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Tuesday, July 14, 2026
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पीलीभीत में एकतरफा प्यार में मेडिकल छात्रा की हत्या, आरोपी क्लासमेट ने चाकू से किया था हमला

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पीलीभीत: पीलीभीत मेडिकल कॉलेज (Pilibhit Medical College) से संबद्ध जिला अस्पताल में मंगलवार को एकतरफा प्रेम के शक में सनसनीखेज वारदात सामने आई। पैरामेडिकल टेक्निशियन (Paramedical Technician) प्रथम वर्ष की छात्रा कशिश पटेल (24) की उसके सहपाठी सागर सिंह ने चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर हत्या कर दी। बीच-बचाव करने पहुंची महिला कर्मचारी निधि भी हमले में घायल हो गईं। पुलिस ने आरोपी को मौके से गिरफ्तार कर लिया है।

बरेली जिले के केसरपुर गांव निवासी कशिश पटेल पिछले 10 महीने से पीलीभीत में रहकर सीटी स्कैन टेक्निशियन का कोर्स कर रही थी। मंगलवार सुबह करीब नौ बजे वह जिला अस्पताल के सीटी स्कैन कक्ष में मौजूद थी। तभी उसका सहपाठी सागर सिंह, निवासी मेडुआ (अरौल), कानपुर देहात, वहां पहुंचा और अचानक चाकू से उसकी गर्दन और पेट पर कई वार कर दिए।

हमले के बाद कशिश जान बचाने के लिए भागी, लेकिन कुछ दूरी पर लहूलुहान होकर गिर पड़ी। उसकी चीख सुनकर अस्पताल की महिला कर्मचारी निधि बचाने पहुंचीं तो आरोपी ने उन पर भी चाकू से हमला कर दिया, जिससे उनके हाथ की कलाई घायल हो गई। शोर सुनकर अस्पताल कर्मियों और सुरक्षा गार्डों ने आरोपी को दबोच लिया।

गंभीर रूप से घायल कशिश को पहले जिला अस्पताल और फिर बरेली के एक निजी मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। घायल कर्मचारी निधि का इलाज जारी है और उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है।

घटना की सूचना पर एसपी सुकीर्ति माधव, एएसपी विक्रम दहिया, सीओ सिटी अमरनाथ वर्मा और सहायक पुलिस अधीक्षक नताशा गोयल मौके पर पहुंचे और जांच शुरू की। पुलिस पूछताछ में आरोपी सागर ने बताया कि वह कशिश से प्रेम करता था, लेकिन पिछले करीब एक महीने से दोनों के बीच बातचीत बंद थी। इसी बात से नाराज होकर उसने वारदात को अंजाम दिया। पुलिस मामले के सभी पहलुओं की जांच कर रही है।

घटना के बाद मेडिकल कॉलेज के छात्रों में आक्रोश फैल गया और उन्होंने अस्पताल परिसर में प्रदर्शन किया। उधर, आरोपी के पिता रामऔतार गौतम ने बेटे की करतूत पर दुख जताते हुए कहा कि उसने जो किया है, उसे उसके अपराध की सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मृतक छात्रा भी उनकी बेटी जैसी थी।

 

पश्चिम एशिया में अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक बदलाव के संकेत

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(राज कुमार सिन्हा-विभूति फीचर्स)

