24 C
Lucknow
Wednesday, February 18, 2026
Home Blog

होली पर घर वापसी की होड़: दिल्ली-एनसीआर से बिहार, यूपी और झारखंड की ट्रेनों में उमड़ी भीड़

0

आरक्षण फुल, वेटिंग लंबी — यात्रियों को कंफर्म टिकट के लिए जद्दोजहद
नई दिल्ली। रंगों का त्योहार होली नजदीक आते ही राजधानी और आसपास के क्षेत्रों से अपने-अपने घर लौटने वालों की भीड़ रेलवे स्टेशनों पर साफ दिखाई देने लगी है। भारतीय रेल की ट्रेनों में सीटों के लिए मारामारी का आलम है।
दिल्ली-एनसीआर के प्रमुख स्टेशनों — नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, आनंद विहार टर्मिनल और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन — पर यात्रियों की भारी भीड़ देखी जा रही है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जाने वाली ट्रेनों में वेटिंग लिस्ट लंबी हो चुकी है, जबकि जनरल डिब्बों में खड़े होकर सफर करने की नौबत आ रही है।
वेटिंग लिस्ट सैकड़ों के पार
रेलवे सूत्रों के अनुसार होली से पहले के सप्ताह में चलने वाली अधिकांश ट्रेनों में स्लीपर और एसी श्रेणी की सीटें फुल हो चुकी हैं। कई ट्रेनों में वेटिंग लिस्ट 200 से 300 तक पहुंच गई है। अचानक बढ़ी मांग के चलते तत्काल टिकट भी कुछ ही मिनटों में खत्म हो रहे हैं।
यात्रियों का कहना है कि त्योहार पर घर पहुंचना उनकी प्राथमिकता है, ऐसे में अतिरिक्त स्पेशल ट्रेनों की जरूरत महसूस की जा रही है। रेलवे प्रशासन ने कुछ मार्गों पर विशेष ट्रेनों के संचालन की तैयारी शुरू की है, लेकिन भीड़ को देखते हुए और ट्रेनों की आवश्यकता बताई जा रही है।
बस अड्डों और सड़कों पर भी दबाव
रेलवे में जगह न मिलने पर कई लोग बसों और निजी वाहनों का सहारा ले रहे हैं। इससे आईएसबीटी और हाईवे पर भी यातायात का दबाव बढ़ने की संभावना है।
सुरक्षा और व्यवस्थाएं
रेलवे स्टेशनों पर आरपीएफ और जीआरपी की तैनाती बढ़ा दी गई है। यात्रियों को प्लेटफॉर्म पर अनुशासन बनाए रखने और अफवाहों से बचने की अपील की गई है।
होली जैसे बड़े पर्व पर हर साल घर वापसी की यह तस्वीर दोहराई जाती है। भीड़ के बीच यात्रियों को धैर्य और सावधानी बरतने की जरूरत है, ताकि सफर सुरक्षित और सुखद बन सके।

नोएडा प्राधिकरण का एक और कांड सामने

0

ट्रांसफर के बाद भी जमे वरिष्ठ प्रबंधक, शासन के आदेशों की अनदेखी के आरोप
नोएडा। औद्योगिक नगरी नोएडा में एक बार फिर प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। नोएडा प्राधिकरण में तैनात वरिष्ठ प्रबंधक सतेंद्र गिरी का 27 जनवरी को ट्रांसफर आदेश जारी होने के बावजूद अब तक कार्यमुक्त न होने का मामला चर्चा में है।
सूत्रों के अनुसार सतेंद्र गिरी का तबादला उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) में किया गया था। आदेश के मुताबिक उन्हें यूपीसीडा में वर्क सर्किल-6 का चार्ज सौंपा गया, लेकिन इसके बावजूद वे नोएडा प्राधिकरण में ही जमे हुए हैं।
शासन के आदेशों की अनदेखी?
प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि शासन स्तर से जारी तबादला आदेशों का समय पर अनुपालन न होना गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। नियमों के अनुसार किसी भी अधिकारी को निर्धारित समयावधि में कार्यभार हस्तांतरित कर नई तैनाती स्थल पर ज्वाइन करना होता है।
बताया जा रहा है कि सतेंद्र गिरी पिछले करीब 10 वर्षों से नोएडा प्राधिकरण में तैनात हैं। इतनी लंबी तैनाती पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि सामान्यतः संवेदनशील पदों पर लंबे समय तक एक ही अधिकारी की तैनाती प्रशासनिक पारदर्शिता के लिहाज से उचित नहीं मानी जाती।
मामले में आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी तक सामने नहीं आई है। यदि ट्रांसफर आदेश के बावजूद कार्यभार ग्रहण नहीं किया गया है तो यह शासनादेश की अवहेलना की श्रेणी में आ सकता है।
प्राधिकरण के उच्चाधिकारियों की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। अब देखना होगा कि शासन स्तर से इस मामले में क्या कार्रवाई होती है।

