40.9 C
Lucknow
Friday, June 5, 2026
Home Blog

फार्मर रजिस्ट्री पर किसानों का बिगुल: टिकैत गुट के तेवर तल्ख

0

– लिंक एक्सप्रेसवे की जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया भी अधर में
– आंदोलन को धार देने मे आगे आनें लगे वकील भी
– बोले जिलाध्यक्ष अजय कटियार आर पार होगा आंदोलन

फर्रुखाबाद।लिंक एक्सप्रेस वे के निर्माण को लेकर चल रही प्रक्रिया किसान आंदोलन से थमने लगी है फार्मर रजिस्ट्री को लेकर शुरू हुआ विरोध अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया का विरोध नहीं रह गया है, बल्कि यह किसानों और प्रशासन के बीच भरोसे की बड़ी लड़ाई बनता जा रहा है। भारतीय किसान यूनियन (टिकैत गुट) जिलाध्यक्ष और पूर्व कांग्रेस नेता अजय कटियार ने सरकार से खुला मोर्चा खोल दिया है।जिससे किसान अब रजिस्ट्री के लिए निकलना बंद हो गया है, अब वकील समुदाय भी जिलाध्यक्ष के समर्थन मे आगे आ रहा क्योंकि वो खुद रजिस्टर्ड वकील भी हैं।
जानकारों का कहना है कि फार्मर रजिस्ट्री को लेकर चल रहे विवाद के बीच प्रस्तावित लिंक एक्सप्रेसवे के लिए भूमि अधिग्रहण और अभिलेखीय सत्यापन की प्रक्रिया भी प्रभावित होने लगी है।

आंदोलन को उस समय नया आयाम मिला जब फतेहगढ़ कचहरी के अधिवक्ता अवधेश मिश्रा और उनके समर्थक कई वकील भी अंदर खाने किसानों के पक्ष में सक्रिय खड़े होने लगे । दावा है कि यदि किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो मामला उच्च न्यायालय तक ले जाया जायेगा । किसान नेताओं और अधिवक्ताओं के बीच लगातार बैठकों का दौर चल रहा है, जिसमें आंदोलन की अगली रणनीति पर चर्चा हो रही है।कि कैसे सरकार को घेर अधिकारियों पर घेरावंदी की जाये।बता दें कि वकील अवधेश मिश्रा नें अकेले करीब तीस रिट याचिकायें प्रशाशनिक और शासन के खिलाफ डाल महारत हासिल कर रखा है, किसान नेता उनके अनुभव का लोहा मानते हैं।

सूत्रों के अनुसार किसान संगठन ने अब गांव स्तर पर समितियां गठित करने, तहसील मुख्यालयों पर प्रदर्शन तेज करने और जनजागरण अभियान चलाने की योजना बनाई है।

दूसरी ओर प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि फार्मर रजिस्ट्री किसानों के खिलाफ नहीं बल्कि उनके हितों की सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था है।

दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सूर्यास्त, 2003 का जनसन्देश कांग्रेस ने 23 साल बाद समझा

0

 

(पवन वर्मा -विनायक फीचर्स)

