“राजपूतों को हाशिए पर धकेलने की कोशिश”, संगठन से लेकर सत्ता तक हिस्सेदारी घटने का लगाया आरोप
लखनऊ । उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार के बाद क्षत्रिय राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय महामंत्री राघवेंद्र सिंह राजू ने भाजपा सरकार पर क्षत्रिय समाज की लगातार उपेक्षा का आरोप लगाते हुए बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट से लेकर राज्यों के मंत्रिमंडल, विधान परिषद, निगम-उपक्रम और संगठन तक में क्षत्रिय समाज को अपेक्षित भागीदारी नहीं दी जा रही है।
यूजीसी कानून को लेकर याचिकाकर्ता भी रहे राघवेंद्र सिंह राजू ने कहा कि 17 मई को जौनपुर में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय अध्यक्ष और पदाधिकारियों के साथ सामूहिक रणनीति पर मंथन किया जाएगा। साथ ही लखनऊ में बड़ी क्षत्रिय महापंचायत बुलाने का निर्णय भी लिया गया है।
एक खास बातचीत में राघवेंद्र सिंह राजू ने कहा कि भारत का इतिहास राजपूतों के बलिदान, राष्ट्रवाद और सनातन रक्षा की गाथाओं से भरा पड़ा है। उन्होंने दावा किया कि आठवीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ सबसे बड़ा संघर्ष राजपूतों ने किया और हिंदू समाज की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
उन्होंने कहा कि देश की आजादी के बाद भी राजपूत रियासतों और जागीरों के वारिसों ने अपने अधिकार छोड़कर भारत को मजबूत राष्ट्र बनाने का रास्ता साफ किया। उन्होंने जयपुर, जोधपुर, उदयपुर और ग्वालियर रियासतों की 1857 से 1947 तक की क्राइम फाइलों का अध्ययन करने का दावा करते हुए कहा कि उन 90 वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराध की एक भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई, जबकि आज हालात पूरी दुनिया के सामने हैं।
राघवेंद्र सिंह राजू ने वर्तमान राजनीति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सत्ता में बने रहने के लिए राष्ट्रवादी और देशभक्त समाजों को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया गया। उनका आरोप था कि राजपूत शक्ति को राजनीतिक रूप से कमजोर करने के लिए इतिहास तक को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।
उन्होंने कहा कि आज राजनीति सेवा का माध्यम नहीं बल्कि “मेवा खाने की दुकान” बनती जा रही है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पूर्व कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलज़ारीलाल नंदा की सादगी और समर्पण का उल्लेख करते हुए वर्तमान राजनीतिक संस्कृति पर सवाल खड़े किए।
राजू ने दावा किया कि राजनीतिक दल सत्ता तो चाहते हैं लेकिन राष्ट्रवादी सोच वाले समाज को साथ नहीं रखना चाहते। उन्होंने कहा कि यदि इसी तरह उपेक्षा जारी रही तो 2027 के चुनावों में इसका असर दिखाई दे सकता है।
उन्होंने राजपूत राजनीति के पुराने उदाहरण भी गिनाए। उनके अनुसार 1952 में राजस्थान विधानसभा में 72 राजपूत विधायक थे। 1980 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के 139 राजपूत विधायक बने थे, जबकि 2012 में समाजवादी पार्टी ने 52 राजपूत प्रत्याशी उतारे जिनमें 45 जीतकर आए।
उन्होंने कहा कि 2024 के चुनावों में राजपूत समाज की नाराजगी का असर दिखाई दिया है और यदि राजनीतिक दलों ने समय रहते समाज की भावनाओं को नहीं समझा तो आगे “उल्टी गिनती” शुरू हो सकती है।
राजपूत समाज के भीतर भी उन्होंने आत्ममंथन की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि समाज के कई नेता केवल पाने की राजनीति कर रहे हैं, लेकिन संघर्ष और संगठन के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने कबीर के दोहे “कस्तूरी कुंडली बसे…” का उल्लेख करते हुए समाज से अपनी ताकत पहचानने का आह्वान किया।
राघवेंद्र सिंह राजू ने कहा कि वह अपने विचारों की प्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी भेज रहे हैं। साथ ही उन्होंने राष्ट्रवादी सोच रखने वाले सभी धर्म और जातियों के लोगों से समर्थन की अपील की।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद उभर रही यह नाराजगी आने वाले समय में भाजपा और अन्य दलों के लिए नई चुनौती बन सकती है। खासकर तब, जब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं।


