42.4 C
Lucknow
Thursday, June 25, 2026
Home Blog

विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने फूंकी चुनावी रणभेरी, पंकज चौधरी ने घोषित की 64 सदस्यीय टीम

0

पूर्व सपा विधायक पूजा पाल व राजनाथ सिंह के पुत्र नीरज सिंह को बड़ी जिम्मेदारी

लखनऊ। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने संगठन को नई धार देते हुए 64 सदस्यीय प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी द्वारा घोषित नई टीम में 19 उपाध्यक्ष, 8 महामंत्री, 19 मंत्री, 6 क्षेत्रीय अध्यक्ष, विभिन्न मोर्चों के अध्यक्ष और अन्य प्रमुख पदाधिकारी शामिल किए गए हैं। भाजपा ने इस टीम के जरिए सामाजिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास किया है।

नई कार्यकारिणी में सबसे अधिक चर्चा पूर्व समाजवादी पार्टी विधायक पूजा पाल और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र नीरज सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाए जाने की है। पूजा पाल लंबे समय तक समाजवादी पार्टी की राजनीति का प्रमुख चेहरा रही हैं, जबकि नीरज सिंह को संगठन में अहम जिम्मेदारी देकर भाजपा ने युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने का संकेत दिया है। इसके अलावा सुरेश राणा, सत्यपाल सैनी, मोहित बेनीवाल, प्रियंका रावत, दुर्विजय शाक्य, आलोक गुप्ता सहित 19 नेताओं को उपाध्यक्ष बनाया गया है। रामप्रताप सिंह चौहान, गीता शाक्य, अभिजात मिश्रा, उपेंद्र रावत, संजय राय, शंकर लोधी, दिलीप पटेल और राजेश चौधरी को महामंत्री की जिम्मेदारी मिली है।

भाजपा ने मोर्चा संगठनों में भी बड़े बदलाव किए हैं। रोहित मिश्रा को युवा मोर्चा, सरोज कुशवाह को महिला मोर्चा, देवेंद्र सिंह को किसान मोर्चा, प्रकाश पाल को पिछड़ा मोर्चा, अशोक रावत को अनुसूचित मोर्चा तथा विद्याभूषण गोंड को अनुसूचित जनजाति मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। पश्चिम क्षेत्र की कमान नवाब सिंह नागर, ब्रज क्षेत्र की पूरन लाल लोधी, कानपुर क्षेत्र की राम किशोर साहू, अवध क्षेत्र की अवधेश द्विवेदी, काशी क्षेत्र की अशोक चौरसिया और गोरखपुर क्षेत्र की विनोद राय को सौंपी गई है।

पंकज चौधरी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के छह महीने बाद घोषित यह टीम 2027 विधानसभा चुनाव में भाजपा की रणनीति को जमीन पर उतारने का काम करेगी। सदस्यता अभियान, बूथ प्रबंधन, जनसंपर्क कार्यक्रम और चुनावी तैयारियों की पूरी जिम्मेदारी अब इसी नई टीम के कंधों पर होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने इस कार्यकारिणी के जरिए चुनावी वर्ष से पहले संगठन को मजबूत करने और विभिन्न सामाजिक वर्गों को साधने का स्पष्ट संदेश दिया है।

हमने इतिहास से क्या सीखा, या केवल तारीखें याद रखीं

0

शरद कटियार
25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह दिन है, जिसे संविधान, सत्ता और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में हमेशा याद किया जाएगा। उस दिन आपातकाल लागू हुआ और देश ने लगभग 21 महीने तक ऐसा दौर देखा, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हुई, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर गंभीर बहस छिड़ गई।

आज, पांच दशक से अधिक समय बाद, जब हम उस दौर को याद करते हैं तो सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि उस समय कौन सत्ता में था। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमने उस इतिहास से कोई स्थायी सीख ली?

