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Wednesday, May 27, 2026
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CBI ने NEET-UG 2026 परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक मामले में दो और लोगों को किया गिरफ्तार

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नई दिल्ली: केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने NEET-UG 2026 परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक मामले में दो और आरोपियों को गिरफ्तार (arrests) किया है, जिससे इस मामले में गिरफ्तार लोगों की कुल संख्या 13 हो गई है। सीबीआई सूत्रों ने बताया कि लातूर के रहने वाले डॉक्टर मनोज शिरुरे को NEET UG 2026 के प्रश्नपत्र लीक मामले में गिरफ्तार किया गया है।

उन्होंने आरोपी कोचिंग सेंटर के मालिक के बेटे समेत तीन छात्रों को आरोपी पी.वी. कुलकर्णी से रसायन विज्ञान के प्रश्नपत्र प्राप्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। गिरफ्तार किए गए अन्य आरोपी तेजस हर्षदकुमार शाह हैं, जो पुणे स्थित कोचिंग सेंटर डॉ. अभंग प्रभु मेडिकल अकादमी (एपीएमए) में भौतिकी के शिक्षक हैं। उन्हें NEET UG 2026 परीक्षा के भौतिकी के लीक हुए प्रश्नपत्र गिरफ्तार आरोपी मनीषा हवलदार से मिले थे।

इस मामले में सिलसिलेवार कड़ी और साजिश का पता लगाने के लिए जांच जारी है। सीबीआई ने अब तक विभिन्न स्थानों पर 49 जगहों पर तलाशी अभियान चलाया है और कई आपत्तिजनक दस्तावेज, लैपटॉप और मोबाइल फोन जब्त किए हैं। जब्त की गई वस्तुओं का विस्तृत विश्लेषण जारी है।

गौरतलब है कि भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा NEET-UG 2026 परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप में दी गई लिखित शिकायत के आधार पर सीबीआई ने 12 मई, 2026 को यह मामला दर्ज किया था। मामला दर्ज होते ही विशेष टीमें गठित की गईं और देश भर में विभिन्न स्थानों पर तलाशी अभियान चलाए गए। कई संदिग्धों को हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ की गई।

इस मामले में अब तक दिल्ली, जयपुर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे, लातूर और अहिल्यानगर से 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। विभिन्न विशेष टीमें मिलकर जांच कर रही हैं और जांच में रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और भौतिक विज्ञान के प्रश्नपत्र लीक होने के वास्तविक स्रोत का पता चला है, जिन्हें परीक्षा से पहले ही प्रसारित कर दिया गया था।

प्रधानमंत्री मोदी के बारह साल और मध्य प्रदेश

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(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)

