फर्रुखाबाद। थाना मऊ दरवाजा क्षेत्र के मोहल्ला शमशेर खानी नकारचियांन्न में एक घर के अंदर गोवंश वध की सूचना मिलने से क्षेत्र में हड़कंप मच गया। सूचना मिलते ही हिंदू समाज पार्टी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री राजेश मिश्रा मौके पर पहुंचे और मामले की जानकारी पुलिस को दी।
बताया जा रहा है कि स्थानीय लोगों के माध्यम से घर के अंदर गाय काटे जाने की सूचना मिली थी। सूचना को गंभीरता से लेते हुए पुलिस तत्काल मौके पर पहुंची और संदिग्ध घर में छापेमारी की। छापे के दौरान घर के भीतर से कटा हुआ मांस बरामद किया गया।
हालांकि समाचार लिखे जाने तक यह स्पष्ट नहीं हो सका था कि बरामद मांस गाय का है या भैंस का। पुलिस ने बरामद मांस को कब्जे में लेकर जांच के लिए प्रयोगशाला भेज दिया है। अधिकारियों का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि मामला गोवंश वध का है या नहीं।
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की विधिक कार्रवाई की जाएगी। यदि गोवंश वध की पुष्टि होती है तो संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर कठोर कार्रवाई की जाएगी।
घटना की सूचना से क्षेत्र में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी, जिसे पुलिस की सतर्कता से नियंत्रित कर लिया गया। एहतियातन क्षेत्र में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने और अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है।
घर में गोवंश वध की सूचना पर छापा, कटा मांस बरामद, जांच रिपोर्ट का इंतजार
थाने के सामने सट्टे का अड्डा : छोटू कबाड़ी पर संरक्षण के साये में अवैध कारोबार का आरोप
फर्रुखाबाद। शहर स्थित थाना मऊदरवाजा क्षेत्र में कानून व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि थाने के ठीक सामने “छोटू कबाड़ी” नाम से चर्चित व्यक्ति द्वारा खुलेआम ऑनलाइन सट्टे का नेटवर्क संचालित किया जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि कथित अवैध गतिविधि पुलिस थाना परिसर के सामने ही बेखौफ ढंग से चल रही है, जिससे क्षेत्र में रोष और अविश्वास का माहौल बन गया है।
क्षेत्रवासियों के अनुसार, छोटू कबाड़ी लंबे समय से ऑनलाइन सट्टा कारोबार में सक्रिय है और अपने अधीन कई छोटे सटोरियों का नेटवर्क संचालित करता है। आरोप है कि वह खुलेआम यह दावा करता फिरता है कि उसकी “ऊपर तक सेटिंग” है और कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इतना ही नहीं, चर्चा यह भी है कि वह जिम्मेदारों तक नियमित “महीना” पहुंचाने की बात कहकर अपने सहयोगियों को संरक्षण का भरोसा देता है। इन दावों के चलते उसके नेटवर्क से जुड़े लोग बिना किसी डर के सट्टे के कारोबार में जुटे हुए हैं।
बताया जा रहा है कि यह कथित ऑनलाइन सट्टा मोबाइल ऐप, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कॉल के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। तेजी से युवाओं को इस जाल में जोड़ा जा रहा है, जिससे उनके भविष्य पर संकट मंडरा रहा है। कई परिवारों ने चिंता जताई है कि उनके घर के युवा इस अवैध गतिविधि की चपेट में आकर आर्थिक नुकसान उठा रहे हैं। इससे पारिवारिक कलह और आर्थिक अस्थिरता की स्थिति पैदा हो रही है।
गौरतलब है कि छोटू कबाड़ी के खिलाफ पूर्व में भी सट्टा और जुआ अधिनियम के तहत कई मुकदमे दर्ज होने की चर्चा है। इसके बावजूद यदि वह खुलेआम थाने के सामने कथित रूप से अपना नेटवर्क चला रहा है, तो यह व्यवस्था की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि पुलिस थाना परिसर के ठीक सामने ही अवैध गतिविधियां फल-फूल रही हैं, तो आमजन की सुरक्षा और कानून के भय का क्या अर्थ रह जाता है?
