27 C
Lucknow
Monday, May 4, 2026
Home Blog

रायबरेली: सरेआम युवक पर लाठी और कुल्हाड़ी से हमला, अस्पताल में लड़ रहा जिंदगी के लिए जंग

0

रायबरेली: उत्तर प्रदेश के रायबरेली (Raebareli) जिले के लालगंज कोतवाली (Lalganj Kotwali) क्षेत्र में युवक पर हुए जानलेवा हमले के बाद पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। आदर्श नगर निवासी एक महिला ने आरोप लगाया है कि उसके भाई पर कुछ लोगों ने लाठी और कुल्हाड़ी से हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया।

परिजनों का कहना है कि घटना से पहले आरोपियों द्वारा युवक से पैसे की मांग की जा रही थी। सूचना देने के बावजूद समय पर कार्रवाई न होने का आरोप लगाया गया है। घायल युवक को पहले सीएचसी लालगंज ले जाया गया, जहां हालत गंभीर होने पर उसे जिला अस्पताल रेफर किया गया, जहां उसका उपचार जारी है।

घटना के बाद परिजन घायल युवक को लेकर रायबरेली पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे और कार्रवाई की मांग की। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है।

 

कुशीनगर में राजकीय नर्सिंग कॉलेज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त

0

 

योगी सरकार की कैबिनेट बैठक में मेडिकल कॉलेज के बगल में निशुल्क भूमि हस्तांतरण को मंजूरी

केंद्रीय सहायतित योजना के तहत राज्य को आवंटित 27 नर्सिंग कॉलेजों में एक कुशीनगर में भी

लखनऊ/कुशीनगर, 4 मई। तथागत बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर में राजकीय नर्सिंग कॉलेज की स्थापना का मार्ग सोमवार को प्रशस्त हो गया। योगी सरकार की कैबिनेट बैठक में नर्सिंग कॉलेज की स्थापना के लिए कुशीनगर के मेडिकल कॉलेज (स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय) के बगल में स्थित सीलिंग भूमि में से 0.405 हेक्टेयर भूमि चिकित्सा शिक्षा विभाग को निशुल्क हस्तांतरित करने को मंजूरी मिल गई है।

केंद्र सहायतित योजना के तहत भारत सरकार ने प्रदेश को 27 नर्सिंग कॉलेज आवंटित किए हैं। इन नर्सिंग कॉलेजों में जनपद कुशीनगर भी शामिल है। केंद्र सरकार की तरफ से प्रति नर्सिंग कॉलेज की लागत 10 करोड़ रुपये निर्धारित की गई है। इसमें 60 प्रतिशत केंद्र का अंश होगा जबकि 40 प्रतिशत राज्यांश है।

कुशीनगर में राजकीय नर्सिंग कॉलेज की स्थापना के लिए पडरौना तहसील के मौजा रामपुर में स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय (मेडिकल कॉलेज) के बगल में 1.054 हेक्टेयर सीलिंग भूमि में से 0.405 हेक्टेयर भूमि का निशुल्क हस्तांतरण होना था। यह भूमि पडरौना-कुबेरस्थान मुख्य मार्ग से 500 मीटर दक्षिण में स्थित है। राजकीय नर्सिंग कॉलेज को निशुल्क भूमि हस्तांतरण के लिए प्रदेश कैबिनेट ने सोमवार को मंजूरी दे दी। कुशीनगर मेडिकल कॉलेज में राजकीय नर्सिंग कॉलेज की स्थापना से उच्च स्तरीय चिकित्सा में सहायता तो मिलेगी ही, स्थानीय स्तर पर रोजगार का भी सृजन होगा।