ईरान युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका और इजराइल की रणनीति का एक उद्देश्य सर्वोच्च नेता अली खामनेई की हत्या के बाद ईरान में सत्ता विरोधी जनविद्रोह भड़काना था, जो पूरी तरह विफल हो गई। बल्कि कई मामलों में इसका उल्टा प्रभाव देखने को मिला है। ईरान में शोक कार्यक्रमों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ शांति समझौता समाप्त घोषित किए जाने के बाद, अमेरिका ने क्रेशम द्वीप, सिरिक, बंदर अब्बास और चाबहार समेत कई ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया है। जून में हुए संघर्ष विराम समझौते के टूटने के बाद से यह विवाद फिर से गहरा गया है। जवाबी कार्यवाही में ईरान ने बहरीन, कतर और कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले किए हैं। इसके अलावा ईरान ने बुशहर के पास अमेरिका का एक ड्रोन (एमक्यू-9) मार गिराने का दावा किया है। अमेरिका-ईरान के बीच हुए सीजफायर समझौते के खत्म होने के बाद ईरान की रणनीति आक्रामक और सख्त जवाबी कार्यवाही करने पर केंद्रित हो गई है। ईरान स्पष्ट कर चुका है कि वह दबाव के आगे नहीं झुकेगा और अमेरिकी हमलों या प्रतिबंधों का पूरी ताकत से जवाब देगा। यदि अमेरिका प्रतिबंधों को और कड़ा करता है या सैन्य कार्रवाई बढ़ाता है, तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आक्रामक तरीके से फिर से तेज कर सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे ताजा युद्ध का मुख्य कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण, तेल आपूर्ति मार्गों और क्षेत्र में सामरिक वर्चस्व को लेकर उपजा प्रत्यक्ष सैन्य टकराव है। जून में हुए संघर्ष विराम समझौते के टूटने के बाद से यह विवाद फिर से गहरा गया है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने होर्मुज जलमार्ग से गुजरने वाले वाणिज्यिक तेल टैंकरों को निशाना बनाया है। ईरान इन जहाजों पर अपने नियम-कायदे लागू करना चाहता है। ईरान इस समुद्री मार्ग पर अपना एकाधिकार चाहता है, जबकि अमेरिका इसे एक खुला अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग बनाए रखने के लिए युद्ध के पहले वाली स्थिति बहाल करना चाहता है। ईरान की सेना रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने होर्मुज को बंद करने का एलान कर दिया है। उन्होंने सख्त चेतावनी दी है कि कोई भी जहाज उनकी मंजूरी के बिना इस रास्ते को पार करने की कोशिश न करे। कतर – जार्डन ने अमेरिका और ईरान दोनों देशों से समझौते का पालन करने और बातचीत जारी रखने की अपील की है। साथ ही होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बनाए रखने पर जोर दिया है।अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कहा है कि अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ा तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और ऊर्जा संकट लंबा खिंच सकता है। ‌ अमेरिका-ईरान संघर्ष और ईरान के नेतृत्व परिवर्तन के बाद पश्चिम एशिया की कूटनीति एक नए संक्रमणकाल में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध के खतरे के बीच, रूस ने अपना बेहद उन्नत टीयू -214 पीयू एयरबोर्न कमांड विमान तेहरान भेजा है। इस कमांड विमान को तेहरान भेजकर रूस ने अमेरिका और अन्य पश्चिमी ताकतों को एक कड़ा भू-राजनीतिक संदेश दिया है कि वह संकट के समय में ईरान के साथ मजबूती से खड़ा है। अब यह क्षेत्र केवल सैन्य टकराव का मैदान नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक महाशक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा,ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्गों और नई भू-राजनीतिक साझेदारियों का केंद्र बन गया है। आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा पर इस संघर्ष का गहरा प्रभाव पड़ सकता है। अमेरिका की अधिकतम दबाव की नीति और ईरान की प्रतिरोध रणनीति के बीच जारी टकराव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल सैन्य शक्ति के आधार पर स्थायी राजनीतिक समाधान संभव नहीं है। इससे क्षेत्रीय देशों ने बहुध्रुवीय कूटनीति को अधिक महत्व देना शुरू किया है। अब अधिकांश देश एक ही शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिका, चीन, रूस, यूरोपीय देशों और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ समानांतर संबंध विकसित करने की नीति अपना रहे हैं। सऊदी अरब, यूएई, कतर और अन्य देशों ने केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय चीन, रूस और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ भी रणनीतिक संबंध मजबूत करने की नीति अपनाई है। साथ ही वे ईरान के साथ संवाद बनाए रखने की भी कोशिश कर रहे हैं ताकि सीधे टकराव से बचा जा सके। चीन की मध्यस्थता में ईरान और सऊदी अरब के बीच संबंधों की बहाली तथा रूस और ईरान के बढ़ते रणनीतिक सहयोग ने यह संकेत दिया है कि पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभाव को पहली बार गंभीर वैकल्पिक चुनौती मिल रही है। चीन अपनी ऊर्जा सुरक्षा, बेल्ट एंड रोड पहल और निवेश के माध्यम से क्षेत्र में दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव बढ़ाना चाहता है, जबकि रूस सुरक्षा, रक्षा सहयोग और ऊर्जा समन्वय के जरिए अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। चीन, रूस और ब्रिक्स के विस्तार के संदर्भ में ईरान की बदलती विदेश नीति, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, ऊर्जा सहयोग तथा पश्चिम प्रतिबंधों का विकल्प की दिशा में आगे बढने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए दोनों पक्षों के साथ संतुलन साध रहा है। इस युद्ध ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और कूटनीतिक संबंधों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। भारत के दृष्टिकोण से चाबहार बंदरगाह, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर- दक्षिण परिवहन गलियारा, ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय प्रवासी समुदाय और संतुलित विदेश नीति की चुनौती होगी। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा होता है तथा उसके व्यापारिक हित होर्मुज जलडमरूमध्य और अरब सागर के समुद्री मार्गों से जुड़े हुए हैं। इसलिए भारत को अपनी पारंपरिक रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के अनुरूप अमेरिका, ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की चुनौती और अधिक जटिल होती दिखाई दे रही है। इससे पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन पहले की तुलना में अधिक जटिल और बहुध्रुवीय होता जा रहा है। यूरोपीय देशों के सामने भी नई चुनौती खड़ी हुई है। एक ओर वे अमेरिका के सुरक्षा सहयोगी बने रहना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए ईरान तथा खाड़ी देशों के साथ संवाद बनाए रखने की आवश्यकता भी महसूस कर रहे हैं। इससे यूरोपीय कूटनीति में भी अधिक व्यवहारिक और संतुलित दृष्टिकोण उभर सकता है। भारत सहित एशिया के अनेक देशों के लिए भी यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण है। भविष्य में पश्चिम एशिया की राजनीति केवल सैन्य शक्ति से निर्धारित नहीं होगी, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आर्थिक प्रतिबंधों, प्रौद्योगिकी सहयोग, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित रक्षा प्रणालियों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण जैसे नए कारक भी कूटनीतिक निर्णयों के प्रमुख आधार बनेंगे। इसलिए यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था और बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय राजनीति के निर्माण की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका-ईरान संघर्ष, ईरान के नेतृत्व परिवर्तन और उसके बाद विकसित घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया अब एक नए भू-राजनीतिक दौर में प्रवेश कर चुका है। सैन्य शक्ति, वैचारिक संघर्ष, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्गों और वैश्विक महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा अब एक-दूसरे से गहराई से जुड़ चुकी है। ईरान ने अपने नेतृत्व परिवर्तन को राजनीतिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकजुटता के प्रदर्शन में बदलने का प्रयास किया है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगियों के सामने क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने की चुनौती पहले से अधिक कठिन हो गई है। दूसरी ओर खाड़ी देशों, यूरोप तथा एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने यह महसूस किया है कि बदलती विश्व व्यवस्था में केवल एक महाशक्ति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसी कारण बहुपक्षीय कूटनीति, क्षेत्रीय संवाद और रणनीतिक संतुलन की नई प्रवृत्तियां तेज़ी से उभर रही हैं। आने वाले समय में पश्चिम एशिया की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रतिस्पर्धा और टकराव के बीच संवाद, कूटनीति और पारस्परिक सुरक्षा व्यवस्था को कितना महत्व दिया जाता है।उपरोक्त संदर्भ में वर्तमान परिस्थितियां यह भी संकेत देती हैं कि पश्चिम एशिया धीरे-धीरे अमेरिकी एकध्रुवीय प्रभाव से निकलकर बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रहा है। चीन का आर्थिक निवेश और मध्यस्थता, रूस का रक्षा एवं सामरिक सहयोग तथा खाड़ी देश क्षेत्रीय संतुलन की राजनीति के माध्यम से नई भूमिका निभा रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि भविष्य की कूटनीति केवल सैन्य गठबंधनों पर आधारित नहीं होगी, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्ग, निवेश, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग भी शक्ति-संतुलन के महत्वपूर्ण आधार बनेंगे। यथार्थवादी दृष्टिकोण से निष्कर्ष यह निकलता है कि अमेरिका, ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों की वर्तमान नीतियां किसी वैचारिक टकराव से अधिक अपनी-अपनी सुरक्षा, शक्ति और रणनीतिक हितों की रक्षा तथा क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश हैं। यही प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया की राजनीति, सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा तय करेगी। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय संकट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री सुरक्षा और विश्व अर्थव्यवस्था पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। (विभूति फीचर्स)