लोकतंत्र केवल मतदान की व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि सरकार जनता के प्रति जवाबदेह रहे, न्यायपालिका स्वतंत्र रहे, मीडिया निर्भीक होकर प्रश्न पूछ सके, विपक्ष अपनी भूमिका निभा सके और आम नागरिक बिना भय के अपनी बात कह सके। जब इनमें से किसी भी स्तंभ पर दबाव बढ़ता है या उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं, तब लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर चर्चा होना स्वाभाविक है।

आज देश में राजनीतिक बहसें अक्सर आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो जाती हैं। एक पक्ष दूसरे पर लोकतंत्र कमजोर करने का आरोप लगाता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक प्रचार बताता है। ऐसे माहौल में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं संविधान के अनुसार निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से काम करती रहें।

समय-समय पर भ्रष्टाचार, परीक्षा अनियमितताओं, प्रशासनिक लापरवाही, अवैध निर्माण, कानून-व्यवस्था और शासन से जुड़े अनेक मामले सामने आते हैं। साथ ही, कई मामलों में जांच, न्यायिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक कार्रवाई भी होती है। इसलिए किसी एक घटना या धारणा के आधार पर पूरे तंत्र का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र की मजबूती का आकलन व्यापक तथ्यों, संस्थाओं की कार्यप्रणाली और नागरिक अधिकारों की स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए।

इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि सत्ता किसी भी दल के पास हो, उसका मूल्यांकन संविधान और कानून की कसौटी पर होना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना भी आवश्यक है और उसकी उपलब्धियों का निष्पक्ष मूल्यांकन भी। दोनों में संतुलन ही स्वस्थ सार्वजनिक विमर्श की पहचान है।

आपातकाल की स्मृति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान की किताबों से नहीं होती। इसके लिए जागरूक नागरिक, जवाबदेह सरकार, स्वतंत्र संस्थाएं, सक्रिय विपक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता आवश्यक हैं। जब ये सभी अपने-अपने दायित्व निभाते हैं, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है।
आज भी सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि राजनीति सेवा का माध्यम बने, प्रशासन पारदर्शी हो, भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगे, न्याय समय पर मिले और जनता का विश्वास संस्थाओं में बना रहे। लोकतंत्र की असली शक्ति किसी एक नेता, दल या सरकार में नहीं, बल्कि संविधान और जनता के विश्वास में निहित होती है।
इतिहास को याद करने का उद्देश्य अतीत के विवादों को दोहराना नहीं, बल्कि भविष्य को बेहतर बनाना है। यदि आपातकाल की स्मृति हमें अधिक जवाबदेह शासन, अधिक स्वतंत्र संस्थाओं और अधिक जागरूक नागरिक समाज की ओर प्रेरित करती है, तभी उस इतिहास को याद करने का वास्तविक अर्थ पूरा होगा।

ब्रांड नहीं, व्यवस्था में बैठे गैर-जिम्मेदार लोग हैं असली दोषी

0

लखनऊ हादसे के बाद छात्रों की सुरक्षा पर बहस तेज, लेकिन क्या केवल संस्थान ही दोषी हैं या मानकों की निगरानी करने वाले लोग भी जवाबदेह हैं?

