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Monday, June 29, 2026
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करनाल पुलिस की बड़ी कार्रवाई: 81 ग्राम अफीम सहित दो तस्कर गिरफ्तार, बाइक भी बरामद

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करनाल: पुलिस अधीक्षक करनाल (Superintendent of Police, Karnal) के दिशा-निर्देशानुसार जिला पुलिस द्वारा नशा तस्करों के विरुद्ध चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत एंटी नारकोटिक्स सेल करनाल की टीम ने इंचार्ज उप निरीक्षक हिम्मत सिंह के नेतृत्व में कार्रवाई करते हुए थाना मुनक क्षेत्र के एक एनडीपीएस एक्ट के मुकदमे में दो आरोपियों को गिरफ्तार (arrested) करने में सफलता हासिल की है।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान परमजीत पुत्र राजेंद्र निवासी गांव पाढा, थाना मुनक, जिला करनाल तथा अंकित पुत्र राजेंद्र निवासी गांव अहर, थाना मतलौडा, जिला पानीपत के रूप में हुई है। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से 81 ग्राम अफीम तथा वारदात में प्रयुक्त एचएफ डीलक्स मोटरसाइकिल बरामद।

प्रारंभिक पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि वे जल्दी अमीर बनने और अपने शौक पूरे करने के उद्देश्य से अफीम की तस्करी करते थे। एंटी नारकोटिक्स सेल की टीम ने गश्त के दौरान दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया। मामले में दिनों आरोपियों से गहन पूछताछ एवं अन्य संभावित खुलासों के लिए अग्रिम अनुसंधान जारी है।

जिला पुलिस करनाल ने आमजन से अपील की है कि यदि कहीं भी नशे की तस्करी या अवैध गतिविधियों की सूचना मिले तो उसकी जानकारी तुरंत पुलिस को दें। सूचना देने वाले व्यक्ति की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी।

अब यूपी में दंगा नहीं, रामराज्य की दिशा में बढ़ रहा प्रदेश’: मुख्यमंत्री

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मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को मुरादाबाद में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने कानून-व्यवस्था, धार्मिक स्थलों, सांस्कृतिक विरासत और प्रदेश के विकास को लेकर विपक्ष की कार्यशैली पर सवाल उठाए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज उत्तर प्रदेश में “नो कर्फ्यू, नो दंगा, सब चंगा” का माहौल है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में अब दंगे और उपद्रव नहीं होते तथा सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के कारण अपराधियों में कानून का भय है। उन्होंने कहा कि जो भी बेटी की सुरक्षा, व्यापारियों या किसानों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ करेगा, उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी।

कुंदरकी विधानसभा उपचुनाव का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वहां की जनता ने प्रदेश की नई राजनीतिक दिशा को मजबूत किया है। उन्होंने इसे कानून-व्यवस्था और विकास के पक्ष में जनता का समर्थन बताया।

मुख्यमंत्री ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि उसकी राजनीति समाज को जाति और क्षेत्र के आधार पर बांटने वाली रही है। उन्होंने “बाबरी सोच” शब्द का प्रयोग करते हुए आरोप लगाया कि ऐसी राजनीति समाज में विभाजन और वैमनस्य पैदा करती है। संभल के हरिहर मंदिर और ऐतिहासिक स्थलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए समाज को सदैव जागरूक रहना होगा।

अयोध्या को लेकर मुख्यमंत्री ने कहा कि डबल इंजन सरकार के नेतृत्व में अयोध्या का व्यापक विकास हुआ है और आज यह विश्वस्तरीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक नगरी के रूप में स्थापित हो रही है। उन्होंने विपक्ष के हालिया बयानों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि वे भी अयोध्या और भगवान राम के महत्व को स्वीकार कर रहे हैं तो यह उनकी विचारधारा की विजय है।

मुख्यमंत्री ने मथुरा-वृंदावन और श्रीकृष्ण जन्मभूमि का भी उल्लेख करते हुए कहा कि सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के संरक्षण के प्रति सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने विपक्ष से तुष्टीकरण की राजनीति छोड़कर राष्ट्रहित और सांस्कृतिक विरासत के मुद्दों पर स्पष्ट रुख अपनाने का आह्वान किया।

अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश आज विकास, सुरक्षा और सुशासन के नए दौर में प्रवेश कर चुका है तथा जनता प्रदेश को आगे बढ़ाने वाली नीतियों के साथ खड़ी है।

क्रांतिकारी संत कवि कबीर दास जयंती पर गोष्ठी , बताया विश्व धर्म का पैरोकार

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फर्रुखाबाद।राष्ट्रीय प्रगतिशील फोरम कायमगंज द्वारा कबीर जयंती पर कृष्णा प्रेस परिसर सड़वाड़ा कायमगंज में आयोजित संगोष्ठी में साहित्यकार प्रोफेसर रामबाबू मिश्र रत्नेश ने कहा कि शब्द के अक्खड जुलाहे संत कवि कबीर दास ने पाखंड और कुत्सित परंपराओं को लेकर जाति धर्म और समाज के ठेकेदारों को खरी खरी सुनाई।
उन्होंने कहा कि स्वामी रामानंद के यशस्वी शिष्य कबीर दास को अपढ़ सिद्ध करना बेमानी है। उनकी उलट वांसियों को सुलझाने में बड़े-बड़े विद्वानों के दिमाग आज भी चक्करधिन्नी काटते हैं।
प्रधानाचार्य योगेश तिवारी ने कहा की हिंसा, उन्माद और नफरत के इस दौर में मानवता का अस्तित्व बरकरार रखने के लिए एक अदद स्पष्टवादी कर्मयोगी संत कबीर की जरूरत है। गीतकार पवन बाथम कहा कि कबीर के साखी और सबद हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। फकीरों से लेकर विश्व स्तर के गायक कलाकार आज भी उनके पदों को गाते हैं। प्रधानाचार्य शिवकांत शुक्ला एवं अमरनाथ शुक्ला ने कहा कि कबीर की वाणी मानव की चेतना को झकझोर कर जगाती हैं। ऐसे संत और कहीं दुर्लभ हैं। वीएस तिवारी ने कहा कि तुलसी सूर कबीर मानवीय संवेदनाओं के अमर गायक है। उनकी सधुक्कड़ी बोली सीधी हृदय में प्रवेश करती है। युवा कवि अनुपम मिश्रा ने कहा कि निर्गुण ज्ञानवादी कबीर प्रेम को मानव जीवन का केंद्रीय भाव मानते हैं।
डॉ सुनीत सिद्धार्थ ने संत कबीर और संत रविदास को भारत की आत्मा का प्रकाश बताया। छात्र कवि यशवर्धन ने काव्य पाठ करते हुए कहा-
होंगे लेखक समीक्षक कवि कोविद मतिधीर
नहीं किसी साहित्य में तुलसी सूर कबीर।
गोष्ठी में शिव कुमार दुबे ,हंसा मिश्रा , शिक्षिका रेखा तिवारी आदि उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व प्रधानाचार्य अहिवरन सिंह गौर ने की उन्होंने कहा कि संत राष्ट्र धर्म और संस्कृति के समर्थ प्रहरी होते हैं।
अंत में फतेहगढ़ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट जवाहर सिंह गंगवार ने कबीर को विश्व के सारे धर्म के लिए आदर्श संत बताया।
वे मानव चेतना को जगा कर विश्व धर्मों की पैरोकारी करते थे।

6 जुलाई तक मनाया जाएगा सहकारिता सप्ताह, दिलाई शपथ

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फर्रुखाबाद।भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय की स्थापना के पांच वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 29 जून से 6 जुलाई तक “सहकारिता सप्ताह” का आयोजन किया जाएगा।
इस क्रम में दि फर्रूखाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, फतेहगढ़ के सभापति कुलदीप गंगवार के दिशा निर्देश के अनुपालन में सहा. आयुक्त एवं सहा.निबन्धक, सहकारिता फर्रुखाबाद अजय पालीवाल, बैंक के मुख्य कार्यपालक अधिकारी सुनील त्रिपाठी, उपमहाप्रबंधक देवेंद्र सिंह तथा बैंक मुख्यालय एवं शाखा फतेहगढ़ के कर्मचारियों द्वारा “सहकार से समृद्धि” के संकल्प को साकार करने हेतु शपथ ग्रहण ली गई।
इस अवसर पर बैंक अध्यक्ष श कुलदीप गंगवार तथा बैंक सचिव/मुख्य कार्यपालक अधिकारी सुनील त्रिपाठी ने जनपद के समस्त सहकारी सदस्यों, किसानों, महिलाओं, युवाओं एवं आमजन से अपील की है कि वे सहकारिता सप्ताह के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करते हुए “सहकार से समृद्धि” के संकल्प को साकार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करें।

