिलहाल अपेक्षाकृत सुरक्षित दिखाई दे रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह राहत कब तक कायम रहेगी?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसका मतलब साफ है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाली हर हलचल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जब तेल महंगा होता है तो सरकार का आयात बिल बढ़ता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है और महंगाई का खतरा बढ़ जाता है। इसके बावजूद भारतीय बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को फिलहाल नियंत्रित रखा गया है।
यह स्थिति सरकार की आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति का भी परिणाम है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस सहित कई देशों से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर अपने आयात खर्च को संतुलित करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि जिस समय कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़े, उस समय भारत में स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर बनी रही।
लेकिन राहत का यह दौर स्थायी नहीं माना जा सकता। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है, होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं या तेल उत्पादक देशों की आपूर्ति बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। ऐसे में भारत के लिए कीमतों को लंबे समय तक नियंत्रित रखना आसान नहीं होगा।
महंगे तेल का सबसे बड़ा खतरा महंगाई है। पेट्रोल और डीजल केवल वाहन चलाने का ईंधन नहीं हैं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की धुरी हैं। ट्रकों से लेकर ट्रैक्टर तक और फैक्ट्रियों से लेकर बाजारों तक हर व्यवस्था इन पर निर्भर है। तेल महंगा होते ही माल ढुलाई महंगी हो जाती है, जिसका असर सब्जियों, अनाज, दाल, दूध और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई देता है।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के विकसित देश भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। अमेरिका जैसी महाशक्ति में भी तेल की बढ़ती कीमतें राजनीतिक मुद्दा बन जाती हैं। यूरोप पहले ही ऊर्जा संकट के प्रभाव झेल चुका है। ऐसे में भारत जैसे विकासशील देश के लिए चुनौती और बड़ी हो जाती है, क्योंकि यहां करोड़ों लोगों की आय सीमित है और महंगाई का सीधा असर उनकी जिंदगी पर पड़ता है।
सरकार के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता से देश को बचाना है, वहीं दूसरी ओर आम जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ने से रोकना है। यदि वैश्विक हालात लंबे समय तक तनावपूर्ण बने रहते हैं तो आने वाले महीनों में कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं।
फिलहाल भारतीय उपभोक्ताओं को राहत जरूर मिली हुई है, लेकिन वैश्विक तेल बाजार का इतिहास बताता है कि यह राहत स्थायी नहीं होती। दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस ईंधन पर चलती है, उसकी कीमतें जब उफान पर होती हैं तो कोई भी देश पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता।
भारत आज राहत के द्वीप पर खड़ा है, लेकिन चारों तरफ महंगे तेल का समुद्र हिलोरें मार रहा है। सरकार की रणनीति और वैश्विक परिस्थितियां तय करेंगी कि यह राहत कितने समय तक जनता की जेब को सुरक्षित रख पाती है। यही आने वाले दिनों का सबसे बड़ा आर्थिक सवाल है।
तेल की आग और भारत की राहत: कब तक बच पाएगी जनता की जेब?


