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Monday, April 6, 2026
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पीएनबी मैराथन थीम सोल्जरथॉन 2026 ने फिट इंडिया मूवमेंट, भारतीय सशस्त्र बलों को श्रद्धांजलि के तहत 27000 से अधिक धावकों को किया एकजुट

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नई दिल्ली: देश के अग्रणी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) ने ‘पीएनबी सोल्जरथॉन 2026’ के प्रति देशव्यापी जबरदस्त उत्साह देखा, जिसमें विभिन्न रनिंग कम्युनिटीज, सेना के समूहों और फिटनेस प्रेमियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। भारत के सबसे बड़े रनिंग इवेंट्स में से एक के रूप में उभरते हुए, यह मैराथन देश की बढ़ती फिटनेस संस्कृति और राष्ट्रीय एकता को दर्शाता है।

भारतीय सशस्त्र बलों के सहयोग से “रन विद सोल्जर्स-रन फॉर सोल्जर्स” थीम के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में 27,000 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए जिनमें सैनिक, एथलीट, फिटनेस उत्साही, पीएनबी कर्मचारी और समाज के हर वर्ग के नागरिक शामिल थे। 1500 से अधिक वालंटियर्स की सक्रिय भागीदारी के साथ, इस आयोजन ने भारत के गौरव और जुनून को एक साझा मंच पर एकजुट कर दिया।

इस मैराथन का फ्लैग ऑफ नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में मुख्य अतिथियों मिजोरम के माननीय राज्यपाल जनरल विजय कुमार सिंह पीवीएसएम, एवीएसएम, वाईएसएम, एडीसी; एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी पीवीएसएम, एवीएसएम, एनएम, नौसेना प्रमुख; डीएफएस सचिव, श्री एम. नागराजू, आईएएस; पीएनबी एमडी एवं सीईओ श्री अशोक चंद्र और पीएनबी के वरिष्ठ प्रबंधन द्वारा किया गया।

मुख्य अतिथियों ने पीएनबी के सतत प्रयासों की सराहना की और इस बात पर जोर दिया कि सोल्जरथॉन जैसी पहल राष्ट्रीय चेतना के निर्माण, फिटनेस की संस्कृति को प्रोत्साहित करने और नागरिक-सैन्य संबंधों को गहरा करने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।

पीएनबी की इस पहल की सराहना करते हुए, मिजोरम के माननीय राज्यपाल जनरल विजय कुमार सिंह पीवीएसएम, एवीएसएम, वाईएसएम, एडीसी ने कहा, “सोलजरथॉन और फिटिस्तान के सहयोग से पीएनबी द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम जबरदस्त सफल रहा है, जिसमें 27,000 से अधिक प्रतिभागियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। इतने बड़े पैमाने पर इस पहल को क्रियान्वित करने के लिए पीएनबी वास्तव में श्रेय का पात्र है। एक प्रमुख बैंक को सक्रिय रूप से खेल और फिटनेस को बढ़ावा देते देखना उत्साहजनक है, जो व्यापक जनता को स्वास्थ्य, अनुशासन और सामुदायिक जुड़ाव के बारे में एक मजबूत और सकारात्मक संदेश दे रहा है।”

नौसेना प्रमुख, एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी, पीवीएसएम, एवीएसएम, एनएम ने अपनी बात जोड़ते हुए कहा, “इस तरह के आयोजन न केवल फिटनेस और अनुशासन को बढ़ावा देते हैं, बल्कि हमारी सशस्त्र सेनाओं के अटूट साहस और बलिदान को एक सशक्त श्रद्धांजलि भी देते हैं। नागरिकों को इतनी बड़ी संख्या में एक साथ आते देखना हृदयस्पर्शी है, जो एकता, लचीलेपन और राष्ट्रीय गौरव की भावना को दर्शाता है।”

डीएफएस सचिव, श्री एम. नागराजू, आईएएस ने जोर देते हुए कहा, “पीएनबी सोलजरथॉन 2026 जैसी पहल राष्ट्रीय चेतना के निर्माण, फिटनेस की संस्कृति को प्रोत्साहित करने और नागरिक-सैन्य संबंधों को गहरा करने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।”

