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Friday, April 3, 2026
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हथियारों को त्याग कर ज्ञान और करुणा के दीप जलाने से ही बचेगी मानव सभ्यता

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(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विनायक फीचर्स)

मानवीय सभ्यता की कहानी वास्तव में मनुष्य की जिजीविषा और उसके संघर्षों की एक लंबी दास्तान है।
सभ्यता सामाजिक नियमों का परिपालन चाहती है, इन मान्य प्रचलित नियमों की अवहेलना युद्ध की जन्मदात्री बनती है।
संपत्ति, संसाधन , स्त्री , या जमीन के लिए युगों से युद्ध होते रहे हैं। हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि विकास और विनाश सिक्के के दो पहलू रहे हैं। सभ्यता का अर्थ अगर सुसंस्कृत होना है तो युद्ध उसी संस्कृति का एक काला अध्याय है।
आदिम युग में जब मनुष्य वनों में रहता था तब उसकी लड़ाई केवल अस्तित्व को बचाने की थी। वह भोजन के लिए लड़ता था और जंगली जानवरों से स्वयं की रक्षा करता था। धीरे धीरे उसने समूह में रहना सीखा और यहीं से समाज की नींव पड़ी। समाज बनने के साथ ही अधिकारों की भावना जागी और इसी भावना ने युद्ध को जन्म दिया।
प्रारंभिक बस्तियों ने जब नगरों का रूप लिया तो संसाधनों पर कब्जे की होड़ शुरू हो गई। नदियों के किनारों पर फली फूली सभ्यताएं पानी और उपजाऊ भूमि के लिए आपस में टकराने लगीं। विकास की दौड़ में मनुष्य ने पहिए का आविष्कार किया और इसी पहिए ने युद्ध के रथों को गति दी। धातु की खोज हुई तो कुल्हाड़ी के साथ साथ तलवारें भी बनाई जाने लगीं। यह एक विडंबना ही है कि मनुष्य ने अपनी बुद्धि का उपयोग जीवन को सुगम बनाने के साथ साथ दूसरों के जीवन को संकट में डालने के लिए भी किया। जैसे जैसे साम्राज्य बढ़े वैसे वैसे सीमाओं का विस्तार हुआ और उन सीमाओं की रक्षा के लिए रक्तपात अनिवार्य मान लिया गया।
इतिहास के पन्ने पलटें तो महान सभ्यताओं के उदय और पतन में युद्धों की बड़ी भूमिका रही है। मेसोपोटामिया से लेकर सिंधु घाटी तक और रोम के वैभव से लेकर चीन की महान दीवार तक हर जगह विजय और पराजय की गाथाएं अंकित हैं। महान सम्राटों ने शांति की स्थापना के नाम पर विशाल सेनाएं खड़ी कीं। उन्होंने विशाल किलों का निर्माण किया जो आज भी हमारी वास्तुशिल्प की उन्नति के गवाह हैं। लेकिन इन किलों की दीवारों के पीछे अनगिनत चीखें और रक्त की बूंदें दफन हैं। विकास ने हमें विज्ञान दिया और विज्ञान ने हमें बारूद थमा दिया। तलवारों की जगह तोपें आ गईं और आमने सामने की लड़ाई दूर से वार करने वाले हथियारों में बदल गई।
मध्यकाल तक आते आते युद्ध केवल जमीन का टुकड़ा जीतने का माध्यम नहीं रह गए। अब विचारधाराओं और धर्मों के नाम पर तलवारें खिंचने लगीं। मनुष्य ने कला और संस्कृति के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की लेकिन उसके भीतर का शिकारी कभी शांत नहीं हुआ। वह महलों में रहने लगा और रेशमी वस्त्र पहनने लगा पर उसकी आंखें अब भी पड़ोसी के वैभव पर टिकी रहती थीं। व्यापार के मार्ग खुले तो उन पर अधिकार जमाने के लिए नौसेनाएं तैयार की गईं। समुद्रों की लहरें भी मानवीय रक्त से लाल होने लगीं। खोज और आविष्कार की इस यात्रा ने मानवता को सात महाद्वीपों तक पहुँचाया लेकिन साथ ही गुलामी और शोषण की नई व्यवस्थाएं भी दीं।