​बंगाल की राजनीति में भाजपा का उदय: संघर्ष, संकल्प और वैचारिकता का एक दशक

0

(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)
​बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का पिछला दशक किसी महाकाव्य से कम नहीं है। यह एक ऐसी यात्रा रही है जिसने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया। 2014 से पहले बंगाल में भाजपा की स्थिति एक हाशिए पर खड़े दल जैसी थी, लेकिन पिछले दस वर्षों में नरेंद्र मोदी का करिश्मा, अमित शाह की रणनीति और स्थानीय नेतृत्व के संघर्ष ने राज्य का भूगोल और इतिहास दोनों बदल दिए हैं।
​2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने बंगाल के लोगों को एक नई उम्मीद दी। उस समय मोदी जी की रैलियों में उमड़े जनसैलाब ने यह स्पष्ट कर दिया कि बंगाल की जनता दशकों के वामपंथी शासन और फिर तृणमूल के शुरुआती वर्षों के बाद एक सशक्त राष्ट्रीय विकल्प की तलाश में है। पार्टी का वोट प्रतिशत अचानक एकल अंक से बढ़कर सत्रह प्रतिशत तक पहुंच गया, जिसने राज्य की सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी।
​2014 से 2019 के बीच का समय भाजपा के लिए सबसे कठिन ‘ग्राउंड वर्क’ का काल था। इस दौरान तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बंगाल को पार्टी के विस्तार का केंद्र बनाया। शाह की ‘विस्तारक’ योजना के तहत संगठन को गांव-गांव और बूथ स्तर तक पहुँचाया गया। उन्होंने न केवल चुनावी रणनीति तैयार की, बल्कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत को पुनर्जीवित कर इसे ‘बंगाली अस्मिता’ से जोड़ दिया। यह वह दौर था जब भाजपा ने बंगाल की माटी के साथ अपना भावनात्मक जुड़ाव बनाना शुरू किया।
​इस कठिन मार्ग में हिंसा एक बड़ी बाधा बनी। राज्य के विभिन्न हिस्सों में कार्यकर्ताओं की हत्याएं और झड़पें आम हो गई। ऐसे समय में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में दिलीप घोष ने मोर्चा संभाला। उनके निडर और आक्रामक नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं के मनोबल को टूटने नहीं दिया। दिलीप घोष ने खुद पर हुए हमलों की परवाह किए बिना ग्रामीण बंगाल के उन क्षेत्रों में पार्टी का झंडा गाड़ा जहाँ पहले जाना भी असंभव माना जाता था। उनकी जमीनी पकड़ ने भाजपा को ‘भद्रलोक’ की पार्टी के ठप्पे से निकालकर आम जनमानस की पार्टी बना दिया।
​2019 के लोकसभा चुनावों ने बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया। 18 सीटों पर जीत और 40% से अधिक वोट शेयर ने ममता बनर्जी के ‘अजेय’ होने के भ्रम को तोड़ दिया। इसके बाद, 2021 के चुनावों से ठीक पहले शुभेंदु अधिकारी का भाजपा में शामिल होना एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ। शुभेंदु ने न केवल तृणमूल के संगठनात्मक ढांचे को चोट पहुँचाई, बल्कि नंदीग्राम की ऐतिहासिक रणभूमि में स्वयं मुख्यमंत्री को पराजित कर भाजपा की शक्ति का लोहा मनवाया।
​2021 के विधानसभा चुनाव भले ही भाजपा को सत्ता तक न ले जा सके हों, लेकिन 3 विधायकों से 77 विधायकों तक का सफर भाजपा के संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। इसके बाद के वर्षों में, विशेषकर 2024 और अब 2026 के दौर में, भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में विधानसभा के भीतर और बाहर एक प्रखर विपक्ष की भूमिका निभाई । संदेशखाली जैसी घटनाओं के बाद पैदा हुआ जन आक्रोश और महिला सुरक्षा व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर शुभेंदु की आक्रामक घेराबंदी ने सरकार को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया है।
​ ​आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो भाजपा का यह 10 साल का संघर्ष इसलिए रंग लाया क्योंकि उसने बंगाल की बदलती नब्ज को पहचाना। नरेंद्र मोदी का विकासवाद, अमित शाह का संगठनात्मक कौशल, दिलीप घोष का जमीनी संघर्ष और शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक मारक क्षमता,इन सबने मिलकर बंगाल में एक ऐसा वैचारिक प्रतिस्थापन किया है जहाँ ‘लाल’ और ‘हरे’ के बीच ‘भगवा’ ने अपनी स्थाई जगह बना ली है।
​अब बंगाल की राजनीति पूरी तरह से द्वि-ध्रुवीय हो चुकी है। भाजपा आज केवल एक विकल्प नहीं है, बल्कि भविष्य की संभावित सरकार के रूप में बंगाल की जनता की चेतना और आकांक्षाओं का केंद्र बन चुकी है। (विनायक फीचर्स)

