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Saturday, February 28, 2026
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Nepal के पूर्वी हिस्से में 4.7 तीव्रता का भूकंप, जानमाल के नुकसान की खबर नहीं

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नेपाल के पूर्वी क्षेत्र में शुक्रवार तड़के भूकंप के झटके महसूस किए गए, जिससे लोगों में कुछ देर के लिए दहशत का माहौल बन गया। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 4.7 मापी गई। राहत की बात यह रही कि अब तक किसी तरह के जानमाल के नुकसान की सूचना नहीं मिली है।

राष्ट्रीय भूकंप निगरानी एवं अनुसंधान केंद्र के अनुसार, भूकंप सुबह 3 बजकर 18 मिनट पर आया। इसका केंद्र संखुवासभा और तपलेजुंग की सीमा के पास टोपके गोला क्षेत्र में स्थित था। यह इलाका राजधानी Kathmandu से लगभग 400 किलोमीटर पूर्व में पड़ता है।

भूकंप के झटके संखुवासभा और तपलेजुंग के अलावा भोजपुर, पांचथर और तेहरथुम जिलों में भी महसूस किए गए। तड़के आए झटकों के कारण कई लोग नींद से जाग गए और एहतियातन घरों से बाहर निकल आए। हालांकि, झटके ज्यादा देर तक नहीं रहे और स्थिति जल्द ही सामान्य हो गई।

स्थानीय प्रशासन ने बताया कि संबंधित जिलों में निगरानी बढ़ा दी गई है और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए टीमें सतर्क हैं। अब तक किसी इमारत के क्षतिग्रस्त होने या लोगों के हताहत होने की खबर नहीं है।

नेपाल भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है, जहां समय-समय पर हल्के और मध्यम तीव्रता के भूकंप आते रहते हैं। विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और भूकंप सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करें। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है।

ईरान तनाव के बीच अमेरिका ने इजरायल से गैर-आपात दूतावास कर्मचारियों की वापसी की अनुमति दी

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ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने इजरायल में अपने दूतावास कर्मचारियों की संख्या घटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। शुक्रवार को जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि जिन अमेरिकी सरकारी कर्मचारियों की आपात स्थिति में आवश्यकता नहीं है, उन्हें परिवार सहित इजरायल छोड़ने की अनुमति दे दी गई है। यह निर्णय सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

यरुशलम स्थित अमेरिकी दूतावास की वेबसाइट पर जारी सूचना के अनुसार, 27 फरवरी 2026 को अमेरिकी विदेश विभाग ने इजरायल मिशन से सभी गैर-आपात अमेरिकी सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों की स्वैच्छिक वापसी को अधिकृत किया। बयान में कहा गया कि जब तक वाणिज्यिक उड़ानें उपलब्ध हैं, तब तक संबंधित लोगों को देश छोड़ने पर विचार करना चाहिए।

दूतावास ने हालांकि सुरक्षा जोखिमों का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन संकेत दिया है कि क्षेत्रीय हालात तेजी से बदल रहे हैं। इजरायल और आसपास के इलाकों में संभावित खतरों को देखते हुए यह एहतियाती कदम उठाया गया है।

अमेरिकी दूतावास ने इजरायल में मौजूद अमेरिकी नागरिकों को भी सलाह दी है कि वे बिना आवश्यक कारण यात्रा करने से बचें और सुरक्षा स्थिति की नियमित निगरानी करते रहें। साथ ही, यात्रा की योजना बना रहे लोगों से अपने कार्यक्रमों पर पुनर्विचार करने को कहा गया है।

विशेष रूप से उत्तरी इजरायल और मिस्र से सटे सीमावर्ती क्षेत्रों में जाने से परहेज करने की सख्त हिदायत दी गई है। इन क्षेत्रों को संवेदनशील मानते हुए सुरक्षा एजेंसियां अतिरिक्त सतर्कता बरत रही हैं।

बयान में कहा गया है कि आतंकी और उग्रवादी समूह इजरायल, वेस्ट बैंक और गाजा में संभावित हमलों की साजिश रच सकते हैं। ऐसे हमले बिना किसी पूर्व चेतावनी के पर्यटक स्थलों, बाजारों, शॉपिंग मॉल्स या सार्वजनिक परिवहन को निशाना बना सकते हैं।

