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Saturday, April 11, 2026
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गाजियाबाद: क्लिनिक में चोरी करने आया चोर शटर और दीवार के बीच फंसा

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नई दिल्ली: गाजियाबाद (Ghaziabad) के इंदिरापुरम इलाके में शनिवार दोपहर एक क्लिनिक (clinic) में शटर और कंक्रीट की दीवार के बीच फंस गए चोरी के प्रयास के संदेह में एक युवक को बचाया गया। यह घटना इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन क्षेत्र के अभय खंड इलाके में हुई। अधिकारियों के अनुसार, लड़का कथित तौर पर चोरी के इरादे से क्लिनिक में घुसा था, लेकिन अंदर जाने की कोशिश में फंस गया। बार-बार कोशिश करने के बावजूद, वह काफी देर तक शटर और दीवार के बीच गर्दन फंसी रहने के कारण फंसा रहा। बचने की कोशिश में उसके चेहरे पर चोटें आईं और खून बहने लगा।

स्थानीय लोगों ने लड़के को शटर और दीवार के बीच फंसा हुआ देखा और पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने अग्निशमन विभाग को सूचना दी। मौके पर पहुंचने पर अग्निशमन दल ने लड़के को लटका हुआ पाया और वह हिल नहीं पा रहा था। दल ने विशेष बचाव उपकरणों की मदद से उसे बचाया। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि लड़के ने चोरी के इरादे से डॉ. पवन शर्मा के हार्ट केयर कार्डियक सेंटर में घुसने की कोशिश की थी। स्थानीय निवासियों के अनुसार, उसने रात में छत के रास्ते क्लिनिक में प्रवेश करने का प्रयास किया, लेकिन क्लिनिक में उतरते समय उसका संतुलन बिगड़ गया और वह शटर और दीवार के बीच फंस गया।

मुख्य अग्निशमन अधिकारी राहुल पाल ने बताया कि वैशाली फायर स्टेशन को दोपहर लगभग 1:15 बजे घटना की सूचना मिली। उन्होंने कहा, बचाव दल को घटनास्थल पर भेजा गया। मौके पर पहुंचने पर हमने पाया कि बिहार निवासी गणेश के पुत्र अभिषेक गर्दन के बल फंसा हुआ था। बचाव उपकरणों की मदद से दल ने सावधानीपूर्वक शटर हटाया और उसे सुरक्षित बाहर निकाला। लड़के को बाद में इंदिरापुरम पुलिस को सौंप दिया गया। अधिकारियों ने मामला दर्ज कर चोरी के प्रयास की आगे की जांच शुरू कर दी है। इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ।

 

सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने इलेक्शन कमीशन पर साधा निशाना, कहा- ज्यादातर वोट PDA के कटे

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लखनऊ: सपा सांसद अवधेश प्रसाद (Awadhesh Prasad) ने भाजपा सरकार (BJP government) और चुनाव आयोग (Election Commission) पर जमकर निशाना साधा है। उनका आरोप है कि सरकार के कहने पर ही चुनाव आयोग काम कर रहा है। हमारे देश की लोकतंत्र की प्रणाली को चुनाव आयोग कमजोर कर रहा है। जितने भी वोट कटे हैं, उसमें ज्यादातर वोट PDA के है। हमारे देश का चुनाव आयोग न तो स्वतंत्र है और न ही निष्पक्ष है।

अवधेश प्रसाद ने कहा कि भाजपा की सरकार लगातार लोकतंत्र को कमजोर करने पर तुली हुई है। बाबा साहब भीम राव अंबेडकर ने जो मताधिकार दिया है, उससे मूल्यवान चीज कुछ और नहीं है। इस देश के करोड़ों-करोड़ों अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और देशवासियों को वोट देने का अधिकार है लेकिन इस अधिकार को खत्म करके भाजपा लोकतंत्र को कमजोर करना चाहती है और इसके लिए तरह-तरह के नीति बना रही है।

अवधेश प्रसाद ने आगे कहा कि किसी देश में लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं, लोकतंत्र कितना मजबूत है उसका अनुमान चुनाव आयोग की स्वतंत्रता व निष्पक्षता से लगाया जा सकता है। लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि हमारे देश का चुनाव आयोग न तो स्वतंत्र है और न ही निष्पक्ष है। सरकार के कहने पर ही चुनाव आयोग काम कर रहा है। हमारे देश की लोकतंत्र की प्रणाली को चुनाव आयोग कमजोर कर रहा है जितने भी वोट कटे हैं, उसमें ज्यादातर वोट PDA के हैं।

 

मशहूर सिंगर आशा भोसले को आया हार्ट अटैक, ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में भर्ती

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मुंबई: 92 की दिग्गज सिंगर आशा भोसले (Asha Bhosle) को लेकर बड़ी खबर सामने आई है कि उन्हें हार्ट अटैक (heart attack) आया है, जिसके चलते उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। अस्पताल के इमरजेंसी मेडिकल यूनिट में फिलहाल आशा का इलाज चल रहा है। सूत्रों के अनुसार, उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। आशा भोसले की स्वास्थ्य स्थिति के बारे में फिलहाल कोई और जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनके परिवार और अस्पताल अधिकारियों ने अभी तक कोई बयान जारी नहीं किया है।