मजलिस में शहीदान ए कर्बला के बताये रास्ते पर अमल का पैगाम

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फर्रुखाबाद। 12वीं मुहर्रम पर शहीदान-ए-कर्बला की मजलिस, वाक़ियात-ए-कर्बला बयान किया शहर के मोहल्ला गड़ी अब्दुल मजीद खा स्थित कदीमी इमामबाड़े में शहीदान-ए-कर्बला की मजलिस मुनअक़िद हुई।
हाफ़िज़ कारी सैयद हारून अली व सैयद अख्ज़र अली उर्फ़ अब्बास मोहम्मद शबराज नशीरी ने हजरत इमाम हुसैन की शान में नात व मन्क़बत पड़ कर समा बांधा। मजलिस को ख़िताब करते हुए हाफ़िज़ कारी अनवर कुरैशी ने वाक़ियात-ए-कर्बला पर तफ़सीली रौशनी डालते हुए हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके रुफ़क़ा की अज़ीम कुर्बानियों को हक़, सब्र और इस्तिक़ामत का बेहतरीन नमूना क़रार दिया। उन्होंने अकीदतमंदों को पैग़ाम-ए-कर्बला पर अमल करने की नसीहत दी। मजलिस के इख़्तिताम पर फ़ातेहा-ख़्वानी की गई और मुल्क में अम्न-ओ-अमान, तरक़्क़ी व खुशहाली के लिए दुआ की गई।

इस मौके पर सैयद जाहिद अली उर्फ़ लड्डन मियां दानिश अली अकरम दानिश मेराजुद्दीन शबराज नसीरी सैयद फुजैल अली रिजवान नसीरी जीशान नसीरी गुलजार नसीरी आशु खान हनीफ दुलारे आमिर खा फरीद खा

विभाजन की पीड़ा में मानवीय रिश्तों की मिठास: “रात्रि का दूसरा पहर”

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(सिद्दीक एहमद-विभूति फीचर्स)