औद्योगिक क्रांति ने दुनिया का चेहरा पूरी तरह बदल दिया। कारखानों से उत्पादन बढ़ा और देशों की भूख भी बढ़ गई। कच्चे माल की तलाश और तैयार माल को बेचने की होड़ ने विश्व को दो भयानक युद्धों की आग में झोंक दिया। बीसवीं सदी का विकास अभूतपूर्व था लेकिन इसी सदी ने हिरोशिमा और नागासाकी का वह मंजर भी देखा जिसने मानवीय चेतना को झकझोर दिया। परमाणु शक्ति जो ऊर्जा का स्रोत बन सकती थी वह सर्वनाश का प्रतीक बन गई। विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि ने ही मनुष्य को सबसे अधिक डरा दिया। आज हम अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने की सोच रहे हैं लेकिन धरती पर शांति स्थापित करने में अब भी संघर्ष कर रहे हैं।
युद्ध ने तकनीकी विकास को गति तो दी है पर मानवीय मूल्यों को पीछे धकेल दिया है। हवाई जहाज से लेकर रडार और इंटरनेट तक कई महान आविष्कार युद्ध की जरूरतों के कारण ही अस्तित्व में आए। सेनाओं को बेहतर संचार चाहिए था इसलिए हमने सूचना क्रांति का सूत्रपात किया। सैनिकों की जान बचाने के लिए चिकित्सा विज्ञान ने नई ऊंचाइयां छुईं। लेकिन क्या इस भौतिक उन्नति की कीमत उन करोड़ों मासूमों की जान से ज्यादा है जो इन युद्धों में स्वाहा हो गए। सभ्यता का विकास तभी सार्थक है जब वह संवेदनशील समाज का निर्माण करे। आज की दुनिया हथियारों के ढेर पर बैठी है और एक छोटी सी चूक सदियों की मेहनत को राख कर सकती है।
आधुनिक युग में युद्ध का स्वरूप बदल गया है। अब केवल सीमाओं पर गोलियां नहीं चलतीं बल्कि आर्थिक और साइबर युद्ध के माध्यम से भी देशों को घुटनों पर लाया जाता है। हमने विकास के नाम पर प्रकृति को भी युद्ध का मैदान बना दिया है। जंगलों का कटना और प्रदूषण का बढ़ना भी एक तरह का युद्ध ही है जो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के खिलाफ लड़ रहे हैं। सच्चा विकास वह है जो समन्वय और सहअस्तित्व की भावना पर आधारित हो। मानवीय सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हमारे पास कितने उन्नत हथियार हैं बल्कि इस पर निर्भर करता है कि हम आपसी मतभेदों को कितनी समझदारी से सुलझाते हैं।
सभ्यता की लंबी यात्रा में हमने बहुत कुछ सीखा है। हमने लोकतंत्र को अपनाया और मानवाधिकारों की बात की। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं बनाई गईं ताकि संवाद के माध्यम से विवाद सुलझाए जा सकें। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य अब युद्ध की विभीषिका से ऊब चुका है। वह शांति और प्रेम की भाषा समझना चाहता है। बुद्ध और गांधी जैसे महापुरुषों ने हमें अहिंसा का मार्ग दिखाया जो आज भी सबसे अधिक प्रासंगिक है। विकास की परिभाषा केवल ऊंचे भवन और तेज रफ्तार गाड़ियां नहीं होनी चाहिए। एक ऐसा समाज जहां हर व्यक्ति सुरक्षित महसूस करे वही वास्तव में विकसित समाज कहलाने का अधिकारी है।
अंत में हमें यह समझना होगा कि युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। हर युद्ध अपने पीछे विनाश और प्रतिशोध की नई कहानियां छोड़ जाता है। मानवीय सभ्यता का वास्तविक उत्कर्ष तभी संभव है जब हमारी बुद्धि और हृदय के बीच संतुलन हो। हम विज्ञान की शक्ति का उपयोग दुखों को दूर करने के लिए करें न कि नए जख्म देने के लिए। भविष्य की राहें तभी प्रशस्त होंगी जब हम हथियारों को त्याग कर ज्ञान और करुणा के दीप जलाएंगे। सभ्यता की मशाल को जलते रहने के लिए शांति की हवा की जरूरत है न कि नफरत के तूफान की। मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना ही विकास की अंतिम मंजिल होनी चाहिए। (विनायक फीचर्स)

