23 C
Lucknow
Saturday, March 21, 2026
Home Blog

ईद की छुट्टी में ‘कब्जा कांड’! असलाह लेकर पहुंचे सपा नेताओं को पुलिस ने मौके से दबोचा

0

 असलाहों के दम पर जमीन कब्जाने पहुंचे थे सपा नेता
– महिलाओं ने लगाए अभद्रता और कपड़े फाड़ने के गंभीर आरोप
– अलर्ट पुलिस ने मौके पर पहुंचकर बिगड़ते हालात संभाले
– पूर्व जिलाध्यक्ष समेत करीब आधा दर्जन लोग हिरासत में
फर्रुखाबाद/जहानगंज। ईद की छुट्टी के दिन थाना जहानगंज क्षेत्र के गांव वर्ना -बुजुर्ग शनिवार करीब अपराह्न 11 बजे सनसनी फैल गई जब कथित तौर पर सपा से जुड़े नेता असलाहों के साथ जमीन पर कब्जा करने पहुंच गए, और दिन दहाड़े बल पूर्वक न्यास भरवाने लगे।मौके पर विमल यादव और विनीत कुमार उर्फ लालू यादव नें अपने कई साथियों के साथ विवादित जमीन पर दबंगई दिखाते हुए कब्जा करने लगे, जानकारी होते ही जमीन मालिक देवराज सिंह लोधी एडवोकेट ने विरोध किया,तो मामला अचानक तूल पकड़ गया और देखते ही देखते मौके पर ग्रामीणों की भारी भीड़ जुट गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मौके पर पहुंचे लोगों ने असलाह के दम पर दबाव बनाने की कोशिश की, जिससे पूरे इलाके में दहशत फैल गई। हालात उस वक्त और बिगड़ गए जब गांव की महिलाएं भी विरोध में सामने आ गईं।महिलाओं ने सपा नेताओं और उनके साथियों पर मारपीट, अभद्रता और कपड़े फाड़ने जैसे गंभीर आरोप लगाए, जिससे माहौल पूरी तरह गरमा गया और मौके पर अफरा-तफरी जैसी स्थिति बन गई।
सूचना मिलते ही थाना अध्यक्ष राजेश राय भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और हालात को काबू में किया। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए विमल यादव और लालू यादव समेत करीब आधा दर्जन लोगों को हिरासत में ले लिया। कई गाड़ियों को भी कब्जे में लिया गया है। पुलिस ने दूसरे पक्ष के कुछ लोगों को भी पूछताछ के लिए थाने बुलाया है।
बताया जा रहा है कि ईद की छुट्टी का फायदा उठाकर यह कार्रवाई की गई, ताकि विरोध कम रहे और कब्जा आसानी से किया जा सके। हालांकि पुलिस की सक्रियता से मामला बड़ा रूप लेने से पहले ही नियंत्रित कर लिया गया।
फिलहाल गांव में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और पुलिस लगातार निगरानी कर रही है। प्रशासन का कहना है कि पूरे मामले की जांच की जा रही है और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