साहित्य की जीवंत परंपरा का उत्सव निखिल बंग साहित्य सम्मेलन

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(कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स)
किसी समाज की पहचान केवल उसके आर्थिक विकास या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि उसकी सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक परंपरा और बौद्धिक विरासत से भी होती है। साहित्य वह शक्ति है जो समय के साथ समाज की स्मृतियों को संजोती है, विचारों को दिशा देती है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती है। यही कारण है कि साहित्यिक सम्मेलन केवल औपचारिक आयोजन नहीं होते, बल्कि वे समाज के सांस्कृतिक आत्मविश्वास के उत्सव बन जाते हैं। हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज द्वारा आयोजित दो दिवसीय निखिल बंग साहित्य सम्मेलन इसी व्यापक भावना का सशक्त उदाहरण बना।
सम्मेलन का उद्घाटन हरियाणा के राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष ने अपनी धर्मपत्नी एवं हरियाणा की प्रथम महिला श्रीमती मित्रा घोष की गरिमामयी उपस्थिति में किया। उनकी उपस्थिति ने आयोजन को केवल औपचारिक गरिमा ही नहीं दी, बल्कि यह संदेश भी दिया कि साहित्य, शिक्षा और संस्कृति आज भी सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण सरोकार हैं और उन्हें संवैधानिक संस्थाओं का संरक्षण तथा प्रोत्साहन प्राप्त है।
कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की सामूहिक प्रस्तुति से हुआ। पूरे सभागार में देशभक्ति, सांस्कृतिक गौरव और साहित्यिक आत्मीयता का वातावरण निर्मित हो गया। इसके बाद अतिथियों का पारंपरिक स्वागत किया गया और सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत हुई।
समारोह की अध्यक्षता हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शंकर कुमार सान्याल ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि साहित्य समाज की आत्मा है और जब तक भाषा तथा साहित्य जीवित रहेंगे, तब तक किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहेगी। उन्होंने संस्था की दीर्घकालीन साहित्यिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज वर्षों से साहित्य, संस्कृत भाषा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।
उपाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रत्ना बसु ने सम्मेलन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में साहित्य का दायित्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में जहाँ त्वरित संचार ने संवाद के नए माध्यम बनाए हैं, वहीं गंभीर अध्ययन और साहित्यिक विमर्श की परंपरा को जीवित रखना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने इस सम्मेलन को साहित्य और समाज के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच बताया।
संस्था के सचिव डॉ. देबब्रत मुखोपाध्याय ने सचिवीय प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने संस्था की विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों, प्रकाशनों, शोध परियोजनाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा सामाजिक पहलों का विस्तृत विवरण रखा। उन्होंने बताया कि संस्था केवल सम्मेलन आयोजित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी में साहित्यिक चेतना विकसित करने, संस्कृत एवं भारतीय भाषाओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करने और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत है।
समारोह के दौरान अधिवक्ता समीर बसु राय चौधरी ने राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष और प्रथम महिला श्रीमती मित्रा घोष का सम्मान किया। यह सम्मान केवल उनके संवैधानिक पद का नहीं था, बल्कि शिक्षा, संस्कृति और साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का भी सम्मान था। पूरे सभागार ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका अभिनंदन किया।