वहीं इस खबर के आने के बाद से सिंगर के फैंस और करीबियों के बीच टेंशन शुरू हो गई है। दुआ की जा रही हैं कि आशा ताई जल्द ठीक हो जाएं. ब्रीच कैंडी अस्पताल के डॉक्टर प्रति समदानी ने इस बात की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि आशा भोसले को अस्पताल में उनकी केयर में एडमिट करवाया गया है। हालांकि डॉक्टर ने इसके आगे कोई भी जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया। आशा भोसले का परिवार उनके साथ अस्पताल में है।

आशा भोसले बॉलीवुड के लेजेंडरी सिंगर्स में से एक हैं। उन्होंने अपनी आवाज का जादू बॉलीवुड फिल्मों में 1950 के दशक में चलाया था। उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर 40 और 50 के दशक की बड़ी गायिका थीं। मंगेशकर परिवार से आईं आशा भी अपनी बहन की ही तरह सुरीली आवाज वाली थीं। हालांकि उन्होंने बड़ी फिल्मों में अपनी आवाज देने से पहले कई लो बजट फिल्मों में गाना गाकर पहचान पाई। 1952 में आई फिल्म ‘संगदिल’ में उन्होंने गाने गाए थे। म्यूजिक कम्पोजर सज्जाद हुसैन की इस एल्बम ने आशा को फेम दिलाया। उस जमाने के जाने माने डायरेक्टर बिमल रॉय ने 1953 में आई फिल्म परिणीता में आशा भोसले को साइन किया था।

आशा भोसले भारतीय संगीत इतिहास की सबसे प्रसिद्ध और बहुमुखी गायिकाओं में से एक हैं। सात दशकों से अधिक के अपने करियर में उन्होंने कई भाषाओं और शैलियों में हजारों गाने रिकॉर्ड किए हैं। उन्होंने आर. डी. बर्मन जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ मिलकर कई सदाबहार हिट गाने दिए हैं। आशा भोसले ने अपना पहला गाना मराठी फिल्म ‘माझा बल’ (1943) में गाया था। उन्होंने बॉलीवुड फिल्म ‘चुनरिया’ (1948) में ‘सावन आया’ गाना गाया। उन्होंने सिर्फ गायन ही नहीं, अभिनय में भी हाथ आजमाया: 2013 में, आशा भोसले ने ‘माई’ नामक एक मराठी फिल्म में काम किया।

 

