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Friday, March 13, 2026
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सोने-चांदी की कीमतों में गिरावट, मुनाफावसूली के चलते बाजार में उतार-चढ़ाव

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– मिडल ईस्ट तनाव के बीच दिल्ली सर्राफा बाजार में सोना 1100 रुपये सस्ता, चांदी भी फिसली

नई दिल्ली। मिडल-ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता का असर देश के सर्राफा बाजार पर भी देखने को मिल रहा है। कारोबारियों की ओर से लगातार दूसरे दिन ऊंचे स्तर पर मुनाफावसूली किए जाने से राजधानी दिल्ली में सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है।

अखिल भारतीय सर्राफा संघ के अनुसार शुक्रवार को दिल्ली सर्राफा बाजार में सोने की कीमत 1100 रुपये गिरकर 1.64 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम रह गई। वहीं चांदी की कीमत भी फिसलकर 2.71 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव और निवेशकों द्वारा मुनाफावसूली के चलते कीमती धातुओं की कीमतों में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है।

हालांकि बाजार विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक परिस्थितियों और भू-राजनीतिक तनाव के कारण आने वाले दिनों में सोने-चांदी की कीमतों में फिर से तेजी या उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। गौरतलब है कि शनिवार और रविवार को सर्राफा बाजार बंद रहता है, इसलिए अब सोमवार को बाजार खुलने के बाद कीमतों में अगला रुख स्पष्ट होगा।

शिक्षा मंत्री गुलाब देवी के आवास पहुंचे सफाई कर्मी, मांगों को लेकर किया प्रदर्शन

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– बोनस, वर्दी और एरियर की मांग, चंदौसी स्थित आवास पर नारेबाजी कर सौंपा ज्ञापन

संभल। संभल के चंदौसी स्थित आवास पर उत्तर प्रदेश सरकार की शिक्षा मंत्री गुलाबो देवी से मिलने बड़ी संख्या में सफाई कर्मी पहुंचे। इस दौरान सफाई कर्मियों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर नारेबाजी करते हुए प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन कर रहे सफाई कर्मियों ने बताया कि वे बोनस, वर्दी, एरियर और अन्य लंबित मांगों को लेकर मंत्री से मिलने पहुंचे हैं। उनका कहना था कि लंबे समय से उनकी मांगें लंबित हैं, जिससे कर्मचारियों में नाराजगी है।

सफाई कर्मियों ने मंत्री के आवास पर प्रदर्शन के बाद शिक्षा मंत्री गुलाब देवी को ज्ञापन सौंपकर अपनी समस्याओं से अवगत कराया और जल्द समाधान की मांग की।

प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में कर्मचारी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया तो आगे और बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे। मामले को लेकर स्थानीय प्रशासन भी सतर्क रहा और स्थिति पर नजर बनाए रखी गई।

रैपर बादशाह के खिलाफ हरियाणा पुलिस की कार्रवाई, ‘टटीरी’ गाने को लेकर एफआईआर

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– पंचकूला में दर्ज हुआ मामला, पुलिस ने पेश होने का नोटिस भेजा

चंडीगढ़/पंचकूला। लोकप्रिय रैपर और सिंगर Badshah के खिलाफ हरियाणा में पुलिस ने कार्रवाई तेज कर दी है। उनके नए गाने ‘टटीरी’ में कथित आपत्तिजनक सामग्री को लेकर पंचकूला में एफआईआर दर्ज की गई है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार शिकायत मिलने के बाद मामले की जांच शुरू की गई और गाने की सामग्री को लेकर आपत्ति जताई गई। इसके बाद पुलिस ने बादशाह को पूछताछ के लिए पेश होने का नोटिस जारी किया है।

बताया जा रहा है कि इस मामले में पुलिस ने ताबड़तोड़ छापेमारी भी शुरू कर दी है। साथ ही सोशल मीडिया पर इस गाने को शेयर करने या प्रसारित करने वालों पर भी नजर रखी जा रही है।

पुलिस का कहना है कि यदि किसी भी गाने या सामग्री में आपत्तिजनक या विवादित बातें पाई जाती हैं, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और नोटिस के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

कानपुर में अवैध कोडीन सिरप व्यापार में दवा कंपनी का मालिक गिरफ्तार

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कानपुर: कानपुर (Kanpur) की क्राइम ब्रांच ने कोडीन आधारित कफ सिरप (illegal codeine syrup) के अवैध व्यापार में फरार चल रहे एक दवा कंपनी के मालिक को गिरफ्तार किया है। यह मामला 5 नवंबर, 2025 को हनुमंत विहार पुलिस स्टेशन में एनडीपीएस अधिनियम और अन्य धाराओं के तहत दर्ज किया गया था। गिरफ्तार आरोपी की पहचान मेसर्स सिसोदिया मेडिसिन हाउस के मालिक विशाल सिंह सिसोदिया के रूप में हुई है।