गैस एजेंसी पर जबरन सिलेंडर ले जाने का आरोप, मुकदमा दर्ज

0

फर्रुखाबाद। कायमगंज कोतवाली क्षेत्र के बाईपास रोड स्थित साईंधाम कॉलोनी में उस समय हड़कंप मच गया, जब इंडेन गैस सर्विस के संचालक राजेश मिश्रा ने कुछ युवकों पर गंभीर आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। मामले में जबरन गैस सिलेंडर ले जाने और बाद में सोशल मीडिया पर अपमानजनक टिप्पणियां करने का आरोप है, जिससे क्षेत्र में तनाव का माहौल बन गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बीते 16 मार्च को गांव घसिया चिलौली निवासी सुमित मिश्रा बिना किसी वैध बुकिंग या ई-केवाईसी प्रक्रिया के गैस एजेंसी पर पहुंचा। आरोप है कि उसने नियमों की अनदेखी करते हुए एजेंसी से जबरन दो भरे हुए गैस सिलेंडर उठा लिए। जब एजेंसी संचालक राजेश मिश्रा ने इसका विरोध किया, तो मौके पर तीखी बहस हो गई और स्थिति तनावपूर्ण बन गई।
बताया जा रहा है कि यह विवाद यहीं नहीं थमा। आरोप है कि इसके बाद सुमित मिश्रा के भाई अमित मिश्रा और सहयोगी मनोज तिवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सहारा लेकर एजेंसी संचालक के खिलाफ आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणियां पोस्ट कीं। पीड़ित राजेश मिश्रा का कहना है कि वह दिव्यांग हैं और आरोपियों ने उनके शारीरिक स्थिति को लेकर भी अभद्र भाषा का प्रयोग किया, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा है।
राजेश मिश्रा ने यह भी आशंका जताई है कि सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भ्रामक और भड़काऊ संदेशों के कारण एजेंसी पर भीड़ एकत्रित हो सकती है, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का खतरा है। उन्होंने बताया कि उनका परिवार भी एजेंसी परिसर में ही निवास करता है, ऐसे में उन्हें अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कायमगंज कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक एम.एम. चतुर्वेदी ने बताया कि पीड़ित की तहरीर के आधार पर सुमित मिश्रा, अमित मिश्रा और मनोज तिवारी के खिलाफ संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस पूरे प्रकरण की गहनता से जांच कर रही है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है।

एक्सक्लूसिव: पूर्व विधायक विजय सिंह और दमयंती सिंह की हिस्ट्रीशीट के बाद जारी हुए शस्त्र लाइसेंस

0

– जिला प्रशासन में पूर्व पालिका अध्यक्ष की प्रेस कांफ्रेंस के बाद दस्तावेजी आंकड़े खगालने किये शुरू
– नाला मछरट्टा स्थित बहुखंडीय मकान की भी जाँच शुरू
– बिना मानचित्र वह निर्माण का नगर मजिस्ट्रेट ने लिया संज्ञान
– समर्थकों पर भी निगरानी शुरू, सोशल मीडिया पर नजरें
फर्रुखाबाद। जनपद के चर्चित सपा के पूर्व विधायक विजय सिंह और उनकी पत्नी दमयंती सिंह फिर सुर्खियों में हैँ । लालच सट्टा स्थित उनके मकान की पत्रावली भी प्रशासन खगालनी शुरू की हैं।यूथ इंडिया को मिले दस्तावेजों, न्यायालयी अभिलेखों और आरटीआई आवेदन से जुड़े तथ्यों के आधार पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। प्रशासन को मिली जानकारी के अनुसार थाना कादरीगेट क्षेत्र में वर्ष 1997 में दर्ज मुकदमा संख्या 113/97 (धारा 25 आर्म्स एक्ट) और मुकदमा संख्या 343/97 (धारा 420 आईपीसी व 30 आर्म्स एक्ट) लंबे समय तक न्यायालय में विचाराधीन रहे।
दस्तावेजों में उल्लेख है कि जब यह मामले अदालत में चल रहे थे, उसी दौरान 4 नवंबर 2002 को तीन शस्त्र लाइसेंस जारी कर दिए गए। इन लाइसेंसों के नंबर 6259, 6260 और 6261 बताए गए हैं। यहीं से पूरे मामले पर संदेह गहरा जाता है, क्योंकि सामान्य नियमों के तहत गंभीर आपराधिक मामलों में घिरे व्यक्ति को शस्त्र लाइसेंस देने से पहले विस्तृत जांच की जाती है।
आरटीआई के माध्यम से मांगी गई जानकारी और हस्तलिखित नोट्स में यह आरोप भी सामने आया है कि लाइसेंस बनवाने के दौरान गलत पता और भ्रामक जानकारी का इस्तेमाल किया गया। साथ ही यह भी आरोप है कि परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर भी लाइसेंस लेने की प्रक्रिया अपनाई गई। दस्तावेजों में दमयंती सिंह के नाम से जुड़े रिकॉर्ड की भी जांच की मांग उठाई गई है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल पुलिस और प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है। यदि मुकदमे लंबित थे, तो सत्यापन प्रक्रिया में यह तथ्य सामने क्यों नहीं आया और लाइसेंस कैसे स्वीकृत हो गए। न्यायालय में सुनवाई के दौरान ही लाइसेंस जारी होना कई स्तर पर जांच का विषय बनता है।
करीब दो दशक पुराने इस मामले के सामने आने के बाद एक बार फिर प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। संभावना जताई जा रही है कि मामले की गहराई से जांच की मांग उठेगी और उस समय के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। वहीं जिला प्रशासन में सभी दस्तावेजों को पलटना शुरू कर दिया है।