मध्य प्रदेश की राजनीति के लंबे गलियारे में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सूर्यास्त एक ऐसी सच्चाई है जिसे स्वीकार करने के लिए कांग्रेस को पूरे तेईस साल का लंबा और कष्टकारी समय लगा। साल 2003 में जनता ने जो स्पष्ट संदेश दिया था, उसे समझने में कांग्रेस के नेतृत्व ने जितनी देरी की, उसी का परिणाम है कि आज प्रदेश में कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा है। वर्ष 2003 के उस विधानसभा चुनाव में जब दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस महज 37 सीटों पर सिमटकर रह गई थी, तभी जनता ने स्पष्ट कर दिया था कि दिग्विजय सिंह अपनी उपयोगिता खो चुके है। लेकिन उस जनादेश को पढ़ने और उसके अनुरूप निर्णय लेने में कांग्रेस ने दो दशक से अधिक का समय गंवा दिया। राजनीतिक गलियारों में इसे केवल एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि उस राजनीतिक जड़ता के अंत की शुरुआत माना जा रहा है, जिसने मध्य प्रदेश में कांग्रेस को एक ऐसी दिशा में धकेल दिया जहाँ से वापसी दिन प्रति दिन कठिन होती जा रही है।
​दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सफर छह दशकों से अधिक का है, लेकिन उनका शासनकाल विशेष रूप से 1993 से 2003 तक, राज्य की राजनीति के लिए एक ऐसा मील का पत्थर रहा जिसने राज्य को दो ध्रुवों में बांट दिया। मुख्यमंत्री के रूप में उनके उन दस वर्षों को आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि जनता का मोहभंग उस समय ही शुरू हो गया था। सड़कें, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव और प्रशासनिक अव्यवस्था ने उस समय के मतदाता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या यह वही नेतृत्व है जिस पर उन्होंने भरोसा जताया था? 2003 का वह ऐतिहासिक जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, वह जनादेश दिग्विजय सिंह की कार्यशैली को लेकर कांग्रेस को दिया गया एक संदेश था। दुर्भाग्य से, कांग्रेस आलाकमान ने इस संदेश को या तो नजरअंदाज किया या फिर उसे समझने में गंभीर भूल की।
​कांग्रेस नेतृत्व की यह सबसे बड़ी विफलता रही कि उसने 2003 के बाद भी दिग्विजय सिंह को हाशिए पर लाने के बजाय, उन्हें दिल्ली की राजनीति में सक्रिय कर दिया। पार्टी को शायद यह लगा कि दिल्ली के गलियारों में बैठकर वे पार्टी को नई ऊर्जा दे सकेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही थी। मध्य प्रदेश में 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव इस बात के प्रमाण थे कि यहां की जनता ने दिग्विजय सिंह को स्वीकार करना बंद कर दिया है। इन चुनावों में पार्टी की लगातार हार ने यह साबित कर दिया कि वे न तो पार्टी को जिताने की स्थिति में हैं और न ही उनके चेहरे पर जनता भरोसा करने को तैयार है। फिर भी, कांग्रेस ने उन्हें बतौर तोहफा 2014 में राज्यसभा भेजा। यह कदम भी पार्टी के लिए फायदे वाला साबित नहीं हुआ । उल्टे यह संदेश गया कि पार्टी आलाकमान को दिग्विजय सिंह पर भरोसा उस स्थिति में भी कायम है जब पार्टी 2003, 2008 और 2013 का विधानसभा चुनाव हार गई। हर हार में दिग्विजय सिंह और उनके गुट की भूमिका को नज़र अंदाज़ किया गया।
​2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की स्थिति में तब थोड़ा सुधार हुआ, जब कमलनाथ जैसे दिग्गज नेता ने प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली। लेकिन इस समय को भी दिग्विजय सिंह के प्रभाव से जोड़कर देखना एक राजनीतिक भूल रही। उस समय सत्ता के गलियारों में जो अस्थिरता पैदा हुई और जिस तरह से सरकार का संचालन हुआ, उसने एक बार फिर जनता को यह अहसास कराया कि पुराने खिलाड़ी अभी भी परदे के पीछे से खेल खेल रहे हैं। इसके बाद जब कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनी, तब भी दिग्विजय सिंह की अति-सक्रियता ने पार्टी की छवि को नुकसान ही पहुंचाया। नतीजे में सरकार गिर गई, उनके मंत्रियों के विवाद भी उभरकर सामने आए थे।
कमलनाथ सरकार में जब उन्होंने भोपाल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, तो जनता ने उन्हें न केवल हराया बल्कि यह संदेश भी दिया कि राजधानी के प्रबुद्ध मतदाता अब उनकी राजनीति के साथ नहीं हैं। भोपाल की यह हार उनके राजनीतिक अंत की एक और कड़ी थी, जिसे भी शायद कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने गंभीरता से नहीं लिया।
​अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाने की हताशा में दिग्विजय सिंह ने अपने सबसे सुरक्षित क्षेत्र राजगढ़ का रुख किया। राजगढ़ को दिग्विजय सिंह का गढ़ माना जाता है और यहां उन्हें राजा दिग्विजय सिंह कहा जाता है,लेकिन राघोगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह यहां से 2024 का लोकसभा चुनाव भी भारी अंतर से हार गए।
एक नेता के लिए अपने सबसे मजबूत किले से चुनाव हार जाना, उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता के पूरी तरह खत्म होने का अंतिम संकेत होता है। राजगढ़ की जनता ने भी उन्हें नकार दिया, जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अब केवल इतिहास का हवाला देकर चुनाव नहीं जीते जा सकते। जनता ने यह साफ कर दिया कि दिग्विजय सिंह का वह युग, जिसमें वे प्रदेश की राजनीति की धुरी हुआ करते थे, अब पूरी तरह से अतीत का हिस्सा बन चुका है। कांग्रेस का उन्हें 23 साल तक ढोना उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल थी। यदि 2003 में ही पार्टी ने नई पीढ़ी के हाथों में बागडोर सौंप दी होती, तो आज कांग्रेस मध्य प्रदेश में इतनी कमजोर स्थिति में नहीं होती।
​दिग्विजय सिंह की राजनीति की विशेषता या त्रासदी यह रही है कि वे हमेशा विवादों को अपनी ढाल बनाने की कोशिश करते रहे, लेकिन बाद में यही विवाद उनके राजनीतिक व्यक्तित्व पर भारी पड़ते गए। बयानों में मर्यादा का उल्लंघन हो या फिर राज्य में गुटबाजी को बढ़ावा देने का आरोप, दिग्विजय सिंह ने एक ऐसी विरासत छोड़ी है जिसने कांग्रेस को एकजुट करने के बजाय उसे बिखरने पर मजबूर किया।
आज मध्य प्रदेश में कांग्रेस की जो दयनीय स्थिति है, उसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने वालों की कमी नहीं है। राज्यसभा की उम्मीदवारी से उनका हटना और उसकी आड़ में सामाजिक संतुलन का तर्क देना, दरअसल उस विवशता को ढंकने का प्रयास है जो पार्टी के भीतर उनके घटते कद को दर्शाती है। पार्टी नेतृत्व अब यह समझ चुका है कि दिग्विजय सिंह एक जिताऊ नेता तो रहे नहीं, बल्कि अब वे पार्टी पर बोझ बनते जा रहे हैं।
​ कांग्रेस में दिग्विजय सिंह का युग समाप्त हो चुका है, यह बात अब केवल जनता ने ही नहीं, बल्कि खुद पार्टी ने भी राज्यसभा में उन्हें न भेजकर स्वीकार कर ली है। अब देखना यह है कि क्या कांग्रेस अपनी इस सीख को केवल एक घटना तक सीमित रखती है या फिर आगे भी ऐसी ही गलतियां दोहराती है। यह एक ऐसी विदाई है जो 2003 में ही अपेक्षित थी, लेकिन देर आए दुरुस्त आए के तर्ज पर, कम से कम आज मध्य प्रदेश कांग्रेस के पास एक नया अध्याय लिखने का अवसर है। दिग्विजय का राजनीतिक सूर्यास्त अब पूर्ण हो चुका है, और अब प्रदेश को एक ऐसे सूर्योदय की प्रतीक्षा है जो पुरानी गलतियों के बोझ से मुक्त हो। कांग्रेस इस आत्ममंथन के बाद अपनी खोई हुई साख फिर से प्राप्त कर पाती है या नहीं यह तो कोई नहीं जानता लेकिन इतना निश्चित है कि भविष्य की राजनीति में दिग्विजय सिंह का स्थान अब केवल इतिहास के पन्नों में ही होगा। (विनायक फीचर्स)