​मध्य प्रदेश की राजनीति के मिजाज को समझने के लिए इसके अलग-अलग अंचलों की जमीनी हकीकत को करीब से देखना बेहद जरूरी है। इसके लिए महाकौशल के जंगलों, मालवा के तपते मैदानों, बुंदेलखंड की पथरीली जमीन और चंबल के घने बीहड़ों के बीच बसे गांवों के जमीनी माहौल को समझना जरूरी है। अपने पत्रकारिता के अब तक के सफर में, मैंने जमीनी स्तर पर कई बड़े विकास कार्यक्रमों और जनसभाओं को कवर किया है। इस दौरान मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी कई कार्यक्रम, सभाएं कवर की। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के बारह वर्ष पूरे होने के इस पड़ाव पर जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो एक पत्रकार के रूप में मेरा यह स्पष्ट और सीधा व्यावहारिक अनुभव रहा है कि उनकी सभाओं का माहौल हमेशा किसी उत्सव या एक जबरदस्त सामूहिक ‘उन्माद’ जैसा रहा है। श्रोताओं में जो जोश, जो करंट और जो उत्साह मैंने इन वर्षों में अपनी आंखों से देखा है, वह देश के किसी दूसरे नेताओं की सभाओं या कार्यक्रमों में नहीं दिख पाता। यही वह खूबी है जो नरेंद्र मोदी को भारत के बाकी तमाम नेताओं से अलग करती है और 12 साल के लंबे शासनकाल के बाद भी उन्हें राजनीति के शीर्ष पर सिरमौर बनाकर रखती है।
​इन बारह वर्षों में दिल्ली की सत्ता से चली नीतियां मध्य प्रदेश के सुदूर गांवों और आदिवासियों तक किस रूप में पहुँचीं और इसने बुनियादी ढांचे को कैसे बदला, यह देखना किसी भी राजनीतिक विश्लेषक के लिए एक जीवंत अनुभव है।
​ इन 12 वर्षों के दौरान दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस वे के मालवा हिस्से (रतलाम-मंदसौर) का निर्माण, भोपाल-इंदौर मेट्रो परियोजना की प्रगति और जल जीवन मिशन के जरिए घर-घर पहुँचे पानी ने मध्य प्रदेश की जनता की आकांक्षाओं को पूरी तरह बदल दिया है। पहले जहाँ राज्य के चुनाव बिजली, सड़क और पानी के बुनियादी संकटों के इर्द-गिर्द सिमटे रहते थे, वहीं आज का मध्य प्रदेश एक्सप्रेस वे, डिजिटल गवर्नेंस और वैश्विक कनेक्टिविटी की भाषा बोलता है।
​एक पत्रकार का कार्य केवल दौरों और घोषणाओं की सूची बनाना नहीं है, बल्कि यह देखना भी है कि इस विकास ने जमीनी स्तर पर जनता की सोच और उम्मीदों के स्तर को कहाँ पहुँचा दिया है। निश्चित रूप से, इस बारह साल के लंबे सफर में रोजगार के नए अवसरों का सृजन और जमीनी स्तर पर प्रशासनिक कमियों को दूर करना जैसी अनेक चुनौतियां आज भी मौजूद हैं, जिन पर निरंतर बात होनी चाहिए। परंतु, जब इन सब चुनौतियों के बीच नेतृत्व की विश्वसनीयता का मूल्यांकन होता है, तो नरेंद्र मोदी का पलड़ा भारी दिखाई देता है।
​एक पत्रकार या लेखक जब मंच के सामने खड़े होकर जनसमूह को देखता,परखता है, तो वह केवल राजनेता का भाषण नोट नहीं करता, बल्कि जनता के चेहरों के भाव पढ़ता है। इन बारह वर्षों में मेरे द्वारा कवर की गई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विभिन्न सभाओं और कार्यक्रमों में मैंने एक बहुत ही स्पष्ट सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बदलाव महसूस किया है। राजनीतिक रैलियों में अक्सर कोई एक वर्ग हावी होता है, लेकिन मोदी की सभाओं में मैंने एक अलग ही समागम देखा है। जहाँ एक ओर 18-20 वर्ष का युवा उनके डिजिटल इंडिया और तकनीकी विजन से प्रभावित होकर पूरे जोश में रहता है, वहीं दूसरी ओर साठ और सत्तर के दशक को देख चुका बुजुर्ग वर्ग उनमें देश का एक मजबूत और साहसी रक्षक देखता है।
मध्य प्रदेश के दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस इंदौर-भोपाल जैसे महानगरों तक, मोदी की सभाओं का ऊर्जा-स्तर एक जैसा होता है। ग्रामीणों के चेहरों का उत्साह और शहर के मध्यवर्गीय युवाओं की उम्मीदें, दोनों मंच पर मौजूद एक चेहरे पर आकर टिक जाती हैं। मैंने जब सभाओं में उपस्थित महिलाओं से बात की तो महसूस हुआ कि रैलियों में महिलाओं की भारी उपस्थिति केवल भीड़ का हिस्सा नहीं है। जब मोदी मंच से सीधे संवाद करते हैं, तो पंडाल के अंतिम छोर पर बैठी ग्रामीण महिला के चेहरे पर जो आश्वस्त मुस्कान दिखाई देती है, वह पिछले 12 वर्षों में उनके जीवन में आए बुनियादी सुधारों (जैसे आवास, बिजली और पानी) के प्रति एक मूक कृतज्ञता होती है। श्रोताओं की भारी भीड़ और उसका जो जोश सभाओं में दिखता, यह किसी के कहने से या सिर्फ बसें भरकर लाने से पैदा नहीं होता। यह एक आंतरिक जुड़ाव है, जो पिछले 12 सालों में और ज्यादा गहरा हुआ है।
