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Monday, May 4, 2026
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सांसद रमेश अवस्थी की बंगाल में ‘राजतिलक’ हुंकार

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– सिउड़ी काउंटिंग सेंटर से दिया नारा, राजतिलक की करो तैयारी आ रहे हैं भगवाधारी
कोलकाता/सिउड़ी। पश्चिम बंगाल की चुनावी गिनती के बीच सिउड़ी काउंटिंग सेंटर से उठी आवाज ने पूरे राज्य की सियासत को झकझोर दिया है। “राज तिलक की करो तैयारी, बंगाल में भी आ रहे हैं भगवाधारी” सोमवार को ये एक नारा नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों का आक्रामक ऐलान बन गया है। कानपुर से सांसद रमेश अवस्थी के इस नारे ने देश भर के कार्यकर्ताओं मे गर्मी भर दी है।
गिनती के दौरान सिउड़ी में जिस तरह कार्यकर्ताओं ने “जय श्री राम” के नारे लगाए, वह केवल जश्न का संकेत नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक ध्रुवीकरण की चरम अभिव्यक्ति भी है । यह वही बंगाल है जहां लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस का दबदबा रहा और ममता बनर्जी की राजनीति को अजेय माना जाता रहा ।
लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदलती दिख रही है। शुरुआती रुझानों में भारतीय जनता पार्टी की बढ़त ने विपक्षी खेमे को बैकफुट पर ला दिया है। कई सीटों पर बीजेपी ने अप्रत्याशित बढ़त हासिल की है, खासकर उन इलाकों में जहां पहले पार्टी की मौजूदगी नगण्य मानी जाती थी।
आंकड़ों के पीछे का सियासी गणित
अगर रुझानों को देखें, तो ग्रामीण और सीमावर्ती जिलों में बीजेपी को भारी समर्थन मिलता दिख रहा है। उत्तर बंगाल के जिलों कूचबिहार, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार में पार्टी का वोट शेयर 50% के आसपास पहुंचने के संकेत हैं। वहीं शहरी सीटों पर भी मुकाबला कड़ा हो गया है।
टीएमसी, जो पिछले चुनावों में 200 के करीब सीटें जीतकर आई थी, इस बार आधे आंकड़े के आसपास सिमटती नजर आ रही है। यह गिरावट केवल सीटों में नहीं, बल्कि जनाधार में बदलाव का संकेत भी देती है।
सिउड़ी में गूंजा “जय श्री राम” केवल धार्मिक नारा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक बन चुका है। यह उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए बीजेपी ने बंगाल में अपनी पहचान मजबूत की।
दूसरी तरफ, टीएमसी ने इसे बाहरी राजनीति और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के तौर पर पेश किया, लेकिन जमीनी स्तर पर यह रणनीति कितनी कारगर रही,यह रुझान साफ कर रहे हैं।
यही सबसे बड़ा सवाल है। चुनावी रुझान अक्सर तस्वीर दिखाते हैं, लेकिन अंतिम परिणाम तक कई बार समीकरण बदल जाते हैं। ऐसे में ‘राजतिलक’ का दावा अभी जल्दबाज़ी भी साबित हो सकता है।
हालांकि, अगर ये रुझान कायम रहते हैं, तो यह बंगाल के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन होगा जहां पहली बार बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाती नजर आएगी।
युवा मतदाताओं की भूमिका इस चुनाव में निर्णायक रही है। बेरोजगारी, उद्योग और अवसरों की कमी जैसे मुद्दों ने उन्हें बदलाव की ओर धकेला है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह वोट विकास के नाम पर पड़ा है या पहचान की राजनीति के प्रभाव में?