पीएनबी के एमडी एवं सीईओ, श्री अशोक चंद्र ने कहा: “स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित पीएनबी सेवा और राष्ट्र-निर्माण के लिए समर्पित है। पीएनबी सोलजरथॉन इसी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो हमारे सशस्त्र बलों के साहस और निस्वार्थ भाव को श्रद्धांजलि देने के लिए हमारे समुदाय को एक साथ लाता है।”

ओपन कैटेगरी के तहत, 21.1K पुरुष वर्ग में सत्याम ने पहला स्थान हासिल किया, जबकि महिला वर्ग में नीता रानी विजेता रहीं। 10K दौड़ में, पुरुष वर्ग में गौरव विजेता रहे और महिला वर्ग में संजना सिंह ने पहला स्थान प्राप्त किया।

वर्ष 2025 में साइबर सुरक्षा पर केंद्रित हाफ मैराथन के पहले संस्करण की सफलता के बाद, इस वर्ष का संस्करण—जो बैंक के 132वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया—सशस्त्र बलों को समर्पित रहा। यह आयोजन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता का स्मरणोत्सव था, जो हमारे बहादुर सैनिकों के अदम्य साहस, लचीलेपन और अटूट समर्पण का प्रतीक है।

माननीय प्रधानमंत्री के देशव्यापी ‘फिट इंडिया’ अभियान के अनुरूप, पीएनबी सोल्जरथॉन 2026 ने फिटनेस, राष्ट्रीय गौरव और सामूहिक कल्याण को बढ़ावा देने की बैंक की प्रतिबद्धता को और मजबूती प्रदान की। अपनी इस प्रमुख हाफ मैराथन को वास्तव में अखिल भारतीय स्तर पर ले जाने के लिए, पीएनबी ने एक ‘वर्चुअल मैराथन’ का भी सफल आयोजन किया। इसमें विभिन्न कार्यक्षेत्रों और शाखाओं के कर्मचारियों ने भाग लिया, जिसने “एक टीम, एक मैराथन” की भावना को और सशक्त बनाया।

 

 

महिला आरक्षण पर सियासत तेज, जनगणना के बिना बिल निराधार : अखिलेश यादव

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लखनऊ

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण बिल को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि बिना ताजा जनगणना के महिला आरक्षण की बात करना पूरी तरह निराधार है और इससे महिलाओं के साथ न्याय नहीं हो सकता। उनका कहना है कि यदि सरकार महिलाओं की वास्तविक संख्या को ही स्पष्ट नहीं करना चाहती, तो उन्हें आरक्षण देने की मंशा भी संदेह के घेरे में आती है।
अखिलेश यादव ने अपने बयान में कहा कि आरक्षण का आधार गणितीय होता है और यह कुल सीटों के अनुपात पर निर्भर करता है। ऐसे में जब तक सही और अद्यतन आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक किसी भी प्रकार का आरक्षण सही तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतने पुराने आंकड़ों के आधार पर महिलाओं के अधिकार तय करना उनके साथ अन्याय होगा।
सपा अध्यक्ष ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि वह महिलाओं को लेकर गंभीर नहीं है और केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस मुद्दे को उछाल रही है। उन्होंने कहा कि “अगर किसी काम को सही नीयत से किया जाता है, तो उसमें किसी प्रकार की शंका नहीं होती, लेकिन यहां सरकार की मंशा साफ नहीं दिख रही है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समाजवादी पार्टी महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का छलावा नहीं होने देगी और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए हर स्तर पर आवाज उठाएगी।
इसके अलावा, अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था को लेकर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि प्रदेश में “प्रीपेड पीड़ित” नाम की एक नई श्रेणी बन गई है, जहां उपभोक्ताओं को पहले ही पैसा जमा करना पड़ता है, फिर भी उन्हें बिजली संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब उपभोक्ता अग्रिम भुगतान कर रहे हैं, तो फिर उन्हें बार-बार परेशान क्यों किया जा रहा है।
कुल मिलाकर, महिला आरक्षण और बिजली व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए जनहित से जुड़े सवाल उठाए हैं। उनके इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर महिला आरक्षण और जनगणना का मुद्दा गरमा गया है।

