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Tuesday, May 12, 2026
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यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा पर फिर उठे सवाल, वायरल वीडियो के बाद भर्ती बोर्ड हरकत में

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लखनऊ।पुलिस उपनिरीक्षक सीधी भर्ती-2025 को लेकर नया विवाद सामने आया है। लिखित परीक्षा परिणाम में कथित धांधली के आरोपों के बीच सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो ने पुलिस और भर्ती बोर्ड की चिंता बढ़ा दी है। मामले में अब आधिकारिक स्तर पर एफआईआर दर्ज करा दी गई है।

जानकारी के मुताबिक आशुतोष पांडे नाम की फेसबुक आईडी से एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती परीक्षा के परिणाम को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए। वीडियो में चयन प्रक्रिया और रिजल्ट में गड़बड़ी होने का दावा किया गया। वीडियो तेजी से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैलने लगा, जिसके बाद अभ्यर्थियों के बीच भी हलचल बढ़ गई।

मामले को गंभीरता से लेते हुए भर्ती बोर्ड की ओर से हुसैनगंज पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया गया है। पुलिस ने वायरल वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट और संबंधित डिजिटल साक्ष्यों की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि भ्रामक जानकारी फैलाकर भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
सूत्रों के अनुसार एफआईआर में सोशल मीडिया के जरिए अफवाह फैलाने, भर्ती प्रक्रिया पर अविश्वास पैदा करने और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित करने जैसी धाराएं शामिल की गई हैं। साइबर सेल भी मामले की जांच में जुट गई है और वायरल कंटेंट की तकनीकी पड़ताल की जा रही है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती परीक्षाएं पहले भी पेपर लीक और पारदर्शिता को लेकर विवादों में रही हैं। ऐसे में एसआई भर्ती-2025 से जुड़ा यह नया विवाद लाखों अभ्यर्थियों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। विपक्षी दल भी समय-समय पर भर्ती प्रक्रियाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं।
फिलहाल पुलिस का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और किसी भी तरह की भ्रामक सूचना फैलाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। वहीं अभ्यर्थियों की नजर अब जांच और भर्ती बोर्ड की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।

रिश्तेदारी के विवाद में गांव में बवाल, पुलिस ने छह लोगों को हिरासत में लिया

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फर्रुखाबाद। थाना क्षेत्र के एक गांव में पारिवारिक विवाद उस समय बढ़ गया जब बच्चों को साथ ले जाने को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। देखते ही देखते मामला इतना बढ़ गया कि गांव में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रण में लेकर कई लोगों को हिरासत में ले लिया।
जानकारी के अनुसार मोहम्मदाबाद निवासी एक युवक लंबे समय से बीमारी से जूझ रहा है और उपचार के लिए बाहर जाने की तैयारी कर रहा था। युवक के बच्चे अपनी मां के साथ ननिहाल में रह रहे थे। बताया गया कि युवक ने अपने परिजनों को गांव भेजकर बच्चों को साथ भेजने की बात कही थी। इसी दौरान दोनों पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हो गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक बातचीत के दौरान माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया और दोनों पक्षों में धक्का-मुक्की होने लगी। आरोप-प्रत्यारोप के बीच मौके पर काफी भीड़ जमा हो गई। विवाद बढ़ने पर किसी ने पुलिस को सूचना दे दी।
उधर महिला पक्ष की ओर से आरोप लगाया गया कि उसे दबाव बनाकर जबरन भेजने का प्रयास किया जा रहा था। सूचना मिलते ही थाना पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास किया। काफी देर तक चली बातचीत के बाद पुलिस ने स्थिति को शांत कराया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने हंगामे में शामिल छह लोगों को हिरासत में लेकर थाने पहुंचाया। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि गांव में शांति व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से संबंधित लोगों के खिलाफ शांति भंग की कार्रवाई की गई है।

प्रकृति का संतुलन: केवल पेड़ों से नहीं बनेगी ठंडी धरती

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डॉ विजय गर्ग
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी की समस्या से जूझ रही है। हर वर्ष गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। शहरों में हीट वेव आम होती जा रही है, जंगलों में आग बढ़ रही है और पानी का संकट गंभीर होता जा रहा है। ऐसे समय में एक बात बार-बार सुनाई देती है—

“ज्यादा पेड़ लगाओ, धरती को ठंडा बनाओ।”