बेमौसम बारिश और आंधी से किसानों पर दोहरी मार, कटी गेहूं की फसल पानी में डूबी

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आलू की मंदी से पहले ही परेशान थे किसान

फर्रुखाबाद। जनपद में सोमवार रात आई बेमौसम बारिश और तेज आंधी ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया। खेतों में कटी पड़ी गेहूं की फसल पूरी तरह से भीगकर बर्बाद हो गई, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। मौसम के इस अचानक बदले मिजाज ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है, जो पहले से ही आलू की मंदी से जूझ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, थाना कमालगंज क्षेत्र के गांव निनोरा श्रंखलापुर निवासी किसान अनस खान की गेहूं की फसल कटकर खेत में ही पड़ी थी। सोमवार रात आई तेज बारिश और आंधी के चलते पूरी फसल पानी में डूब गई। खेतों में जलभराव हो गया, जिससे गेहूं की बालियां सड़ने की कगार पर पहुंच गई हैं। किसान की कई महीनों की मेहनत कुछ ही घंटों में तबाह हो गई।
किसान अनस खान ने बताया कि हम लोग पहले से ही आलू की गिरती कीमतों के कारण आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। आलू का सही दाम नहीं मिल रहा, जिससे लागत भी नहीं निकल पा रही है। अब गेहूं की फसल भी बर्बाद हो गई, ऐसे में और मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने सरकार से मुआवजे की मांग करते हुए कहा कि यदि समय रहते मदद नहीं मिली तो किसानों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा।
जिले के अन्य क्षेत्रों में भी बारिश और आंधी का असर देखने को मिला है। कई स्थानों पर गेहूं की कटी फसल खेतों में भीग गई है, जबकि कुछ जगहों पर पेड़ गिरने और बिजली आपूर्ति बाधित होने की भी खबरें हैं। किसानों का कहना है कि मौसम की मार से लगातार नुकसान हो रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है।
किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि नुकसान का जल्द सर्वे कराया जाए और प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा दिया जाए, ताकि उन्हें इस संकट से उबरने में राहत मिल सके।

ऑपरेशन के बाद बिगड़ी हालत, प्रसूता की मौत,अस्पताल स्टाफ फरार, परिजनों में आक्रोश

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फर्रुखाबाद। जनपद के कंपिल थाना क्षेत्र के गांव रसीदपुर में एक प्रसूता की इलाज के दौरान मौत हो जाने से हड़कंप मच गया। परिजनों ने निजी अस्पताल पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए जमकर हंगामा किया। घटना के बाद अस्पताल स्टाफ मौके से फरार हो गया, जिससे परिजनों का आक्रोश और बढ़ गया।
जानकारी के अनुसार, गांव रसीदपुर निवासी रेनू (25) पत्नी अनुज कश्यप को रविवार दोपहर करीब 3:30 बजे प्रसव पीड़ा होने पर परिजनों द्वारा लोहिया अस्पताल के पास स्थित गायत्री हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। देर शाम करीब 8:30 बजे चिकित्सकों ने ऑपरेशन के जरिए रेनू का प्रसव कराया, जिसमें उसने एक पुत्री को जन्म दिया। परिजनों के अनुसार, शुरुआत में सब कुछ सामान्य बताया गया, लेकिन ऑपरेशन के कुछ ही समय बाद रेनू की हालत अचानक बिगड़ने लगी।
बताया जा रहा है कि ऑपरेशन के बाद महिला को अत्यधिक रक्तस्राव (ब्लीडिंग) होने लगा, जिससे उसकी स्थिति गंभीर हो गई। रात करीब 12:30 बजे अस्पताल कर्मियों ने हालत गंभीर बताते हुए मरीज को कहीं और ले जाने की सलाह दे दी। घबराए परिजन रेनू को लेकर कई निजी अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन कहीं भी उसे भर्ती नहीं किया गया। मजबूर होकर परिजन वापस उसी अस्पताल पहुंचे, जहां महिला को दो बोतल खून चढ़ाया गया।
इसके बावजूद रेनू की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और सोमवार तड़के करीब 3:30 बजे उसने दम तोड़ दिया। जैसे ही महिला की मौत की खबर फैली, अस्पताल का स्टाफ एक-एक कर मौके से भाग निकला। इससे गुस्साए परिजनों ने अस्पताल पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है।
मृतका रेनू की यह तीसरी संतान थी। उसका पति अनुज कश्यप गैस हाकर के रूप में काम करता है और गांव में ही गैस गोदाम से घर-घर सिलेंडर पहुंचाकर परिवार का भरण-पोषण करता है। घटना के बाद परिवार में कोहराम मचा हुआ है और गांव में शोक की लहर है। परिजनों ने प्रशासन से दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