​प्रधानमंत्री मोदी के पिछले बारह वर्षों के मध्य प्रदेश दौरे केवल राजनीतिक रैलियों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनका हर एक दौरा राज्य के बुनियादी ढांचे को बदलने वाली किसी बड़ी परियोजना के शिलान्यास, आधारशिला या लोकार्पण की गवाही देता रहा है।
बुंदेलखंड की प्यासी धरती दशकों से पानी के संकट और पलायन के अभिशाप को झेल रही थी। अस्सी और नब्बे के दशक में यहां सूखे की स्थिति यह थी कि धर्मयुग जैसी पत्रिका ने इस पर कवर स्टोरी की और विशेष रुप से मेरे पिताजी श्री दिनेश चंद्र वर्मा से यहां के जल संकट पर फीचर स्टोरी लिखवाई गयी। इस अंचल की तकदीर बदलने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने डेढ़ साल पहले खजुराहो और बुंदेलखंड के अपने दौरे में ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ की आधारशिला रखी। देश की इस पहली नदी-जोड़ो परियोजना के शिलान्यास ने छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, सागर जैसे जिलों के किसानों के जीवन में एक नया विश्वास फूंका है, जिसे मैंने स्वयं महसूस किया है।
वहीं भोपाल का ऐतिहासिक जम्बूरी मैदान प्रधानमंत्री के कई युगांतरकारी विजन का साक्षी रहा है। अपने एक महत्वपूर्ण दौरे में उन्होंने न केवल देश के सबसे आधुनिक और पहले विश्वस्तरीय रानी कमलापति रेलवे स्टेशन का लोकार्पण कर बुनियादी ढांचे की नई परिभाषा लिखी, बल्कि इसी मंच से जनजातीय गौरव दिवस का शंखनाद भी किया। गोंड साम्राज्य की रानी कमलापति और भगवान बिरसा मुंडा के सम्मान के जरिए उन्होंने मध्य प्रदेश की विशाल आदिवासी आबादी को यह अहसास कराया कि वे देश के विकास में अग्रिम पंक्ति के हकदार हैं। इसी जम्बूरी मैदान से पिछले साल प्रधानमंत्री ने देश भर में महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया। इसी मैदान से उन्होंने पाकिस्तान और आतंकवादियों को चेतावनी दी थी कि ” तुम गोली चलाओगे तो मान के चलो, गोली का जवाब गोले से दिया जाएगा”।
अपने बारह साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी का विंध्य क्षेत्र के रीवा का दौरा मध्य प्रदेश को आत्मनिर्भरता की राह पर ले जाने वाला साबित हुआ। प्रधानमंत्री ने यहाँ 750 मेगावाट के रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर पावर प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी और इसे राष्ट्र को समर्पित किया। इस दौरे ने मध्य प्रदेश को रिन्यूएबल ऊर्जा के मामले में वैश्विक मानचित्र पर स्थापित कर दिया। इस पिछड़े माने जाने वाले अंचल के लिए यह गर्व का क्षण था कि उनके यहाँ बनने वाली सौर ऊर्जा आज देश की राजधानी की लाइफलाइन (दिल्ली मेट्रो) को गति दे रही है।
महाकौशल के शहडोल में प्रधानमंत्री का दौरा पूरी तरह से मानवीय और स्वास्थ्य चेतना को समर्पित था। यहाँ उन्होंने ‘राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन’ की शुरुआत की और जनजातीय समाज को इस वंशानुगत बीमारी से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया। इसके साथ ही ग्रामीण अंचलों के विकास के लिए सैकड़ों करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास किया गया। इस दौरे में उनका स्थानीय जनता के बीच जमीन पर बैठकर संवाद करना उनके जन-कनेक्ट को एक अलग ऊंचाई दे गया।
​पत्रकारिता के अपने इस सफर में मैंने कई मुख्यमंत्रियों-प्रधानमंत्रियों को देखा है लेकिन आम जनता के साथ ऐसा सीधा, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक संबंध मैंने किसी अन्य राजनेता में नहीं देखा। यही वह मूल कारण है, जो बारह साल के लंबे शासनकाल के बाद भी एंटी-इन्कम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को बेअसर करते हुए नरेंद्र मोदी को भारतीय राजनीति का निर्विवाद सिरमौर बनाए रखता है। यह मध्य प्रदेश के मैदानों, शिलान्यासों और रैलियों से छनकर निकला वो जमीनी सच है, जिसे मैंने विगत बारह वर्षों में महसूस किया है। (विनायक फीचर्स)