लोहिया चिकित्सालय की ओपीडी व्यवस्था चरमराई, डॉक्टरों के न पहुंचने से मरीजों को घंटों करना पड़ा इंतजार

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फर्रुखाबाद। डॉ राम मनोहर लोहिया चिकित्सालय में स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था एक बार फिर उजागर हुई है। अस्पताल की ओपीडी में डॉक्टरों के समय पर न पहुंचने के कारण मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ा। इस दौरान कई मरीज जमीन पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करते रहे, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ गई।
मिली जानकारी के अनुसार, सुबह से ही बड़ी संख्या में मरीज इलाज कराने के लिए अस्पताल की ओपीडी में पहुंच गए थे, लेकिन निर्धारित समय के बाद भी चिकित्सक अपनी सीट पर नहीं पहुंचे। इंतजार करते-करते मरीजों की लंबी कतार लग गई और बैठने की उचित व्यवस्था न होने के कारण कई मरीजों को जमीन पर ही बैठना पड़ा।
घंटों इंतजार के बाद भी जब डॉक्टर नहीं पहुंचे, तो कई मरीजों ने मजबूरी में अस्पताल से लौटना ही बेहतर समझा। इसके बाद उन्होंने निजी चिकित्सकों के यहां जाकर इलाज कराया, जिससे उन्हें अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी उठाना पड़ा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि लोहिया अस्पताल में यह कोई नई बात नहीं है। अक्सर डॉक्टरों की अनुपस्थिति और अव्यवस्था के कारण मरीजों को भटकना पड़ता है। कई बार शिकायतों के बावजूद भी स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है।
इस तरह की लापरवाही न केवल मरीजों की सेहत के साथ खिलवाड़ है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर भी सवाल खड़े करती है। लोगों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि मामले की जांच कर दोषी चिकित्सकों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि मरीजों को समय पर और बेहतर उपचार मिल सके।

सरकारी अस्पतालों की लापरवाही उजागर, मरीजों को नहीं मिल रहीं चादरें—योगी सरकार के प्रयासों पर उठे सवाल

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फर्रुखाबाद। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को बेहतर से बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लगातार निर्देश दिए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। अस्पताल प्रशासन और कर्मचारियों की लापरवाही के चलते मरीजों को मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रहना पड़ रहा है।
ताजा मामला जिला अस्पताल से सामने आया है, जहां वार्ड में भर्ती मरीजों को बेड पर चादर तक उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। मजबूरी में मरीजों को बिना चादर के ही बेड पर लेटना पड़ रहा है, जो न केवल नियमों के विरुद्ध है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहद खतरनाक है।
मरीजों और उनके तीमारदारों का कहना है कि कई बार अस्पताल कर्मचारियों से चादर की मांग की गई, लेकिन हर बार उन्हें टाल दिया गया। इस तरह की लापरवाही से संक्रमण फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे अन्य मरीजों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ सकता है।
सरकार द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अस्पताल स्तर पर कर्मचारियों की उदासीनता इन प्रयासों पर पानी फेरती नजर आ रही है। यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

रजाई के अंदर दम घुटने से एक माह की मासूम की दर्दनाक मौत, परिवार में मचा कोहराम

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फर्रुखाबाद। जनपद के मऊ दरवाजा थाना क्षेत्र से एक बेहद दर्दनाक और हृदयविदारक घटना सामने आई है, जहां एक माह की मासूम बच्ची की रजाई के अंदर दम घुटने से मौत हो गई। घटना के बाद परिवार में कोहराम मच गया और पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, थाना मऊ दरवाजा क्षेत्र के अंतर्गत जसमई निवासी एक परिवार की एक माह की मासूम पुत्री ‘बेवी’ रात में घर पर सो रही थी। परिजनों ने ठंड से बचाने के लिए उसके ऊपर रजाई डाल दी थी। इसी दौरान मासूम का रजाई के अंदर दम घुट गया, जिससे उसकी मौके पर ही हालत गंभीर हो गई।
जब परिजनों को घटना की जानकारी हुई तो आनन-फानन में बच्ची को लेकर लोहिया अस्पताल पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मासूम की मौत की खबर सुनते ही परिवार में चीख-पुकार मच गई और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया।
इस दर्दनाक घटना ने सभी को झकझोर कर रख दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ठंड से बचाव के दौरान इस तरह की लापरवाही कभी-कभी जानलेवा साबित हो जाती है। चिकित्सकों का भी कहना है कि छोटे बच्चों को सुलाते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि उनकी सांस लेने की क्षमता कमजोर होती है और ज्यादा ढकने से दम घुटने का खतरा बढ़ जाता है।

नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाने व जबरन शादी का दबाव, मां समेत दो पर मुकदमा दर्ज