शीतयुद्ध का साया: लुमुम्बा की हत्या और अधूरा न्याय

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यूथ इंडिया
शीतयुद्ध के दौर में दुनिया सिर्फ दो महाशक्तियों के बीच वैचारिक टकराव का मैदान नहीं थी, बल्कि यह उन कमजोर और नवस्वतंत्र देशों की त्रासदी का भी समय था, जिन्हें अपने ही भविष्य पर अधिकार पाने से वंचित कर दिया गया। अफ्रीका का देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो इस सच्चाई का सबसे कड़वा उदाहरण है। यहां के पहले लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री पैट्रिक लुमुम्बा की हत्या आज भी इतिहास के सबसे विवादास्पद और दुखद अध्यायों में गिनी जाती है।

हाल ही में बेल्जियम की एक अदालत द्वारा पूर्व राजनयिक एटियेन डेविग्नन के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया गया है। यह कदम भले ही देर से उठाया गया हो, लेकिन इसे उस न्याय की शुरुआती आहट माना जा रहा है, जिसकी मांग दशकों से उठती रही है। लुमुम्बा के परिवार और मानवाधिकार संगठनों ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताया है, परंतु सवाल यह भी है कि क्या इतने वर्षों बाद न्याय वास्तव में संभव है, या यह केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा?

सत्ता, साजिश और शीतयुद्ध का खेल

1960 में जब कांगो बेल्जियम से आज़ाद हुआ, तब देश के सामने उम्मीदों का एक नया क्षितिज था। पैट्रिक लुमुम्बा एक युवा, करिश्माई और राष्ट्रवादी नेता के रूप में उभरे, जिन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता हासिल की। लेकिन उनकी स्वतंत्र सोच और राष्ट्रीय संसाधनों पर नियंत्रण की नीति ने पश्चिमी शक्तियों को असहज कर दिया।

उस समय दुनिया शीत युद्ध की विभाजक रेखाओं में बंटी हुई थी। अमेरिका को डर था कि कांगो कहीं सोवियत प्रभाव में न चला जाए। इसी आशंका ने एक खतरनाक साजिश को जन्म दिया। सीआईए और पश्चिमी राजनीतिक तंत्र के कुछ हिस्सों ने लुमुम्बा को सत्ता से हटाने और खत्म करने की योजनाएं बनाईं।

हालांकि जहर देकर हत्या की योजना विफल रही, लेकिन इसके समानांतर एक और राजनीतिक खेल चल रहा था, जिसमें स्थानीय विरोधी गुटों और विदेशी ताकतों की मिलीभगत थी। अंततः 1961 में लुमुम्बा की निर्मम हत्या कर दी गई—एक ऐसी घटना जिसने कांगो के भविष्य को गहरे अंधकार में धकेल दिया।

लोकतंत्र से तानाशाही तक

लुमुम्बा की हत्या के बाद जिस राजनीतिक शून्य का निर्माण हुआ, उसे भरने के लिए एक ऐसी व्यवस्था खड़ी की गई, जिसने देश को स्थिरता के बजाय भ्रष्टाचार और तानाशाही की ओर धकेल दिया। विदेशी समर्थन से उभरे नेताओं ने सत्ता पर कब्जा तो कर लिया, लेकिन जनता के हितों की अनदेखी होती रही।

आज भी कांगो की बड़ी आबादी गरीबी, हिंसा और अस्थिरता से जूझ रही है, जबकि यह देश खनिज संसाधनों से बेहद समृद्ध है। विडंबना यह है कि जिन संसाधनों से देश समृद्ध हो सकता था, वही बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप का कारण बन गए।