21 मार्च: ओशो का सम्बोधि दिवस: जब भीतर जागी चेतना और बदल गया जीवन का अर्थ

0

– आत्म-जागरण, ध्यान और आंतरिक क्रांति का संदेश देता ऐतिहासिक दिन
भरत चतुर्वेदी
21 मार्च को ओशो का सम्बोधि दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि मानव चेतना के उत्कर्ष का प्रतीक है। ओशो के अनुसार, 21 मार्च 1953 को जबलपुर में एक पेड़ के नीचे ध्यान करते हुए उन्हें ज्ञान की अनुभूति हुई—एक ऐसी अवस्था, जहां व्यक्ति अपने अस्तित्व की सच्चाई से साक्षात्कार करता है।
“सम्बोधि” का अर्थ है—पूर्ण जागरण, पूर्ण चेतना। यह वह स्थिति है, जहां मनुष्य अपने भीतर की सीमाओं, भ्रमों और अहंकार से मुक्त होकर जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझता है। ओशो के विचार में, यह कोई धार्मिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत अनुभव है, जिसे हर व्यक्ति प्राप्त कर सकता है।
ओशो ने पारंपरिक धर्मों और रूढ़ियों से अलग हटकर अध्यात्म को समझाया। उनका मानना था कि सच्चा धर्म किसी मंदिर, मस्जिद या ग्रंथ में सीमित नहीं है, बल्कि वह व्यक्ति के भीतर है। उन्होंने ध्यान को एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे व्यक्ति अपने भीतर की शांति और आनंद को खोज सकता है।
ओशो के अनुसार, ध्यान केवल आंखें बंद कर बैठने का नाम नहीं, बल्कि जीवन को पूरी सजगता के साथ जीने की कला है। उन्होंने “डायनेमिक मेडिटेशन” जैसी तकनीकों के माध्यम से आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी ध्यान को संभव बनाया।
आज के समय में, जब व्यक्ति तनाव, असंतुलन और बाहरी दबावों से घिरा हुआ है, सम्बोधि दिवस का महत्व और बढ़ जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सच्ची शांति और संतोष बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर है।
इस दिन ओशो के अनुयायी ध्यान, सत्संग और आत्ममंथन के माध्यम से अपने भीतर झांकने का प्रयास करते हैं। कई आश्रमों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां ओशो के विचारों पर चर्चा होती है।
आज का समाज तेज़ी से बदल रहा है। तकनीक और भौतिकता के इस दौर में इंसान अपने भीतर से दूर होता जा रहा है। ऐसे समय में ओशो का संदेश—“अपने भीतर जाओ, खुद को जानो”—अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।
उनका दर्शन हमें यह सिखाता है कि जीवन को केवल जीना ही नहीं, बल्कि समझना भी जरूरी है। जब हम खुद को समझते हैं, तभी हम दूसरों को भी सही मायनों में समझ पाते हैं।
ओशो का सम्बोधि दिवस केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि का उत्सव नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो जीवन के गहरे अर्थ को जानना चाहता है।
यह दिन हमें यह संदेश देता है कि असली यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की है। अगर हम अपने भीतर जाग जाएं, तो जीवन अपने आप ही एक उत्सव बन जाता है।“सम्बोधि का अर्थ है—अपने भीतर के प्रकाश को पहचानना।”