नौकरी के लिए उमड़ा युवाओं का सैलाब, बिहार जॉब मेले में 62 हजार अभ्यर्थियों की भीड़

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पटना। बिहार की राजधानी पटना के ज्ञान भवन में आयोजित जॉब फेयर ने देश में बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं की बेचैनी की तस्वीर एक बार फिर सामने ला दी है। तीन दिनों तक चलने वाले इस रोजगार मेले में करीब 62 हजार युवा पहुंच गए। हालात ऐसे रहे कि हर तरफ सिर्फ युवाओं की भीड़ दिखाई दी। कोई रिज्यूमे हाथ में लिए लाइन में खड़ा था तो कोई इंटरव्यू हॉल के बाहर घंटों इंतजार करता नजर आया।

यह भीड़ किसी सरकारी भर्ती परीक्षा की नहीं, बल्कि प्राइवेट नौकरी पाने की उम्मीद में जुटे युवाओं की थी। यही वजह है कि यह जॉब फेयर अब केवल रोजगार कार्यक्रम नहीं बल्कि देश के रोजगार संकट पर बड़ा सवाल बन गया है।

बिहार लंबे समय से पलायन और बेरोजगारी की मार झेलता रहा है। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी के कारण अब बड़ी संख्या में युवा निजी क्षेत्र की नौकरियों की ओर रुख कर रहे हैं। जॉब मेले में शामिल कई युवाओं ने कहा कि वे वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रिया लंबी और अनिश्चित होने के कारण अब प्राइवेट सेक्टर में अवसर तलाश रहे हैं।
इस रोजगार मेले में देश की कई निजी कंपनियों ने हिस्सा लिया। टेक्निकल, सेल्स, मार्केटिंग, कस्टमर सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों के लिए इंटरव्यू आयोजित किए गए। हालांकि बड़ी संख्या में पहुंचे युवाओं के मुकाबले उपलब्ध नौकरियां बेहद कम मानी जा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि 62 हजार युवाओं का एक साथ प्राइवेट नौकरी के लिए पहुंचना देश की बदलती आर्थिक और सामाजिक स्थिति का संकेत है। पहले जहां युवा सरकारी नौकरी को ही स्थायी भविष्य मानते थे, वहीं अब परिस्थितियां उन्हें निजी क्षेत्र की ओर धकेल रही हैं।
आंकड़ों के अनुसार बिहार देश के उन राज्यों में शामिल है जहां युवा आबादी सबसे अधिक है, लेकिन उद्योग और बड़े निवेश की कमी के कारण रोजगार के अवसर सीमित हैं। यही वजह है कि हर साल लाखों युवा दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों की ओर पलायन करते हैं।
जॉब फेयर में उमड़ी भारी भीड़ ने यह भी साफ कर दिया कि देश में रोजगार अब सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। आने वाले चुनावों में बेरोजगारी और युवाओं का भविष्य राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।

डिग्री हाथ में, भविष्य अधर में: आखिर नौजवान जाए तो जाए कहां?