अपने प्रेरक संबोधन में राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष ने कहा कि साहित्य समाज को केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि उसे विचार, विवेक और संवेदना भी प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि जब समाज में संवाद कम होने लगता है, तब साहित्य ही मनुष्यता को बचाने का सबसे प्रभावी माध्यम बनता है। भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ज्ञान परंपरा रही है, जिसमें संस्कृत सहित अनेक भारतीय भाषाओं ने अमूल्य योगदान दिया है। इन भाषाओं और उनकी साहित्यिक विरासत का संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
उन्होंने विशेष रूप से युवाओं का आह्वान किया कि वे भारतीय भाषाओं, शास्त्रीय साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन में रुचि लें। उनका कहना था कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं, बल्कि परंपरा और नवाचार के बीच संतुलन स्थापित करना है। उन्होंने साहित्यिक संस्थाओं के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे सम्मेलन समाज में वैचारिक संवाद और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करते हैं।
राज्यपाल के व्यक्तित्व की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उनकी सहजता और आत्मीयता रही। उन्होंने केवल औपचारिक संबोधन देकर मंच नहीं छोड़ा, बल्कि अनेक साहित्यकारों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों से संवाद भी किया। उनकी विनम्रता और सौहार्दपूर्ण व्यवहार ने उपस्थित लोगों पर गहरी छाप छोड़ी। अनेक प्रतिभागियों ने अनुभव किया कि सार्वजनिक जीवन में उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों का इस प्रकार साहित्यिक आयोजनों में समय देना स्वयं साहित्य के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
प्रथम महिला श्रीमती मित्रा घोष की गरिमामयी उपस्थिति ने भी सम्मेलन की शोभा बढ़ाई। उन्होंने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया और प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया। उनकी उपस्थिति ने आयोजन में आत्मीयता और सौम्यता का विशेष वातावरण निर्मित किया।
सांस्कृतिक सत्र में साजेर बेला और उनके दल ने अपनी सुमधुर प्रस्तुतियों से पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। संगीत और साहित्य का यह सुंदर संगम सम्मेलन की आत्मा बन गया। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में संगीत और साहित्य सदैव एक-दूसरे के पूरक रहे हैं, और इस आयोजन में भी दोनों का यह समन्वय स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के सामूहिक गायन के साथ हुआ।
हावड़ा संस्कृत साहित्य समाज की कार्यकारिणी समिति ने भी सभी अतिथियों, साहित्यकारों, स्वयंसेवकों, समर्थकों तथा साहित्य और संस्कृति के असंख्य प्रेमियों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की। समिति ने विश्वास व्यक्त किया कि यह सम्मेलन आने वाले वर्षों में और अधिक व्यापक रूप लेगा तथा बंगाल सहित पूरे देश में साहित्यिक संवाद को नई दिशा देगा।
आज जब पढ़ने की आदतों में परिवर्तन आ रहा है, सोशल मीडिया त्वरित अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बन गया है और गहन साहित्यिक विमर्श के लिए समय लगातार सिमटता दिखाई देता है, ऐसे समय में इस प्रकार के सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि पुस्तकें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति भी हैं। साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं, संघर्षों, सपनों और भविष्य का दस्तावेज़ है।
निखिल बंग साहित्य सम्मेलन इसी विश्वास का उत्सव है कि भारतीय भाषाओं, संस्कृत साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं की धारा आज भी अविरल प्रवाहित है। यह आयोजन केवल दो दिनों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि साहित्य और संस्कृति के प्रति समाज की आस्था, प्रतिबद्धता और भविष्य के प्रति विश्वास का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आया। ऐसे सम्मेलन यह संदेश देते हैं कि जब तक शब्द जीवित हैं, तब तक समाज की आत्मा भी जीवित रहेगी; और जब तक साहित्य का दीप जलता रहेगा, तब तक संस्कृति की ज्योति भी कभी मंद नहीं पड़ेगी। (विभूति फीचर्स)