अमेरिकी विदेश विभाग ने यह भी कहा कि स्थानीय सुरक्षा स्थिति जटिल है और बहुत तेजी से बदल सकती है। अचानक हिंसा भड़कने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए नागरिकों को अपने व्यक्तिगत सुरक्षा उपायों को सख्ती से अपनाने की सलाह दी गई है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का संकेत है। ईरान और इजरायल के बीच टकराव की आशंकाओं ने अमेरिका को अपने राजनयिक और नागरिक हितों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने पर मजबूर किया है।

हालांकि दूतावास पूरी तरह बंद नहीं किया गया है और आवश्यक सेवाएं जारी रहेंगी, लेकिन कर्मचारियों की संख्या कम होने से सामान्य कामकाज पर असर पड़ सकता है।

फिलहाल क्षेत्रीय स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर है। कूटनीतिक हल की संभावनाओं के बीच सुरक्षा तैयारियों को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि किसी भी संभावित संकट की स्थिति में त्वरित कार्रवाई की जा सके।

किंग डेविड होटल से नेसेट तक: ज्विका क्लेन ने बताया पीएम मोदी से मुलाकात का अनोखा अनुभव

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राजनीति और कूटनीति की दुनिया को अक्सर पूर्व-निर्धारित औपचारिकताओं, तयशुदा मुस्कानों और स्क्रिप्टेड संवादों के लिए जाना जाता है। लेकिन द यरूशलेम पोस्ट के मुख्य संपादक ज्विका क्लेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी मुलाकात को इस पारंपरिक ढांचे से बिल्कुल अलग बताया है। अपने हालिया लेख में क्लेन ने किंग डेविड होटल के सुइट में हुई मुलाकात और इजरायली संसद में मोदी के भाषण का विस्तार से वर्णन किया।

क्लेन ने अपने लेख की शुरुआत एक छोटे लेकिन प्रभावशाली प्रसंग से की। उन्होंने लिखा कि 1.4 अरब लोगों के नेता को अपनी कलम देने से पहले उन्होंने उसे नोटबुक पर चलाकर जांचा कि स्याही ठीक से चल रही है या नहीं। लेकिन जब उन्होंने वह कलम मोदी को सौंपी, तो मोदी ने उस पर नजर डाले बिना सीधे उनकी आंखों में देखा। क्लेन के मुताबिक मोदी का स्थिर आई कॉन्टैक्ट और खड़े होकर किया गया अभिवादन इस बात का संकेत था कि यह महज औपचारिक मुलाकात नहीं थी।

उन्होंने लिखा कि हाथ मिलाते समय मोदी की पकड़ मजबूत थी और सामान्य से एक पल अधिक देर तक बनी रही, मानो वे सामने वाले को यह महसूस कराना चाहते हों कि वे सचमुच संवाद में उपस्थित हैं। क्लेन के अनुसार, यह एक “प्रदर्शन” नहीं, बल्कि स्वाभाविक आत्मविश्वास का संकेत था।

मुलाकात के दौरान सुरक्षा जांच में हुई देरी के लिए मोदी ने स्वयं माफी मांगी। क्लेन ने बताया कि इजरायली सुरक्षा कर्मियों की कड़ी जांच के कारण उन्हें आशंका हो गई थी कि शायद मुलाकात रद्द हो जाए। लेकिन प्रधानमंत्री ने बातचीत की शुरुआत ही ‘सॉरी’ कहकर की, जिससे माहौल सहज हो गया। इसके बाद मोदी ने अखबार का विशेष फ्रंट पेज उठाया और खड़े-खड़े हिंदी में लिखा—“मानवता सर्वोपरि रहेगी। लोकतंत्र अमर रहेगा।”

क्लेन ने अपने लेख में उल्लेख किया कि उन्होंने अपने करियर में कई राष्ट्राध्यक्षों, राजनेताओं और सार्वजनिक हस्तियों का साक्षात्कार लिया है, जिनकी शैली अक्सर अभ्यास से तराशी हुई लगती है। लेकिन उनके अनुसार मोदी उस सांचे में फिट नहीं होते। उन्होंने लिखा कि उस सुइट में मोदी पूरी तरह “मौजूद” थे—एक दुर्लभ गुण, जो औपचारिक कूटनीति से परे जाता है।