गैस एजेंसी पर जबरन सिलेंडर ले जाने का आरोप, मुकदमा दर्ज

0

फर्रुखाबाद। कायमगंज कोतवाली क्षेत्र के बाईपास रोड स्थित साईंधाम कॉलोनी में उस समय हड़कंप मच गया, जब इंडेन गैस सर्विस के संचालक राजेश मिश्रा ने कुछ युवकों पर गंभीर आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। मामले में जबरन गैस सिलेंडर ले जाने और बाद में सोशल मीडिया पर अपमानजनक टिप्पणियां करने का आरोप है, जिससे क्षेत्र में तनाव का माहौल बन गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बीते 16 मार्च को गांव घसिया चिलौली निवासी सुमित मिश्रा बिना किसी वैध बुकिंग या ई-केवाईसी प्रक्रिया के गैस एजेंसी पर पहुंचा। आरोप है कि उसने नियमों की अनदेखी करते हुए एजेंसी से जबरन दो भरे हुए गैस सिलेंडर उठा लिए। जब एजेंसी संचालक राजेश मिश्रा ने इसका विरोध किया, तो मौके पर तीखी बहस हो गई और स्थिति तनावपूर्ण बन गई।
बताया जा रहा है कि यह विवाद यहीं नहीं थमा। आरोप है कि इसके बाद सुमित मिश्रा के भाई अमित मिश्रा और सहयोगी मनोज तिवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सहारा लेकर एजेंसी संचालक के खिलाफ आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणियां पोस्ट कीं। पीड़ित राजेश मिश्रा का कहना है कि वह दिव्यांग हैं और आरोपियों ने उनके शारीरिक स्थिति को लेकर भी अभद्र भाषा का प्रयोग किया, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा है।
राजेश मिश्रा ने यह भी आशंका जताई है कि सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भ्रामक और भड़काऊ संदेशों के कारण एजेंसी पर भीड़ एकत्रित हो सकती है, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का खतरा है। उन्होंने बताया कि उनका परिवार भी एजेंसी परिसर में ही निवास करता है, ऐसे में उन्हें अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कायमगंज कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक एम.एम. चतुर्वेदी ने बताया कि पीड़ित की तहरीर के आधार पर सुमित मिश्रा, अमित मिश्रा और मनोज तिवारी के खिलाफ संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस पूरे प्रकरण की गहनता से जांच कर रही है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है।

