सड़कें किसी भी देश के विकास की पहली पहचान होती हैं। गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क हो या महानगरों को जोड़ने वाला एक्सप्रेसवे, पुल हो या कोई अन्य सार्वजनिक निर्माण परियोजना इनका उद्देश्य केवल आवागमन को आसान बनाना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को गति देना और आम नागरिक के जीवन को सुविधाजनक बनाना है। लेकिन जब विकास की इन परियोजनाओं की नींव में भ्रष्टाचार की हिस्सेदारी बढ़ जाती है तो मजबूत सड़क की जगह कमजोर व्यवस्था तैयार होती है।
सार्वजनिक निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार कोई नया विषय नहीं है। ठेका हासिल करने से लेकर निर्माण सामग्री की खरीद, गुणवत्ता जांच, माप पुस्तिका तैयार करने, बिल पास कराने और भुगतान तक कई स्तरों पर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रहती हैं। कमीशनखोरी और रिश्वतखोरी के कारण परियोजना की वास्तविक लागत और जमीन पर दिखाई देने वाले निर्माण के बीच अंतर पैदा हो जाता है।
जब किसी परियोजना के बजट का बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता है तो उसका असर सबसे पहले निर्माण की गुणवत्ता पर पड़ता है। घटिया सामग्री का इस्तेमाल, मानकों की अनदेखी, पर्याप्त मोटाई न रखना, तकनीकी स्पेशफिकेशन्स से समझौता और निरीक्षण में लापरवाही जैसी स्थितियां सामने आती हैं। परिणाम यह होता है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी सड़क कुछ ही समय में टूटने लगती है। बारिश में गड्ढे बन जाते हैं, पुलों में दरारें दिखाई देने लगती हैं और कई बार निर्माण की कमजोरियां दुर्घटनाओं का कारण बन जाती हैं।
सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब किसी निर्माण की खामी के कारण लोगों की जान चली जाती है। दुर्घटना के बाद प्रशासन सक्रिय होता है, जांच समिति गठित होती है, अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी जाती है और पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे की घोषणा की जाती है। कुछ दिनों तक मामला चर्चा में रहता है और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन मूल समस्या वहीं बनी रहती है।
सवाल यह है कि आखिर जांच रिपोर्टों का क्या होता है? कितने मामलों में दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों से वास्तव में नुकसान की भरपाई कराई जाती है? कितने मामलों में जिम्मेदार लोगों की संपत्ति और आर्थिक हितों की जांच होती है? और कितने मामलों में उन्हें भविष्य में सार्वजनिक निर्माण कार्यों से प्रतिबंधित किया जाता है?
जब इन सवालों का जवाब नहीं मिलता तो भ्रष्टाचार करने वालों के भीतर कानून का भय समाप्त होता जाता है।
सार्वजनिक निर्माण में केवल ठेकेदार ही जिम्मेदार नहीं हो सकता। किसी भी परियोजना को मंजूरी देने, डिजाइन तैयार करने, तकनीकी स्वीकृति देने, गुणवत्ता जांचने, माप सत्यापित करने और भुगतान की प्रक्रिया में अनेक अधिकारी और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल होते हैं। इसलिए खराब निर्माण होने पर केवल ठेकेदार को जिम्मेदार बताकर व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
जरूरत इस बात की है कि निर्माण की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए। किसी परियोजना की शुरुआत से लेकर उसके पूरा होने तक प्रत्येक चरण का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हो। किस कंपनी को ठेका मिला, कितनी लागत स्वीकृत हुई, कौन सी सामग्री इस्तेमाल हो रही है, किस अधिकारी ने गुणवत्ता की जांच की और किस स्तर पर भुगतान स्वीकृत हुआ—इन सभी जानकारियों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
