– नेता की प्रवत्ति बदलने से देश के युवा मे भी बदलाव की चटपटाहट
– केजरीवाल, और थालापति के बाद काकरोच पार्टी बड़ा संकेत
– देश में एंटी सिस्टम पॉलिटिक्स की लगातार मजबूत हो रही ज़मीन
शरद कटियार
देश की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां आम जनता का पारंपरिक नेताओं और पुरानी राजनीतिक सोच से विश्वास तेजी से टूटता जा रहा है। कभी जाति, धर्म, मंदिर, मस्जिद और भावनात्मक नारों के दम पर चुनाव जीतने वाले राजनीतिक दल अब एक नए संकट से जूझ रहे हैं जनता सवाल पूछने लगी है।
दिल्ली की राजनीति में अरविंद केजरीवाल का अचानक उभरना हो या दक्षिण भारत में विजय थलापति जैसे चेहरों को मिल रहा जनसमर्थन, यह केवल व्यक्तियों की लोकप्रियता नहीं बल्कि व्यवस्था से मोहभंग का संकेत है। यहां तक कि सोशल मीडिया पर “काकरोज जनता पार्टी” जैसे व्यंग्यात्मक नामों का वायरल होना भी बताता है कि जनता अब राजनीतिक व्यवस्था का मजाक उड़ाने लगी है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि ऐसे व्यंग्यात्मक और गैर पारंपरिक प्लेटफॉर्म्स को सोशल मीडिया पर तेजी से समर्थन मिल रहा है। यह बदलाव केवल मनोरंजन नहीं बल्कि जनमानस की मानसिक स्थिति को दर्शाता है। यह संकेत देता है कि अगला दशक बड़े बदलाव या क्रांति से भरा होगा।
देश का युवा अब जातीय भाषणों और धार्मिक ध्रुवीकरण से ऊब चुका है। उसे नौकरी चाहिए, सुरक्षित भविष्य चाहिए, पारदर्शी व्यवस्था चाहिए और सबसे ज्यादा “गुड गवर्नेंस” चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि राजनीति अब सेवा कम और व्यापार ज्यादा दिखाई देने लगी है।
आज आम आदमी के भीतर सबसे बड़ा गुस्सा भ्रष्टाचार को लेकर है। महंगाई ने मध्यम वर्ग और गरीब की कमर तोड़ दी है। सरकारी योजनाओं से लेकर स्थानीय विकास निधियों तक कमीशनखोरी की चर्चा आम हो चुकी है। जनता देख रही है कि चुनाव जीतने से पहले सादगी की बात करने वाले कई नेता पांच साल के भीतर आलीशान गाड़ियों के काफिलों और करोड़ों की संपत्तियों के मालिक बन जाते हैं। यही वह सवाल है जो लोकतंत्र की आत्मा को सबसे ज्यादा घायल करता है।
कभी जनप्रतिनिधि को “जनसेवक” कहा जाता था, लेकिन अब राजनीति में प्रवेश करते ही अधिकांश नेताओं का जीवन स्तर जिस तेजी से बदलता है, वह जनता के मन में गहरे संदेह पैदा करता है। आम आदमी यह समझ नहीं पा रहा कि आखिर ऐसा कौन सा व्यवसाय है जिसमें पांच वर्षों के भीतर जमीन से आसमान तक पहुंचा जा सकता है।
आज का जनप्रतिनिधि लोकसेवक के दायरे मे आ चुका, उसे भारी भरकम तनख्वाह, और पेंशन सहित तमाम सुविधाएं मिलने लगी, दुर्भाग्य है कि आज के जनप्रतिनिधि की अधिकारी सुनने को तैयार नहीं हैं, सरकारों को अधिकारियों को शासनादेश जारी करने पड़ रहे कि विधायक जी को प्रोटोकॉल दें, उनकी पैरवी को प्रमुखता दें। विधायक सांसद हो या फिर कैबिनेट मंत्री किसी की कोई सुनने को तैयार नहीं है कारण सिर्फ एक ही है, कि जब देश का राजा राजा व्यापारी हो जाता है,तो उस देश की प्रजा भिखारी हो जाती है।
आज की राजनीति का सबसे बड़ा संकट विश्वसनीयता का है। जनता को अब भाषण नहीं बल्कि चरित्र चाहिए। वह ऐसे लोगों को तलाश रही है जो पढ़े-लिखे हों, ईमानदार हों, संघर्षशील हों और व्यवस्था बदलने का साहस रखते हों। लेकिन विडंबना यह है कि समाज के अधिकांश योग्य, शिक्षित और ईमानदार लोग राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं। और जो लोग राजनीति में पहुंचते भी हैं, उनमें से कई समय के साथ उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं, जिसके खिलाफ लड़ने का दावा करते थे।
यही कारण है कि देश में “एंटी सिस्टम पॉलिटिक्स” की जमीन लगातार मजबूत हो रही है। जनता अब स्थापित राजनीतिक ढांचे के बाहर विकल्प तलाश रही है। सोशल मीडिया इस बदलाव का सबसे बड़ा मंच बन चुका है, जहां युवा खुलकर नेताओं का मूल्यांकन कर रहा है।
भारत का लोकतंत्र अभी भी मजबूत है, लेकिन जनता का धैर्य कमजोर पड़ता जा रहा है। यदि राजनीति ने समय रहते खुद को नहीं बदला, तो आने वाले वर्षों में देश में बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव दिखाई दे सकते हैं। क्योंकि अब जनता केवल जाति और धर्म नहीं, बल्कि जवाबदेही और ईमानदारी की राजनीति चाहती है।
राष्ट्रहित में सबसे बड़ा प्रश्न यही है, क्या राजनीति फिर से सेवा बनेगी या केवल सत्ता और संपत्ति का माध्यम बनकर रह जाएगी?