समाज सुधार के दो दीप ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले

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(आरती चौगुले-विनायक फीचर्स)
महात्मा ज्योतिराव फुले व सावित्रीबाई फुले इन नामों से कोई भी अपरिचित नहीं है। संपूर्ण विश्व में विशेषतः महाराष्ट्र में यह पति-पत्नी पूजनीय है। सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम शिक्षिका के रूप में पहचानी जाती है। पिछड़े हुए रूढ़िवादी, अंधश्रद्धा, छुआछूत,जातिभेद आदि बुराइयों, कुरीतियों से ग्रसित समाज में, इन्होंने क्रांति की मशाल जलाई और समाज को एक नई दिशा देकर अजर अमर हो गये।
ज्योतिबा का जन्म 11 अप्रैल 1827 को कटगुण सातारा में एक रूढ़िवादी पिछड़े हुए माली परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम गोविंदराव व माता का नाम चिमणाबाई था। इनके बड़े भाई का नाम राजाराम था। पिता का एक बाग था और वे फूल बेचने का कार्य करते थे, इसलिये इनका उपनाम फुले पड़ गया। छोटी आयु में ही इनकी माता का देहान्त हो गया, और सगुणाबाई-क्षीरसागर नाम की मौसेरी बहन ने इनका लालन-पालन किया।
बचपन से ही ज्योतिबा कुशाग्र बुद्धि थे। शिक्षा के प्रति रुझान था। पढने में रूचि थी। इनकी प्रतिभा देखकर, इनके पिता ने विद्यालय में दाखिला करवा दिया। कक्षा में वह मेधावी छात्रों में से थे। उस समय निम्न जाति के लोगों को और स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा जाता था। इसी कारण कुछ लोगों ने गोविंदराव को फुसलाना शुरू किया, कहते ‘ज्योतिबा’ को पढ़ा-लिखा कर क्या करोगे? करना तो उसको बगीचा, खेती की देखभाल और उसका पारिवारिक फूल बेचने का व्यवसाय ही है।
फलस्वरूप उनके पिता ने उनको विद्यालय से निकाल लिया और खेती के कामों में लगा दिया, लेकिन ज्योतिबा के मन में पढ़ने की तीव्र लालसा थी। वे खेत में ही वृक्ष के नीचे बैठकर मिट्टी में अक्षर लिखते रहते थे। तीन वर्ष इसी तरह बीतने के पश्चात ‘स्कॉट इंग्लिश मीडियम स्कूल में ज्योतिबा ने पुनः विद्यार्जन प्रारंभ किया। उस समय समाज में एक और कुप्रथा थी ‘बाल-विवाह । कुल तेरह वर्ष की आयु में ज्योतिबा का विवाह नौ वर्ष की सावित्री के साथ हो गया। सावित्री सातारा जिले में नायगाँव की रहनेवाली भोली-भाली निर्भीक और चंचल बालिका थी। इनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे पाटिल था।
सहेलियों के साथ पेड़ पर चढकर बेर-इमली तोड़ना, भाँति-भाँति के खेल खेलना यही उसकी दिनचर्या थी। किसी भी प्रकार का अन्याय वह सहन नहीं करती थी। अन्याय होते हुए देख भी नहीं सकती थी। उस समय समाज में स्त्रियों की स्थिति दयनीय थी। स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया था। छोटी उम्र में विवाह, मातृत्व का बोझ, संयुक्त परिवार में दिनभर घर के काम, बच्चों की परवरिश, इतना ही स्त्रियों का दायरा था। यदि कोई लड़की बाल उम्र में ही विधवा हो जाती, तो परिवार और समाज उसका जीना दुश्वार कर देते। अच्छा खाना, अच्छा पहनना तो वह सोच भी नहीं सकती थी। सती प्रथा जैसी कुप्रथाएं समाज में व्याप्त थी। राजा राममोहन राय और केशवचंद्र सेन ने इन कुरीतियों का जमकर विरोध किया।
ज्योतिबा ने भी इन कुप्रथाओं का जमकर विरोध किया और स्त्री शिक्षा का शुभारंभ इन्होंने अपने घर से ही सावित्री को अक्षर-ज्ञान करा के किया। सावित्री भी कुशाग्र बुद्धि की थी। पठन-पाठन में उसकी विशेष रूचि थी। शीघ्र ही उन्होंने शिक्षा को आत्मसात कर लिया था, किंतु यह सब इतना सरल नहीं था। स्त्री शिक्षा के विरोधी समाज ने उन पर अनेकानेक अत्याचार किये। उन पर पत्थर फेंके, गोबर, कीचड़ फेंका, मानसिक यातनाएं दी, फिर भी यह दंपत्ति अपने पथ से विचलित नहीं हुए।