स्कूलों, सरकारी अभियानों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों द्वारा वृक्षारोपण को जलवायु संकट का सबसे बड़ा समाधान बताया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पेड़ प्रकृति के अमूल्य उपहार हैं। वे ऑक्सीजन देते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, छाया प्रदान करते हैं और जैव विविधता को बचाते हैं।

लेकिन पर्यावरण विज्ञान हमें एक महत्वपूर्ण सच्चाई भी बताता है—

“अधिक पेड़ हमेशा कम गर्मी का मतलब नहीं होते।”

यह सुनने में अजीब लग सकता है, क्योंकि हमने हमेशा पेड़ों को ठंडक से जोड़कर देखा है। परंतु वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। यदि बिना योजना, बिना स्थानीय परिस्थितियों को समझे और बिना वैज्ञानिक अध्ययन के वृक्षारोपण किया जाए, तो कई बार इसके नकारात्मक परिणाम भी सामने आते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि पेड़ नुकसानदायक हैं। इसका अर्थ केवल इतना है कि—

सही जगह पर सही पेड़ लगाना जरूरी है।

पेड़ वातावरण को ठंडा कैसे करते हैं?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पेड़ सामान्यतः गर्मी कम करने में कैसे मदद करते हैं।

1. छाया प्रदान करना

पेड़ सूर्य की सीधी किरणों को जमीन तक पहुंचने से रोकते हैं। इससे सड़कें, इमारतें और मिट्टी कम गर्म होती हैं।

2. वाष्पोत्सर्जन

पेड़ अपनी पत्तियों से जलवाष्प छोड़ते हैं। यह प्रक्रिया आसपास के वातावरण को ठंडा करती है, ठीक वैसे जैसे पसीना शरीर को ठंडा करता है।

3. कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण

पेड़ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख कारण है।

4. वायु गुणवत्ता में सुधार

पेड़ धूल, धुआं और प्रदूषण कम करते हैं, जिससे वातावरण स्वस्थ बनता है।

इन्हीं कारणों से दुनिया भर में वृक्षारोपण को जलवायु समाधान के रूप में देखा जाता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब “हर जगह अधिक पेड़” को ही एकमात्र समाधान मान लिया जाता है।
हर जगह जंगल बनाना सही नहीं

1. सभी भूमि जंगल बनने के लिए नहीं होती

अक्सर लोग घास के मैदानों, सूखी भूमि या खुले क्षेत्रों को “बेकार जमीन” समझ लेते हैं। फिर वहां बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए जाते हैं।

लेकिन पर्यावरण विज्ञान बताता है कि:

घास के मैदान भी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र हैं।

वे अनेक पक्षियों, कीटों और जानवरों का घर होते हैं।

कई प्रजातियां खुले क्षेत्रों में ही जीवित रह सकती हैं।

यदि हर जगह घने जंगल बना दिए जाएं, तो कई प्राकृतिक प्रजातियां समाप्त हो सकती हैं।

इसलिए प्रकृति में केवल जंगल ही महत्वपूर्ण नहीं हैं; घासभूमि, दलदली क्षेत्र और रेगिस्तान भी उतने ही आवश्यक हैं।

अधिक पेड़ कभी-कभी गर्मी बढ़ा भी सकते हैं

2. गहरे रंग के जंगल अधिक गर्मी सोखते हैं

यह बात कम लोग जानते हैं कि जंगल सूर्य की गर्मी को अधिक अवशोषित करते हैं।

इसे विज्ञान में “अल्बीडो प्रभाव” कहा जाता है।

अल्बीडो क्या है?

किसी सतह द्वारा सूर्य के प्रकाश को वापस परावर्तित करने की क्षमता को अल्बीडो कहते हैं।

बर्फ सूर्य का अधिकांश प्रकाश वापस भेज देती है।

घास कुछ प्रकाश परावर्तित करती है।

लेकिन घने जंगल अधिक गर्मी सोख लेते हैं।

ठंडे क्षेत्रों में यदि बर्फ वाली भूमि पर बड़े जंगल उगा दिए जाएं, तो कई बार पृथ्वी अधिक गर्म हो सकती है।

यानी हर परिस्थिति में जंगल तापमान कम नहीं करते।

पेड़ों को भी बहुत पानी चाहिए

3. अत्यधिक वृक्षारोपण जल संकट बढ़ा सकता है

पेड़ पानी का उपयोग करते हैं। कुछ पेड़ बहुत अधिक पानी खींचते हैं।

विशेष रूप से:

यूकेलिप्टस

पॉपलर

कुछ विदेशी प्रजातियां

ये भूजल तेजी से कम कर सकती हैं।

कई क्षेत्रों में किसानों ने शिकायत की है कि बड़े पैमाने पर लगाए गए कुछ पेड़ों के कारण:

कुएं सूख गए

मिट्टी की नमी कम हो गई

खेती प्रभावित हुई

सूखे और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में बिना सोचे-समझे वृक्षारोपण जल संकट को और गंभीर बना सकता है।

शहरों में पेड़ हमेशा समाधान नहीं

4. गलत शहरी वृक्षारोपण गर्मी फंसा सकता है

शहरों में पेड़ जरूरी हैं, लेकिन वैज्ञानिक योजना के साथ।

यदि:

संकरी गलियों में बहुत घने पेड़ लगा दिए जाएं,

हवा के प्रवाह को रोक दिया जाए,

ऊंची इमारतों के बीच गलत पेड़ लगाए जाएं,

तो गर्म हवा फंस सकती है।

इससे:

नमी बढ़ती है,

उमस बढ़ती है,

गर्मी और असहज महसूस हो सकती है।

इसलिए शहरी वृक्षारोपण केवल संख्या का खेल नहीं होना चाहिए।

विदेशी पेड़ स्थानीय प्रकृति को नुकसान पहुंचा सकते हैं

5. हर पेड़ पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं होता

अक्सर वृक्षारोपण अभियान में तेजी से बढ़ने वाले विदेशी पेड़ लगाए जाते हैं।

लेकिन ऐसी प्रजातियां:

स्थानीय पौधों को नष्ट कर सकती हैं,

मिट्टी की गुणवत्ता बदल सकती हैं,

जैव विविधता कम कर सकती हैं।

भारत में कई क्षेत्रों में विदेशी प्रजातियों ने स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाया है।

स्थानीय जलवायु के अनुसार देशी पेड़ अधिक लाभकारी होते हैं।
घने जंगल और जंगल की आग

6. अत्यधिक घनत्व जंगलों को खतरनाक बना सकता है

यदि जंगलों का उचित प्रबंधन न हो, तो:

सूखी लकड़ी जमा होती रहती है,

आग तेजी से फैलती है,

जंगलों में भीषण आग लग सकती है।

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया में जंगल की आग पहले से अधिक खतरनाक हो चुकी है।

इसलिए केवल अधिक पेड़ लगाना ही पर्याप्त नहीं; जंगलों का वैज्ञानिक प्रबंधन भी जरूरी है।

केवल पेड़ लगाने से जलवायु संकट हल नहीं होगा

आज कई लोग मानते हैं कि बस पेड़ लगाकर ग्लोबल वार्मिंग रोक दी जाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि जलवायु संकट बहुत जटिल है।

हमें साथ-साथ:

प्रदूषण कम करना होगा,

जीवाश्म ईंधन का उपयोग घटाना होगा,

जल संरक्षण करना होगा,

टिकाऊ खेती अपनानी होगी,

ऊर्जा दक्षता बढ़ानी होगी।

पेड़ समाधान का हिस्सा हैं, पूरा समाधान नहीं।

पुराने जंगलों को बचाना ज्यादा जरूरी

आज दुनिया में लाखों पेड़ लगाए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर पुराने प्राकृतिक जंगल तेजी से काटे जा रहे हैं।

एक पुराना प्राकृतिक जंगल:

हजारों नए पौधों से अधिक कार्बन संग्रहित करता है,

अधिक जैव विविधता बचाता है,

जल चक्र को स्थिर रखता है,

मिट्टी को सुरक्षित रखता है।

इसलिए नए पौधे लगाने से अधिक जरूरी है—

मौजूदा जंगलों को बचाना।

वृक्षारोपण बनाम पर्यावरण संरक्षण

आज कई बार वृक्षारोपण केवल फोटो अभियान बनकर रह जाता है।

लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन:

उनकी देखभाल नहीं होती,

वे कुछ महीनों में सूख जाते हैं,

केवल आंकड़े बढ़ाए जाते हैं।

पर्यावरण संरक्षण का असली उद्देश्य होना चाहिए:

