शरद कटियार
देश के विभाजन की त्रासदी को भले ही लगभग आठ दशक बीत चुके हों, लेकिन उसके घाव आज भी लाखों परिवारों की स्मृतियों में जीवित हैं। 1947 में जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तब लाखों लोगों को अपनी जन्मभूमि, घर, खेत और व्यापार छोड़कर अनिश्चित भविष्य की ओर पलायन करना पड़ा। इनमें से अनेक परिवार उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में आकर बस गए, लेकिन विस्थापन का दर्द उनके साथ पीढ़ियों तक चलता रहा।
आज जब उत्तर प्रदेश में पाकिस्तान से विस्थापित 1645 परिवारों को भूमिधरी अधिकार पत्र दिए जा रहे हैं, तो यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह उन परिवारों के संघर्ष, धैर्य और अधिकारों की औपचारिक मान्यता है, जिन्होंने वर्षों तक अपने अस्तित्व और पहचान के लिए संघर्ष किया।
जमीन केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं होती। गांवों और कस्बों में जमीन सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की गारंटी का प्रतीक होती है। जिन परिवारों के पास जमीन तो थी, लेकिन उसका वैधानिक स्वामित्व नहीं था, वे अनेक सरकारी सुविधाओं और अधिकारों से वंचित रह जाते थे। बैंक ऋण लेने से लेकर संपत्ति के हस्तांतरण तक हर स्तर पर उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इन परिवारों को अपने अधिकार पाने में इतने दशक क्यों लग गए? आजादी के बाद विभिन्न सरकारें आईं और गईं, लेकिन विस्थापित परिवारों के भूमि अधिकारों का विषय अक्सर फाइलों और आश्वासनों तक सीमित रहा। राजनीतिक मंचों पर उनके नाम लिए गए, लेकिन समाधान बहुत कम दिखाई दिया। यही कारण है कि आज का निर्णय केवल सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक देरी के बाद मिला न्याय भी है।
इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष भी है। जब किसी परिवार को भूमि का कानूनी स्वामित्व मिलता है, तो उसके भीतर सुरक्षा और आत्मविश्वास की भावना पैदा होती है। वह अपने भविष्य की योजना बना सकता है, अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश कर सकता है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। यह अधिकार केवल वर्तमान पीढ़ी को नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी स्थिरता प्रदान करेगा।
कार्यक्रम में लगभग 50 पूर्व सैनिकों को भी भूमिधरी अधिकार दिए जाना विशेष महत्व रखता है। जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा की, उन्हें उनके अधिकारों का सम्मान मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी भी है और कर्तव्य भी।
हालांकि सरकार की इस पहल का स्वागत होना चाहिए, लेकिन इसके साथ एक व्यापक सवाल भी जुड़ा है। देशभर में ऐसे कितने परिवार हैं जो दशकों से राजस्व, भूमि और स्वामित्व संबंधी विवादों में फंसे हुए हैं? कितने लोग आज भी अपने ही घर और खेत पर कानूनी अधिकार पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं? यदि शासन वास्तव में सुशासन का मॉडल स्थापित करना चाहता है, तो उसे ऐसे सभी लंबित मामलों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करना होगा।
बिजनौर के धामपुर में होने वाला यह कार्यक्रम केवल अधिकार पत्र वितरण समारोह नहीं है। यह उन परिवारों के लिए इतिहास का वह क्षण है, जब वे स्वयं को केवल शरणार्थी या विस्थापित नहीं, बल्कि पूर्ण अधिकारों वाले नागरिक के रूप में महसूस करेंगे।
वास्तव में भूमिधरी अधिकार पत्र एक कागज नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा, पहचान और न्याय का दस्तावेज है। और जब किसी समाज को उसका अधिकार मिलता है, तभी लोकतंत्र अपनी वास्तविक सार्थकता सिद्ध करता है।