शनैः शनैः समाज में कुछ लोग स्त्री शिक्षा का अनुमोदन करने लगे। उनको शिक्षा का महत्व समझ में आने लगा। वे अपने घर की महिलाओं को पढ़ने के लिये विद्यालय में भेजने लगे। सावित्रीबाई, उन स्त्रियों को बहुत प्रेम से, अपनत्व से पढ़ाती थी। इस प्रकार देश की प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई हुई। शिक्षा का प्रसार तीव्र गति से हो रहा था। ज्योतिबा ने (22) बाईस विद्यालय खोले। सत्य-शोधक समाज की स्थापना की। देश में प्रचलित कुरीतियों का विरोध किया। कुरीतियों और अज्ञान के अंधकूपों में पड़े हुए समाज में ज्ञान की ज्योति जलाई और अपने ज्योतिबा नाम को सार्थक किया। सावित्रीबाई, अपने पति के पदचिन्हों पर चलती रही और पति के संपूर्ण कार्यों में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा।
एक बार महाराष्ट्र में अकाल पड़ गया तब सावित्रीबाई ने रोज दो हजार भाकरी (ज्वार की रोटी) बनाकर गरीबों को खाना खिलाया। स्वयं के घर का कुआँ, अस्पृश्यों को पानी भरने के लिये खोल दिया। बालहत्या, भ्रूणहत्या जैसे अपराधों को रोका। सारी उम्र इस दंपत्ति ने सामाजिक कार्यों में तन-मन-धन से अपने आप को झौंक दिया। इस सब के लिये उनको अनेक यातनाएं झेलनी पड़ी। धर्म के ठेकेदारों ने उनको अनेक प्रकार से प्रताड़ित किया, यहाँ तक कि ज्योतिबा के पिता ने उनको परिवार से निष्कासित कर दिया। 73 वर्ष की उम्र तक उन्होंने क्रांति की मशाल थामे रखी। गुलामगिरी ज्योतिबा के द्वारा लिखी पहली पुस्तक है। 73 वर्ष की उम्र में पक्षाघात का आक्रमण उन पर हुआ। सावित्रीबाई ने अपने पति की खूब सेवा की। इस दंपत्ति की अपनी कोई संतान नहीं थी। दूसरों के बच्चों पर यह ममतामयी माँ अपनी ममता लुटाती रही। एक अनाथ बच्चे को गोद लेकर डॉक्टर बनाया। ज्योतिबा ने उनकी मृत्यु के समय उनकी अंतिम इच्छा व्यक्त की थी कि उन्हें उनके घर के आँगन में दफन किया जाय। परंतु तत्कालीन सरकार ने उनकी इस इच्छा का विरोध किया, और रीति-रिवाज के अनुसार उनका दाह-संस्कार किया गया।
सावित्रीबाई ने पति की अर्थी के आगे चलकर पति की चिता को मुखाग्नि दी। इस तेजोमय नारी को मेरा शतशःवंदन। पति की मृत्यु के पश्चात भी, इन्होने समाजसेवा का जो व्रत लिया था उसे अखंड चालू रखा।
1897 में महाराष्ट्र में प्लेग फैला हुआ था। शरीर में किसी स्थान पर गाँठ होती थी और चौबीस घंटे में व्यक्ति मृत्यु के आधीन हो जाता था। एक-एक घर में से चार-चार व्यक्ति मृत्यु के मुख में जा रहे थे। सावित्रिबाई घर-घर में जाकर, प्लेग से पीड़ित लोगों की सेवा सुश्रुषा कर रही थी। उनको स्वयं के प्राणों की तनिक भी परवाह नहीं थी। अपने गोद लिये बेटे यशवंत को जो नागपुर में कार्यरत था, उन्होंने पूना बुला लिया।
सावित्रीबाई रोगियों को कंधे पर लादकर अस्पताल पहुँचाया करती थी। ऐसे ही एक बालक को कंधे पर लादकर ले जाते समय रोग का संक्रमण उन्हें हो गया और प्लेग की इस महामारी में, दस मार्च 1897 के दुर्भाग्यशाली दिन ये अनाथों की माँ, लाखों लोगों की श्रद्धास्थान अपनी इहलोक की यात्रा समाप्त कर के अनंत में विलीन हो गयी। वे नायगाँव जैसे ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी, निरक्षर कन्या थीं जिसके पास अदम्य साहस, धैर्य, निर्भरता और लगन जैसे सद्गुण थे। इन सद्गुणों से अलंकृत सावित्रीबाई को मेरा कोटि-कोटि नमन।
आजीवन इस दंपत्ति को समाज ने यातनाएं, त्रास, विवंचना ही दी किंतु उन्होंने स्त्री शिक्षा का जो छोटा सा पौधा लगाया था आज वह वटवृक्ष का रूप ले चुका है।
पुणे में आज भी सावित्री बाई फुले विद्यापीठ अस्तित्व में है। उनके घर को महाराष्ट्र सरकार ने संग्रहालय का रूप दिया है। प्रत्येक सफल पुरूष की सफलता के पीछे एक स्त्री होती है। महात्मा ज्योतिराव फुले के कार्यों में उनकी सहधर्मिणी, सहचरी पत्नी का पूर्ण योगदान था। पति-पत्नी दोनों ही एक रूप थे शायद इसलिये इस दांपत्य का समाज के प्रति अमूल्य योगदान है। (विनायक फीचर्स)