अधूरा न्याय और वैश्विक जिम्मेदारी

लुमुम्बा की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि यह एक लोकतांत्रिक आकांक्षा की हत्या थी। पिछले 65 वर्षों में न तो अमेरिका ने और न ही संयुक्त राष्ट्र ने इस मामले में कोई औपचारिक माफी मांगी है। 2002 में बेल्जियम ने सीमित रूप से जिम्मेदारी स्वीकार जरूर की, लेकिन उसे पूर्ण न्याय नहीं कहा जा सकता।

अब जब अदालत ने एटियेन डेविग्नन के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है, तो यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या यह कदम इतिहास के उस गहरे घाव को भर पाएगा, या केवल प्रतीकात्मक रहेगा।

निष्कर्ष: इतिहास से सबक की जरूरत

लुमुम्बा की कहानी हमें यह सिखाती है कि वैश्विक राजनीति में ताकतवर देशों के हित अक्सर कमजोर देशों के लोकतंत्र और संप्रभुता पर भारी पड़ते हैं। आज जब दुनिया एक बार फिर नए भू-राजनीतिक तनावों की ओर बढ़ रही है, तब इस इतिहास को याद रखना बेहद जरूरी है।

कांगो की त्रासदी केवल एक देश की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का आईना है, जहां न्याय अक्सर देर से आता है—और कई बार अधूरा ही रह जाता है।

ईरान युद्ध का वैश्विक असर, अमेरिका में पेट्रोल-डीजल महंगा, नेपाल में लागू हुआ दो दिन का वीकेंड

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नई दिल्ली। ईरान के खिलाफ चल रहे युद्ध की तपिश अब वैश्विक स्तर पर साफ दिखाई देने लगी है। इस संघर्ष का सीधा असर दुनिया की अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पर पड़ रहा है। खासतौर पर अमेरिका और नेपाल जैसे देशों में ईंधन संकट और महंगाई ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
अमेरिका में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया है। हालात यह हैं कि पेट्रोल की औसत कीमत बढ़कर 4.09 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है, जो पिछले कई महीनों का उच्चतम स्तर माना जा रहा है। वहीं डीजल की कीमत भी बढ़कर 5.53 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो रही है, जिससे ईंधन की लागत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसका असर परिवहन, हवाई यात्रा और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ने लगा है।
ईंधन की बढ़ती लागत को देखते हुए बड़ी कंपनियों ने भी कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। Amazon ने अपनी डिलीवरी सेवाओं पर 3.5 प्रतिशत ईंधन सरचार्ज लगाने की घोषणा की है। वहीं अमेरिकी डाक सेवा भी पैकेज और एक्सप्रेस मेल पर अस्थायी ईंधन अधिभार लगाने की तैयारी कर रही है। एयरलाइनों ने भी बढ़ती लागत के चलते बैगेज शुल्क में वृद्धि करनी शुरू कर दी है, जिससे यात्रियों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है तो इसका असर और गहरा हो सकता है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक बाजार आपस में जुड़े हुए हैं, ऐसे में किसी एक क्षेत्र में संकट पूरे विश्व को प्रभावित करता है। परिवहन लागत बढ़ने से अन्य वस्तुओं की कीमतों में भी तेजी आ सकती है, जिससे महंगाई और बढ़ेगी।
दूसरी ओर, नेपाल में ईंधन संकट से निपटने के लिए सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। मंत्रिपरिषद की बैठक में यह तय किया गया कि अब सप्ताह में दो दिन—शनिवार और रविवार—सार्वजनिक अवकाश रहेगा। इस फैसले का उद्देश्य ईंधन की खपत को कम करना और संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना है। सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि यह व्यवस्था छह अप्रैल से लागू कर दी जाएगी और सभी सरकारी कार्यालय व शैक्षणिक संस्थान इसका पालन करेंगे।
कुल मिलाकर, ईरान युद्ध का प्रभाव अब केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन को सीधे प्रभावित कर रहा है। आने वाले समय में यदि हालात नहीं सुधरे, तो महंगाई और आर्थिक दबाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