राज्यसभा चुनाव: खुलेआम क्रॉस-वोटिंग कैसे कर पाते हैं विधायक

0

 अशोक भाटिया , वसई
राज्यसभा की खाली सीटों के लिए हुए चुनावों में राजनीति खूब होती है मतदान के दौरान क्रॉस वोटिंग के खेल ने सुर्खियां बटोरींती है । हाल ही में कुल खाली 37 राज्यसभा सीटों में से 11 के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच रस्साकशी देखने को मिली। ऐसा इसलिए क्योंकि बाकी 26 सीटों पर एक ही कैंडिडेट होने की वजह से वोटिंग नहीं हुई। अब बिहार, ओडिशा, हरियाणा में हुए चुनाव में विपक्षी दलों के कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी। अंतरात्मा की आवाज पर ऐसा कदम उठाने वाले विधायकों को बागी भी करार दिया जाता है। राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया और इसमें ‘क्रॉस वोटिंग’ का मुद्दा भारतीय राजनीति में काफी चर्चा में रहता है। जैसे कि इस बार की गणित में एनडीए को फायदा हो गया।
हरियाणा राज्यसभा चुनाव में कई कांग्रेसी विधायकों की तरफ से क्रॉस वोटिंग के बाद पार्टी में खूब गहमागहमी का माहौल बना हुआ है। आखिरकार कांग्रेस ने रतिया के विधायक सरदार जरनैल सिंह को भी क्रास वोटिंग करने के आरोप में कारण बताओ नोटिस थमा दिया है। जरनैल सिंह समेत पार्टी अब तक पांच विधायकों को नोटिस दे चुकी है। इनमें नारायणगढ़ की विधायक शैली चौधरी, सढौरा की विधायक रेणुबाला, पुन्हाना के विधायक मोहम्मद इलियास और हथीन के विधायक मोहम्मद इसराइल शामिल हैं। सभी को नोटिस मिलने पर सात दिन के भीतर जवाब देना होगा। हालांकि विधायकों ने क्रास वोटिंग के आरोपों को खारिज कर दिया है।विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष राज्यसभा चुनाव के बाद से पांच विधायकों के क्रास वोटिंग करने की बात स्वीकार कर रहे थे। 18 मार्च को जब कांग्रेस प्रभारी बीके हरिप्रसाद ने नई दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस की तो उन्होंने चार विधायकों के नाम लिए और उन्हें नोटिस देने की बात कही। बीके हरिप्रसाद के इस बयान के बाद कांग्रेस के अंदर और मीडिया पर कांग्रेस आलाकमान पर सवाल उठने लगे थे। क्रास वोटिंग के आरोप से घिरे विधायकों ने भी आरोप लगाया कि इसमें पसंद व नापसंद का खेल खेला जा रहा है। जो पसंद है, उसे बचाया जा रहा है और जो पसंद नहीं है, उसे निपटाया जा रहा है।कांग्रेस के कई विधायक भी असमंजस में थे कि जब पांच विधायकों ने क्रास वोटिंग की तो चार को ही नोटिस क्यों दिया गया। इससे पार्टी पर दबाव बना और शुक्रवार को जरनैल सिंह को भी नोटिस दिया गया। जरनैल सिंह को भी नोटिस मिलने के अगले सात दिन के भीतर अपना जवाब देना होगा।
राज्यसभा चुनाव 2026 में हाल के कई सालों की तरह इस बार भी कांग्रेस के विधायकों ने जमकर क्रॉस वोटिंग की। हरियाणा से लेकर ओडिशा तक में कांग्रेस के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। बिहार में तो एक अलग ही खेला हुआ, कांग्रेस के तीन विधायक तो वोट ही करने नहीं पहुंचे। जिसके कारण बीजेपी गठबंधन बिहार में पांचों सीटें जीतने में सफल रहा। AIMIM का साथ मिलने के बाद भी राजद उम्मीदवार को हार मिली, राजद उम्मीदवार को ही कांग्रेस सपोर्ट कर रही थी।
हरियाणा में कांग्रेस ने खुद स्वीकार किया है कि उसके पांच विधायकों ने बीजेपी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की है। वहीं ओडिशा में बीजेडी के आठ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है, खुद पार्टी ने यह जानकारी दी है, लेकिन उनके नाम बीजद की ओर से जारी नहीं किए गए हैं। हालांकि तीन विधायकों ने खुद ही स्वीकार किया है कि उन्होंने बीजेपी के पक्ष में मतदान किया है।
इसके पूर्व यूपी में राज्यसभा की 10 सीटों पर चुनाव होने थे। विधायकों की संख्या के हिसाब से बीजेपी के सात और समाजवादी पार्टी के तीन उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित थी। दोनों ही दलों ने पहले इतने ही उम्मीदवार उतारे भी थे, लेकिन बीजेपी ने आखिरी मौके पर एक और उम्मीदवार को उतारकर मतदान को जटिल बना दिया।