लेखक – अंकुश गौरव

लखनऊ में कोचिंग संस्थान में हुए अग्निकांड के बाद प्रदेशभर में बड़े-बड़े कोचिंग ब्रांडों पर कार्रवाई हो रही है। कई संस्थानों को सीज किया जा रहा है, जांच की जा रही है और सुरक्षा मानकों के पालन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। यह कार्रवाई आवश्यक भी है, क्योंकि छात्रों की सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठता है—क्या वास्तव में गलती केवल ब्रांड की है?
किसी भी बड़े कोचिंग संस्थान का ब्रांड करोड़ों रुपये खर्च करके अपना नाम, प्रतिष्ठा और इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करता है। संस्थान के शीर्ष स्तर पर सुरक्षा, भवन चयन, संचालन और मानकों के अनुपालन के लिए अलग-अलग अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। क्षेत्रीय निदेशक (रीजनल डाॅयरेक्टर), क्षेत्रीय संचालन प्रबंधक (रीजनल आपरेशन्स मैनेजर) और अन्य प्रशासनिक अधिकारी इसी उद्देश्य से होते हैं कि प्रत्येक केंद्र निर्धारित मानकों के अनुसार संचालित हो।
समस्या तब शुरू होती है जब कुछ लोग अपने पद की जिम्मेदारियों को भूलकर व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता देने लगते हैं। भवन चयन से लेकर संचालन तक कई निर्णय ऐसे लोगों के हाथ में होते हैं। यदि कोई अधिकारी केवल लागत कम करने, व्यक्तिगत लाभ लेने या सुविधा के आधार पर स्थान का चयन करता है, तो सुरक्षा मानक पीछे छूट जाते हैं।
कई बार ऐसी इमारतें चुनी जाती हैं जहां पर्याप्त आपातकालीन निकास, चौड़ी सीढ़ियां, फायर सेफ्टी व्यवस्था या अन्य आवश्यक सुविधाएं विकसित करना कठिन होता है। शुरुआत में यह निर्णय लागत बचत या अन्य कारणों से सही लग सकता है, लेकिन बाद में यही निर्णय छात्रों की सुरक्षा के लिए खतरा बन जाता है।
दुर्भाग्य यह है कि जब ऐसी कमियां सामने आती हैं तो पूरा दोष संस्थान के ब्रांड पर आता है। कार्रवाई होती है, कोचिंग सेंटर सीज होते हैं, हजारों छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है, अभिभावक परेशान होते हैं और वर्षों से बनाई गई प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है। जबकि कई मामलों में वास्तविक जिम्मेदारी उन लोगों की भी होती है जिन्होंने समय रहते अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया।
यह लेख किसी विशेष संस्था या व्यक्ति पर आरोप नहीं है, बल्कि एक व्यापक व्यवस्था की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास है। यदि सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना है तो केवल संस्थानों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं होगा। उन अधिकारियों और प्रबंधकीय स्तर के लोगों की जवाबदेही भी तय करनी होगी जिनके निर्णयों के कारण ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं।
छात्रों की सुरक्षा सर्वोपरि है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि ब्रांड, प्रशासन और प्रबंधन—सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करें। तभी शिक्षा संस्थान वास्तव में सुरक्षित बन सकेंगे और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकेगा।

वैश्विक शब्दावली संकट: प्रतिदिन सैकड़ों शब्द खो जाते हैं

0

डॉ विजय गर्ग
मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक भाषा है। भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, इतिहास, ज्ञान, परंपराओं और सामूहिक स्मृति का भंडार भी है। किंतु आज दुनिया एक ऐसे संकट का सामना कर रही है, जिस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह संकट है—वैश्विक शब्दावली का लगातार सिकुड़ना। भाषाविदों के अनुसार दुनिया भर में प्रतिदिन सैकड़ों शब्द उपयोग से बाहर हो जाते हैं और धीरे-धीरे हमेशा के लिए लुप्त हो जाते हैं।

यह केवल शब्दों का नुकसान नहीं है, बल्कि उन विचारों, अनुभवों और सांस्कृतिक धरोहरों का भी नुकसान है जो इन शब्दों में समाहित होती हैं।

भाषाओं के विलुप्त होने का बढ़ता खतरा

वर्तमान में विश्व में लगभग 7,000 भाषाएँ बोली जाती हैं। किंतु अनेक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि इनमें से लगभग आधी भाषाएँ इस शताब्दी के अंत तक समाप्त हो सकती हैं। जब कोई भाषा मरती है, तो उसके साथ हजारों विशिष्ट शब्द, मुहावरे, लोककथाएँ और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ भी समाप्त हो जाती हैं।

कई आदिवासी और स्थानीय भाषाओं में ऐसे शब्द मौजूद हैं जिनका अन्य भाषाओं में कोई सटीक अनुवाद नहीं है। ये शब्द स्थानीय प्रकृति, मौसम, सामाजिक संबंधों और जीवन-शैली से जुड़े विशिष्ट अनुभवों को व्यक्त करते हैं। भाषा के समाप्त होने के साथ ये अनुभव भी इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं।

शब्द क्यों खो रहे हैं?