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शरद कटियार
पटना के ज्ञान भवन में उमड़ी 62 हजार युवाओं की भीड़ केवल एक जॉब फेयर का दृश्य नहीं थी, बल्कि यह देश के उस मौन संकट की तस्वीर थी जिसे सरकारें आंकड़ों और घोषणाओं के पीछे छिपाने की कोशिश करती रही हैं। हाथों में रिज्यूमे, आंखों में उम्मीद और चेहरे पर बेचैनी लिए हजारों युवा नौकरी की तलाश में घंटों लाइन में खड़े रहे। यह भीड़ बताती है कि भारत का युवा अब केवल रोजगार नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई लड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि करोड़ों रुपये खर्च कर डिग्रियां हासिल करने वाले युवा आज मामूली निजी नौकरियों के लिए भी भीड़ का हिस्सा बनने को मजबूर हैं? कभी सरकारी नौकरी भारतीय मध्यम वर्ग के लिए स्थिरता और सम्मान का प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन अब भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक, वर्षों तक अटकी नियुक्तियां और सीमित पदों ने युवाओं का भरोसा तोड़ दिया है।
बिहार जैसे राज्यों की स्थिति और अधिक गंभीर है। यहां प्रतिभा की कमी नहीं, लेकिन अवसरों का घोर अभाव है। उद्योग नहीं, बड़े निवेश नहीं, रोजगार पैदा करने वाली ठोस नीतियां नहीं। परिणाम यह हुआ कि बिहार का युवा वर्षों से पलायन के लिए मजबूर है। दिल्ली की फैक्ट्रियों से लेकर गुजरात के उद्योगों और दक्षिण भारत की कंपनियों तक बिहार के युवा अपनी मेहनत बेचते दिखाई देते हैं।
विडंबना यह है कि चुनावी मंचों पर युवाओं को “देश का भविष्य” बताया जाता है, लेकिन जब रोजगार की बात आती है तो वही युवा सरकारी फाइलों और राजनीतिक भाषणों के बीच कहीं खो जाता है। हर चुनाव में करोड़ों नौकरियों के वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति यह है कि निजी नौकरी के एक मेले में 62 हजार युवाओं की भीड़ जुट जाती है। यह संख्या केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर अविश्वास का संकेत है।
एक और चिंताजनक पहलू यह है कि अब युवा “करियर” नहीं बल्कि “कोई भी नौकरी” तलाश रहा है। इंजीनियर सेल्समैन बनने को तैयार है, ग्रेजुएट कस्टमर केयर की नौकरी के लिए लाइन में है और पोस्टग्रेजुएट डेटा एंट्री ऑपरेटर बनने को मजबूर है। यह केवल आर्थिक संकट नहीं बल्कि सामाजिक असंतुलन की शुरुआत भी है। जब पढ़ा-लिखा युवा खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है तो उसके भीतर व्यवस्था के प्रति आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है।
सरकारें अक्सर स्टार्टअप, स्किल इंडिया और आत्मनिर्भरता जैसे बड़े नारों की बात करती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में रोजगार का ढांचा अभी भी बेहद कमजोर है। वहां न पर्याप्त उद्योग हैं, न निवेश और न ही ऐसा माहौल जहां युवा अपने सपनों को आकार दे सके।
आज जरूरत केवल जॉब फेयर आयोजित करने की नहीं, बल्कि ऐसी आर्थिक नीति की है जो रोजगार पैदा करे। छोटे और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, स्थानीय स्तर पर निवेश बढ़ाना होगा और भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी एवं समयबद्ध बनाना होगा। वरना आने वाले समय में बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं रहेगी, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का कारण भी बन सकती है।
पटना का यह जॉब फेयर एक चेतावनी है। यह उन करोड़ों युवाओं की आवाज है जो कहना चाहते हैं कि उन्हें भाषण नहीं, अवसर चाहिए; वादे नहीं, रोजगार चाहिए। क्योंकि जब किसी देश का युवा ही असुरक्षित भविष्य के अंधेरे में खड़ा हो जाए, तो विकास के सारे दावे खोखले लगने लगते हैं।

गंगाजल और मांगपत्र लेकर अखिलेश से मिले सपा नेता

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लखनऊ/फर्रुखाबाद। गंगा एक्सप्रेस-वे से फर्रुखाबाद को जोड़ने की मांग अब राजनीतिक रूप से और तेज होती दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी महानगर अध्यक्ष राघव दत्त मिश्रा ने मंगलवार को लखनऊ स्थित सपा कार्यालय पहुंचकर सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को गंगाजल और मांगपत्र सौंपा।
राघव दत्त मिश्रा द्वारा सौंपे गए पत्र में भाजपा सरकार पर फर्रुखाबाद के लोगों के साथ “छलावा” करने का आरोप लगाया गया है। पत्र में कहा गया कि शुरुआती योजना में गंगा एक्सप्रेस-वे से फर्रुखाबाद को जोड़ने की बात कही गई थी, लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव में जिले को परियोजना से बाहर कर दिया गया।
सपा नेता ने दावा किया कि फर्रुखाबाद की जनता, व्यापारी और युवा लंबे समय से एक्सप्रेस-वे कनेक्टिविटी की मांग कर रहे हैं, क्योंकि इससे जिले में उद्योग, व्यापार और रोजगार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
सूत्रों के अनुसार मुलाकात के दौरान अखिलेश यादव ने राघव दत्त मिश्रा से कहा कि “सरकार आने पर आपकी मांगों को पूरा किया जाएगा।” इस बयान के बाद जिले की राजनीति में गंगा एक्सप्रेस-वे का मुद्दा फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
राघव दत्त मिश्रा ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि फर्रुखाबाद को विकसित जनपदों की श्रेणी में लाने के लिए बड़े उद्योगों और बेहतर सड़क नेटवर्क की आवश्यकता है। उन्होंने 2027 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर जिले को नए एक्सप्रेस-वे नेटवर्क से जोड़ने की मांग दोहराई।