पेड़ों का जीवित रहना,

सही प्रजाति चुनना,

स्थानीय पारिस्थितिकी बचाना।
प्रकृति संतुलन पर चलती है

प्रकृति का नियम है—संतुलन।

यदि किसी एक तत्व को जरूरत से ज्यादा बढ़ा दिया जाए, तो असंतुलन पैदा हो सकता है।

हर क्षेत्र की अपनी प्राकृतिक पहचान होती है:

कहीं जंगल उचित हैं,

कहीं घासभूमि,

कहीं दलदली क्षेत्र,

कहीं खुला मरुस्थल।

सभी जगह एक जैसा पर्यावरण नहीं बनाया जा सकता।

स्थानीय ज्ञान का महत्व

ग्रामीण और आदिवासी समुदाय अक्सर प्रकृति को बेहतर समझते हैं।

वे जानते हैं:

कौन सा पेड़ कहां उगना चाहिए,

कौन सी भूमि खुली रहनी चाहिए,

किस क्षेत्र में पानी की कमी है,

कौन से पौधे स्थानीय जीवन के लिए उपयोगी हैं।

पर्यावरण योजनाओं में स्थानीय अनुभवों को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है।

भविष्य के लिए सही संदेश

हमें बच्चों और समाज को यह नहीं सिखाना चाहिए कि—

“जितने ज्यादा पेड़, उतनी कम गर्मी।”

बल्कि सही संदेश होना चाहिए:

“संतुलित और स्वस्थ पारिस्थितिकी ही जलवायु को सुरक्षित रखती है।”

कभी जंगल जरूरी होते हैं,
कभी घासभूमि,
कभी जल संरक्षण,
और कभी प्रदूषण नियंत्रण।

निष्कर्ष

पेड़ पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक रक्षक हैं। वे जीवन देते हैं, पर्यावरण को सुरक्षित रखते हैं और मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। लेकिन पर्यावरण विज्ञान यह भी स्पष्ट करता है कि हर परिस्थिति में अधिक पेड़ लगाना ही सबसे अच्छा समाधान नहीं होता।

गलत जगह, गलत प्रजाति और बिना योजना के वृक्षारोपण:

जल संकट बढ़ा सकता है,

जैव विविधता को नुकसान पहुंचा सकता है,

स्थानीय पारिस्थितिकी बिगाड़ सकता है,

और कुछ परिस्थितियों में गर्मी भी बढ़ा सकता है।

इसलिए हमारा लक्ष्य केवल अधिक पेड़ लगाना नहीं होना चाहिए, बल्कि—

सही स्थान पर सही पेड़ लगाकर प्रकृति का संतुलन बनाए रखना होना चाहिए।

क्योंकि प्रकृति संख्या से नहीं,

संतुलन से चलती है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

धीरे-धीरे लुप्त हो रहे गांव और ग्रामीण समुदाय: एक सामाजिक चिंता

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डॉ. विजय गर्ग
गांव सिर्फ रहने की जगह नहीं हैं, वे हमारी संस्कृति, परंपराओं और जीवन के असली मूल का प्रतीक हैं। पंजाब के गांवों में कभी साझाकरण, सादगी और सुखी जीवन की एक अनूठी झलक थी। लेकिन आज के तेजी से बदलते समय में यह ग्रामीण जीवन धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। गाँवों की सड़कें धुंधली होती जा रही हैं, और सामुदायिक संबंध कमजोर होते जा रहे हैं।

ग्रामीण जीवन की विशेषता

पुराने समय में गांवों का जीवन सादगी और सहयोग से भरा हुआ था। लोग एक-दूसरे के दुखों में भागीदार होते थे। शादियों, त्यौहारों एवं कृषि कार्यों में पूरा गाँव इकट्ठा हो जाता था। साझा कुएँ, गाँव की चरागाहें एवं खुली हवाओं वाला जीवन एक अलग ही अनुभव प्रदान करता था।

बदलते समय के प्रभाव

आजकल युवा लोग बेहतर शिक्षा और रोजगार के लिए शहरों की ओर बढ़ रहे हैं। इस पलायन के कारण ग्रामीण इलाकों में बुजुर्ग एवं बच्चे ही रह जाते हैं। कृषि में रुचि कम होने तथा आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से देहाती संस्कृति धीरे-धीरे पीछे छूट रही है।