सवालों में उलझी गुमशुदगी की गुत्थी

0

डॉ विजय गर्ग
समाज में किसी व्यक्ति की गुमशुदगी केवल एक घटना नहीं होती, बल्कि यह परिवार, समुदाय और प्रशासन—तीनों के लिए गहरी चिंता और असंख्य सवालों का कारण बन जाती है। जब कोई अचानक लापता होता है, तो पीछे रह जाते हैं अनुत्तरित प्रश्न, अनिश्चितता की पीड़ा और न्याय की प्रतीक्षा।

गुमशुदगी: एक बढ़ती सामाजिक चिंता

देश के विभिन्न हिस्सों में हर वर्ष हजारों लोग लापता होने की रिपोर्ट दर्ज होती है। इनमें बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग और युवा सभी शामिल होते हैं। कई मामलों में लोग घर से स्वेच्छा से निकल जाते हैं, तो कुछ मामलों में मानव तस्करी, पारिवारिक विवाद, मानसिक तनाव या अपराध जैसी परिस्थितियाँ सामने आती हैं।

परिवार की पीड़ा और प्रतीक्षा

किसी प्रियजन के अचानक गायब हो जाने से परिवार मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक संकट में घिर जाता है।

हर दस्तक पर उम्मीद जागती है।

हर फोन कॉल दिल की धड़कन बढ़ा देता है।

समय के साथ उम्मीद और निराशा का संघर्ष गहरा होता जाता है।

यह अनिश्चित प्रतीक्षा सबसे बड़ी यातना बन जाती है।

जांच प्रक्रिया और चुनौतियाँ

पुलिस और जांच एजेंसियाँ गुमशुदगी के मामलों को सुलझाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करती हैं:

सीसीटीवी फुटेज की जांच

मोबाइल लोकेशन ट्रैकिंग

सोशल मीडिया गतिविधियों का विश्लेषण

स्थानीय नेटवर्क और मुखबिरों की सहायता

फिर भी कई मामलों में पहचान, समय की देरी, सीमित संसाधन और झूठी सूचनाएँ जांच को जटिल बना देती हैं।

डिजिटल युग: मदद भी, चुनौती भी

तकनीक ने खोज प्रक्रिया को आसान बनाया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तस्वीरें और जानकारी तेजी से फैलती हैं, जिससे लोगों को खोजने में सहायता मिलती है। दूसरी ओर, गलत जानकारी और अफवाहें जांच को भटका सकती हैं।

रोकथाम: जागरूकता और सतर्कता की आवश्यकता

गुमशुदगी की घटनाओं को कम करने के लिए समाज को सक्रिय भूमिका निभानी होगी:

बच्चों को सुरक्षा के बारे में जागरूक करना

बुज़ुर्गों और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों पर ध्यान देना

संदिग्ध गतिविधियों की तुरंत सूचना देना

समुदाय स्तर पर निगरानी और सहयोग बढ़ाना

सवाल जो अब भी बाकी हैं

हर अनसुलझी गुमशुदगी कई प्रश्न छोड़ जाती है:
क्या वह स्वेच्छा से गया था या किसी साजिश का शिकार हुआ?
क्या समय पर मदद मिल सकती थी?
क्या समाज और प्रशासन और अधिक सतर्क हो सकते थे?

निष्कर्ष

गुमशुदगी की गुत्थी केवल एक कानूनी या प्रशासनिक मामला नहीं है; यह मानवीय संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी का विषय है। जब तक हर लापता व्यक्ति अपने घर नहीं लौटता, तब तक सवाल बने रहेंगे और समाज की जिम्मेदारी भी।

समाधान केवल जांच में नहीं, बल्कि जागरूकता, संवेदनशीलता और सामूहिक प्रयास में छिपा है।

डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

सूर्य महोत्सव में फर्रुखाबाद की अंजलि चौहान ने कथक से मोहा सबका मन

0

मोहम्मद आकिब खां

फर्रुखाबाद/महोबा। महोबा के स्थापना दिवस पर आयोजित सात दिवसीय ‘सूर्य महोत्सव’ की सांस्कृतिक संध्या में फर्रुखाबाद की कथक नृत्यांगना अंजलि चौहान और उनके दल ने अपनी मनमोहक प्रस्तुति से समां बांध दिया। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग के सौजन्य से आयोजित इस कार्यक्रम में अंजलि की कला साधना और सधे हुए नृत्य को दर्शकों ने खूब सराहा।

महोत्सव के दौरान महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर अंजलि चौहान ने लखनऊ के गोविंद यादव और अपनी टीम की साथी अक्षरा, कशिश व दीपांशी के साथ मंच साझा किया। भगवान शिव को समर्पित उनकी विशेष कथक प्रस्तुति ने आयोजन को भक्ति और कला के अनूठे संगम में बदल दिया।

संस्कृति विभाग की इस पहल के माध्यम से प्रदेश की प्रतिभाओं को अपनी कला के प्रदर्शन के लिए एक बड़ा मंच मिल रहा है। अंजलि की प्रस्तुति ने न केवल भारतीय शास्त्रीय नृत्य की बारीकियों को दर्शाया, बल्कि भारतीय परंपरा, अनुशासन और सामाजिक समरसता का प्रेरक संदेश भी दिया।

11 से 17 फरवरी तक आयोजित हुए इस महोत्सव में अंजलि चौहान की टीम की प्रस्तुति को स्थानीय नागरिकों और प्रशासनिक अधिकारियों ने विशेष रूप से सराहा। दर्शकों का कहना था कि इस तरह के आयोजनों से न केवल शास्त्रीय नृत्य के प्रति युवाओं में रुचि बढ़ती है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षण मिलता है। अंजलि की इस सफलता पर फर्रुखाबाद के कला प्रेमियों में हर्ष की लहर है।

क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी डॉ. चित्रगुप्त ने भी इस प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रमों से प्रदेश की सांस्कृतिक एकता और विरासत को नया बल मिल रहा है।