प्रधानमंत्री का इजरायल दौरा केवल रणनीतिक और रक्षा समझौतों तक सीमित नहीं रहा। नेसेट में दिए अपने भाषण में मोदी ने भारत और इजरायल की प्राचीन सभ्यताओं के बीच गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने यहूदी अवधारणा “टिक्कुन ओलाम” की तुलना भारतीय दर्शन के “वसुधैव कुटुंबकम” से की।

इसी तरह उन्होंने यहूदी परंपरा के “हलाखा” और हिंदू अवधारणा “धर्म” के बीच समानताओं को रेखांकित किया। त्योहारों का जिक्र करते हुए उन्होंने दीवाली और हनुक्का को अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक बताया, जबकि पुरीम और होली के बीच भी सांस्कृतिक समानताएं बताईं। क्लेन के अनुसार, यह तुलना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि गहन बौद्धिक जुड़ाव का उदाहरण थी।

आतंकवाद के मुद्दे पर मोदी ने स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने 7 अक्टूबर के हमलों को भारत के 26/11 मुंबई हमलों से जोड़ा और कहा कि निर्दोषों की हत्या को कोई भी कारण उचित नहीं ठहरा सकता। क्लेन ने इसे भाषण का सशक्त और स्पष्ट संदेश बताया।

भाषण का सबसे भावनात्मक क्षण वह था जब मोदी ने इजरायल में कार्यरत भारतीय कामगारों और देखभालकर्ताओं का जिक्र किया, जिन्होंने संकट के समय लोगों की मदद की। उन्होंने तल्मूड का हवाला देते हुए कहा—“जो एक जीवन बचाता है, वह पूरी दुनिया बचाता है।” क्लेन के अनुसार, यह बयान दोनों देशों के संबंधों को मानवीय आधार पर परिभाषित करता है।

क्लेन ने यह भी उल्लेख किया कि मोदी ने इजरायल की संसद में यह कहा कि यहूदी समुदाय सदियों तक भारत में बिना उत्पीड़न के सुरक्षित रहा। इसे उन्होंने भारत के लिए गर्व का विषय बताया। अपने लेख के अंत में क्लेन ने लिखा कि मोदी उन नेताओं में से हैं जो औपचारिक हस्ताक्षरों से आगे बढ़कर इतिहास, दर्शन और मानवीय मूल्यों के आधार पर रिश्तों को परिभाषित करते हैं—ऐसे रिश्ते जो कूटनीति से पहले ही इतिहास में दर्ज हो चुके होते हैं।

People’s Liberation Army में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से कमांड ढांचे पर सवाल, युद्ध तैयारी को लेकर बढ़ी चिंता

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चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping द्वारा सेना में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी गई व्यापक मुहिम ने देश की सैन्य व्यवस्था में गहरे बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस अभियान के तहत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है, लेकिन इसके साथ ही यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या इस सफाई अभियान से चीन की युद्ध क्षमता और कमांड संरचना पर अल्पकालिक असर पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना दीर्घकालिक सुधार की दिशा में अहम कदम है, परंतु वर्तमान में इससे सैन्य नेतृत्व में खालीपन और अस्थिरता की स्थिति बन सकती है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार लंदन स्थित थिंक टैंक International Institute for Strategic Studies (IISS) ने अपनी वार्षिक “मिलिट्री बैलेंस” रिपोर्ट में कहा है कि जब तक सेना के शीर्ष स्तर पर खाली पदों को नहीं भरा जाता, तब तक पीएलए कमजोर नेतृत्व ढांचे के साथ काम करती रहेगी। रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यह स्थिति सेना की तत्काल युद्धक क्षमता को प्रभावित कर सकती है, खासकर ऐसे समय में जब क्षेत्रीय तनाव बढ़ रहा हो।

भ्रष्टाचार विरोधी इस मुहिम का असर चीन के सर्वोच्च सैन्य निकाय Central Military Commission तक पहुंचा है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि हाल में दो शीर्ष जनरलों के खिलाफ जांच और कार्रवाई के बाद नेतृत्व का दायरा सीमित हो गया है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया पर दबाव बढ़ सकता है और कमांड एवं कंट्रोल सिस्टम में अस्थायी कमजोरी आ सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि नियुक्तियां पारदर्शी प्रक्रिया के बजाय व्यक्तिगत संपर्कों के आधार पर हुई हों, तो इस तरह की कार्रवाई से अल्पकाल में संचालन क्षमता प्रभावित होना स्वाभाविक है।