अखिलेश यादव की करीबी सर्किल में बढ़ती राघव दत्त मिश्रा की सक्रियता
– उर्मिला राजपूत का भोजपुर से आना लगभग तय
लखनऊ/फर्रुखाबाद। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा फर्रुखाबाद के सपा महानगर अध्यक्ष राघव दत्त मिश्रा को लगातार मिल रही राजनीतिक तरजीह अब जिले की राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बनती जा रही है। मंगलवार को लखनऊ स्थित पार्टी कार्यालय में हुई मुलाकात के दौरान अखिलेश यादव ने राघव दत्त मिश्रा से जनपद से जुड़े कई अहम मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की।
वहीं सपा जिलाध्यक्ष चंद्रपाल यादव से संगठन को और मजबूत करने के निर्देश दिए गए, सैफई परिवार की पारिवारिक सदस्य उर्मिला राजपूत का भोजपुर से चुनाव लड़ना भी लगभग तय माना जा रहा, वो अलग बात है चेहरा उनका हो और प्रत्याशी उनकी बहु पंचशील की पत्नी उर्मिला राजपूत घोषित हों।
सपा के भीतर यह भी चर्चा है कि आने वाले समय में संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर राघव दत्त मिश्रा की भूमिका और मजबूत हो सकती है।