धैर्य, संयम और सम्मान का शाश्वत धर्म: राजा ययाति के उपदेशों में जीवन का सत्य

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यूथ इंडिया
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जो समय की सीमाओं को पार कर आज भी जीवन को दिशा देने की क्षमता रखते हैं। इन्हीं अमूल्य कथाओं में राजा ययाति और उनके पुत्र पुरु का प्रसंग विशेष महत्व रखता है। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि मानव स्वभाव, इच्छाओं, संयम और नैतिकता की गहराई को समझाने वाला जीवंत उदाहरण है।

राजा ययाति का जीवन इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य चाहे जितना भी भौतिक सुखों में डूब जाए, अंततः उसे संतोष की तलाश भीतर ही करनी पड़ती है। जब उन्हें शुक्राचार्य के शाप के कारण असमय वृद्धावस्था प्राप्त हुई, तब उन्होंने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु से उसका यौवन लेकर अपनी इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास किया। यह घटना केवल एक पिता-पुत्र के संबंध का प्रसंग नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की अतृप्त इच्छाओं और भोग की प्रवृत्ति का प्रतीक भी है।

वर्षों तक भोग-विलास में लीन रहने के बाद भी ययाति की इच्छाएं समाप्त नहीं हुईं। यह अनुभव उनके जीवन का सबसे बड़ा सत्य बनकर उभरा कि इच्छाएं भोग से नहीं, बल्कि संयम और आत्मनियंत्रण से शांत होती हैं। यही वह क्षण था, जब उन्होंने यौवन लौटाकर अपने पुत्र को उसका अधिकार दिया और स्वयं सांसारिक सुखों से विरक्त होकर तपस्या के मार्ग पर चल पड़े। यह निर्णय उनके भीतर जागे आत्मबोध और वैराग्य का प्रमाण था।

वन में जाकर राजा ययाति ने वानप्रस्थ आश्रम का पालन करते हुए एक अत्यंत अनुशासित और सादा जीवन अपनाया। उन्होंने शिलोंछवृत्ति को अपनाया, जिसमें व्यक्ति केवल उतना ही ग्रहण करता है, जितना आवश्यक हो। पहले अतिथियों को संतुष्ट करना और फिर स्वयं भोजन करना, उनके जीवन का नियम बन गया। यह केवल एक आचार नहीं, बल्कि त्याग और सेवा की भावना का उत्कृष्ट उदाहरण था। समय के साथ उनकी तपस्या और भी कठोर होती गई—कभी केवल जल पर जीवन, कभी वायु पर, तो कभी अग्नि के मध्य तप। यह सब उनके आत्मबल और संकल्प की गहराई को दर्शाता है।

उनकी तपस्या का प्रभाव इतना व्यापक था कि उनका यश पृथ्वी से लेकर स्वर्ग तक फैल गया। अंततः उन्हें दिव्य लोकों की प्राप्ति हुई, जहां देवताओं ने उनका सम्मान किया। किंतु उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण विरासत उनकी तपस्या नहीं, बल्कि वह ज्ञान है, जो उन्होंने अपने पुत्र पुरु को दिया।

जब उन्होंने पुरु को राज्य सौंपा, तब उन्होंने केवल राजसत्ता नहीं दी, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण नीति भी दी। उन्होंने समझाया कि मनुष्य को कभी क्रोध, कपट और दीनता का सहारा नहीं लेना चाहिए। क्रोध पर नियंत्रण ही वास्तविक शक्ति है। जो व्यक्ति अपमान सहकर भी शांत रहता है, वही सच्चे अर्थों में महान होता है, क्योंकि उसका धैर्य ही उसके विरोधियों को पराजित कर देता है। यह शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जब समाज में छोटी-छोटी बातों पर असहिष्णुता और आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता, विद्वानों, तपस्वियों और क्षमाशील व्यक्तियों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। यह केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक नैतिक कर्तव्य है, जो समाज की स्थिरता और संतुलन को बनाए रखता है। ययाति के अनुसार, जो व्यक्ति दूसरों का सम्मान करता है, वही वास्तव में सम्मान का पात्र बनता है।

वाणी के विषय में भी उन्होंने अत्यंत गूढ़ और व्यावहारिक शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि कठोर और कटु शब्द मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं, जबकि मधुर वाणी संबंधों को सुदृढ़ करती है। शब्दों की शक्ति को समझना और उनका संयमित उपयोग करना, एक सभ्य समाज की पहचान है। आज के समय में, जब संवाद की जगह विवाद ने ले ली है, यह शिक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