क्षेत्रीय लोगों ने जिला प्रशासन और पुलिस के उच्चाधिकारियों से मांग की है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए, आरोपों की सच्चाई सामने लाई जाए और यदि मिलीभगत पाई जाए तो संबंधित जिम्मेदारों पर भी कठोर कार्रवाई की जाए।
अब निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या सचमुच इस कथित ऑनलाइन सट्टा नेटवर्क पर सख्त शिकंजा कसा जाएगा, या फिर कानून के साए में ही यह खेल यूं ही चलता रहेगा यह आने वाला समय तय करेगा।
नाम बदला, पर हालात और बदतर: मनरेगा की जमीनी सच्चाई ने खोली व्यवस्था की पोल
फर्रुखाबाद| समेत प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में रोजगार की आधारशिला मानी जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। योजना का नाम बदला, पोर्टल बदले, प्रक्रियाओं को डिजिटल और पारदर्शी बताकर प्रचारित किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि समस्याएं कम होने के बजाय पहले से कहीं अधिक जटिल और गहरी हो गई हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों का आरोप है कि उन्हें दो-दो महीने तक मजदूरी का भुगतान नहीं मिल रहा। जिन हाथों ने तालाब खोदे, सड़कें बनाई, पंचायत भवनों की मरम्मत की और गांवों को विकास की राह पर आगे बढ़ाया, वही हाथ आज अपने परिवार के लिए रोटी जुटाने को संघर्ष कर रहे हैं। मजदूरी रुकने का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई, घर के राशन और दवाइयों पर पड़ रहा है। कई परिवार उधार लेकर गुजारा कर रहे हैं, जिससे कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
स्थिति केवल श्रमिकों तक सीमित नहीं है। एपीओ, ग्राम रोजगार सेवक, तकनीकी सहायक, कंप्यूटर ऑपरेटर और लेखा सहायकों का लगभग आठ माह से मानदेय लंबित है। ये वही कर्मचारी हैं जो योजना के क्रियान्वयन की पूरी जिम्मेदारी संभालते हैं—मस्टर रोल तैयार करना, ऑनलाइन एंट्री करना, तकनीकी स्वीकृति देना, भुगतान प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और शासन के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना। इसके बावजूद उन्हें समय पर उनका हक नहीं मिल पा रहा।
कर्मचारियों का कहना है कि पहले जहां काम सीमित दायरे में था, अब डिजिटल पोर्टल, ई-केवाईसी, भू-टैगिंग, सर्वे, बीएलओ ड्यूटी और अन्य अतिरिक्त दायित्वों ने कार्यभार कई गुना बढ़ा दिया है। दिन-रात काम करने के बाद भी आर्थिक असुरक्षा बनी हुई है। त्योहारों के समय यह संकट और गहरा जाता है, जब परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना भी चुनौती बन जाता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि योजना के नाम और स्वरूप में बदलाव के बावजूद भुगतान प्रणाली की खामियां जस की तस बनी हुई हैं। कागजों में पारदर्शिता और समयबद्धता के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर देरी, तकनीकी अड़चनें और प्रशासनिक उदासीनता ने व्यवस्था को अविश्वसनीय बना दिया है। ग्रामीण विकास की धुरी मानी जाने वाली यह योजना यदि समय पर भुगतान ही सुनिश्चित न कर सके, तो उसके उद्देश्य पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा जैसी योजनाएं केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने का माध्यम हैं। जब मजदूरी और मानदेय महीनों तक अटका रहता है, तो उसका असर पूरे बाजार और स्थानीय व्यापार पर पड़ता है। गांव की छोटी दुकानों से लेकर स्कूलों तक इसकी मार दिखाई देती है।
स्पष्ट है कि केवल नाम बदलने या नई घोषणाएं करने से हालात नहीं सुधरेंगे। जरूरत है ठोस प्रशासनिक इच्छाशक्ति, पारदर्शी भुगतान प्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की। जब तक श्रमिक और कर्मचारी दोनों को समय पर उनका अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक योजना का वास्तविक उद्देश्य अधूरा ही रहेगा और असंतोष की चिंगारी सुलगती रहेगी।
माफिया अनुपम दुबे के भाई और उसके बदमाश साथियों की पैरवी में आये पूर्व मंत्री रामनरेश
– सर्किट हाउस में डीएम एसपी समेत कई जिम्मेदारों के बीच हुई मंत्रणा
– मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस पर उनके ही विधायक सवाल दागने पहुंचे
– जान की परवाह किए बगैर पुलिस प्रशासन द्वारा की जा रही कार्रवाई पर सवाल
फर्रुखाबाद। जिले में अपराध के खिलाफ चल रही सख्त कार्रवाई के बीच एक नया सियासी मोड़ सामने आया है। कुख्यात माफिया चर्चित अनुपम दुबे के भाई डब्बन और उसके मैनपुरी के रिश्तेदार साथियों की पैरवी में से पूर्व मंत्री व भोगांव विधायक रामनरेश अग्निहोत्री के हस्तक्षेप की चर्चा ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।
थाना मऊ दरवाजा में दर्ज गैंगस्टर एक्ट के मुकदमे में अनुपम के भाई समेत डब्बन, बब्बन 11 बदमाशों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई चल रही है। इसमें डब्बन के साले मैनपुरी निवासी और उसके रिश्तेदार का नाम भी शामिल है। पुलिस और प्रशासन की टीमें लगातार दबिश, गिरफ्तारी और संपत्ति कुर्की की प्रक्रिया में जुटी हैं। अधिकारियों का कहना है कि कुख्यात अपराधियों के खिलाफ यह अभियान जोखिम भरा जरूर है, लेकिन कानून-व्यवस्था के लिए जरूरी है।
इसी बीच बीते गुरुवार फतेहगढ़ सर्किट हाउस में हुई बैठक ने पूरे मामले को राजनीतिक रंग दे दिया। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में पूर्व मंत्री रामनरेश अग्निहोत्री ने संबंधित माफिया पक्ष की ओर से अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी। इसे लेकर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और सवाल उठाया है कि जब जिला प्रशासन जान जोखिम में डालकर कार्रवाई कर रहा है, तब सत्ता पक्ष के वरिष्ठ नेता की यह पहल क्या संदेश देती है?
दूसरी ओर, प्रशासनिक हलकों में डीएम और एसपी की कार्यशैली की चर्चा है। लगातार गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमे, कुर्की और दबिश से अपराध जगत में बेचैनी बताई जा रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि लंबे समय बाद अपराधियों के खिलाफ इस स्तर की निर्णायक कार्रवाई दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रकरण केवल एक पैरवी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि “जीरो टॉलरेंस” बनाम “राजनीतिक हस्तक्षेप” की बहस को और तेज करेगा। फिलहाल आधिकारिक बयान का इंतजार है, लेकिन जिले की सियासत में यह मुद्दा गरमाता जा रहा है।
अपराध के खिलाफ प्रशासनिक अभियान और उसके बीच उभरती राजनीतिक गतिविधियां—दोनों मिलकर इस मामले को आने वाले दिनों में और बड़ा रूप दे सकती हैं।
अकेले रामनरेश को दर्द कटियार समाज को कोई आपत्ति नहीं
फर्रुखाबाद। थाना मऊ दरवाजा में दर्ज गैंगस्टर एक्ट के मामले में दो कटियार नाम भी माफिया अनुपम दुबे के भाई बब्बन, डब्बन के साथ जुड़े हैँ इसके बावजूद कटियार समाज की ओर से किसी प्रकार की सार्वजनिक आपत्ति दर्ज नहीं की गई है। उनके समाज के लोगों ने सांप कहा कि अपराधी की कोई जाति नहीं होती अपराध किया है तो सजा भुगतनी होगी, जिला प्रशासन की कार्रवाई अपनी प्रक्रिया के तहत जारी है।
लेकिन सजातीय गुंडों हो रही कार्रवाई का दर्द भोगांव विधायक व पूर्व मंत्री रामनरेश अग्निहोत्री कुछ ज्यादा है और मैं पर भी करने के लिए मैनपुरी से फर्रुखाबाद तक चले आए ,स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं कि जब कुर्मी समाज की ओर से कोई विरोध नहीं है, तब राजनीतिक स्तर पर इन्हे इतनी बेचैनी क्यों दिखाई दे रही है।
चिता भस्म की होली पर विवाद गहराया, डोमराजा परिवार की परंपरा रोकने की मांग
वाराणसी। धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए विश्वविख्यात काशी में इस वर्ष होली से पहले ‘चिता भस्म की होली’ को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। श्मशान घाटों पर खेली जाने वाली इस परंपरा को लेकर डोमराजा परिवार ने कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे तत्काल प्रभाव से बंद कराने की मांग की है। परिवार ने चेतावनी दी है कि यदि मसान घाट पर चिता भस्म की होली खेली गई तो वे विरोध स्वरूप चिता में आग देना बंद कर देंगे।