1. वैश्वीकरण का प्रभाव

आज अंग्रेज़ी, मंदारिन, स्पेनिश और हिंदी जैसी बड़ी भाषाओं का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। शिक्षा, व्यापार और रोजगार के अवसरों के लिए लोग इन्हीं भाषाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। परिणामस्वरूप छोटी भाषाएँ और उनकी शब्दावली धीरे-धीरे हाशिए पर चली जाती हैं।

2. शहरीकरण और पलायन

गाँवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन स्थानीय बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं को कमजोर कर रहा है। नई पीढ़ी अक्सर अपने पूर्वजों की भाषा नहीं सीखती, जिससे अनेक शब्द उपयोग से बाहर हो जाते हैं।

3. डिजिटल युग की चुनौतियाँ

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने संचार को आसान बनाया है, लेकिन इन मंचों पर कुछ चुनिंदा भाषाओं का प्रभुत्व है। जिन भाषाओं की डिजिटल उपस्थिति कम है, उनकी शब्दावली नई पीढ़ी तक नहीं पहुँच पाती।

4. बदलती जीवनशैली

समय के साथ अनेक पारंपरिक व्यवसाय, उपकरण और सामाजिक प्रथाएँ समाप्त हो रही हैं। इनके साथ जुड़े शब्द भी धीरे-धीरे लोगों की स्मृति से मिट रहे हैं। आज के युवाओं को ऐसे अनेक शब्दों का अर्थ भी ज्ञात नहीं है जो कुछ दशक पहले सामान्य बोलचाल का हिस्सा थे।

शब्दों के साथ क्या खो जाता है?

हर शब्द एक विचार, एक अनुभव और एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। कुछ भाषाओं में प्रकृति के सूक्ष्म परिवर्तनों के लिए विशेष शब्द होते हैं। कुछ में रिश्तों की जटिलताओं को व्यक्त करने वाले शब्द मिलते हैं। कुछ शब्द स्थानीय ज्ञान और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को संरक्षित रखते हैं।

जब कोई शब्द खो जाता है, तो केवल उसका उच्चारण या अर्थ नहीं मिटता, बल्कि मानव अनुभव का एक अनूठा पहलू भी समाप्त हो जाता है।

भाषा और सांस्कृतिक पहचान

भाषा किसी भी समाज की आत्मा होती है। लोकगीत, कहावतें, मुहावरे, लोककथाएँ और पारंपरिक ज्ञान भाषा के माध्यम से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। यदि भाषा कमजोर होती है, तो सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर पड़ने लगती है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है। यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। प्रत्येक भाषा अपने भीतर एक अलग सांस्कृतिक संसार समेटे हुए है। इनका संरक्षण केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आवश्यकता भी है।

संरक्षण के प्रयास

सौभाग्य से दुनिया भर में कई संगठन और समुदाय संकटग्रस्त भाषाओं को बचाने के लिए कार्य कर रहे हैं। डिजिटल शब्दकोश बनाए जा रहे हैं, लोक साहित्य का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है और बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा देने के प्रयास किए जा रहे हैं।

हम भी कुछ सरल कदम उठा सकते हैं—

– घर में मातृभाषा का प्रयोग बढ़ाएँ।
– स्थानीय बोलियों और लोक साहित्य को प्रोत्साहित करें।
– बच्चों को अपनी भाषाई विरासत से परिचित कराएँ।
– डिजिटल माध्यमों पर स्थानीय भाषाओं में सामग्री तैयार करें।
– विलुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण अभियानों का समर्थन करें।

निष्कर्ष

वैश्विक शब्दावली संकट केवल भाषाविदों की चिंता नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की चिंता है। प्रतिदिन खोते सैकड़ों शब्द हमें यह याद दिलाते हैं कि हमारी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता कितनी नाजुक है।

यदि हम अपनी भाषाओं और शब्दों को संरक्षित नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल शब्द ही नहीं, बल्कि ज्ञान, परंपराएँ, लोक स्मृतियाँ और अपनी सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी खो देंगी। प्रत्येक बचाया गया शब्द मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं; वे मानव अनुभवों का जीवंत संग्रहालय हैं। इन्हें बचाना हमारी साझा जिम्मेदारी है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

