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Tuesday, July 14, 2026

साहित्य की जीवंत परंपरा का उत्सव निखिल बंग साहित्य सम्मेलन

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(कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स)
किसी समाज की पहचान केवल उसके आर्थिक विकास या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि उसकी सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक परंपरा और बौद्धिक विरासत से भी होती है। साहित्य वह शक्ति है जो समय के साथ समाज की स्मृतियों को संजोती है, विचारों को दिशा देती है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती है। यही कारण है कि साहित्यिक सम्मेलन केवल औपचारिक आयोजन नहीं होते, बल्कि वे समाज के सांस्कृतिक आत्मविश्वास के उत्सव बन जाते हैं। हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज द्वारा आयोजित दो दिवसीय निखिल बंग साहित्य सम्मेलन इसी व्यापक भावना का सशक्त उदाहरण बना।
सम्मेलन का उद्घाटन हरियाणा के राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष ने अपनी धर्मपत्नी एवं हरियाणा की प्रथम महिला श्रीमती मित्रा घोष की गरिमामयी उपस्थिति में किया। उनकी उपस्थिति ने आयोजन को केवल औपचारिक गरिमा ही नहीं दी, बल्कि यह संदेश भी दिया कि साहित्य, शिक्षा और संस्कृति आज भी सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण सरोकार हैं और उन्हें संवैधानिक संस्थाओं का संरक्षण तथा प्रोत्साहन प्राप्त है।
कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की सामूहिक प्रस्तुति से हुआ। पूरे सभागार में देशभक्ति, सांस्कृतिक गौरव और साहित्यिक आत्मीयता का वातावरण निर्मित हो गया। इसके बाद अतिथियों का पारंपरिक स्वागत किया गया और सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत हुई।
समारोह की अध्यक्षता हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शंकर कुमार सान्याल ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि साहित्य समाज की आत्मा है और जब तक भाषा तथा साहित्य जीवित रहेंगे, तब तक किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहेगी। उन्होंने संस्था की दीर्घकालीन साहित्यिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज वर्षों से साहित्य, संस्कृत भाषा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।
उपाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रत्ना बसु ने सम्मेलन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में साहित्य का दायित्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में जहाँ त्वरित संचार ने संवाद के नए माध्यम बनाए हैं, वहीं गंभीर अध्ययन और साहित्यिक विमर्श की परंपरा को जीवित रखना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने इस सम्मेलन को साहित्य और समाज के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच बताया।
संस्था के सचिव डॉ. देबब्रत मुखोपाध्याय ने सचिवीय प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने संस्था की विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों, प्रकाशनों, शोध परियोजनाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा सामाजिक पहलों का विस्तृत विवरण रखा। उन्होंने बताया कि संस्था केवल सम्मेलन आयोजित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी में साहित्यिक चेतना विकसित करने, संस्कृत एवं भारतीय भाषाओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करने और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत है।
समारोह के दौरान अधिवक्ता समीर बसु राय चौधरी ने राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष और प्रथम महिला श्रीमती मित्रा घोष का सम्मान किया। यह सम्मान केवल उनके संवैधानिक पद का नहीं था, बल्कि शिक्षा, संस्कृति और साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का भी सम्मान था। पूरे सभागार ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका अभिनंदन किया।
अपने प्रेरक संबोधन में राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष ने कहा कि साहित्य समाज को केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि उसे विचार, विवेक और संवेदना भी प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि जब समाज में संवाद कम होने लगता है, तब साहित्य ही मनुष्यता को बचाने का सबसे प्रभावी माध्यम बनता है। भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ज्ञान परंपरा रही है, जिसमें संस्कृत सहित अनेक भारतीय भाषाओं ने अमूल्य योगदान दिया है। इन भाषाओं और उनकी साहित्यिक विरासत का संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
उन्होंने विशेष रूप से युवाओं का आह्वान किया कि वे भारतीय भाषाओं, शास्त्रीय साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन में रुचि लें। उनका कहना था कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं, बल्कि परंपरा और नवाचार के बीच संतुलन स्थापित करना है। उन्होंने साहित्यिक संस्थाओं के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे सम्मेलन समाज में वैचारिक संवाद और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करते हैं।
राज्यपाल के व्यक्तित्व की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उनकी सहजता और आत्मीयता रही। उन्होंने केवल औपचारिक संबोधन देकर मंच नहीं छोड़ा, बल्कि अनेक साहित्यकारों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों से संवाद भी किया। उनकी विनम्रता और सौहार्दपूर्ण व्यवहार ने उपस्थित लोगों पर गहरी छाप छोड़ी। अनेक प्रतिभागियों ने अनुभव किया कि सार्वजनिक जीवन में उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों का इस प्रकार साहित्यिक आयोजनों में समय देना स्वयं साहित्य के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
प्रथम महिला श्रीमती मित्रा घोष की गरिमामयी उपस्थिति ने भी सम्मेलन की शोभा बढ़ाई। उन्होंने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया और प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया। उनकी उपस्थिति ने आयोजन में आत्मीयता और सौम्यता का विशेष वातावरण निर्मित किया।
सांस्कृतिक सत्र में साजेर बेला और उनके दल ने अपनी सुमधुर प्रस्तुतियों से पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। संगीत और साहित्य का यह सुंदर संगम सम्मेलन की आत्मा बन गया। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में संगीत और साहित्य सदैव एक-दूसरे के पूरक रहे हैं, और इस आयोजन में भी दोनों का यह समन्वय स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के सामूहिक गायन के साथ हुआ।
हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज की कार्यकारिणी समिति ने भी सभी अतिथियों, साहित्यकारों, स्वयंसेवकों, समर्थकों तथा साहित्य और संस्कृति के असंख्य प्रेमियों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की। समिति ने विश्वास व्यक्त किया कि यह सम्मेलन आने वाले वर्षों में और अधिक व्यापक रूप लेगा तथा बंगाल सहित पूरे देश में साहित्यिक संवाद को नई दिशा देगा।
आज जब पढ़ने की आदतों में परिवर्तन आ रहा है, सोशल मीडिया त्वरित अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बन गया है और गहन साहित्यिक विमर्श के लिए समय लगातार सिमटता दिखाई देता है, ऐसे समय में इस प्रकार के सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि पुस्तकें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति भी हैं। साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं, संघर्षों, सपनों और भविष्य का दस्तावेज़ है।
निखिल बंग साहित्य सम्मेलन इसी विश्वास का उत्सव है कि भारतीय भाषाओं, संस्कृत साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं की धारा आज भी अविरल प्रवाहित है। यह आयोजन केवल दो दिनों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि साहित्य और संस्कृति के प्रति समाज की आस्था, प्रतिबद्धता और भविष्य के प्रति विश्वास का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आया। ऐसे सम्मेलन यह संदेश देते हैं कि जब तक शब्द जीवित हैं, तब तक समाज की आत्मा भी जीवित रहेगी; और जब तक साहित्य का दीप जलता रहेगा, तब तक संस्कृति की ज्योति भी कभी मंद नहीं पड़ेगी। (विभूति फीचर्स)

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