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फर्रुखाबाद

फतेहगढ़ कोतवाली क्षेत्र से एक सनसनीखेज और गंभीर मामला सामने आया है, जिसने क्षेत्र में दहशत और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। यहां एक 14 वर्षीय नाबालिग किशोरी को बहला-फुसलाकर ले जाने और उस पर जबरन शादी का दबाव बनाने का आरोप लगा है। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में पीड़िता की मां की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है। पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए त्वरित कार्रवाई कर मां समेत दो आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, राजन नगला भोलेपुर निवासी सलोनी ने कोतवाली फतेहगढ़ में तहरीर देकर बताया कि बीते 12 मार्च को उनकी मां लक्ष्मी देवी उनकी 14 वर्षीय नाबालिग बहन को बहाने से फर्रुखाबाद बस अड्डे ले गईं। वहां पहले से मौजूद एक युवक से उसकी मुलाकात कराई गई। आरोप है कि यह पूरी घटना पूर्व नियोजित साजिश के तहत अंजाम दी गई।
शिकायत में बताया गया कि बस अड्डे पर शाहजहांपुर जिले के सरैयां गांव निवासी लगभग 26 वर्षीय रामदेव उर्फ भूरा पहले से मौजूद था। मां लक्ष्मी देवी अपनी बेटी को वहीं छोड़कर वापस लौट आईं, जिसके बाद आरोपी युवक नाबालिग को अपने साथ बहला-फुसलाकर ले गया। पीड़िता का आरोप है कि आरोपी ने उसे अपने घर में रखकर लगातार शादी करने का दबाव बनाया और विरोध करने पर उसे धमकाया गया।
इतना ही नहीं, पीड़िता ने अपनी मां पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने भी आरोपी का साथ दिया और उसे जबरन उसके साथ रहने तथा अनुचित संबंध बनाने के लिए उकसाया। किसी तरह पीड़िता ने फोन के माध्यम से अपनी बहन सलोनी को पूरी घटना की जानकारी दी, जिसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा।
सूचना मिलते ही कोतवाली फतेहगढ़ पुलिस सक्रिय हुई और मामले में आरोपी रामदेव उर्फ भूरा तथा लक्ष्मी देवी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 की धारा 61(2), 137(2) और 87 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस का कहना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच तेज कर दी गई है,

दूध में गिरी छिपकली से बनी चाय पीने पर तीन मासूमों की हालत बिगड़ी

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फर्रुखाबाद| मऊ दरवाजा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कटरी शिकारपुर गांव में शुक्रवार सुबह एक गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया, जिसने पूरे गांव में हड़कंप मचा दिया। घर में रखे दूध में अनजाने में गिरी छिपकली से बनी चाय पीने के बाद तीन मासूम बच्चों की अचानक तबीयत बिगड़ गई। परिजनों ने बिना देर किए तीनों को तत्काल डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती कराया, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज जारी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, गांव निवासी रामवीर ने बताया कि गुरुवार शाम को घर में भैंस का दूध निकालकर एक बाल्टी में सुरक्षित रख दिया गया था। रात के दौरान किसी समय उस दूध में एक छिपकली गिर गई, लेकिन इसकी भनक घर के किसी सदस्य को नहीं लगी। शुक्रवार सुबह जब परिवार की महिला ने उसी दूध को उबालकर चाय तैयार की, तो अनजाने में वह दूषित दूध उपयोग में आ गया।
यह चाय रामवीर के भाई प्रेमपाल के तीन बेटे—सोहिल (13 वर्ष), शोभित (11 वर्ष) और मोहित—ने पी ली। चाय पीने के बाद तीनों बच्चे सामान्य दिनचर्या के तहत खेत की ओर चले गए। शुरुआत में सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन कुछ ही देर बाद खेत पर काम करते समय बच्चों को पेट में तेज जलन, घबराहट और बेचैनी महसूस होने लगी। उनकी हालत बिगड़ती देख परिवार के अन्य सदस्य भी चिंतित हो उठे।
इसी दौरान घर पर दूध गर्म करते समय महिला की नजर बाल्टी में पड़ी मृत छिपकली पर पड़ी, जिससे पूरे परिवार में अफरा-तफरी मच गई। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तुरंत बच्चों को फोन कर इसकी जानकारी दी गई। सूचना मिलते ही परिजन तुरंत खेत पहुंचे और बच्चों को लेकर अस्पताल की ओर दौड़े।
अस्पताल में डॉक्टरों ने तत्काल प्राथमिक उपचार शुरू किया और बच्चों को निगरानी में रखा गया। चिकित्सकों के अनुसार समय रहते अस्पताल पहुंचाने के कारण स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन एहतियात के तौर पर तीनों बच्चों का लगातार स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है।