हिंदी यात्रा साहित्य के जनक महापंडित राहुल सांकृत्यायन

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(कुमार कृष्णन-विनायक फीचर्स)
महापंडित राहुल सांकृत्यायन…एक ऐसा व्यक्तित्व जिन्होंने 20वीं सदी में भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्व पटल पर पुनर्जीवित किया। महापंडित राहुल सांकृत्यायन (1896-1963) न केवल एक अथक यात्री थे, बल्कि एक विपुल लेखक भी थे जिन्होने 13 साल की उम्र में पहली बार घर छोड़कर अपनी यात्रा शुरु की। उन्होंने यात्रा वृतांत को ‘साहित्यिक रूप’ दिया इसलिए राहुल सांकृत्यायन को हिंदी यात्रा साहित्य का जनक कहा जाता है। उन्होंने अपने जीवन के 45 वर्ष अपने घर से दूर अन्वेषण में बिताए।
अपने जीवन के विभिन्न चरणों में राहुल सांकृत्यायन एक वैष्णव मठ के महंत, किसान आंदोलन कारी, बौद्ध भिक्षु, स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी थे। हालांकि उनका सबसे बड़ा योगदान अपनी यात्राओं के माध्यम से भारत और तिब्बत के बीच प्राचीन संबंधों को फिर से उजागर करना और प्रचुर सामग्री भारत वापस लाना था।
मिन्हाजू सिराज ने अपनी पुस्तक ‘तबकात -ए-नासरी’ में 12वीं शताब्दी के अंत में नालंदा, विक्रमशिला और उदवंतपुरी के प्राचीन विश्वविद्यालयों के विध्वंस का वर्णन किया है। मुख्य रूप से बौद्ध शाक्य सम्प्रदाय के मठों में संग्रहित कई अमूल्य पांडुलिपियों को तिब्बत से वापस लाए। इन ग्रन्थों को पलायनकारी भिक्क्षु अपने साथ तिब्बत ले गए थे। तिब्बत के मौसम ने यह सुनिश्चित किया कि ये प्रकृति की अनिश्चितताओं से नष्ट न हो।महापंडित ने संस्कृत, पाली और अन्य भाषाओं में दुर्लभ पांडुलिपियों को प्राप्त करने के लिए तिब्बत में लगातार चार अभियानों का नेतृत्व किया और उनके प्रयासों ने बुद्ध की शिक्षाओं को पुनर्जीवित किया जो विलुप्तता के कगार पर थीं। अपने प्रयासों से वह न केवल इन दुर्लभ हिंदू और बौद्ध ग्रंथो की प्रतियां वापस लाए बल्कि उपमहाद्वीप की भूली हुई विरासत और इतिहास पर भी प्रकाश डाला।
राहुल सांकृत्यायन ने स्वयं पाली सीखी और बौद्ध ग्रंथ “मध्यम निकाय” का अध्ययन किया जिसमें बौद्ध प्रवचनों का वर्णन है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, तिब्बत की उनकी यात्राएं अच्छे और बुरे दोनों अनुभवों से पूर्ण थी। जहां उन्होंने भारी कठिनाइयों का सामना किया, वहीं कुछ अनुभव बहुत अच्छे थे। उन्हें प्राचीन ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियों के साथ-साथ भारतीय शैली की अमूल्य स्क्रॉल पेंटिंग भी मिली।
1926 में राहुल जी ने अपनी पहली तिब्बत यात्रा ज्यादातर पैदल तय की। उस यात्रा में उनका साथी केवल एक कुत्ता था। तिब्बत की उनकी बाद की यात्राओं में घोड़े तथा खच्चर यात्रा के साधन थे। उन्होंने लिखा है कि उनके पास जो पैसे थे उनमें से ज्यादातर यात्रा खर्च के लिए भी पर्याप्त नहीं थे। वह आगे लिखते हैं कि उन्हें कभी दूसरों से पैसा उधार लेना पसंद नहीं था, लेकिन तिब्बत में उन्हें इस व्यक्तिगत प्रवृत्ति को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
1933-34 में अपनी दूसरी यात्रा के दौरान उन्होंने अपने उल्लेखनीय साथी, मित्र, दार्शनिक, कलाकार और भिक्षु ‘गेदुन चोफेल’ से मुलाकात की। राहुलजी के अनुसार तिब्बत एक सुनहरा पुल था जिस पर वे एक-दूसरे से मिले थे। उनकी दोस्ती पारस्परिक सम्मान पर आधारित थी और दोनों ने एक-दूसरे की सोच और दृष्टिकोण को प्रभावित किया। वह गेदुन चोफेल को लेकर भारत वापिस लौटे जिसे तिब्बती विद्वान ने अपने सपने का साकार होना बताया।भारत और तिब्बत के बीच के प्रगाढ़ संबंधों को उजागर करना है। उनकी तिब्बत से 22 खच्चर भर लाई गई पांडुलिपियां अनमोल हैं।महापंडित ने अपने गांव के स्कूल में केवल उर्दू का अध्ययन किया था, लेकिन 30 से अधिक भाषाओं में स्व-शिक्षित थे और 12 से अधिक में पारंगत थे। उन्होंने यात्रा वृतांत से लेकर उपन्यास तक 140 से अधिक ग्रंथ लिखे। उनका सबसे बड़ा योगदान आम जनता के लिए प्राचीन बौद्ध ग्रंथों का सरल हिंदी में अनुवाद करना रहा, जिससे यह सर्वसुलभ हो गया। उन्होंने तिब्बती-हिन्दी शब्दकोश भी लिखा। मूल बौद्ध सिद्धांतों को पढ़ने के लिए उन्होंने स्वयं पाली सीखी। बाद में वे श्रीलंका गये जहां उन्होंने संस्कृत पढ़ाई। राहुल सांकृत्यायन द्वारा लाई गईं अधिकांश पांडुलिपियां काशी प्रसाद जायसवाल संस्थान, पटना में संरक्षित हैं। श्री जयसवाल स्वयं एक प्रसिद्ध इतिहासकार और वकील थे जिन्होंने महापंडित को उनकी यात्राओं के वित्तपोषण और पांडुलिपियों के अनुवाद में सहायता की।राहुल सांकृत्यायन को साहित्य अकादमी और पद्म भूषण सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । उन्होंने त्रिपटक ग्रंथ का गहन अध्ययन किया और उन्हें’ त्रिपटकाचार्य’ की उपाधि दी गई । उनकी रचनाएं मुख्य रूप से हिंदी में हैं, जिसके कारण अंग्रेजी भाषी अभिजात वर्ग द्वारा इसे नजरअंदाज कर दिया गया है। उनके समकालीन ज्ञानी उन्हें विलक्षण प्रतिभा का धनी मानते थे। पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, ‘मैं केवल एक ही राहुल को जानता हूं जो विलक्षण हैं।’