बताया जा रहा है कि इस चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) के सात विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की है, जबकि एक विधायक वोट डालने नहीं आईं। वहीं नेशनल डेमोक्रैटिक अलायंस (एनडीए) में शामिल ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के एक विधायक ने भी क्रॉस-वोट किया। सपा विधायकों की क्रॉस-वोटिंग के चलते बीजेपी के सभी आठ उम्मीदवारों की जीत तय मानी जा रही है।
हालांकि, इस क्रॉस-वोटिंग को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। सपा के नेता अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि बीजेपी ने विधायकों को प्रलोभन देकर और धमकाकर अपने उम्मीदवार के पक्ष में मतदान कराया है। वहीं, बीजेपी का कहना है कि विधायकों ने अपनी मर्जी से वोट दिया है। क्रॉस-वोटिंग करने वाले विधायकों का कहना है कि उन्होंने अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर मतदान किया है।
अयोध्या में राम मंदिर दर्शन को लेकर समाजवादी पार्टी के कुछ विधायकों में अपनी पार्टी के रुख पर नाराजगी जरूर थी, लेकिन ये विधायक पार्टी के खिलाफ चले जाएंगे, ऐसी उम्मीद नहीं थी। अब सवाल यह है कि क्रॉस वोटिंग क्या होती है? राज्यसभा सीट के लिए चुनाव में वोटिंग की प्रक्रिया क्या होती है और पाला बदलकर वोट डालने वाले विधायकों पर ऐक्शन कौन लेता है? इस ‘सियासी खेल’ में नियम कानून का हवाला क्या है? आइए समझते हैं हर सवाल का जवाब।जब किसी राजनीतिक दल का विधायक अपनी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार की बजाय विपक्षी दल के उम्मीदवार को वोट दे देता है, तो उसे ‘क्रॉस वोटिंग’ कहा जाता है। अगर सरल शब्दों में समझें तो अपनी पार्टी की तरफ से जारी निर्देश यानी व्हिप के खिलाफ जाकर दूसरे खेमे में मतदान करना ही क्रॉस वोटिंग कहलाता है।
क्रॉस-वोटिंग का मतलब है कि किसी पार्टी का विधायक किसी दूसरे दल के उम्मीदवार को वोट करे। हालांकि, मतदान करते समय पहले वोट को पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाया जाता है और उसके बाद सभापति के पास जमा किया जाता है। राज्यसभा चुनाव, विधान परिषद चुनाव और राष्ट्रपति के चुनाव में अक्सर क्रॉस- वोटिंग होती है। साल 1998 में क्रॉस-वोटिंग के चलते कांग्रेस उम्मीदवार के चुनाव हारने के कारण ओपन बैलेट का नियम लाया गया। इसके तहत हर विधायक को अपना वोट पार्टी के मुखिया या अधिकृत एजेंट को दिखाना होता है। हालांकि उसके बाद भी क्रॉस-वोटिंग होती रही और आज भी हुई।
राज्ससभा चुनाव में खरीद-फरोख्त, दल-बदल, क्रॉस-वोटिंग जैसी शिकायतें अक्सर होती हैं, लेकिन साल 2016 में एक दिलचस्प मामला सामने आया जब गलत पेन के इस्तेमाल के कारण एक दर्जन से ज्यादा विधायकों के वोट रद्द कर दिए गए। यह मामला था हरियाणा का, जब कांग्रेस पार्टी के 13 विधायकों के वोट गलत पेन के इस्तेमाल की वजह से रद्द कर दिए गए।कहा गया कि पीठासीन अधिकारी जिस पेन की अनुमति दे, उसी का इस्तेमाल मतपत्र पर करना था जबकि इन विधायकों ने दूसरी कलम का इस्तेमाल किया था। वहीं, पार्टी के विधायक रणदीप सुरजेवाला का वोट इसलिए रद्द कर दिया गया कि उन्होंने अपना वोट कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी को दिखा दिया था। नियमों के मुताबिक मतदान गुप्त होता है और बैलेट बॉक्स में डालने से पहले इसे किसी को दिखाने की अनुमति नहीं होती।
दरअसल, क्रॉस-वोटिंग इसलिए भी विधायकों के लिए आसान हो जाती है कि ऐसा करने वाले विधायक की सदस्यता पर इससे आंच नहीं आती। क्रॉस-वोटिंग करने वाले विधायक के खिलाफ उसकी पार्टी कोई कार्रवाई जरूर कर सकती है। साल 2017 में गुजरात में कांग्रेस पार्टी ने क्रॉस वोटिंग करने के लिए अपने 14 विधायकों को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था।लेकिन क्रॉस-वोटिंग करने वाले विधायक की सदस्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ता, यानी उसके ऊपर दल-बदल कानून लागू नहीं होता। जब तक कोई सदस्य अपनी मूल पार्टी, जिससे वो विधायक है, उससे इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में शामिल नहीं होता, तब तक वह दल-बदल कानून के दायरे में नहीं आता।