प्रौद्योगिकी के विकास ने जीवन को आसान बना दिया है, लेकिन इसने मानव संबंधों में भी दूरी पैदा कर दी है। जहां पहले लोग चौपाल में बैठकर बात करते थे, वहीं आज वे मोबाइल फोन और सोशल मीडिया में रुचि रखते हैं।

ग्रामीण समुदाय की कमजोरी

गांवों में पहले सामुदायिक एकता बहुत मजबूत थी। लेकिन आजकल यह कम होती जा रही है। लोग अपने निजी जीवन में अधिक समृद्ध हो गए हैं और साझा सोच भी कम हो गई है। इसका गाँवों के सामाजिक ढांचे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

प्रभाव और चुनौतियाँ

गाँवों के लुप्त होने से न केवल संस्कृति को नुकसान हो रहा है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। भारत की रीढ़ कृषि में युवाओं की रुचि कम होना एक चिंताजनक संकेत है।

ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की कमी भी एक बड़ी समस्या है, जिसके कारण लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं।

समाधान की दिशा

ग्रामीण जीवन को बचाने के लिए सरकार एवं समाज दोनों का मिलकर प्रयास करना आवश्यक है। गांवों में अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएँ। कृषि को आधुनिक तकनीक से जोड़कर युवाओं के लिए आकर्षक बनाया जा सकता है।

इसके साथ ही हमें अपनी संस्कृति और परंपराओं को बनाए रखने की आवश्यकता है। गांवों में साझा कार्यक्रमों और गतिविधियों को बढ़ाना चाहिए ताकि सामुदायिक एकता मजबूत हो सके।

पंजाब की आत्मा इसके गांवों में निवास करती थी। एक समय था जब गाँव केवल घरों का समूह नहीं थे, बल्कि साझाकरण, प्यार और गर्मजोशी का जीवित नमूना थे। लेकिन आज के दौर में शहरीकरण और पश्चिमी संस्कृति की चमक ने ग्रामीण जीवन की छवि को बदल दिया है। हमारी विरासत की गवाह बनी ग्रामीण जीवनशैली धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। ग्रामीण समुदाय में हुए परिवर्तन पुराने दिनों में गांवों का जीवन **साझेदारी पर निर्भर था। आज यह तस्वीर काफी बदल गई है:

सभी परिवारों का टूटना: पहले गांवों में बड़े-बड़े साझा परिवार होते थे, जहाँ दादा-दादी की कहानियाँ और माता-पिता द्वारा बच्चों को संस्कार दिए जाते थे। आज गांवों में भी शहरों की तरह ही छोटे-मोटे परिवारों का चलन बढ़ गया है। गायब: गाँव का वह स्थान, जहाँ बुजुर्ग लोग बैठकर दुख-दुख साझा करते थे एवं गाँव के मुद्दों को सुलझाते थे, अब खाली पड़ा है। मोबाइल फोन एवं सोशल मीडिया ने लोगों को अपने घरों तक ही सीमित कर दिया है।
कृषि से दूरी: जो किसान गांवों की अर्थव्यवस्था का आधार थे, अब वे घाटे में हैं। नई पीढ़ी खेती छोड़कर नौकरियों या विदेश जाने को प्राथमिकता दे रही है। लुप्त होते विरासत के संकेत कुछ चीजें जो कभी गांव की पहचान होती थीं, अब केवल संग्रहालयों या पुस्तकों में ही रह गई हैं: विलुप्त होने के मुख्य कारण

विदेश जाने की होड़: पंजाब के गांवों में रहने वाले अधिकांश लोग विदेश जा रहे हैं… पीछे केवल बुजुर्ग और खाली पड़े हुए लोग ही रह गए हैं।
मशीनीकरण: मशीनों ने काम आसान बना दिया, लेकिन मानव संबंधों की समानता कम हो गई। अब सीरी-साझी का प्यार खत्म हो गया है और केवल मजदूरी ही रह गई है।
**शहरी प्रभाव: ग्रामीण लोगों में शहरी दिखावटीपन और प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है, जिसके कारण सादगी खत्म हो रही है।

परिणाम

गाँव हमारे द्वार हैं। अगर गाँव नहीं रहे, तो हमारी संस्कृति और जड़ें भी खत्म हो जाएंगी। इसलिए यह हमारा साझा दायित्व है कि हम ग्रामीण जीवन और समुदाय को बचाने के लिए प्रयास करें।