श्रवण कुमार सिंह के अनुसार, आरोपी ने प्रतिबंधित कोडीन आधारित सिरप फैंसीएपिक-टी की 10,500 से अधिक बोतलें अवैध रूप से खरीदी और बेची थीं। जांच के दौरान, रिकॉर्ड और ईमेल से पता चला कि आरोपी ने इधिका लाइफसाइंसेज से सिरप की 5,250 बोतलें खरीदी थीं, लेकिन इसकी कानूनी बिक्री का कोई सबूत नहीं मिला। आगे की जांच में पुष्टि हुई कि कोडीन आधारित दवाओं की 10,500 से अधिक बोतलें विभिन्न स्रोतों से खरीदी गई थीं।

पुलिस ने आरोपी से एक लैपटॉप भी बरामद किया है, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर रिकॉर्ड में हेराफेरी करने और फर्जी बिलिंग दस्तावेज बनाने के लिए किया गया था। लैपटॉप को फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है। पुलिस इस अवैध गिरोह के अन्य सदस्यों और आपूर्तिकर्ताओं की संलिप्तता की भी जांच कर रही है और पहले से बेची गई बोतलों को बरामद करने का प्रयास कर रही है।

बिजनौर में विवाद के बाद दामाद ने सास की गोली मारकर हत्या

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बिजनौर: बिजनौर (Bijnor) में एक 45 वर्षीय महिला की उसके दामाद ने कथित तौर पर झगड़े के बाद गोली मारकर हत्या (shoots dead) कर दी। यह घटना नाहटौर पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले फुलसंडा गंगादास गांव में हुई। मृतका की पहचान बाबली के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार, बाबली की बेटी भावना 29 मार्च, 2024 को सज्जल के साथ भाग गई थी और बाद में अदालत में उससे शादी कर ली थी। दंपति लगभग एक साल तक गांव से बाहर रहे और फिर अपने परिवार के पास बसने के लिए लौट आए।

शुक्रवार रात करीब 9 बजे बाबली और उसके दामाद सज्जल के बीच झगड़ा हुआ। विवाद से क्रोधित होकर आरोपी ने कथित तौर पर बाबली के सिर और कनपटी पर देसी पिस्तौल से गोली मार दी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। आरोपी को हिरासत में ले लिया गया है। पुलिस ने बताया कि सज्जल और भावना के प्रेम विवाह के बाद से ही दोनों परिवारों के बीच तनाव बना हुआ था, जिसके कारण अंततः यह घातक घटना घटी।

अपर पुलिस अधीक्षक अमित किशोर के अनुसार घटना के बाद से आरोपी सजल फरार है और उसकी तलाश में पुलिस टीमें लगाई गई हैं। घटना से जुड़े अन्य पहलुओं की गहनता से जांच की जा रही है। आसपास के लोगों से पूछताछ कर घटना के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

मध्यप्रदेश की राजनीति में महिलाओं की स्थिति

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(अंजनी सक्सेना-विभूति फीचर्स)

मध्यप्रदेश का राजनीतिक इतिहास कई प्रभावशाली पुरुष नेताओं के नाम से भरा पड़ा है, लेकिन जब इसी इतिहास को महिला नेतृत्व के दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। राज्य के गठन 1956 से लेकर आज तक महिला नेताओं की मौजूदगी तो रही, परंतु संख्या और प्रभाव के लिहाज से यह उपस्थिति सीमित ही रही है। कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपने समय में मजबूत पहचान बनाई, लेकिन उनके बाद उसी स्तर का व्यापक और दीर्घकालिक महिला नेतृत्व उभरता दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि आज भी मध्यप्रदेश की राजनीति में प्रभावी महिला नेतृत्व की कमी अक्सर चर्चा का विषय बनती है।

राज्य के राजनीतिक इतिहास में महिला नेतृत्व की शुरुआत जिस गरिमा और प्रभाव के साथ हुई थी, वह आगे चलकर निरंतरता नहीं पकड़ सकी। शुरुआती दशकों में कुछ ऐसी महिलाएं सामने आईं जिन्होंने न केवल प्रदेश की राजनीति को दिशा दी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान स्थापित की। लेकिन समय के साथ वह परंपरा कमजोर होती चली गई।
गरिमामयी राजनीति की आधारशिला राजमाता सिंधिया