हालांकि रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि दीर्घकाल में यह अभियान सेना के पेशेवर मानकों को मजबूत कर सकता है। यदि हथियारों की खरीद, अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रमों और रक्षा अकादमियों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है, तो इससे आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को बल मिल सकता है। शी जिनपिंग पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि सेना को “विश्व स्तरीय” बनाने के लिए अनुशासन और निष्ठा अनिवार्य है।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सैन्य सक्रियता के बीच यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है। विशेष रूप से ताइवान के आसपास चीनी सैन्य गतिविधियों में वृद्धि ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। IISS की रिपोर्ट के अनुसार, एशिया में कुल रक्षा खर्च में चीन की हिस्सेदारी लगभग 44 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जो उसकी सैन्य महत्वाकांक्षाओं को दर्शाती है। ऐसे में कमांड संरचना में किसी भी प्रकार की कमी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान स्थिति लंबी अवधि तक बनी रहती है, तो संभावित संघर्ष की स्थिति में त्वरित और समन्वित प्रतिक्रिया देने में कठिनाई आ सकती है। हालांकि रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि किसी तत्काल युद्ध की स्थिति में चीन कमजोर होगा, लेकिन यह जरूर रेखांकित किया गया है कि नेतृत्व में अस्थिरता रणनीतिक योजना और क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकती है।

चीनी रक्षा मंत्रालय ने इस अध्ययन पर तत्काल कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं, बीते दिनों सेना को संबोधित करते हुए शी जिनपिंग ने कहा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में “असाधारण प्रगति” हुई है और सेना अधिक अनुशासित और जवाबदेह बनी है। उनका दावा है कि यह अभियान सेना को आंतरिक रूप से मजबूत करेगा।

कुल मिलाकर, चीन की सेना इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है—एक ओर वह वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर आंतरिक सुधार की प्रक्रिया से गुजर रही है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह कठोर रुख पीएलए को दीर्घकाल में अधिक सक्षम बनाता है या अल्पकालिक अस्थिरता उसकी रणनीतिक क्षमता पर भारी पड़ती है।

United States ने Afghanistan के लिए जारी की ट्रैवल एडवाइजरी, Pakistan के हवाई हमलों के बाद हालात को बताया बेहद जोखिमपूर्ण

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अफगानिस्तान में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने वहां रह रहे अपने नागरिकों के लिए नई ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। अमेरिकी मिशन ने चेतावनी दी है कि हालिया घटनाक्रम, विशेष रूप से पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमलों के बाद सुरक्षा स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ गई है। एडवाइजरी में कहा गया है कि मौजूदा हालात अत्यंत जोखिमपूर्ण हैं और नागरिकों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए।

अमेरिकी मिशन ने यह एडवाइजरी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी की। बयान में कहा गया कि अमेरिका पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष की स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए है। मिशन ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र में तेजी से बदलते सुरक्षा हालात के मद्देनजर यह परामर्श जारी किया गया है, ताकि अमेरिकी नागरिक समय रहते उचित निर्णय ले सकें।

एडवाइजरी के अनुसार, पाकिस्तान ने स्थानीय समयानुसार तड़के करीब 1:50 बजे अफगानिस्तान के कई शहरों पर हवाई हमले किए। जिन क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है, उनमें राजधानी Kabul के अलावा पक्तिया और Kandahar शामिल हैं। अमेरिकी मिशन ने मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा कि पाकिस्तानी विमान सुबह करीब नौ बजे तक अफगान हवाई क्षेत्र में सक्रिय रहे और संभावित लक्ष्यों की तलाश करते रहे।

इसके अतिरिक्त, अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर झड़पों की खबरें भी सामने आई हैं। एडवाइजरी में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच प्रमुख सीमा क्रॉसिंग फिलहाल बंद कर दिए गए हैं, जिससे आवाजाही पर गंभीर असर पड़ा है। इस स्थिति ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित किया है, बल्कि वहां मौजूद विदेशी नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं बढ़ा दी हैं।