राज्यसभा के चुनाव में राज्यों की विधानसभाओं के विधायक हिस्सा लेते हैं। इसमें विधान परिषद के सदस्य वोट नहीं डालते। राज्यसभा चुनाव की वोटिंग का एक फॉर्मूला होता है और यह लोकसभा के मतदान से अलग होता है।विधायकों को चुनाव के दौरान प्राथमिकता के आधार पर वोट देना होता है। उन्हें कागज पर लिखकर बताना होता है कि उनकी पहली पसंद कौन है और दूसरी पसंद कौन। सबसे पहले पहली पसंद के वोटों की गिनती होती है और जिसे ज्यादा मत मिलते हैं, यानी जो मतदान का कोटा पूरा कर लेगा, वही जीता हुआ माना जाएगा। अगर प्रथम वरीयता के वोटों से जीत सुनिश्चित नहीं होती है, तो दूसरी वरीयता के मतों की गणना होती है।मतों का कोटा कैसे तय होता है, ये जानना भी जरूरी है। दरअसल, किसी राज्य में जितनी राज्यसभा सीटें खाली हैं, उसमें सबसे पहले एक जोड़ा जाता है, फिर उसे उस राज्य की कुल विधानसभा सीटों की संख्या से भाग दिया जाता है। इससे जो संख्या आती है, उसमें एक जोड़ दिया जाता है।
जैसे, यूपी में राज्य सभा की कुल 31 सीटें हैं। फिलहाल 10 सीटें खाली थीं, जिन पर आज चुनाव हुए हैं। 10 में एक जोड़ने पर संख्या आती है- 11। यूपी में विधानसभा सीटों की संख्या 403 है, लेकिन मौजूदा समय में चार सीटें खाली हैं, इसलिए कुल 399 विधायकों को मतदान करना था। अब 399 को 11 से भाग देने पर यह संख्या करीब 36 आती है। इसमें एक जोड़ने पर यह संख्या होती है- 37। यानी एक उम्मीदवार को जीतने के लिए 37 वोटों की जरूरत थी।2019 के चुनाव में बीजेपी की नेता स्मृति ईरानी ने अमेठी सीट पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी को हराया था, लेकिन रायबरेली सीट अभी भी बीजेपी से दूर रही है। हालांकि इस बार सोनिया गांधी यहां से चुनाव नहीं लड़ेंगी।
यूपी के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस-वोटिंग की चर्चा इसलिए भी हो रही है कि आने वाले दिनों में लोकसभा चुनाव हैं। राजनीतिक दलों के नेताओं का इधर-उधर जाने का क्रम जारी है। पिछले दिनों अयोध्या में राम मंदिर दर्शन को लेकर समाजवादी पार्टी के कुछ विधायकों में अपनी पार्टी के रुख को लेकर नाराजगी जरूर थी, लेकिन ये विधायक पार्टी के खिलाफ चले जाएंगे, ऐसी उम्मीद नहीं थी।अमेठी के गौरीगंज से समाजवादी पार्टी के विधायक राकेश सिंह ने मतदान से ठीक पहले ‘जय श्रीराम’ कहकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया था। हालांकि, सबसे चौंकाने वाला नाम रहा समाजवादी पार्टी के मुख्य सचेतक और रायबरेली जिले की ऊंचाहार विधानसभा सीट से विधायक मनोज पांडेय का। मनोज पांडेय समाजवादी पार्टी सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं।समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच आगामी लोकसभा चुनावों के लिए सीटों के बंटवारे पर सहमति बन गई है।
अमेठी और रायबरेली की लोकसभा सीटें कांग्रेस का गढ़ मानी जाती हैं और यहां पिछले कई चुनाव से समाजवादी पार्टी अपने उम्मीदवार नहीं उतारती। हाल ही में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच हुए गठबंधन के कारण ये सीटें गठबंधन के पक्ष में और मजबूत हुई हैं, जबकि बीजेपी किसी भी कीमत पर इन सीटों को जीतना चाहती है।अमेठी सीट को तो वो 2019 में जीत भी चुकी है, जब केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को हराया था। लेकिन रायबरेली सीट अभी भी बीजेपी से दूर रही है। हालांकि इस बार सोनिया गांधी ने यहां से चुनाव न लड़ने की घोषणा की थी ।
अशोक भाटिया,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार ,लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
वसई पूर्व – 401208 ( मुंबई )E MAIL – vasairoad.yatrisangh@gmail.com व्हाट्स एप्प 9221232130