वेस्टयूपी में हाईकोर्ट बेंच की मांग को धार देते आंदोलनकारी

0

अशोक मधुप
पश्चिमी उत्तर प्रदेश (वेस्ट यूपी) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक बेंच स्थापित करने की मांग एक बहुत पुराना और लगातार जारी रहने वाला आंदोलन है। लगभग 70 साल पुरानी यह मांग केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि क्षेत्रीय न्याय, सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की एक गहरी पुकार है। इस आंदोलन के कामयाब न होने की खास बात यह रही कि आंदोलनरत वकील आदोलन से जनता को नही जोड़ सके। अब पश्चिम उत्तर प्रदेश के वकीलों अपनी गलती समझ गए। उन्होंने रणनीति में बदलाव किया है। वह इससे पश्चिम उततर प्रदेश की जनता को जोड़ने में लग गए हैं। जनता को बैंच बनने के फायदें बता रहे हैं। अन्य जनप्रतिनिधियों का समर्थन ले रहे हैं। केंद्र सरकार और विधि मंत्रालय को उनसे समर्थन पत्र लिखवा रहे हैं।
1948 में, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ स्थापित की गई थी, लेकिन पश्चिमी यूपी को इससे कोई राहत नहीं मिली, क्योंकि लखनऊ भी इस क्षेत्र से काफी दूर था। वैसे 1955 की विधि आयोग की सिफारिशों ने इस आंदोलन को एक नई दिशा दी। आयोग ने सिफारिश की थी कि उच्च न्यायालय की बेंच उन क्षेत्रों में स्थापित की जानी चाहिए, जहाँ से दूरी अधिक है। साल 1955 में तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद ने मेरठ में हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने की सिफारिश की । वर्ष 1976 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की सरकार ने केंद्र को खंडपीठ स्थापित किए जाने का प्रस्ताव भेजा । जनता पार्टी के शासन में राम नरेश यादव की सरकार ने भी इस मांग पर मुहर लगाई और पश्च‍िमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने के प्रस्ताव को कर उसे केंद्र सरकार को भेजा। बनारसीदास सरकार एवं बाद में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में भी एक प्रस्ताव पारित कर हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की मांग को संस्तुति प्रदान की गईं । प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया।
1970 और 1980 के दशक में, यह आंदोलन और भी जोर पकड़ने लगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वकीलों ने हड़तालों और विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। किसान नेता चौधरी चरणसिंह, मुलायम सिंह यादव और अजित सिंह जैसे नेताओं ने भी इस मांग को अपना समर्थन दिया। इससे यह मांग राजनीतिक मुद्दा बन जरूर बन गई किंतु नेताओं की इच्छा शक्ति के अभाव में और इलाहाबाद के वकीलों के दबाव में कभी पूरी नही हुई। आज भी, पश्चिमी यूपी के कई संगठन और बार एसोसिएशन इस मुद्दे पर नियमित रूप से आंदोलन करते रहते हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों जैसे मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर और मथुरा से इलाहाबाद की दूरी 500 से 700 किलोमीटर है। इस लंबी दूरी के कारण मुवक्किलों और वकीलों को अत्यधिक समय, धन और ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। गरीबी और संसाधनों की कमी वाले लोगों के लिए यह एक बड़ा बोझ बन जाता है। इलाहाबाद में एक मुकदमे के लिए जाने का मतलब है, न केवल यात्रा का खर्च, बल्कि वहाँ रहने और खाने का भी खर्च। इसके अलावा, वकीलों की फीस भी अधिक होती है। यह सब मिलकर गरीब और मध्यम वर्ग के लिए न्याय को बहुत महंगा बना देता है। एक बात और इलाहाबाद की जगह यदि पश्चिम उत्तर प्रदेश को लखनऊ खंडपीठ से संबद्ध कर दिया जाता, तब भी दूरी दौ सौ किलोमीटर के आसपास कम हो जाती। लखनऊ पश्चिम उत्तर प्रदेश के नजदीक पड़ता है किंतु ऐसा भी नही किया गया। आंदोलनकारियों का कहना है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पहले से ही मुकदमों का भारी बोझ है। पश्चिमी यूपी से आने वाले मामलों की बड़ी संख्या के कारण, न्याय में और अधिक देरी होती है। एक बेंच की स्थापना से मामलों का तेजी से निपटारा हो सकेगा। इससे न्यायपालिका पर दबाव कम होगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश एक आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसे अक्सर “भारत का चीनी का कटोरा” कहा जाता एक हाईकोर्ट बेंच की स्थापना से इस क्षेत्र की न्यायिक और राजनीतिक पहचान मजबूत होगी, और यह एक आत्मनिर्भर केंद्र बन सकेगा।
वर्तमान में भी यह आंदोलन जारी है, हालाँकि इसने कई बार धीमी गति पकड़ी है। 1981 से वकीलों के संगठन नियमित रूप से प्रत्येक शनिवार को हड़ताल करते हैं, वे धरने देते रहतें हैं, और ज्ञापन सौंपते हैं। हालांकि, इस आंदोलन को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस आंदोलन के सामने सबसे बडी चुनौती है कि किसी भी राजनीतिक दल ने इस मुद्दे को पूरी गंभीरता से नहीं लिया है। केंद्र और राज्य सरकारें इस मांग को टालती रही हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वकील इस मांग का विरोध करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि एक बेंच की स्थापना से उनका काम और आय प्रभावित होगी। सरकार का तर्क है कि एक बेंच की स्थापना से प्रशासनिक जटिलताएँ बढ़ेंगी और यह एक आर्थिक बोझ होगा। इसके अलावा, सरकार अक्सर इस मुद्दे को भविष्य के लिए टाल देती है। एक मजबूत और एकीकृत नेतृत्व की कमी ने इस आंदोलन को कमजोर किया है। अलग-अलग संगठन अपने-अपने तरीके से आंदोलन चला रहे हैं, जिससे एकता नहीं बन पाती।
हाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच स्थापना के लिए सांसद अरुण गोविल मुखर हो गए हैं। सांसद ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लगभग छह करोड़ आबादी को सस्ता, सुलभ और त्वरित न्याय दिलाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में उच्च न्यायालय की चार बेंच हैं। मध्य प्रदेश में दो बेंच हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश इतना बड़े होने के बाद भी यहां उच्च न्यायालय की एक पीठ है। इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए न्याय प्राप्त करना मुश्किल है। सांसद ने कहा कि यहां बेंच मिलने से कम समय में न्याय मिलेगा और धन की भी बचत होगी।एक हाईकोर्ट बेंच की स्थापना से न केवल पश्चिमी यूपी के लोगों को न्याय तक पहुँचने में आसानी होगी, बल्कि यह पूरे राज्य की न्याय प्रणाली को मजबूत करेगा। यह आवश्यक है कि सरकार, न्यायपालिका और सभी हितधारक मिलकर इस मुद्दे का समाधान निकालें।
पश्चिमी महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में बॉम्बे हाईकोर्ट की एक नई पीठ ओर राज्य में चौथी हाईकोर्ट बेंच के गठन की अधि‍सूचना एक अगस्त को जैसे ही जारी हुई यूपी के मेरठ में सरगर्मियां बढ़ गईं। “पश्च‍िम उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट बेंच केंद्रीय संघर्ष समिति‍” ने तुरंत वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए पश्च‍िमी यूपी के 22 जिलों के बार अध्यक्षों और महामंत्री के साथ बैठक की. समिति के पदाधिकारियों ने सरकार से सवाल किया कि जब कोल्हापुर में बॉम्बे हाईकोर्ट की चौथी बेंच खुल सकती है तो यूपी के मेरठ में हाईकोर्ट की तीसरी बेंच क्यों नहीं स्थापित हो सकती? मेरठ में हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर पश्चिमी यूपी के वकीलों ने चार अगस्त को हड़ताल कर प्रदर्शन किया। मुरादाबाद की सांसद कुंवरानी रूचिवीरा ने भी संसद में हाल ही में पचिम उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बैंच बनाने की मांग कर चुकी हैं। चांदपुर क्षेत्र के विधायक स्वामी ओमवेश ने भी विधान सभा में ये ही मांग की है। कमोबेश पश्चिम उत्तर प्रदेश के सभी जनप्रतिनिधि ये मांग कर चुके हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बैंच की स्थापना का आंदोलन पिछले लगभग 70 साल से जारी है। कब तक जारी रहेगा, यह भी नही कहा जा सकता। इतना जरूर कहा जा सकता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आंदोलनकारी वकील अब जनता को पश्चिम में हाईकोर्ट की बैंच बनने के फायदे बताकर जनता और जनप्रतिनिधियों को आंदोलन से जोड़ने में लगे हैं। उनका समर्थन ले रहे हैं। आंदोलन को नया रूप दे रहे हैं। आंदोलन को नया तेवर देने में लगें हैं।
अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