यूपी की सत्ता पर पिछड़ों की राजनीति तेज

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=मजबूत विपक्ष की भूमिका में तो लगातार सक्रिय सपा
=लेकिन सत्ता मे बापसी के लिए अभी तैयारी आधी भी नहीं
यूथ इंडिया। लखनऊ।
शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर पिछड़ों की सामाजिक इंजीनियरिंग के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले झटके के बाद अब बीजेपी के चाणक्य केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सीधे यूपी पर फोकस बढ़ा दिया है। और उनके सारथी सुनील वंसल का पूरा ध्यान देश के सबसे बड़े निर्णायक राज्य पर है।दूसरी ओर अखिलेश यादव लगातार मजबूत विपक्ष की भूमिका में खुद को स्थापित करने में जुटे ही हैं, सत्ता को पाने की उनकी कोई विशेष चाहत न देख उनका एक बड़ा समर्थक तबका मज़बूरी मे सही लेकिन बीजेपी के ही सहारे होता जा रहा ।
सपा का पीडीए यानी “पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक” फार्मूला लोकसभा चुनाव में असरदार साबित हुआ। खासकर यादवों के साथ गैर-यादव पिछड़ों और दलित वोट के हिस्से में आई हलचल ने भाजपा नेतृत्व को नई रणनीति पर मजबूर कर दिया। यही वजह है कि भाजपा अब जातीय संतुलन और पिछड़े नेतृत्व को नए तरीके से आगे बढ़ाने में जुट गई है। क्योंकि पीडीए के मुताबिक अखिलेश के पास खुद के चेहरे को छोड़ अन्य दो धड़ों के राजनैतिक चेहरे हैं ही नहीं, पीडीए की आग नें उनसे सवर्ण नेता पहले ही अलग कर दिए, दलित माया और चंद्रशेखर के इर्दगिर्द पहले से ही हैं, मुश्लिम का झुकाव बीजेपी की ओर बढ़ ही रहा, जिसका जीता जागता उदाहरण बंगाल चुनाव भी है, जहाँ मुश्लिम बीजेपी की ओर बढ़ता मिला।
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को लेकर है। सात बार सांसद रहे और केंद्र मे वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी को प्रदेश संगठन की कमान सौंपना केवल संगठनात्मक फैसला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पूर्वांचल और उनके सजातीय कुर्मी वोट बैंक को साधने की बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि बीजेपी नें पूर्व मे स्वतंत्रत देव सिंह, राकेश सचान जैसे नेताओं को दिग्गज की श्रेणी मे लाने की कोशिश की लेकिन वह लोग अपने सजातियों में कोई जगह नहीं बना सके जिसका नुकसान पार्टी को भुगतना पड़ा । लोकसभा चुनाव में कई क्षेत्रों में सपा के प्रति कुर्मी वोट के झुकाव ने भाजपा को चिंतित किया था।
भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि बिहार जैसे बड़े राज्य में यूपी के डिप्टी सीएम केशव मौर्य की अगुवाई में सम्राट चौधरी के रूप में मौर्य-कुशवाहा नेतृत्व को स्थापित कर पार्टी को सामाजिक लाभ मिला। यूपी में भी उसी मॉडल पर काम करने की तैयारी दिखाई दे रही है। पहले से ही उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या को संगठन और सरकार दोनों में आक्रामक भूमिका दी जा रही है। भाजपा के भीतर यह संदेश साफ है कि गैर-यादव पिछड़ों की राजनीति को और धार दी जाएगी।
इसी रणनीति के तहत अब लोध वोट बैंक पर भी भाजपा की नजरें टिकी हैं। राजनीतिक चर्चाओं में यह लगभग तय माना जा रहा है कि केंद्र सरकार के अगले विस्तार में एटा सांसद राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया या फिर साक्षी महाराज जैसे बड़े लोध चेहरे को अहम जिम्मेदारी मिल सकती है। उत्तर प्रदेश में जनपद कन्नौज की कृपा विधानसभा के चौथी बार विधायक कैलाश राजपूत को पार्टी ने राज्य मंत्री बना ही दिया है। सूत्रों की माने तो भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी में हर बड़े पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व सुरक्षित है।
उधर अखिलेश यादव लगातार भाजपा की इसी सामाजिक रणनीति को चुनौती देने में जुटे हैं। सपा प्रमुख अब केवल यादव राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहते। लोकसभा चुनाव और बाद मे सपा ने पीडीए के जरिए जिस तरह गैर-यादव पिछड़ों और दलितों में पैठ बनाने की कोशिश की , वह ना काफी रही क्योंकि अन्य वर्गों से अच्छे चेहरों का प्रतिनिधित्व सपा को आज तक नहीं मिल सका, पीडीए फार्मूले के कारण उनसे ठाकुर और ब्राह्मण, वैश्य भी छिटक गया। भाजपा के पारंपरिक समीकरणों में हलचल हुई। यही वजह है कि भाजपा अब “अति पिछड़ा बनाम यादव वर्चस्व” की नई बहस को फिर हवा देने की तैयारी में दिखाई दे रही है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओबीसी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में केशव प्रसाद मौर्य के नाम पर ओबीसी नें बीजेपी को वोट किया था हालांकि बाद में संगठन ने योगी आदित्यनाथ को प्रदेश की बाग- डोर सौंप दी थी। प्रदेश में पिछड़ा वर्ग की आबादी लगभग 50 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है। इनमें कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी, निषाद, लोध, यादव और राजभर जैसी जातियां अलग-अलग क्षेत्रों में चुनावी परिणाम बदलने की ताकत रखती हैं। 2024 के लोस चुनाव में भाजपा को कई सीटों पर इसी सामाजिक समीकरण में नुकसान उठाना पड़ा था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में असली लड़ाई “हिंदुत्व बनाम पीडीए ” नहीं, बल्कि “पिछड़ों के भीतर नेतृत्व की लड़ाई” बनने जा रही है। भाजपा जहां जातीय प्रतिनिधित्व के जरिए गैर-यादव ओबीसी को साधने में जुटी है, वहीं अखिलेश यादव सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी के मुद्दे को और तेज करने की तैयारी करते रहे, लेकिन उनकी पार्टी के साथ अन्य ओबीसी के मजबूत चेहरे आज तक साथ नहीं खड़े हो सके ।
इधर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक भाजपा संगठन में हो रहे बदलाव इस बात का संकेत हैं कि पार्टी अब केवल मोदी-योगी चेहरे के भरोसे नहीं रहना चाहती, बल्कि सामाजिक समीकरणों की बिसात भी नए सिरे से बिछाई जा रही है। वहीं सपा इस माहौल को “सत्ता बनाम सामाजिक न्याय” की लड़ाई में बदलने की कोशिश कर रही है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब हर नियुक्ति, हर विस्तार और हर बयान के पीछे जातीय गणित पढ़ा जा रहा है। आने वाले महीनों में यही समीकरण तय करेंगे कि 2027 की लड़ाई में पिछड़ों का सबसे बड़ा राजनीतिक ठिकाना कौन बनता है। वहीं बीजेपी की नई इंजीनियरिंग में पंकज चौधरी को फिलहाल पेंतरे सीखने के अंदर खाने निर्देश मिले हैं।