मानौरा: जहां पुरी से वचन निभाने आते हैं भगवान जगदीश

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(अंजनी सक्सेना – विभूति फीचर्स)

आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष द्वितीया। इस दिन पूरे देश में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का जयघोष गूंजता है। उड़ीसा की पुरी में जब लाखों भक्तों के कंधों पर भगवान का रथ आगे बढ़ता है, तब मध्यप्रदेश के विदिशा जिले का एक छोटा सा गांव मानौरा सांसें थामे एक चमत्कार की प्रतीक्षा करता है। यहां रथयात्रा तब तक शुरू नहीं होती जब तक पुरी में भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए थम न जाएं।
पिछले लगभग 200 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा मानौरा को देश के अन्य धामों से बिल्कुल अलग करती है। कहते हैं संचार के साधन न होने के बावजूद भी पूर्वजों को पता चल जाता था कि अब पुरी में रथ रुक गया है, अब भगवान मानौरा पधार रहे हैं।
स्वयंभू विग्रह और वचन की डोर

मानौरा में भगवान जगन्नाथ को जगदीश कहा जाता है। यहां भगवान जगदीश, बलभद्र और देवी सुभद्रा का 200 वर्ष पुराना मंदिर है। चंदन की बनी ये तीनों मूर्तियां स्वयंभू हैं। मान्यता है कि ये स्वयं प्रकट हुई थीं। यहां भी पुरी की तरह मीठे भात का भोग लगता है और वही विधि-विधान से पूजा होती है।
इस अनोखी परंपरा के पीछे एक भक्त की अटूट आस्था की कथा जुड़ी है। वर्षों पहले मानौरा के तरफदार मानिकचंद रघुवंशी और उनकी पत्नी पद्मावती निसंतान थे। जगदीश में उनकी गहरी श्रद्धा थी। संतान की कामना लेकर दोनों पति-पत्नी ने मानौरा से पुरी तक दंडवत यात्रा करने का संकल्प लिया। दुर्गम जंगलों और कांटों भरे रास्तों पर चलते-चलते जब उनका शरीर लहूलुहान हो गया, तब भगवान जगन्नाथ स्वयं प्रकट हुए। उन्होंने भक्तों को वापस मानौरा लौटने और हर वर्ष आषाढ़ दूज पर स्वयं दर्शन देने का वचन दिया। उसी समय मानौरा में तीनों विग्रह भी प्रकट हुए। तब से यह मान्यता है कि वचन निभाने के लिए भगवान पुरी से मानौरा आते हैं।
जब अपने आप खुलते हैं पट

रथयात्रा की पूर्व संध्या पर मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं लेकिन रथयात्रा वाले दिन सुबह पट अपने आप खुले मिलते हैं। जैसे ही भगवान को रथ में विराजमान किया जाता है, रथ में हल्का कंपन होता है या वह स्वयं लुढ़कने लगता है। ठीक उसी समय पुरी में पुजारी घोषणा करते हैं – “भगवान मानौरा पधार गए हैं।”
इस दिव्य क्षण को देखने मानौरा में हर साल लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। चारों ओर सिर्फ एक ही आवाज गूंजती है “जय जगदीश”। यहां मेहमानों का अभिवादन भी “जय जगदीश” से ही होता है।
कीचड़ में भीगी श्रद्धा