धीरे-धीरे लुप्त होते गांवों को पुनर्जीवित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस सुंदर और सरल जीवन का अनुभव कर सकें। गाँवों का विलुप्त होना केवल एक भौगोलिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति और नैतिक मूल्यों की हानि है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी भावी पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें, तो हमें अपने गाँव में साझापन और सादगी को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयास करना चाहिए। **”गाँव जीवित रहेंगे, तभी पंजाबियत जीवित रहेगी।
डॉ. विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट पंजाब

मोबाइल स्नैचरों का गैंग बेनकाब, सिकंदरा पुलिस ने 3 बदमाश दबोचे

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आगरा।राह चलते लोगों से मोबाइल छीनने वाले गिरोह का पुलिस ने खुलासा कर दिया है। Sikandra थाना पुलिस ने कार्रवाई करते हुए तीन अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से छीना गया मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया है।
पुलिस के अनुसार कुछ दिनों पहले क्षेत्र में मोबाइल छीनने की घटना सामने आई थी, जिसके बाद पीड़ित की शिकायत पर मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की गई। सीसीटीवी फुटेज, सर्विलांस और स्थानीय मुखबिर तंत्र की मदद से पुलिस आरोपियों तक पहुंची।
गिरफ्तार अभियुक्तों से पूछताछ में मोबाइल स्नैचिंग की वारदात कबूल करने की बात सामने आई है। पुलिस का कहना है कि आरोपियों ने राह चलते लोगों को निशाना बनाकर मोबाइल छीनने की कई घटनाओं में शामिल होने की बात स्वीकार की है।
सबसे अहम बात यह रही कि वादी ने बरामद मोबाइल की पहचान कर ली, वहीं पकड़े गए आरोपियों को भी पहचान लिया गया। इसके बाद पुलिस ने कानूनी कार्रवाई तेज करते हुए आरोपियों को न्यायालय में पेश करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक शहर में बढ़ती स्नैचिंग घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है। प्रमुख बाजारों, सुनसान मार्गों और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में गश्त बढ़ाई गई है।
आगरा में हाल के महीनों में मोबाइल स्नैचिंग और बाइक सवार बदमाशों की घटनाएं लगातार पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई थीं। ऐसे में सिकंदरा पुलिस की इस कार्रवाई को बड़ी सफलता माना जा रहा है। पुलिस अब यह भी खंगाल रही है कि गिरफ्तार अभियुक्त किसी बड़े गिरोह से जुड़े हैं या नहीं।

मंडी में खराब गेहूं मिलने से उठे सवाल, राशन व्यवस्था की निगरानी पर जोर

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फर्रुखाबाद, कायमगंज। गल्ला मंडी में बड़ी मात्रा में खराब हालत में पड़े गेहूं को लेकर स्थानीय लोगों और किसानों में नाराजगी देखने को मिल रही है। मंडी परिसर में खुले स्थान पर रखे गेहूं के खराब होने की चर्चा के बाद खाद्यान्न भंडारण और वितरण व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। लोगों का कहना है कि यदि समय पर उचित रखरखाव नहीं किया गया तो अनाज की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
मंडी में मौजूद कुछ किसानों और व्यापारियों का आरोप है कि लंबे समय से खुले में पड़े गेहूं में नमी और खराबी आने लगी है। कई स्थानों पर गेहूं के ढेरों में रंग परिवर्तन और दुर्गंध जैसी स्थिति देखे जाने की बात कही जा रही है। इसे लेकर स्थानीय लोगों ने चिंता जताई कि खराब अनाज यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली तक पहुंचा तो उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।
क्षेत्रीय नागरिकों का कहना है कि सरकार गरीबों और जरूरतमंदों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है, इसलिए भंडारण व्यवस्था में लापरवाही नहीं होनी चाहिए। किसानों ने मांग की है कि मंडी में रखे गेहूं की गुणवत्ता की जांच कराई जाए और खराब अनाज को अलग किया जाए, ताकि वितरण व्यवस्था प्रभावित न हो।
लोगों ने यह भी मांग उठाई कि खाद्यान्न भंडारण केंद्रों पर नियमित निरीक्षण की व्यवस्था मजबूत की जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो अनाज की बर्बादी के साथ-साथ जनस्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।
स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मामले की निष्पक्ष जांच कराने, भंडारण व्यवस्था को दुरुस्त करने तथा दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की मांग की है। वहीं जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से मामले की जानकारी लेकर जांच कराने की बात कही जा रही है।