हमारा देश वर्तमान में ‘सांस्कृतिक पुनरुद्धार’ पर की ओर अग्रसर है। हमें महापंडित जैसे लोगों का अध्ययन करने और उनके योगदान से सीखने की जरूरत है। राहुल सांकृत्यायन ने जनमानस की चेतना से मिटाए गए ग्रंथों को फिर से खोजा। उनका लेखन भारत और तिब्बत के बौद्ध संबंधों और विरासत को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। महापंडित का जीवन ‘चरैवेति -चरैवेति’ वाक्यांश में समाहित है, जिसका अर्थ है निरंतर चलते रहो। ‘बदलाव’ भी उनके जीवन का उपयुक्त वर्णन होगा। राहुल सांकृत्यायन भारतीय ज्ञान तथा परंपरा के प्रतीक हैं जिसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। उन्होंने अपना समय एवं ऊर्जा, हमारे प्राचीन ग्रंथों और संस्कृति के अध्ययन की पुनः खोज और उनके माध्यम से भारत और तिब्बत के बीच के संबंधों को और भी प्रगाढ़ करने में समर्पित किया जिसके लिये वह साधुवाद के भागी हैं।करीब 100 साल पहले राहुल सांकृत्यायन द्वारा तिब्बत से लाई गई विश्व प्रसिद्ध पांडुलिपियां आज भी अपने पूर्ण संरक्षण और अनुवाद की प्रतीक्षा कर रही हैं। यह धरोहर न केवल धार्मिक है, बल्कि प्राचीन भारत-चीन और तिब्बत संबंधों का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण भी है।राहुल सांकृत्यायन ने वर्ष 1929 से 1938 के बीच चार बार तिब्बत की दुर्गम यात्राएं की थीं। उन यात्राओं के दौरान उन्होंने मठों और गांवों का सघन सर्वेक्षण कर करीब 10 हजार ग्रंथ एकत्र किए थे। इस विशाल संग्रह का मुख्य हिस्सा उन्होंने बिहार एंड ओडिशा रिसर्च सोसाइटी, पटना को सौंपा था, जबकि दुर्लभ पांडुलिपियों का एक विशेष हिस्सा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण दिल्ली को दिया गया। दिल्ली के धरोहर भवन में रखी इन पांडुलिपियों में सबसे अद्भुत ‘सेरडे’ संस्करण है, जिसमें 108 पोथियां शामिल हैं। ये पांडुलिपियां हस्तनिर्मित कागज पर शुद्ध सोने की स्याही से लिखी गई हैं, जिन्हें ‘कंजूर’ यानी बुद्ध के प्रत्यक्ष वचन कहा जाता है। ‘भोट’ लिपि में लिखे गए इन 845 ग्रंथों को 20वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण विश्व धरोहरों में गिना जाता है।ये ग्रंथ मात्र धार्मिक दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि 7वीं से 11वीं शताब्दी (अर्ली मेडिवल पीरियड) के उस दौर का इतिहास हैं जब लगभग 400 वर्षों तक नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी के विद्वान निरंतर तिब्बत और चीन की यात्रा करते थे। इन ग्रंथों में आचार्य पद्मसंभव, शान्तरक्षित और दीपांकर श्रीज्ञान जैसे विद्वानों के वृत्तांत दर्ज हैं।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन का बिहार के भागलपुर के सुल्तानगंज से गहरा संबंध था। उन्होंने 1932 में सुल्तानगंज से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका “गंगा” के संपादक पंडित रामगोविन्द त्रिवेदी को बहुमूल्य परामर्श दिए थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “मेरी जीवन यात्रा” में सुल्तानगंज की ‘गंगा’ पत्रिका के लिए अनेक ऐतिहासिक व पुरातात्विक लेख लिखने का जिक्र किया है।
सुल्तानगंज (भागलपुर, बिहार) से प्रकाशित “गंगा” पत्रिका में राहुल जी के लेख छपते थे, जिनमें ‘महायान की उत्पत्ति’ और ‘चौरासी सिद्धि’ का जिक्र मिलता है।सुल्तानगंज के इसी समय के दौरान, उन्होंने तिब्बत से लाए गए बौद्ध चित्रों को बेचकर प्राप्त धन से नालन्दा महाविहार के पुनरुद्धार का विचार किया था।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने 1932 में सुल्तानगंज (बिहार) से निकलने वाली “गंगा” पत्रिका के सम्पादक पंडित रामगोविन्द त्रिवेदी को परामर्श दिया कि गंगा पत्रिका पुरातत्व विशेषांक प्रकाशित करे। ‘गंगा’ के स्वामी बनैली राज्य नरेश कुमार कृष्णानन्द सिह थे। उन्होने पुरातत्व विशेषांक के लिये प्रचुर धन प्रदान किया, लेकिन उनकी शर्त थी कि राहुलजी इस विशेषांक के अतिथि सम्पादक के दायित्व का निर्वहन करेंगे। ‘गंगा’ के पुरातत्व विशेषांक के सम्पादन के लिए राहुलजी को कुछ सप्ताह सुल्तानगंज मे रहना पड़ा।
कुमार साहब के राजदरबार में सनातन धर्मावलम्बियों का प्रभुत्व था। सनातनियों को ज्ञात था कि राहुल सांकृत्यायन श्रीलंका के बौद्ध महाविहार में प्रवजित होकर अनीश्वरवादी हो गये। सनातन धर्म के इस तिरस्कार से वे क्षुब्ध थे। उन्होंने कहा, दुनिया के सभी प्रमुख धर्म किसी न किसी रूप में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हैं। गुरु नानक, संत कबीर, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गाधी आदि विश्ववंद्य महात्माओं ने भी ईश्वर के अस्तित्व मे आस्था व्यक्त की है, फिर राहुलजी क्यों अनीश्वरवादी हैं? राहुलजी ईश्वर की सत्ता को इसलिए नहीं मानते होंगे क्योंकि बौद्ध धर्म प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम, अर्थात कारण-कार्य की श्रृंखला को मानता है।
