शरद कटियार
सड़क किनारे ठेला लगाकर सब्जी बेचने वाला वह आदमी शायद देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़ों में कभी दिखाई नहीं देता। उसके पास कोई बड़ा शोरूम नहीं, कोई राजनीतिक पहुंच नहीं, कोई आलीशान दफ्तर नहीं। उसके पास सिर्फ एक ठेला होता है, कुछ किलो सब्जियां होती हैं और पेट पालने की जिद होती है। लेकिन आज सबसे आसान निशाना वही बन गया है।
सुबह चार बजे मंडी से सब्जी खरीदकर लाने वाला गरीब जब दिनभर धूप में खड़ा होकर दो वक्त की रोटी कमाने की कोशिश करता है, तभी प्रशासन का बुलडोजर “अतिक्रमण हटाओ अभियान” के नाम पर उसकी पूरी दुनिया कुचल देता है। उसकी टोकरी बिखर जाती है, ठेला टूट जाता है, सब्जियां सड़क पर फैल जाती हैं और उसके बच्चों की भूख भी उसी सड़क पर तड़पती रह जाती है।
सवाल यह नहीं कि अतिक्रमण हटना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या कानून केवल गरीबों के लिए ही बचा है? बड़े-बड़े अवैध निर्माण, रसूखदारों के कब्जे, नेताओं के संरक्षण में चल रहे कारोबार क्या प्रशासन को दिखाई नहीं देते? क्या बुलडोजर केवल उस गरीब की रोजी पर ही चल सकता है जिसके पास न वकील है, न पहुंच और न सत्ता?
विडंबना देखिए, जो आदमी टैक्स नहीं चुरा रहा, जो अपराध नहीं कर रहा, जो सिर्फ मेहनत कर रहा है, वही सबसे ज्यादा अपमानित किया जा रहा है। उसकी गरीबी अब अपराध जैसी मानी जाने लगी है। उसे सड़क से हटाया जा रहा है, लेकिन उसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनाई जाती। कोई यह नहीं पूछता कि उसका परिवार अब खाएगा क्या?
देश में गरीबी खत्म करने की बातें दशकों से होती रही हैं, लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि गरीबी नहीं, गरीबों को ही हटाने की कोशिश चल रही है। शहरों को चमकाने की होड़ में उन हाथों को मिटाया जा रहा है जो ईमानदारी से जीवन चला रहे हैं। विकास अगर किसी गरीब की थाली छीनकर आता है तो वह विकास नहीं, संवेदनहीनता है।
एक ठेला सिर्फ लोहे का ढांचा नहीं होता, वह किसी पिता की उम्मीद, किसी मां की दवा, किसी बच्चे की फीस और पूरे परिवार की सांस होता है। बुलडोजर जब उस ठेले पर चलता है तो सिर्फ सामान नहीं टूटता, इंसान अंदर से टूट जाता है।
जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था गरीबों को दुश्मन नहीं, नागरिक समझे। अतिक्रमण हटाना है तो पहले वैकल्पिक बाजार और व्यवस्थित स्थान दिए जाएं। कानून सबके लिए बराबर हो। गरीब की मजबूरी पर शक्ति प्रदर्शन बंद हो। क्योंकि जिस समाज में सबसे कमजोर आदमी लगातार कुचला जाता है, वहां इंसानियत धीरे-धीरे मरने लगती है।