बंगाल में भाजपा की जीत पर मनाई खुशी, छुड़ाई आतिशबाजी

0

फर्रुखाबाद । सोमवार को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम के दिन पश्चिम बंगाल एवं असम में भारतीय जनता पार्टी एवं पांडिचेरी में भाजपा गठबंधन की ऐतिहासिक जीत के अवसर पर जिला अध्यक्ष फतेहचंद वर्मा के नेतृत्व में भाजपा पदाधिकारी व कार्यकर्ता आवास विकास तिराए पर जीत का हर्ष व्यक्त करने एकत्रित हुए भाजपा जिला अध्यक्ष फतेह चंद्र वर्मा के नेतृत्व में सांसद मुकेश राजपूत,अमृतपुर विधायक सुशील कुमार शाक्य पूर्व जिला अध्यक्ष सत्यपाल सिंह पूर्व जिला अध्यक्ष दिनेश कटियार पूर्व जिला अध्यक्ष डॉ भूदेव सिंह एवं एकत्रित कार्यकर्ताओं ने नरेंद्र मोदी जिंदाबाद अमित शाह जिंदाबाद एवं भाजपा जिंदाबाद के नारे लगाए ।
इस दौरान कार्यकर्ताओं ने आतिशबाजी छुड़ाई और मिष्ठान वितरण व झालमुढी वितरित की।भाजपा जिला अध्यक्ष फतेहचंद वर्मा ने कहा पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम के नतीजे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल की जनता ममता बनर्जी के कुशासन और भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी थी। ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति को वहां की जनता ने सिरे से खारिज दिया। भाजपा ने 2016 के विधानसभा चुनाव में मात्र तीन सीट 2021 के चुनाव में 77 सीट और 2026 के चुनाव में करीब 200 सीटों पर जीत हासिल करते हुए प्रचंड बहुमत की सरकार बनाने जा रही है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुशासन और विकास की जीत है।
सांसद मुकेश राजपूत ने कहा भाजपा अपनी विचारधारा और सिद्धांतों से कभी भटकती नहीं है जिसके परिणाम स्वरूप लंबे समय तक संघर्ष करने के बाद भारतीय जनता पार्टी बंगाल के अंदर सरकार बनाने जा रही है विकास व सुशासन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता ने बंगाल की जनता का दिल जीत लिया परिणाम स्वरूप भारतीय जनता पार्टी दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आ गई है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा तीसरी बार लगातार सरकार बनाएगी।
इस कार्यक्रम के अवसर पर अमरदीप दीक्षित जिला महामंत्री हिमांशु गुप्ता पूर्व जिला महामंत्री डीएस राठौर जिला उपाध्यक्ष जितेंद्र सिंह जिला कोषाध्यक्ष संजीव गुप्ता मुकेश गुप्ता कुलदीप पाल विकास पांडे पूर्व सभासद प्रबल त्रिपाठी अंकित गुप्ता जिला मीडिया प्रभारी शिवांग रस्तोगी मयंक गुप्ता अमन अवस्थी अतुल सिंह चौहान डॉ उदय प्रताप सिंह नितिन प्रताप सिंह प्रांजल अग्निहोत्री पीयूष त्रिपाठी कृष्ण मुरारी राजपूत देवेंद्र परमार सभासद सुनील तिवारी शिवम दुबे अभिषेक बाजपेई ब्लॉक प्रमुख पल्लव सोमवंशी आदि लोग मौजूद रहे।

‘रणनीति बनाम सत्ता’ अमित शाह की चुनावी बिसात ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी?

0

शरद कटियार

भारतीय राजनीति में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब चुनावी परिणाम केवल सत्ता परिवर्तन नहीं होते, बल्कि वे पूरे राजनीतिक तंत्र की दिशा और दशा बदल देते हैं। हालिया चुनावी परिदृश्य में जो तस्वीर उभरी है, उसने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया है कि राजनीति केवल लोकप्रियता का खेल नहीं, बल्कि गहरी रणनीति, संगठन और समय पर लिए गए फैसलों का परिणाम होती है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं,अमित शाह ।