बौद्धधर्म कहता है कि सृष्टि का न तो कोई संचालन करने वाला है, न ही कोई सृजन करने वाला है। बौद्धधर्म की धारणा कि ब्रह्माण्ड का न आरंभ है और न अंत, पूर्णतः मिथ्या है, निराधार है।
एक दिन कुमार साहब के दरबार में पण्डितों ने गंगा सम्पादक त्रिवेदीजी से कहा कि “राहुलजी को कल यहाँ बुला लाइये। इस विषय पर शास्त्रार्थ होगा और हम लोग राहुलजी को ईश्वर मनवाकर दम लेंगे।”
त्रिवेदीजी लिखते है-
“मैने राहुलजी से सारी कथा कह सुनायी। किन्तु उन्होंने दरबार में जाने की आनाकानी की। राहुल जी राजनैतिक नेताओं और धनपतियों से उदासीन रहते थे। एक बार देशबन्धु चितरंजन दास से आप मिलने गये। थोड़ी देर बैठकर (बुलावा नहीं आने के कारण) बिना मिले ही लौट गये। तिब्बत जाकर दुर्लभ सामग्री आपने पटना-म्यू‌जियम को दी। इससे बिहार का तत्कालीन गवर्नर बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने प्रसिद्ध इतिहास-वेत्ता श्री काशीप्रसाद जायसवाल के द्वारा राहुलजी को धन्यवाद दिया और मिलने के लिये राहुलजी को बुलाया। किन्तु राहुलजी नहीं मिले। परन्तु मेरे अत्यधिक आग्रह करने पर कुमार साहब को साहित्यानुरागी जानकर दरबार में चलने और विचार विनिमय करने को राजी हो गये।
प्रातःकाल से ही योद्धा तीरकमान चढाने लगे और धनुर्वाण मांजने लगे। शाम होते-होते सभी मल्लराज अखाड़े में उतर पड़े। राहुलजी भी मुझे लेकर दरबार में पहुँचे। शिष्ट-विधि के अनन्तर तर्क-वितर्क प्रारम्भ हुये। पंडित लोग आस्तिक दर्शनों के प्रमाण, तर्क और उक्तियाँ उपस्थित करते और राहुल जी खण्डन करते। पूर्व पक्ष से न्याय, वेदान्त, उपनिषद और इनके भाष्यों की गहन-गम्भीर युक्तियां दी जाती और राहुलजी बौद्धदर्शन और विज्ञान के तर्कों से उनका खण्डन करते। यह क्रम एक घंटे तक चलने के पश्चात सात्विक विवाद ने तामस रूप ले लिया। हार-जीत के फैसले के लिये बेताब कुछ श्रोता भी शुष्क दार्शनिक तर्क-प्रमाण सुनते-सुनते ऊब चले। वायुमण्डल गम्भीर हो गया। पंडित क्रोधावेश में आकर उबल पडे – यह कुछ नहीं समझता, पूर्वाग्रह-ग्रस्त है, महामूर्ख है।” दूसरे गरजे, “यह कुछ नहीं जानता, पल्लव-ग्राही है। मैं तुम्हें जीवन भर विद्यार्थी बनाकर पढ़ा सकता हूँ। राहुल जी नितान्त शान्त बैठे मुस्कराते हुए बोले- “आप लोगों ने जो कहा वह ठीक हो सकता है। किन्तु मेरे जैसे महामूर्ख से आप ईश्वर नहीं मनवा सकते, मैं विद्यार्थी तो हूं ही, जीवन भर विद्या का अर्थी रहना चाहता हूँ।”
राहुलजी की तर्क-युक्तियों का तो किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। परन्तु उनकी असीम सहनशीलता का लोगों पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा। लोग स्तब्ध और विस्मित हो उठे। इन लोगों को क्या मालूम था कि राहुलजी जेल भी गये तो हंसते रहे।
उस दिन मेरे घर पर आकर राहुलजी ने मुझसे ईषद्हास्य के साथ पूछा “यहां के संस्कृत-महाविद्यालय में कितने अगस्त्य-दुर्वासा है?”
मैंने कहा- अस्मिन अगस्त्य-प्रमुखा प्रदेशे, भूयांस उद्गीथविदो वसन्ति।
राहुलजी ने झटपट टिप्पणी की “उद्गीथविद (वेद-विज्ञाता) होकर भी पाशुपतास्त्र, आग्नेयास्त्र और ब्रह्मास्त्र चलाने में वे बड़े निपुण हैं।” मैंने कहा- “वशिष्ठ और द्रोणाचार्य की सन्तान जो है।” इस पर एक करारा ठहाका लगा।”
सुल्तानगंज मे अपना कार्य समाप्त करने के बाद राहुलजी पटना गये। पटना स्टेशन पर बैरिस्टर और इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल जिन्होंने मिर्जापुर मे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के साथ हाई स्कूल की पढाई पूरी की थी और तदुपरांत ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में इतिहास का अध्ययन किया, उनको लेने आये।
शाम के समय युवा कवि दिनकर “काव्यशास्त्र विनोद” के लिये जायसवालजी की कोठी पर आये। उन्होने जायसवाल जी से कहा-आप जैसा बोलते हैं, ईश्‍वर पर आपका वैसा ही अविश्वास है या नहीं, इसमें मुझे सन्देह है । अगर ईश्वर-सिद्धि के पक्ष में केवल एक ही दलील हो, तो भी वह काफी है कि कोई था ही नहीं, तो यह सारी सृष्टि आई कहाँ से ?’ राहुलजी पास ही बैठे थे। जायसवालजी ने संकेत किया। वे झट बोल उठे–‘कौन कहता है कि ईश्वर नहीं था? था जरूर,लेकिन, कुछ दिन हुए, बेचारा मर गया। देखते नहीं दुनिया कितनी दुःखी है?’ दिनकर जी ने राहुल सांकृत्यायन के संस्मरण मे लिखा, ‘तीर लक्ष्य पर लगे और सुनने वाले का जी भी न दुखे, राहुलजी ऐसे व्यंग्य के धनी हैं।
1934 के भूकम्प के समय पटना में महात्मा गांधी ने राहुलजी को किसी विषय पर विचार-विमर्श करने के लिये बुलाया। गांधीजी से मिलकर जब वे बाहर निकले, मालवीय जी ने उनसे पूछा, क्या बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है? राहुलजी ने कहा, बौद्ध दर्शन के तीन स्तम्भ है: अनीश्वरवाद, अनात्मवाद और क्षणिकवाद। मालवीयजी ने धैर्यपूर्वक राहुलजी की व्याख्या सुनी।
बौद्ध ग्रंथो में धैर्य या क्षान्ति की बडी महिमा है। हम दूसरे के विचार को स्वीकार करें या न करें, अगर हम विपरीत विचार के प्रति धैर्यवान हैं, यह जग-उद्यान नाना प्रकार के सुन्दर विचार-पुष्प से सुशोभित और सुरभित रहेगा। (विनायक फीचर्स)