रथयात्रा के दिन मंदिर में अटका यानी मीठे भात का विशेष भोग लगाया जाता है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर यह भोग चढ़ाते हैं। सबसे अद्भुत दृश्य तब दिखता है जब आसपास के सैकड़ों गांवों से लोग कीचड़, पत्थरों और कंकड़ों से भरे रास्तों पर नंगे पैर या दंडवत करते हुए मानौरा पहुंचते हैं। उन्हें न भूख की परवाह होती है, न थकान की। उनकी आंखों में सिर्फ एक ही धुन होती है,भगवान जगदीश के दर्शन की।
पुरी के बाद मानौरा में निकलने वाली यह रथयात्रा सिर्फ एक उत्सव नहीं है। यह एक वचन की निरंतरता है, एक भरोसे की गवाही है कि आस्था के आगे समय और दूरी दोनों छोटे पड़ जाते हैं। जब तक पुरी में रथ रुकेगा, तब तक मानौरा में जगदीश का रथ चलता रहेगा। (विभूति फीचर्स)

चुनाव पर कॉकरोच जनता पार्टी ने भविष्य के विकल्प रखे खुले

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नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच उभरी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के चुनावी राजनीति में आने को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि संगठन ने अभी चुनाव लड़ने या राजनीतिक दल बनने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन नेतृत्व ने भविष्य के सभी विकल्प खुले होने के संकेत दिए हैं।

जंतर-मंतर पर आयोजित एक संवाद के दौरान सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके से जब चुनाव लड़ने को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने इसका जवाब अपने प्रवक्ताओं को देने के लिए कहा। प्रवक्ता विजेता दहिया ने कहा कि राजनीति लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन फिलहाल संगठन खुद को एक जनआंदोलन के रूप में देखता है। उनका कहना था कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से लगातार जवाब मांगना चाहिए।

प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि देश में पहले से सैकड़ों राजनीतिक दल मौजूद हैं, फिर भी लोग निराश हैं। उन्होंने कहा कि सीजेपी अभी एक आंदोलन है और चुनाव लड़ने को लेकर बार-बार पूछे जाने वाले सवालों पर ऐसा लगता है कि एक दिन मीडिया ही उसे राजनीतिक दल घोषित कर देगा।

वहीं प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा कि संगठन का उद्देश्य फिलहाल जनहित के मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही तय कराना है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनआंदोलन, सिविल सोसाइटी और प्रेशर ग्रुप की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भविष्य में संगठन किस दिशा में आगे बढ़ेगा, यह समय और परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाएगा।

सीजेपी की ओर से फिलहाल यह स्पष्ट किया गया है कि उसका मुख्य उद्देश्य युवाओं और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर जनआंदोलन को मजबूत करना है। चुनावी राजनीति में उतरने को लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

पीओके के रावलकोट में हिंसा, फायरिंग में 6 नागरिकों की मौत; भारत ने जताई कड़ी आपत्ति

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नई दिल्ली। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के रावलकोट क्षेत्र में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसा में छह नागरिकों की मौत होने की खबर है। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल बना हुआ है और स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, रावलकोट में प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों की फायरिंग में कई लोग घायल भी हुए हैं। मृतकों में स्थानीय नागरिकों के शामिल होने की बात कही जा रही है। घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। साथ ही इंटरनेट सेवाओं पर भी प्रतिबंध लगाए जाने की खबरें सामने आई हैं, जिससे लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क प्रभावित हुआ है।

इस बीच, पीओके से जुड़े कुछ संगठनों और प्रदर्शनकारियों ने मानवीय सहायता की मांग उठाई है। उनका कहना है कि क्षेत्र में हालात लगातार बिगड़ रहे हैं और आम नागरिकों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत है।

भारत ने इस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पीओके में नागरिकों के साथ हो रही घटनाएं वहां लंबे समय से जारी समस्याओं और कथित व्यवस्थित दमन को दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि वहां के लोगों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं।

रावलकोट की घटना के बाद पीओके की स्थिति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है। घटनाक्रम पर क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर नजर रखी जा रही है।