स्वाद मस्तिष्क से शुरू होता है, जीभ से नहीं

0

डॉ विजय गर्ग
(जीभ से पहले दिमाग को होता है स्वाद का अहसास)

(स्वाद की असली प्रयोगशाला हमारा मस्तिष्क है)

जब आपके सामने गर्मागर्म समोसे की प्लेट आती है, ताज़ी जलेबी की मिठास हवा में घुलती है या किसी रेस्तरां से आती पिज़्ज़ा की सुगंध आपके नथुनों तक पहुँचती है, तो क्या आपने कभी सोचा है कि स्वाद का अनुभव वास्तव में कहाँ शुरू होता है? अधिकांश लोग मानते हैं कि स्वाद का संबंध केवल जीभ से है, लेकिन आधुनिक न्यूरोसाइंस और खाद्य विज्ञान एक अलग कहानी बताते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, भोजन का स्वाद जीभ पर पहुँचने से पहले ही हमारे दिमाग में बनना शुरू हो जाता है।

दरअसल, स्वाद केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मस्तिष्क, स्मृतियों, भावनाओं, गंध, दृष्टि और अनुभवों का संयुक्त परिणाम है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि हम भोजन को पहले दिमाग से चखते हैं और बाद में जीभ से।
स्वाद की पारंपरिक समझ और नई वैज्ञानिक सोच
सदियों तक यह माना जाता रहा कि जीभ ही स्वाद की मुख्य और लगभग एकमात्र पहचानकर्ता है। जीभ पर मौजूद स्वाद कलिकाएँ भोजन में मौजूद रासायनिक तत्वों को पहचानती हैं और उन्हें तंत्रिका संकेतों के रूप में मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं।

जीभ पाँच प्रमुख स्वादों को पहचान सकती है—
– मीठा
– नमकीन
– खट्टा
– कड़वा
– उमामी
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि ये स्वाद केवल संकेत हैं। उनका अर्थ निकालना, उन्हें सुखद या अप्रिय मानना और उनके आधार पर प्रतिक्रिया देना मस्तिष्क का काम है।

यदि मस्तिष्क इन संकेतों को ग्रहण न करे, तो स्वाद का पूरा अनुभव समाप्त हो सकता है। अर्थात स्वाद का अंतिम निर्णय जीभ नहीं, दिमाग करता है।

भोजन को पहले आँखें चखती हैं

कभी गौर किया है कि सुंदर ढंग से सजाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट लगता है? इसका कारण केवल उसकी गुणवत्ता नहीं बल्कि हमारी दृश्य प्रणाली है।

जब हम किसी भोजन को देखते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसके रंग, आकार, बनावट और प्रस्तुति के आधार पर पहले ही अनुमान लगा लेता है कि उसका स्वाद कैसा होगा। यही कारण है कि सुनहरे रंग की कुरकुरी कचौड़ी या चमकदार मिठाई हमें अधिक आकर्षित करती है।

वैज्ञानिक प्रयोगों में पाया गया है कि यदि एक ही पेय को अलग-अलग रंगों में प्रस्तुत किया जाए, तो लोग उसके स्वाद को अलग-अलग बताते हैं। लाल रंग का पेय अधिक मीठा महसूस होता है जबकि हरे रंग का पेय अपेक्षाकृत खट्टा प्रतीत हो सकता है।

इस प्रकार स्वाद का पहला अध्याय आँखों से शुरू होता है।

गंध: स्वाद की सबसे शक्तिशाली साथी

यदि किसी व्यक्ति की नाक बंद हो जाए, तो अधिकांश भोजन बेस्वाद लगने लगता है। इसका कारण यह है कि हम जो स्वाद महसूस करते हैं, उसका बड़ा हिस्सा वास्तव में गंध से आता है।

