उत्तर प्रदेश में 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेसवे का लोकार्पण सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना का उद्घाटन नहीं, बल्कि सत्ता, विकास और राजनीतिक प्रभाव के जटिल समीकरणों का सार्वजनिक प्रदर्शन भी है। हरदोई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में आयोजित यह भव्य कार्यक्रम जितना विकास के दावों से भरा था, उतना ही राजनीतिक संदेशों से भी लदा हुआ नजर आया।
प्रधानमंत्री ने इसे “मां गंगा का आशीर्वाद” और उत्तर प्रदेश की “नई लाइफलाइन” बताया। निस्संदेह, एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाएं किसी भी राज्य के आर्थिक ढांचे को गति देती हैं लॉजिस्टिक्स सस्ता होता है, उद्योगों को रफ्तार मिलती है, और निवेश के नए रास्ते खुलते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास समान रूप से वितरित होगा या फिर कुछ जिलों और खास आर्थिक वर्गों तक सीमित रह जाएगा?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे प्रदेश की अर्थव्यवस्था की “रीढ़” बताया, लेकिन हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश में विकास की धारा अभी भी असंतुलित है। कुछ जिले एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और औद्योगिक निवेश के केंद्र बन रहे हैं, जबकि कई जिले आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। यही असंतुलन भविष्य में सामाजिक और राजनीतिक असंतोष को जन्म दे सकता है।
गंगा एक्सप्रेसवे का एक बड़ा पहलू भूमि अधिग्रहण भी है। हजारों किसानों की जमीन इस परियोजना के लिए ली गई है। सरकारी आंकड़े भले ही उचित मुआवजे का दावा करें, लेकिन जमीनी स्तर पर अक्सर शिकायतें सामने आती हैं कम मुआवजा, देरी से भुगतान और पुनर्वास की अस्पष्ट नीति। ऐसे में यह जरूरी है कि विकास की कीमत सिर्फ किसान ही न चुकाएं।
हरदोई में आयोजित कार्यक्रम ने एक और कड़वा सच उजागर किया विकास योजनाएं अब राजनीतिक प्रभाव का पैमाना बन चुकी हैं। जिन जिलों के नेता सत्ता के करीब हैं, वहां परियोजनाएं तेजी से पहुंचती हैं, जबकि कमजोर राजनीतिक प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्र पीछे छूट जाते हैं। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संतुलन के लिए खतरा है।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री का पश्चिम बंगाल चुनाव का जिक्र इस बात का संकेत था कि विकास के मंच का इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने के लिए भी किया जा रहा है। यह नया नहीं है, लेकिन यह जरूर बताता है कि अब हर बड़ी परियोजना सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार भी बन चुकी है।
गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश को आर्थिक रूप से नई दिशा दे सकता हैइसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है। क्या यह परियोजना किसानों, छोटे व्यापारियों और आम नागरिकों की जिंदगी में वास्तविक बदलाव लाएगी? क्या इससे रोजगार के अवसर स्थानीय युवाओं तक पहुंचेंगे? या फिर यह सिर्फ बड़े निवेशकों और कॉरपोरेट घरानों के लिए फायदेमंद साबित होगा?
उत्तर प्रदेश की जनता अब सिर्फ उद्घाटन और भाषण नहीं, बल्कि परिणाम देखना चाहती है। एक्सप्रेसवे की चमक तभी सार्थक होगी जब उसके किनारे बसे गांवों तक भी विकास की रोशनी पहुंचे। वरना यह “लाइफलाइन” भी उन कई परियोजनाओं की तरह रह जाएगी, जिनकी चमक सिर्फ मंच तक सीमित रही और जमीनी हकीकत अंधेरे में छूट गई।
गंगा एक्सप्रेसवे: विकास की लाइफलाइन या सियासी ताकत का प्रदर्शन