भारतीय साहित्य में हिंदी के साथ अन्य भाषाएं भी शामिल हैं। प्रायः भारतीय भाषाओं का श्रेष्ठ लेखन हिंदी में अनुवादित कम ही होता है। सिंधी भाषा भले कम प्रचलित हो, लेकिन उसकी मिठास, उसका साहित्य, नाटक, उपन्यास आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने अन्य भाषाओं के। भारत के विभाजन के बाद सिंधी समाज सहित पाकिस्तान अर्थात पहले के अखंड भारत में रहने वाले अन्य समाजों के लोगों को भी अपनों के बिछड़ने का दर्द झेलना पड़ा। उस समय सिंध में रहने वाले सभी समाज के लोग ऐसे मिल-जुलकर रहते थे जैसे सगे-संबंधी हों।
सिंधी भाषा के सबसे लोकप्रिय उपन्यास “रात्रि का दूसरा पहर” का हिंदी जगत में स्वागत होना चाहिए। चालीस साल पहले लिखा गया यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना भारत के विभाजन के समय था। इसे साहित्य अकादमी से पुरस्कृत अजमेर के लेखक हरि हिमथानी ने लिखा था। भोपाल के अशोक मनवानी ने राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, भारत सरकार के सहयोग से प्रकाशक ‘अखंड सिंधु संसार’, भोपाल से हिंदी में प्रकाशित किया है।
किसी भी भाषा के उपन्यास को दूसरी भाषा में अनुवादित करना उपन्यास लिखने से अधिक कठिन होता है। अनुवादक को मूल उपन्यास की गरिमा और उद्देश्य को बनाए रखते हुए ऐसा अनुवाद करना होता है जिससे पाठक को उसे समझने में आसानी हो। शब्दों का चयन, वाक्य-विन्यास के साथ इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है कि सभी भाषाओं में तालमेल बना रहे। लेखक जो कहना चाह रहा है, वह सभी पाठकों तक पहुंच जाए।
उपन्यास “रात्रि का दूसरा पहर” देश के विभाजन की परिस्थितियों के बीच अंकुरित प्रेम संबंधों पर केंद्रित है। भारत-पाक में तब बहुत उथल-पुथल थी, पर प्रेम का तत्व कहीं विलुप्त नहीं हुआ था। आजाद तो दोनों देश हो गए थे, बंटवारा भी हो चुका था, परंतु इंसान नहीं बंट पाए थे। दोनों देशों से विस्थापित होकर नागरिक नए देश में बसने जा रहे थे। यह क्रम कुछ महीनों तक चला था। ऐसे हालात में भी प्रेम खत्म नहीं हुआ था। मानवीय जीवन में यह सदा रहेगा।
इस उपन्यास का नायक द्वंद्व में रहता है। उसकी चाहत पहले एक थी, बाद में दो हो जाती हैं। नायक युवा एंशी अविवाहित है। उपन्यास में नायिकाएं दो हैं,पहली जुहरा, जो अविवाहित है। दूसरी नायिका रेमी विवाहित है।
रेमी, एंशी और जुहरा के प्रेम को सशक्त बनाने का माध्यम बनती है। लेकिन इस बीच एंशी का आकर्षण रेमी के प्रति भी हो जाता है। यहां तक कि रेमी अपने पति ओलाफ और एंशी के साथ मैत्री भाव से सहज रहती है। एंशी, रेमी को भी समान रूप से चाहने लगता है। बड़ी संख्या में सिंध से विस्थापित होकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के लिए एक दिन एंशी को भी कराची से पानी के जहाज में बैठकर परिजनों के साथ भारत रवाना होना पड़ता है।
अंतिम दिनों में वह रेमी से भेंट कर विदाई तो ले चुका था, लेकिन जुहरा से न मिल पाने का उसे अफसोस रहता है। बंटवारे से हर कोई विवश हो जाता है। सब अपने-अपने घर बसा लेते हैं।
उपन्यास का नायक एंशी नई जमीन पर पहुंचकर अजमेर में बस जाता है। इसके 20-25 साल बाद दरगाह शरीफ के दर्शन के लिए जुहरा अपने पति, भाई-भाभी के साथ अजमेर पहुंचती है। यह परिवार संयोग से स्टेशन पर एंशी से मिल जाता है। एंशी उन्हें होटल के बजाय अपने घर रुकने का आग्रह करता है। अंततः जुहरा का परिवार एंशी की बात मान लेता है। वे आसपास के स्थान भी घूमते हैं। उनके बीच चुटकुलों और शायरी की महफिल भी जमती है।
उपन्यास के कथानक में बताया गया है कि धर्म से ऊपर आपसी मानवीय संबंध होते हैं। एक-दूसरे को सम्मान देना कितना महत्वपूर्ण है। निःस्वार्थ प्रेम के रिश्ते बहुत बड़े होते हैं। भले ही एंशी और जुहरा जीवनसाथी नहीं बन सके, लेकिन परिवारों का संगम भारतीय संस्कृति और भाईचारे का उदाहरण प्रस्तुत करता है। वे ऐसे सच के साक्षी थे, जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि फिर जीवन में मिल पाएंगे। संसार बहुत बड़ा नहीं है। जिस इंसान से लगाव हो, अगर उसका चेहरा भी दिख जाए तो उसका अपना आनंद होता है। सिर्फ दैहिक संबंध ऐसे रिश्तों का आधार नहीं होते। परस्पर अपेक्षा-रहित प्रेम कितना महत्वपूर्ण है, इसे बहुत खूबसूरती से शब्दों में पिरोया गया है। अशोक मनवानी उपन्यास की भावना को सभी पाठकों तक पहुंचाने में सफल रहे हैं। अपने कथानक और भाषा-शैली के कारण यह उपन्यास पाठकों को बांधे रखता है। (विभूति फीचर्स)