जब भोजन चबाया जाता है, तो उससे निकलने वाले सुगंधित अणु नाक तक पहुँचते हैं। वहाँ मौजूद रिसेप्टर्स उन्हें पहचानकर मस्तिष्क को संकेत भेजते हैं। मस्तिष्क इन संकेतों को जीभ से प्राप्त स्वाद संकेतों के साथ जोड़कर एक संपूर्ण “फ्लेवर” तैयार करता है।

यही कारण है कि चाय, कॉफी, आम, इलायची, पुदीना या ताज़े मसालों की सुगंध हमें भोजन का आनंद कई गुना बढ़ा देती है।

कोविड-19 महामारी के दौरान लाखों लोगों ने स्वाद और गंध खोने का अनुभव किया। उस समय वैज्ञानिकों और आम लोगों को स्पष्ट रूप से समझ आया कि स्वाद वास्तव में केवल जीभ का नहीं, बल्कि गंध और मस्तिष्क का भी खेल है।

स्मृतियाँ भी बदल देती हैं स्वाद

क्या आपने कभी महसूस किया है कि बचपन में खाई गई दादी की बनाई खीर आज भी किसी पाँच सितारा होटल की मिठाई से अधिक स्वादिष्ट लगती है?

इसका कारण केवल उसकी सामग्री नहीं, बल्कि उससे जुड़ी भावनात्मक स्मृतियाँ हैं।

हमारा मस्तिष्क भोजन को अनुभवों और भावनाओं के साथ जोड़ता है। जब कोई भोजन हमें किसी सुखद स्मृति की याद दिलाता है, तो उसका स्वाद अधिक अच्छा महसूस होता है।

इसी प्रकार किसी बीमारी के दौरान खाया गया भोजन बाद में कम पसंद आ सकता है क्योंकि मस्तिष्क उसे नकारात्मक अनुभव से जोड़ लेता है।

स्वाद इसलिए केवल भोजन में नहीं, हमारी यादों में भी बसता है।

भावनाएँ और मनोदशा भी तय करती हैं स्वाद

मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि हमारी मानसिक स्थिति भोजन के स्वाद को प्रभावित करती है।

जब व्यक्ति प्रसन्न होता है, तो सामान्य भोजन भी अधिक स्वादिष्ट लगता है। इसके विपरीत तनाव, चिंता, अवसाद या क्रोध की स्थिति में पसंदीदा भोजन भी आकर्षक नहीं लगता।

यही कारण है कि कुछ लोग तनाव के समय अधिक मीठा खाते हैं, जबकि कुछ लोगों की भूख ही समाप्त हो जाती है।

दिमाग भोजन को केवल रासायनिक पदार्थों के रूप में नहीं, बल्कि भावनात्मक अनुभव के रूप में भी ग्रहण करता है।

स्वाद और मस्तिष्क का वैज्ञानिक तंत्र

जब भोजन जीभ पर पहुँचता है, तो स्वाद कलिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं। ये कलिकाएँ तंत्रिकाओं के माध्यम से संकेतों को मस्तिष्क के विभिन्न भागों तक भेजती हैं।

मस्तिष्क का एक विशेष क्षेत्र, जिसे गस्टेटरी कॉर्टेक्स कहा जाता है, स्वाद संबंधी जानकारी को संसाधित करता है। इसके साथ ही अन्य क्षेत्र गंध, तापमान, बनावट, स्मृति और भावनाओं की जानकारी जोड़ते हैं।

इन सभी सूचनाओं को मिलाकर मस्तिष्क एक अंतिम अनुभव तैयार करता है, जिसे हम “स्वाद” कहते हैं।

इस दृष्टि से स्वाद वास्तव में एक मानसिक निर्माण है।

क्यों पसंद आते हैं कुछ स्वाद?

मानव विकास के दौरान मस्तिष्क ने कुछ स्वादों के प्रति विशेष प्रतिक्रियाएँ विकसित की हैं।

मीठा स्वाद ऊर्जा का संकेत देता था, इसलिए मनुष्य स्वाभाविक रूप से उसे पसंद करता है।

कड़वा स्वाद कई बार विषैले पदार्थों से जुड़ा होता था, इसलिए उसके प्रति सावधानी विकसित हुई।

नमकीन स्वाद शरीर के लिए आवश्यक खनिजों का संकेत देता था।
खट्टा स्वाद भोजन की ताजगी या खराब होने की स्थिति का संकेत दे सकता था।

इस प्रकार स्वाद की हमारी पसंद केवल संस्कृति नहीं, बल्कि लाखों वर्षों के विकास का परिणाम भी है।
भोजन उद्योग कैसे प्रभावित करता है हमारे दिमाग को?