अमेरिका ने अपने नागरिकों से अपील की है कि वे अफगानिस्तान की यात्रा की योजना पर पुनर्विचार करें। जो नागरिक पहले से वहां मौजूद हैं, उन्हें स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करने, भीड़भाड़ वाले इलाकों से दूर रहने और सुरक्षित स्थानों पर रहने की सलाह दी गई है। मिशन ने यह भी कहा कि आपातकालीन सेवाएं सीमित हो सकती हैं और अचानक हालात बिगड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम पहले से ही अस्थिर क्षेत्र में नई जटिलताएं पैदा कर सकता है। अमेरिका की यह एडवाइजरी संकेत देती है कि वाशिंगटन इस संघर्ष को गंभीरता से ले रहा है और क्षेत्रीय हालात पर बारीकी से निगरानी रख रहा है। फिलहाल, स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और आने वाले दिनों में घटनाक्रम किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

यमन के सरकारी कर्मचारियों के लिए सऊदी अरब ने जारी किए 346.6 मिलियन डॉलर

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सऊदी अरब ने यमन के सरकारी कर्मचारियों की सैलरी में आई भारी कटौती की भरपाई में मदद के लिए 346.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान की है। यह भुगतान किंग सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के निर्देश पर किया गया। यह राशि Saudi Program for Development and Reconstruction of Yemen (SDRPY) के माध्यम से जारी की गई है।

SDRPY ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर जारी बयान में कहा कि यह सहायता यमन में स्थिरता और विकास को बढ़ावा देने के लिए किंगडम की निरंतर प्रतिबद्धता का हिस्सा है। कार्यक्रम के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य आर्थिक, वित्तीय और मौद्रिक स्थिरता को मजबूत करना, सरकारी संस्थानों की कार्यक्षमता बढ़ाना और प्रशासनिक पारदर्शिता में सुधार करना है।

बयान में यह भी कहा गया कि सऊदी सहायता निजी क्षेत्र को सशक्त बनाने और सतत आर्थिक विकास को गति देने में सहायक होगी। लंबे समय से संघर्ष और आर्थिक संकट झेल रहे यमन में सरकारी कर्मचारियों को नियमित वेतन न मिल पाने की समस्या गंभीर बनी हुई है, जिससे सार्वजनिक सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं।

रशद अल-अलीमी, जो यमनी प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल के चेयरमैन हैं, ने इस सहायता के लिए सऊदी नेतृत्व का आभार व्यक्त किया। उन्होंने इसे यमन के लोगों के प्रति किंगडम के लंबे समय से चले आ रहे समर्थन की निरंतरता बताया।

अल-अलीमी ने कहा कि यह वित्तीय सहयोग यमन की आर्थिक रिकवरी प्रक्रिया को गति देने में मदद करेगा और राष्ट्रीय संस्थानों को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने इसे सुरक्षा और स्थिरता बहाल करने की सरकार की क्षमता में विश्वास का प्रतीक बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि सऊदी अरब के साथ यमन की रणनीतिक साझेदारी एक स्थिर और सुरक्षित भविष्य के निर्माण के लिए आवश्यक है। दोनों देशों के बीच सहयोग पुनर्निर्माण, बुनियादी ढांचे के विकास और सार्वजनिक सेवाओं के सुदृढ़ीकरण में अहम भूमिका निभा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आर्थिक सहायता यमन की कमजोर वित्तीय प्रणाली को अस्थायी राहत दे सकती है, खासकर उस समय जब देश मानवीय और आर्थिक संकट से जूझ रहा है। वेतन भुगतान में सुधार से सरकारी संस्थानों की कार्यक्षमता और आम जनता का भरोसा बढ़ने की उम्मीद है।

सऊदी अरब पहले भी यमन में ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स में निवेश कर चुका है। SDRPY के तहत चल रही परियोजनाएं देश के विभिन्न प्रांतों में विकास कार्यों को आगे बढ़ा रही हैं।

हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए राजनीतिक समाधान और व्यापक आर्थिक सुधार भी आवश्यक होंगे। वित्तीय सहायता तत्काल राहत दे सकती है, लेकिन स्थायी विकास के लिए संरचनात्मक बदलाव जरूरी हैं।

फिलहाल, यह सहायता यमन की सरकार और कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है। इससे वेतन भुगतान में आंशिक स्थिरता आने और प्रशासनिक तंत्र को सुचारु रूप से चलाने में मदद मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।