जयंती पर सपाइयों ने महात्मा ज्योतिबा राव फुले को किया याद, प्रेरणा लेने का आह्वान

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फर्रुखाबाद। आवास विकास स्थित समाजवादी पार्टी के जिला कार्यालय पर जिलाध्यक्ष सपा चंद्रपाल सिंह यादव की अध्यक्षता में महात्माॅं ज्योतिबा राव फुले की जयंती के अवसर पर गोष्ठी का आयोजन किया गया।
जिला प्रवक्ता सचिव राधेश्याम सविता ने बताया कि इस मौके पर जिलाध्यक्ष चंद्रपाल सिंह यादव के नेतृत्व में पार्टी के सभी पदाधिकारियों ने महात्माॅं फुले के चित्र पर माल्यार्पण कर उनके जीवन मूल्य एवं विचारों पर चर्चा की। कार्यक्रम के प्रभारी संतोष दिवाकर जिला अध्यक्ष अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ एवं संचालन मुन्ना यादव एडवोकेट ने किया।
इस दौरान पार्टी जिलाध्यक्ष श्री चंद्रपाल सिंह यादव ने कहा महात्माॅं फुले का पूरा जीवन पीडीए समाज को समर्पित रहा है। उन्होंने समाज में समता की बात की। वह सदैव पाखंड और अज्ञानता के खिलाफ खड़े रहे। समाज में आज भी उन्हें बड़े समाज सुधारक और शैक्षिक क्रांति के योद्धा रूप में याद किया जाता है, पीडीए समाज के लिए उनके विचार आज भी बहुमूल्य हैं।
इस मौके पर प्रदेश सचिव एवं कायमगंज विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी सर्वेश अंबेडकर ने कहा की महात्माॅं फुले आज भले ही हमारे बीच में ना हों लेकिन उनके विचार आज भी हम सब के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनके महान विचारों से हम सब एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
इस दौरान अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के नव-नियुक्त जिलाध्यक्ष संतोष दिवाकर का पार्टी कार्यालय में फूल माला पहनाकर स्वागत किया गया।
इस मौके पर जिला महासचिव इलियास मंसूरी, जिला उपाध्यक्ष अजीत यादव, जिला सचिव निजाम अंसारी, प्रदेश उपाध्यक्ष समाजवादी छात्र सभा राजपाल यादव, महानगर अध्यक्ष यूथ ब्रिगेड शिवम पटेल, जियाउल हक जिला महासचिव समाजवादी युवजन सभा, एडवोकेट सद्दाम हुसैन, बालिस्टर सिंह यादव, जितेंद्र सिंह यादव, नागेंद्र सिंह यादव, अशोक अंबेडकर, केशव पाल, विवेक भारद्वाज आदि पदाधिकारी साथी मौजूद रहे।