आधुनिक खाद्य उद्योग इस तथ्य को भली-भाँति समझता है कि स्वाद दिमाग में पैदा होता है।

इसी कारण कंपनियाँ आकर्षक पैकेजिंग, रंग, विज्ञापन, संगीत और सुगंध का उपयोग करती हैं। सुपरमार्केट में ताज़ी ब्रेड की खुशबू, फास्ट फूड के चमकदार विज्ञापन और सुंदर पैकेजिंग हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।

अक्सर हम उत्पाद का वास्तविक स्वाद लेने से पहले ही उसके बारे में सकारात्मक धारणा बना लेते हैं।

क्या भविष्य में दिमाग से नियंत्रित होगा स्वाद?

वैज्ञानिक ऐसे उपकरणों और तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो बिना वास्तविक भोजन के भी स्वाद का अनुभव उत्पन्न कर सकें। वर्चुअल रियलिटी और न्यूरोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं जिनमें विद्युत संकेतों के माध्यम से मस्तिष्क को स्वाद का अनुभव कराया जा सकता है।

यदि ये तकनीकें सफल होती हैं, तो भविष्य में लोग कम कैलोरी वाले भोजन को भी अधिक स्वादिष्ट महसूस कर सकते हैं या विशेष चिकित्सा स्थितियों में स्वाद की कमी को दूर किया जा सकेगा।
स्वाद का अनुभव हमारी कल्पना से कहीं अधिक जटिल और अद्भुत है। जीभ स्वाद की शुरुआत अवश्य करती है, लेकिन उसकी व्याख्या, उसका आनंद और उससे जुड़ी भावनाएँ मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। भोजन का रंग, गंध, स्मृतियाँ, भावनाएँ और वातावरण—सारे मिलकर स्वाद का निर्माण करते हैं।
अगली बार जब आप अपने पसंदीदा भोजन का आनंद लें, तो याद रखिए कि वह केवल आपकी जीभ को नहीं, बल्कि आपके पूरे मस्तिष्क को संतुष्ट कर रहा है। सच तो यह है कि स्वाद का पहला निवाला जीभ नहीं, दिमाग लेता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

अमेरिकी नागरिकता लेना होगा महंगा, ट्रंप प्रशासन का नया प्रस्ताव

0

 

वॉशिंगटन। अमेरिका में बसने और नागरिकता हासिल करने की तैयारी कर रहे भारतीयों समेत लाखों प्रवासियों को बड़ा झटका लग सकता है। ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने अमेरिकी नागरिकता के लिए आवेदन शुल्क में 75 से 80 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव जारी किया है।

प्रस्ताव के अनुसार, नागरिकता के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह के आवेदन पहले की तुलना में काफी महंगे हो जाएंगे। इसके साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर आवेदकों को मिलने वाली फीस माफी और रियायती शुल्क की सुविधा भी समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया है।
इस फैसले का सबसे अधिक असर भारतीय समुदाय पर पड़ने की संभावना है। अमेरिका में नागरिकता प्राप्त करने वाले लोगों में भारतीय दूसरा सबसे बड़ा समूह हैं। ऐसे में हजारों भारतीय ग्रीन कार्ड धारकों को अब अमेरिकी नागरिकता के लिए पहले से कहीं अधिक खर्च करना पड़ सकता है।
हालांकि, यह फिलहाल एक प्रस्ताव है। इसे लागू करने से पहले सार्वजनिक सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी। प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
यदि यह प्रस्ताव मंजूर हो जाता है, तो अमेरिकी नागरिक बनने की राह पहले से अधिक महंगी और चुनौतीपूर्ण हो जाएगी।