काशी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर वर्षों से कुछ साधु-संतों और श्रद्धालुओं द्वारा चिता की राख से होली खेलने की परंपरा रही है। इसे शिवभक्ति और वैराग्य की प्रतीक परंपरा बताया जाता है। हालांकि इस बार मणिकर्णिका घाट से जुड़े डोमराजा परिवार ने इसे मृतकों का अपमान बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि चिता की भस्म से रंग खेलना समाज में गलत संदेश देता है और शोक संतप्त परिवारों की भावनाओं को आहत करता है।
डोमराजा परिवार का कहना है कि यदि भारी भीड़ घाट पर पहुंचती है और चिता भस्म से होली खेली जाती है तो यह प्रशासन की लापरवाही मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में वे चिता को मुखाग्नि देना बंद कर अपना विरोध दर्ज कराएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके लिए पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
काशी में अंतिम संस्कार की परंपरा में डोम समुदाय की विशेष भूमिका रही है। मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर सदियों से डोमराजा परिवार द्वारा ही चिता को अग्नि दी जाती है। इस बार उनका विरोध सामने आने से धार्मिक संगठनों, साधु-संतों और प्रशासन के बीच चर्चा तेज हो गई है।
स्थानीय प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि सभी पक्षों से संवाद कर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा ताकि धार्मिक आस्था और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बना रहे।
फिलहाल काशी में होली के पारंपरिक आयोजनों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। देखना होगा कि प्रशासन और संबंधित पक्षों के बीच बातचीत से क्या रास्ता निकलता है और इस वर्ष मसान की होली किस रूप में आयोजित होती है।
“प्रेरणा स्थल में बाबूजी की मूर्ति क्यों नहीं?”— साक्षी महाराज नें उठाई मांग
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर स्वाभिमान और विरासत का मुद्दा गर्मा गया है। उन्नाव से सांसद साक्षी महाराज ने राजधानी लखनऊ में बने प्रेरणा स्थल को लेकर तीखा बयान दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में मांग की है कि वहां पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह (बाबूजी) की प्रतिमा भी स्थापित की जाए।
साक्षी महाराज ने कहा कि बाबूजी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि हिंदुत्व और सुशासन की मजबूत पहचान थे। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन से लेकर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को सख्ती से संभालने तक, अपने कार्यकाल में ऐतिहासिक फैसले लिए। ऐसे नेता की उपेक्षा “अन्याय” है और यह प्रदेश की जनता की भावनाओं के खिलाफ है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब प्रेरणा स्थल का उद्देश्य महान नेताओं के योगदान को सम्मान देना है, तो फिर बाबूजी जैसे जननायक को इस सूची से बाहर क्यों रखा गया? उनका कहना है कि कल्याण सिंह ने पिछड़ों और सामान्य वर्ग दोनों के हितों के लिए मजबूती से आवाज उठाई और प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दी।
सांसद ने यह भी संकेत दिया कि यदि उनकी मांग पर विचार नहीं किया गया तो वे इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाएंगे। उन्होंने इसे केवल प्रतिमा का सवाल नहीं, बल्कि “सम्मान और इतिहास के न्याय” का मुद्दा बताया।
राजनीतिक गलियारों में इस बयान के बाद हलचल तेज हो गई है। समर्थकों का कहना है कि कल्याण सिंह की विरासत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, वहीं विरोधी इसे राजनीतिक बयानबाजी बता रहे हैं।
फिलहाल, प्रदेश सरकार या संबंधित प्राधिकरण की ओर से इस मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाएगा।
सवाल अब सीधा है—क्या प्रेरणा स्थल में बाबूजी को स्थान मिलेगा, या यह बहस और तीखी होगी? राजनीति की जमीन पर यह नया विवाद आने वाले समय में बड़ा रूप ले सकता है।