शादी समारोह में हादसा: करंट लगने से युवक की मौत, मचा हड़कंप

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फर्रुखाबाद। पड़ोसी जनपद शाहजहांपुर के थाना मिर्जापुर क्षेत्र में एक शादी समारोह उस समय मातम में बदल गया, जब दावत खाने पहुंचे एक युवक की करंट लगने से दर्दनाक मौत हो गई। घटना के बाद पूरे समारोह में अफरा-तफरी मच गई और खुशी का माहौल पल भर में गम में बदल गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, थाना मिर्जापुर क्षेत्र के गांव मजहरा निवासी रामदीन का 24 वर्षीय पुत्र रुद्र प्रताप गांव में ही आयोजित एक शादी समारोह में दावत खाने गया था। बताया जा रहा है कि समारोह के दौरान अचानक किसी विद्युत उपकरण या खुले तार के संपर्क में आने से उसे तेज करंट लग गया, जिससे वह गंभीर रूप से झुलस गया और मौके पर ही बेहोश होकर गिर पड़ा।
घटना होते ही वहां मौजूद लोगों में हड़कंप मच गया। परिजन और ग्रामीण आनन-फानन में उसे उपचार के लिए लोहिया अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। युवक की मौत की खबर मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया।
इस हादसे के बाद शादी समारोह की खुशियां मातम में बदल गईं। वहीं स्थानीय लोगों ने शादी आयोजनों में बिजली व्यवस्था की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। पुलिस ने मामले की जानकारी लेकर आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी है।

पीडब्ल्यूडी विभाग की बड़ी लापरवाही, बारिश में दलदल बनी राजेपुर-डबरी सड़क

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अमृतपुर/फर्रुखाबाद

राजेपुर-डबरी मुख्य मार्ग पर चल रहा अधूरा सड़क निर्माण कार्य अब सीधे तौर पर लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। सोमवार को हुई बारिश ने विभागीय लापरवाही और ठेकेदार की सुस्ती की पूरी तस्वीर सामने ला दी। सड़क पर फैले कीचड़ और जलभराव ने इसे दलदल में बदल दिया है, जिससे आम जनता का चलना तक मुश्किल हो गया है।
स्थानीय लोगों के अनुसार यह सड़क कई महीनों से अधूरी पड़ी है, लेकिन पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा न तो कार्य में तेजी लाई गई और न ही गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया। बारिश के बाद हालात इतने बिगड़ गए हैं कि सड़क पर बने गड्ढे तालाब जैसे दिखाई दे रहे हैं। दोपहिया वाहन चालक आए दिन फिसलकर गिर रहे हैं, जबकि पैदल चलने वाले लोग जान जोखिम में डालकर निकलने को मजबूर हैं।
सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और ग्रामीणों को झेलनी पड़ रही है। बच्चों को कीचड़ और पानी के बीच से होकर स्कूल जाना पड़ रहा है, जिससे उनकी सुरक्षा पर गंभीर खतरा बना हुआ है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद पीडब्ल्यूडी विभाग और संबंधित अधिकारियों ने इस समस्या को नजरअंदाज किया।
लोगों में इस बात को लेकर खासा आक्रोश है कि हर साल बारिश में यही स्थिति बनती है, लेकिन विभाग कोई स्थायी समाधान नहीं करता। ठेकेदार की लापरवाही और अधिकारियों की अनदेखी के चलते सड़क की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पीडब्ल्यूडी विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए तथा सड़क निर्माण कार्य को प्राथमिकता के आधार पर जल्द से जल्द पूरा कराया जाए। साथ ही जलनिकासी की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।

यूपी की अर्थव्यवस्था पर ‘बड़ा दावा’, क्या सच में ‘बीमारू’ से ‘रेवेन्यू सरप्लस’ तक का सफर पूरा हो गया?