मध्यप्रदेश की राजनीति में महिला नेतृत्व की सबसे प्रभावशाली शुरुआत श्रीमती विजयाराजे सिंधिया से मानी जाती है। ग्वालियर राजघराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने केवल चुनावी राजनीति ही नहीं की, बल्कि वैचारिक राजनीति को मजबूत आधार दिया।अपने गरिमापूर्ण और ममतामयी व्यवहार से जनसंघ और बाद में भाजपा के संगठन को खड़ा करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी व्यक्तित्व थीं जिन्होंने वैचारिक प्रतिबद्धता और जनसंपर्क दोनों को साथ लेकर राजनीति की। 1960 और 1970 के दशक में मध्यप्रदेश में जनसंघ की जड़ें मजबूत करने में उनका योगदान निर्णायक माना जाता है।

इमरजेंसी के दौरान उनका संघर्ष भी राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। राजमाता ने सत्ता के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाई और जेल जाने से भी पीछे नहीं हटीं। इस तरह वे केवल ग्वालियर या चंबल क्षेत्र की नेता नहीं रहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उनकी मजबूत पहचान बनी।

आदिवासी नेतृत्व की सशक्त आवाज जमुना देवी

कांग्रेस की राजनीति में यदि किसी महिला नेता ने गहरा प्रभाव छोड़ा, तो वह थीं जमुना देवी। जमुना देवी को मध्यप्रदेश की सबसे प्रभावशाली आदिवासी महिला नेता माना जाता है। वे कई बार विधायक चुनी गईं और राज्य सरकार में मंत्री भी रहीं। 2003 से 2008 तक वे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहीं, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। उनकी राजनीति केवल पदों तक सीमित नहीं थी। वे आदिवासी समाज की समस्याओं को मजबूती से उठाने वाली नेता थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में उनका जनाधार बहुत मजबूत था और वे आम लोगों से सीधे संवाद करने वाली नेता के रूप में जानी जाती थीं। जमुना देवी के निधन के बाद कांग्रेस में वैसी ही मजबूत महिला आदिवासी नेतृत्व की कमी अक्सर महसूस की जाती है।

अग्निमुखी साध्वी उमा भारती

मध्यप्रदेश की राजनीति में महिला नेतृत्व का सबसे बड़ा प्रतीक उमा भारती के रूप में सामने आया। 2003 में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद फायर ब्रांड नेता और अग्निमुखी साध्वी के नाम से प्रसिद्ध उमा भारती मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। यह प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण क्षण था, क्योंकि पहली बार किसी महिला नेता ने राज्य की सत्ता संभाली।

उमा भारती की राजनीति का अपना अलग ही अंदाज रहा। वे ओजस्वी वक्ता थीं और जनसभाओं में उनकी लोकप्रियता बहुत अधिक थी। राम मंदिर आंदोलन से लेकर राज्य की राजनीति तक उनका प्रभाव व्यापक रहा। हालाँकि उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन उन्होंने यह साबित किया कि महिला नेतृत्व भी प्रदेश की राजनीति में शीर्ष तक पहुंच सकता है।

सशक्त सुमित्रा महाजन

मध्यप्रदेश की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली सुमित्रा महाजन इंदौर से लगातार आठ बार लोकसभा सांसद चुनी गईं। यह उपलब्धि अपने आप में बहुत बड़ी है। उनकी राजनीतिक शैली सशक्त,संयमित और संगठनात्मक रही। 2014 से 2019 तक वे लोकसभा की स्पीकर रहीं, जो भारतीय लोकतंत्र में अत्यंत प्रतिष्ठित पद है।
सरल,सहज,लोकप्रिय सुषमा स्वराज

सुषमा स्वराज भारतीय राजनीति की सबसे लोकप्रिय महिला नेताओं में गिनी जाती हैं। वे विदेश मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत आवाज बनीं। सोशल मीडिया के माध्यम से आम नागरिकों की मदद करने की उनकी शैली ने उन्हें जनता के बीच बेहद लोकप्रिय बनाया तो मध्यप्रदेश के विदिशा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर उन्होंने मध्यप्रदेश का भी राष्ट्रीय राजनीति में मान बढ़ाया।

इनके अतिरिक्त विद्यावती चतुर्वेदी, विमला वर्मा, मैमूना सुल्तान, जयश्री बैनर्जी, डॉ. नजमा हेपतुल्ला, कुसुम मेंहदले,उर्मिला सिंह,डॉ.कल्पना परुलेकर, यशोधरा राजे,डॉ. विजय लक्ष्मी साधौ,अनुसुईया उइके,मीनाक्षी नटराजन और कल्याणी पाण्डेय भी प्रदेश की चर्चित और सक्रिय राजनेता रही हैं।

वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य में रिक्तता

सुषमा स्वराज और सुमित्रा महाजन के बाद राष्ट्रीय स्तर पर मध्यप्रदेश की महिला नेतृत्व की ऐसी मजबूत पहचान फिलहाल दिखाई नहीं दे रही है। आज की राजनीति में प्रदेश से कई महिला नेता जैसे-केंद्रीय मंत्री सावित्री ठाकुर, मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री कृष्णा गौर,संपतिया उइके,निर्मला भूरिया,राधा सिंह,प्रतिमा बागरी,सांसद लता वानखेड़े, विधायक अर्चना चिटनीस,पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर सक्रिय जरूर हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रभाव और स्वीकार्यता में कमी स्पष्ट दिखाई देती है। वैसे यह केवल किसी एक दल की समस्या नहीं है, बल्कि लगभग सभी राजनीतिक दलों में यह स्थिति दिखाई देती है।

कांग्रेस में महिला नेतृत्व

कांग्रेस की बात करें तो जमुना देवी और उर्मिला सिंह के बाद राज्य में वैसा प्रभावशाली महिला नेतृत्व उभरता दिखाई नहीं देता। कांग्रेस संगठन में कुछ महिलाएं जरूर सक्रिय रही हैं। उदाहरण के तौर पर शोभा ओझा को महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का अवसर मिला। यह एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक उपलब्धि थी लेकिन चुनावी राजनीति में लगातार सफलता न मिल पाने के कारण उनका प्रभाव उतना व्यापक नहीं हो सका, जितनी अपेक्षा की जा रही थी। यही स्थिति मीनाक्षी नटराजन की भी रही। पूर्व में मध्यप्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रही उर्मिला सिंह अवश्य बाद में हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल रही और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रही।

वस्तुत: राजनीति में संगठन और जनाधार दोनों का संतुलन आवश्यक होता है। यदि कोई नेता चुनावी मैदान में मजबूत प्रदर्शन नहीं कर पाता, तो उसकी राजनीतिक पहचान सीमित रह जाती है।

भाजपा में भी अवसरों की कमी

भाजपा में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। राजमाता सिंधिया और उमा भारती जैसी प्रभावशाली महिला नेताओं के बाद उस स्तर का व्यापक महिला नेतृत्व कम दिखाई देता है। राज्य सरकारों में महिला मंत्री जरूर रही हैं और कई महिलाएं विधायक भी बनी हैं, लेकिन प्रदेश स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक जनाधार और वैचारिक प्रभाव रखने वाली महिला नेताओं की संख्या सीमित ही है।

पंचायत और स्थानीय राजनीति से बदलाव के संकेत

हालाँकि एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि पंचायत और नगरीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। आरक्षण व्यवस्था के कारण हजारों महिलाएं सरपंच, जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य और पार्षद के रूप में राजनीति में आई हैं। इससे राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का आधार जरूर बढ़ा है लेकिन स्थानीय स्तर से प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने की राजनीतिक यात्रा अभी भी आसान नहीं है। इसके लिए संगठनात्मक समर्थन, संसाधन और दीर्घकालिक राजनीतिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।

सामाजिक और राजनीतिक कारण

महिला नेतृत्व की कमी के पीछे कई सामाजिक और राजनीतिक कारण भी हैं। राजनीति अभी भी काफी हद तक पुरुष प्रधान मानी जाती है। चुनावी राजनीति में संसाधनों की आवश्यकता, लंबे समय तक क्षेत्र में सक्रिय रहने की चुनौती और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी कई बार महिलाओं के लिए बाधा बनती हैं।। इसके अलावा राजनीतिक दल भी कई बार महिलाओं को सीमित अवसर देते हैं। चुनावी टिकट वितरण में महिलाओं की संख्या अभी भी कम रहती है।

क्या हैं संभावनाएँ

प्रदेश में उन महिलाओं के सामने,जो राजनीति में आगे बढ़ने की क्षमता,योग्यता और सपना रखती हैं,स्थिति निराशाजनक तो बिल्कुल नहीं है लेकिन चुनौतियां अवश्य हैं नई पीढ़ी की कई महिलाएं राजनीति में सक्रिय हो रही हैं। शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और राजनीतिक भागीदारी के बढ़ते अवसरों के कारण आने वाले समय में मजबूत महिला नेतृत्व उभरने की संभावना भी है।

जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल महिलाओं को केवल प्रतीकात्मक भूमिका तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी बराबर स्थान दें। यदि आने वाले समय में राजनीतिक दल महिला नेतृत्व को गंभीरता से आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं, तो संभव है कि मध्यप्रदेश की राजनीति में फिर से ऐसी प्रभावशाली महिला नेता उभरें जो प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति में भी नई पहचान स्थापित करें।

(विभूति फीचर्स)