सातनपुर मंडी में आलू के दामों में तेजी

0

18 फरवरी को दागी 321–451, गड्ड 451–571 और छट्टा/हाईलैंड 701–801 रुपये प्रति कुंतल
फर्रुखाबाद, 18 फरवरी। जनपद की प्रमुख कृषि उपज मंडी सातनपुर में बुधवार को आलू के भाव में मजबूती दर्ज की गई। गुणवत्ता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में दाम तय हुए, जिससे किसानों और व्यापारियों के बीच पूरे दिन खरीद-फरोख्त का दौर चलता रहा।
मंडी सूत्रों के अनुसार आज दागी आलू ₹321 से ₹451 प्रति कुंतल के बीच बिका। वहीं गड्ड आलू का भाव ₹451 से ₹571 प्रति कुंतल तक रहा। अच्छी क्वालिटी के छट्टा व हाईलैंड आलू की मांग अधिक रहने से इसके दाम ₹701 से ₹801 प्रति कुंतल तक पहुंच गए।
व्यापारियों का कहना है कि इस समय मंडी में अच्छी किस्म के आलू की मांग अधिक है, खासकर कोल्ड स्टोरेज व बाहरी जनपदों की सप्लाई के लिए छट्टा और हाईलैंड किस्म की पूछ बढ़ी है। इसी कारण इन श्रेणियों के दाम अपेक्षाकृत ऊंचे बने हुए हैं।
दूसरी ओर दागी आलू की आवक सामान्य रहने से उसके भाव मध्यम स्तर पर रहे। गड्ड आलू के भाव में भी स्थिरता के साथ हल्की मजबूती देखने को मिली।
किसानों में संतोष, व्यापारी सतर्क
मंडी में आए कई किसानों ने बताया कि पिछले सप्ताह की तुलना में अच्छे ग्रेड के आलू में उन्हें बेहतर दाम मिल रहे हैं। हालांकि व्यापारियों का मानना है कि यदि आवक अचानक बढ़ी तो भाव में गिरावट भी आ सकती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले दिनों में मौसम और बाहरी मंडियों की मांग स्थानीय कीमतों को प्रभावित कर सकती है। फिलहाल सातनपुर मंडी में आलू का बाजार संतुलित और सक्रिय बना हुआ है।