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शरद कटियार
सत्ता के मंच से जब आंकड़े और दावे गूंजते हैं, तो वे सिर्फ राजनीतिक संदेश नहीं होते—वे राज्य की आर्थिक सच्चाई का आईना भी बनते हैं। सहकारी समितियां एवं पंचायत लेखा परीक्षा विभाग के नव चयनित लेखा परीक्षकों को नियुक्ति-पत्र वितरण कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो तस्वीर पेश की, वह एक ‘परिवर्तित उत्तर प्रदेश’ की कहानी कहती है—लेकिन क्या यह पूरी कहानी है?
मुख्यमंत्री का दावा है कि 2017 से पहले उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य था, जिसे बैंक कर्ज देने से भी कतराते थे। आज वही राज्य ‘रेवेन्यू सरप्लस’ बन चुका है। यह दावा राजनीतिक रूप से जितना आकर्षक है, आर्थिक रूप से उतना ही जटिल भी।
रेवेन्यू सरप्लस बनाम कर्ज का सच
रेवेन्यू सरप्लस का मतलब होता है कि सरकार की आमदनी (राजस्व) उसके नियमित खर्च से ज्यादा है। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक हिस्सा है। असल सवाल यह है कि राज्य का कुल कर्ज कितना है, और विकास परियोजनाओं के लिए किस स्तर तक उधारी ली जा रही है।
सरकारी बजट दस्तावेजों के अनुसार, उत्तर प्रदेश का कुल कर्ज लगातार बढ़ते ग्राफ पर है और हर साल हजारों करोड़ रुपये की उधारी का प्रावधान रखा जाता है। ऐसे में ‘बिना कर्ज विकास’ का दावा तकनीकी रूप से आधा सच भी हो सकता है और राजनीतिक प्रस्तुति भी।
मुख्यमंत्री ने गंगा एक्सप्रेसवे को मॉडल प्रोजेक्ट के तौर पर पेश किया,करीब 600 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेसवे, जिस पर 36,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो रहा है और कुल निवेश 42,000 करोड़ के आसपास बताया गया है। इसके साथ 9 इंडस्ट्रियल और लॉजिस्टिक हब, 7000 एकड़ जमीन पर विकसित किए जा रहे हैं।
यह निश्चित रूप से यूपी के इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इन प्रोजेक्ट्स से तत्काल रोजगार और आय में उतनी तेजी से वृद्धि होगी, जितनी तेजी से इनके आंकड़े पेश किए जा रहे हैं?
सरकार का दावा है कि कानून व्यवस्था सुधरी है, निवेश बढ़ा है और वित्तीय अनुशासन कायम हुआ है। इसमें आंशिक सच्चाई भी दिखती है एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, डिफेंस कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट्स इसका प्रमाण हैं।
लेकिन दूसरी तरफ बेरोजगारी, कृषि आय, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं। युवा वर्ग, जो इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी होना चाहिए, वही सबसे ज्यादा सवाल भी उठा रहा है।
इस कार्यक्रम का सबसे अहम पहलू वह युवा वर्ग है, जिसे लेखा परीक्षक के रूप में सिस्टम का हिस्सा बनाया गया है। यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि वित्तीय पारदर्शिता की जिम्मेदारी है।
अगर सरकार वास्तव में ‘वित्तीय अनुशासन’ की बात कर रही है, तो इन युवाओं की भूमिका बेहद अहम होगी क्योंकि वही तय करेंगे कि आंकड़े सिर्फ कागजों तक सीमित हैं या जमीन पर भी उतर रहे हैं।
निष्कर्ष: दावा बड़ा है, पर परीक्षा बाकी है
उत्तर प्रदेश ने निश्चित रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक स्तर पर बदलाव की दिशा पकड़ी है। लेकिन ‘बीमारू से रेवेन्यू सरप्लस’ तक का सफर केवल दावों से पूरा नहीं होता इसके लिए जमीनी आंकड़ों, पारदर्शिता और जनता के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार जरूरी है।
आज का सवाल यही है क्या यूपी वाकई आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह पर स्थायी रूप से आगे बढ़ चुका है, या यह अभी भी एक अधूरी कहानी है, जिसे पूरा होने में वक्त लगेगा?