आज तकनीक ने निगरानी को पहले की तुलना में काफी आसान बना दिया है। ड्रोन से निर्माण की निगरानी की जा सकती है। सेंसर आधारित तकनीक से सड़क की गुणवत्ता और मजबूती की जांच की जा सकती है। निर्माण सामग्री की डिजिटल ट्रैकिंग की जा सकती है। थर्ड पार्टी तकनीकी ऑडिट कराया जा सकता है। यदि सरकार चाहे तो आम नागरिक भी किसी परियोजना की प्रगति और गुणवत्ता की जानकारी ऑनलाइन देख सकता है।
लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके पीछे ईमानदार व्यवस्था और जवाबदेही हो।
सबसे महत्वपूर्ण सुधार व्यक्तिगत जवाबदेही का है। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही या मिलीभगत से घटिया निर्माण होता है तो केवल स्थानांतरण या निलंबन पर्याप्त नहीं होना चाहिए। जांच में दोष सिद्ध होने पर आर्थिक नुकसान की भरपाई, विभागीय कार्रवाई और कानून के तहत आपराधिक कार्रवाई तक की व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू होनी चाहिए।
इसी तरह ऐसे ठेकेदारों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जो बार-बार घटिया निर्माण करते हैं। उन्हें केवल एक परियोजना से हटाना पर्याप्त नहीं है। गंभीर मामलों में उनके खिलाफ भविष्य की सरकारी परियोजनाओं के लिए प्रतिबंध और नियमानुसार आर्थिक दंड की व्यवस्था लागू होनी चाहिए।
जनता के पैसे से बनने वाली सड़कें किसी अधिकारी, नेता या ठेकेदार की निजी संपत्ति नहीं हैं। यह पैसा आम नागरिक के टैक्स से आता है। इसलिए हर रुपये का हिसाब जनता के प्रति जवाबदेही के साथ होना चाहिए।
यह भी जरूरी है कि सड़क बनने के बाद केवल उसका उद्घाटन कर देना ही परियोजना की सफलता न माना जाए। सड़क कितने वर्ष तक निर्धारित गुणवत्ता के साथ चलती है, पुल कितना भार सहन करता है, जल निकासी की व्यवस्था कैसी है और रखरखाव में कितना खर्च आया इन सभी मानकों का निश्चित अवधि तक वैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए।
यदि किसी सड़क की पांच साल की गारंटी है और वह छह महीने में टूट जाती है तो सवाल केवल ठेकेदार से नहीं, बल्कि उस निर्माण को स्वीकृति देने वाले पूरे तंत्र से पूछा जाना चाहिए।
भारत में विकास की रफ्तार तेज हुई है और आने वाले वर्षों में हजारों करोड़ रुपये की सड़क, पुल, रेलवे, सिंचाई और शहरी विकास परियोजनाएं चलनी हैं। इसलिए आज आवश्यकता केवल अधिक निर्माण की नहीं, बल्कि बेहतर और टिकाऊ निर्माण की है।
भ्रष्टाचार विकास की गति को केवल आर्थिक रूप से नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि लोगों के विश्वास को भी कमजोर करता है। जब कोई नागरिक करोड़ों रुपये की सड़क को कुछ महीनों में टूटते देखता है तो उसके मन में पूरे सरकारी तंत्र के प्रति अविश्वास पैदा होता है।
इसलिए अब समय आ गया है कि सार्वजनिक निर्माण की व्यवस्था में केवल नए नियम जोड़ने के बजाय पूरी प्रणाली की गंभीर समीक्षा की जाए। ठेका प्रक्रिया पारदर्शी हो, गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच हो, डिजिटल निगरानी हो, भुगतान प्रदर्शन से जोड़ा जाए और दोषियों की व्यक्तिगत जवाबदेही सुनिश्चित हो।
सड़क की मजबूती केवल उसकी मोटाई और सामग्री से तय नहीं होती। उसकी असली मजबूती उस व्यवस्था की ईमानदारी से तय होती है, जिसने उसे बनाया है।
जब तक भ्रष्टाचार करने वाले व्यक्ति को यह डर नहीं होगा कि घटिया निर्माण या सरकारी धन की हेराफेरी की कीमत उसे व्यक्तिगत रूप से चुकानी पड़ेगी, तब तक व्यवस्था में स्थायी बदलाव मुश्किल है।
इसलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जहां सड़क की नींव में भ्रष्टाचार नहीं, गुणवत्ता और जवाबदेही की नींव हो। तभी सार्वजनिक धन का सही उपयोग होगा, दुर्घटनाएं कम होंगी और विकास का वास्तविक लाभ जनता तक पहुंचेगा।