ययाति ने दया, मैत्री और दान को जीवन के तीन ऐसे स्तंभ बताया, जिनसे समस्त जगत को जीता जा सकता है। यह विचार केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यावहारिक भी है। यदि मनुष्य अपने व्यवहार में करुणा और उदारता को स्थान दे, तो समाज में आपसी विश्वास और सहयोग स्वतः बढ़ता है।

उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य को सदैव श्रेष्ठ व्यक्तियों के आचरण का अनुसरण करना चाहिए और दुष्टों की कटु बातों को सहन करना चाहिए। यह सहनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति का प्रतीक है। साथ ही उन्होंने यह भी सिखाया कि व्यक्ति को देने की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए, लेकिन स्वयं कभी किसी से कुछ मांगने की आदत नहीं डालनी चाहिए। यह आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का सर्वोच्च रूप है।

राजा ययाति की यह शिक्षाएं केवल एक युग के लिए नहीं, बल्कि हर काल के लिए मार्गदर्शक हैं। आज जब समाज में पारिवारिक मूल्यों का क्षरण, आपसी सम्मान की कमी और असहिष्णुता जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, तब ययाति के उपदेश एक प्रकाशस्तंभ की तरह सामने आते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची प्रगति केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों और आचरण से होती है।

इस प्रकार ययाति की कथा हमें यह समझाती है कि जीवन का वास्तविक सौंदर्य त्याग, संयम और सम्मान में निहित है। यदि इन मूल्यों को अपनाया जाए, तो न केवल व्यक्ति का जीवन संतुलित और सुखी बन सकता है, बल्कि समाज भी अधिक शांत, सभ्य और समृद्ध बन सकता है।

यूपी में जातीय सियासत गरमाई, कश्यप-निषाद को एससी दर्जा देने की मांग से बढ़ी चुनावी हलचल

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लखनऊ

प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं और इसी के साथ जातीय समीकरण साधने की कोशिशें भी खुलकर सामने आने लगी हैं। पश्चिमी यूपी में कश्यप-निषाद समाज को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा देने की मांग ने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। अलग-अलग मंचों से उठी इस मांग ने सत्ता और सहयोगी दलों के बीच नई रणनीतिक हलचल पैदा कर दी है।
दरअसल, नरेंद्र कश्यप द्वारा गाजियाबाद के रामलीला मैदान में आयोजित महर्षि कश्यप जयंती महाकुंभ में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी देखी गई। इस कार्यक्रम में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। यहां मंच से कश्यप-निषाद समाज की सात समतुल्य जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग जोर-शोर से उठाई गई।
वहीं, कुछ ही दूरी पर नोएडा के इनडोर स्टेडियम में डॉ. संजय निषाद के नेतृत्व में निषाद पार्टी ने गुर्जर-निषाद सम्मेलन का आयोजन कर अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। इस कार्यक्रम के जरिए निषाद पार्टी ने न केवल अपनी सामाजिक पकड़ मजबूत करने का संदेश दिया, बल्कि सहयोगी भाजपा पर भी दबाव बनाने की रणनीति अपनाई।
दोनों आयोजनों में समान रूप से कश्यप-निषाद समाज से जुड़ी सात जातियों को SC का दर्जा देने की मांग उठना इस बात का संकेत है कि पश्चिमी यूपी में जातीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। यह मुद्दा आने वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, क्योंकि इस समाज की आबादी कई सीटों पर प्रभावी मानी जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मांग केवल सामाजिक न्याय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे चुनावी गणित भी छिपा है। विभिन्न दल अपने-अपने तरीके से इस वर्ग को साधने में जुटे हैं, जिससे आने वाले समय में गठबंधन और समीकरणों में बदलाव देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर, कश्यप-निषाद समाज को SC का दर्जा देने की मांग ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अब देखना होगा कि सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है और इसका आगामी चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ता है।