अमित शाह को लंबे समय से भारतीय राजनीति का “चाणक्य” कहा जाता रहा है, लेकिन यह उपाधि केवल विशेषण नहीं, बल्कि उनकी कार्यशैली का प्रतिबिंब बन चुकी है। पश्चिम बंगाल, असम, पुडुचेरी और तमिलनाडु जैसे विविध राजनीतिक और सांस्कृतिक राज्यों में भाजपा की बढ़ती पकड़ यह संकेत देती है कि पार्टी ने केवल चुनाव नहीं लड़े, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक परियोजना को जमीन पर उतारा।

सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल को लेकर है, जहां ममता बनर्जी की सत्ता को चुनौती देना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं था। लगभग डेढ़ दशक से अधिक समय तक एक मजबूत जनाधार और आक्रामक राजनीतिक शैली के साथ ममता बनर्जी ने राज्य की राजनीति पर नियंत्रण बनाए रखा। लेकिन इस बार चुनावी नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सत्ता कितनी भी मजबूत क्यों न हो, अगर जनता के बीच असंतोष की परतें बनती हैं, तो बदलाव अवश्यंभावी हो जाता है।

यहां सवाल यह नहीं है कि भाजपा जीती या तृणमूल हारी। असली सवाल यह है कि भाजपा ने वह किया कैसे, जो पहले असंभव माना जाता था। इसका उत्तर अमित शाह की रणनीति में छिपा है। उन्होंने राजनीति को केवल भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे एक संगठित, डेटा-आधारित और लक्ष्य केंद्रित अभियान में बदल दिया।
बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की तैनाती, हर मतदाता वर्ग के लिए अलग रणनीति, और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने की कला यह सब किसी एक चुनाव का प्रयोग नहीं, बल्कि वर्षों की तैयारी का परिणाम है। अमित शाह ने यह समझ लिया था कि आज की राजनीति में केवल विचारधारा पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे जमीन पर उतारने के लिए मजबूत संगठन और सटीक प्रबंधन जरूरी है।

असम और पुडुचेरी के नतीजे भी इसी रणनीति की पुष्टि करते हैं। असम में भाजपा ने अपनी पकड़ को और मजबूत किया, जबकि पुडुचेरी में गठबंधन के जरिए सत्ता हासिल कर यह दिखाया कि पार्टी अब केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रही। तमिलनाडु में भले ही भाजपा पूर्ण सफलता नहीं पा सकी, लेकिन वहां उसकी बढ़ती मौजूदगी भविष्य के संकेत दे रही है।

लेकिन इस पूरी कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्या यह जीत केवल विकास और सुशासन के नाम पर मिली, या फिर इसमें ध्रुवीकरण, आक्रामक प्रचार और राजनीतिक ध्रुवीकरण की भी भूमिका रही? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र केवल जीत-हार का खेल नहीं, बल्कि समाज के संतुलन का भी दायित्व निभाता है।

अमित शाह की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वह चुनाव को केवल वर्तमान की लड़ाई नहीं मानते, बल्कि भविष्य की नींव के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि भाजपा ने उन राज्यों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की, जहां वह परंपरागत रूप से कमजोर रही है।

युवाओं के नजरिए से देखें तो यह पूरा घटनाक्रम कई सवाल खड़े करता है। क्या राजनीति अब पूरी तरह “मैनेजमेंट” का खेल बन चुकी है? क्या विचारधारा और जनसरोकार पीछे छूट रहे हैं? या फिर यह एक नई राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत है, जहां परिणाम ही सबसे बड़ा मापदंड होगा?

यह भी सच है कि किसी भी रणनीति की असली परीक्षा सत्ता में आने के बाद होती है। चुनाव जीतना एक लक्ष्य हो सकता है, लेकिन जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना असली चुनौती है। अगर नई सरकारें विकास, रोजगार और पारदर्शिता के मोर्चे पर सफल नहीं होतीं, तो वही जनता अगले चुनाव में फिर बदलाव का फैसला लेने में देर नहीं करेगी।

विपक्ष के लिए यह समय आत्ममंथन का है। केवल आरोप-प्रत्यारोप से राजनीति नहीं चलती। उन्हें यह समझना होगा कि भाजपा की सफलता के पीछे केवल प्रचार नहीं, बल्कि एक मजबूत संगठन और स्पष्ट रणनीति है। अगर विपक्ष इस मॉडल को समझने और उसके मुकाबले की रणनीति बनाने में विफल रहता है, तो आने वाले समय में राजनीतिक संतुलन और अधिक एकतरफा हो सकता है।

अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि अमित शाह ने भारतीय राजनीति को एक नए दौर में पहुंचा दिया है जहां चुनाव केवल जनभावनाओं से नहीं, बल्कि सूक्ष्म रणनीति, डेटा और संगठन की ताकत से जीते जा रहे हैं।

यूथ इंडिया के नजरिए से यह केवल एक राजनीतिक विश्लेषण नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है,राजनीति बदल चुकी है, और जो इस बदलाव को नहीं समझेगा, वह इतिहास बन जाएगा।

संभल में ‘काम से पहचान’ बनाने वाले डीएम डॉ . राजेंद्र पेन्सिया अब संभालेंगे पीतल नगरी

0

– 26 महीनों में बदली तस्वीर, अब मुरादाबाद की बारी
संभल। उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक सिस्टम में बड़े बदलाव के चलते संभल जिले को नई पहचान देने वाले जिलाधिकारी डॉ . राजेंद्र पेन्सिया का करीब 26 महीने के कार्यकाल के बाद तबादला कर दिया गया है। शासन ने उन्हें अब बड़े जनपद मुरादाबाद जिले की कमान सौंपी है।
यह सिर्फ एक ट्रांसफर नहीं, बल्कि संभल में एक ऐसे कार्यकाल का अंत है जिसे स्थानीय लोग “परिवर्तन काल” के रूप में देख रहे हैं। चर्चा यह है कि डॉ. पेंसिया ने जिले को सिर्फ प्रशासनिक सख्ती से नहीं, बल्कि विजन के साथ संभाला।
संभल, जो कभी कानून-व्यवस्था और अव्यवस्था के लिए चर्चाओं में रहता था, वहां उनके कार्यकाल में कंट्रोल, अनुशासन और भरोसे का माहौल बना। संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ी, पुलिस-प्रशासन का तालमेल बेहतर हुआ और घटनाओं पर त्वरित कार्रवाई ने हालात को स्थिर किया।
लेकिन असली पहचान बनी संभल की विरासत को पुनर्जीवित करने की। डॉ. पेंसिया ने जिले के 68 प्राचीन तीर्थ स्थलों और 19 ऐतिहासिक कूपों को फिर से जीवंत करने का अभियान चलाया। यह सिर्फ सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि इतिहास को वर्तमान से जोड़ने की रणनीति थी।
स्थानीय स्तर पर सर्वे, पुनर्निर्माण और संरक्षण कार्यों के जरिए इन स्थलों को चिन्हित कर विकसित किया गया। इसके पीछे साफ मकसद था संभल को धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के नक्शे पर लाना। इससे आने वाले समय में स्थानीय रोजगार और अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद भी जताई जा रही है।
विकास के मोर्चे पर भी काम दिखा। सड़कें सुधरीं, सफाई व्यवस्था मजबूत हुई, और जनसुनवाई को प्रभावी बनाया गया। खास बात यह रही कि डीएम खुद फील्ड में उतरकर निरीक्षण करते रहे जिससे अधिकारियों में जवाबदेही बढ़ी और काम की रफ्तार तेज हुई।
सूत्रों के मुताबिक, उनके कार्यकाल में शिकायतों के निस्तारण की गति बढ़ी और कई पुराने लंबित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया गया। यह बदलाव आम लोगों के बीच प्रशासन की छवि सुधारने में अहम साबित हुआ।
अब जब उन्हें मुरादाबाद की जिम्मेदारी दी गई है, तो नजर इस बात पर है कि क्या वहां भी वह इसी मॉडल को लागू कर पाएंगे।
संभल के लिए यह तबादला एक बड़ा मोड़ है। एक ऐसा अधिकारी, जिसने कानून-व्यवस्था, विकास और सांस्कृतिक विरासत—तीनों को एक साथ साधने की कोशिश की, अब दूसरे जिले की जिम्मेदारी संभालने जा रहा है।
जिले में चर्चा यही है 26 महीने का यह कार्यकाल केवल प्रशासन नहीं, बल्कि एक उदाहरण बन गया है कि इच्छाशक्ति हो तो सिस्टम भी बदल सकता है।