शरद कटियार
भारत को विश्व में यदि किसी एक पहचान ने सबसे अलग स्थान दिलाया है तो वह उसकी सनातन परंपरा है। यह वही भूमि है जहां ऋषियों ने राजाओं को धर्म का मार्ग बताया, जहां संतों के चरणों में सम्राटों ने शीश झुकाया और जहां आध्यात्मिक शक्ति को राजनीतिक शक्ति से भी ऊपर माना गया। लेकिन आज जब एक शंकराचार्य को सड़क पर रात्रि विश्राम करने की नौबत आ जाए, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम केवल सनातन की बातें कर रहे हैं या वास्तव में उसके मूल्यों को भी जी रहे हैं?
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ कन्नौज में जो हुआ, उसने करोड़ों सनातन अनुयायियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यदि एक जगद्गुरु शंकराचार्य, जिन्हें आदि शंकराचार्य की परंपरा का प्रतिनिधि माना जाता है, उनके लिए सम्मानजनक व्यवस्था तक सुनिश्चित नहीं हो पाती, तो यह केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि उस परंपरा का अपमान माना जाएगा जिसने हजारों वर्षों से भारत की आध्यात्मिक चेतना को जीवित रखा है।
विडंबना यह है कि आज सनातन राजनीति का सबसे बड़ा विषय बन चुका है। चुनावी मंचों पर सनातन की रक्षा के दावे किए जाते हैं। संतों और धर्माचार्यों के साथ तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं। मंदिरों और तीर्थों के विकास को उपलब्धि बताया जाता है। लेकिन जब किसी शंकराचार्य के सम्मान का वास्तविक प्रश्न सामने आता है, तब व्यवस्था मौन क्यों दिखाई देती है?
भारत में शंकराचार्य केवल एक धार्मिक पद नहीं हैं। वे उस दार्शनिक परंपरा के उत्तराधिकारी हैं जिसने देश को सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बांधने का कार्य किया। जब विदेशी आक्रमणों ने भारत की पहचान मिटाने का प्रयास किया, तब संतों और मठों ने संस्कृति की रक्षा की। जब समाज बिखरने लगा, तब इन्हीं आध्यात्मिक केंद्रों ने उसे जोड़े रखा। ऐसे में यदि आज उनके सम्मान पर प्रश्न उठते हैं तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सनातन केवल नारों तक सीमित हो गया है? क्या संतों का सम्मान केवल तब तक है जब तक वे सत्ता की प्रशंसा करते रहें? क्या सरकारों और प्रशासन को केवल वही संत स्वीकार हैं जो प्रश्न न पूछें? लोकतंत्र में असहमति और सवाल पूछना अपराध नहीं होता। यदि कोई संत कानून-व्यवस्था, गौ संरक्षण या सामाजिक मुद्दों पर सरकार से सवाल करता है तो उसका उत्तर संवाद से दिया जाना चाहिए, उपेक्षा से नहीं।
भारतीय संस्कृति का मूल भाव सम्मान है। यहां विरोधी विचार रखने वाले ऋषियों का भी सम्मान किया गया। यहां शास्त्रार्थ हुए, बहसें हुईं, लेकिन संतों की गरिमा कभी कम नहीं होने दी गई। यही भारत की विशेषता रही है। यदि हम उस परंपरा से दूर हो रहे हैं तो यह केवल धार्मिक संकट नहीं, सांस्कृतिक संकट भी है।
आज आवश्यकता आत्ममंथन की है। सनातन केवल मंदिरों, नारों और आयोजनों का नाम नहीं है। सनातन का अर्थ है मर्यादा, सम्मान, संवाद और परंपरा के प्रति श्रद्धा। यदि इन मूल्यों की रक्षा नहीं हो रही, तो फिर केवल स्वयं को सनातन का रक्षक घोषित कर देने से कुछ नहीं बदलेगा।
कन्नौज की घटना एक चेतावनी है। यह याद दिलाती है कि भारत की आत्मा उसके संतों, गुरुओं और आध्यात्मिक परंपराओं में बसती है। जिस दिन यह आत्मा आहत होती है, उस दिन केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरी सांस्कृतिक विरासत घायल होती है।
और तब यह प्रश्न गूंजता है जिस धरती पर शंकराचार्य को सड़क पर बैठना पड़े, क्या वह सचमुच स्वयं को सनातन का राष्ट्र कहने का नैतिक अधिकार रखती है?