रेलवे स्टेशन पर देर रात पहुंचे अपर पुलिस अधीक्षक, सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा

0

 

क्रासर

संदिग्ध गतिविधियों पर त्वरित कार्रवाई और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर विशेष निगरानी के दिए निर्देश
फर्रुखाबाद। जिले में सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने के उद्देश्य से देर रात अपर पुलिस अधीक्षक ने थाना कोतवाली फर्रुखाबाद क्षेत्र के रेलवे स्टेशन परिसर का निरीक्षण कर सुरक्षा इंतजामों का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने स्टेशन परिसर एवं आसपास के क्षेत्रों का भ्रमण कर ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।
निरीक्षण के दौरान अपर पुलिस अधीक्षक ने पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को उच्च सतर्कता बरतने, किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तत्काल कार्रवाई करने तथा रेलवे स्टेशन जैसे भीड़भाड़ वाले स्थानों पर विशेष निगरानी रखने के निर्देश दिए। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था में किसी प्रकार की लापरवाही न बरतने की हिदायत भी दी।
अपर पुलिस अधीक्षक ने आमजन से भी अपील करते हुए कहा कि यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति अथवा लावारिस वस्तु दिखाई दे तो उसकी सूचना तत्काल पुलिस को दें। उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने और जनसुरक्षा सुनिश्चित करने में आम नागरिकों का सहयोग भी महत्वपूर्ण है।

धूप में बिकता बोतलबंद पानी, हर घूंट के साथ बढ़ रहा है गंभीर बीमारी का खतरा?

0

शरद कटियार
गर्मी के मौसम में सड़क किनारे, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और बाजारों में लाखों बोतल पैक पानी खुले आसमान के नीचे बिकता दिखाई देता है। चिलचिलाती धूप में घंटों रखी ये बोतलें लोगों को राहत तो देती हैं, लेकिन क्या वास्तव में यह पानी उतना ही सुरक्षित है जितना हम समझते हैं? यह सवाल अब वैज्ञानिक शोध और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनियों के बाद गंभीर होता जा रहा है।

भारत में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर की बिक्री लगातार बढ़ रही है। लोग नल के पानी की अपेक्षा बोतलबंद पानी को अधिक सुरक्षित मानते हैं। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि दुकानों के बाहर पानी की पेटियां सीधे सूर्य की किरणों के संपर्क में रहती हैं। कई बार तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर पहुंच जाता है। ऐसे में प्लास्टिक की बोतलों की गुणवत्ता और उनमें भरे पानी की सुरक्षा पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।

विशेषज्ञों के अनुसार प्लास्टिक की बोतलों को सीधे धूप और अत्यधिक गर्मी से बचाकर रखना चाहिए। यही कारण है कि अधिकांश कंपनियां अपने लेबल पर स्पष्ट रूप से लिखती हैं कि बोतल को ठंडी, साफ और सूखी जगह पर रखा जाए तथा सीधे सूर्य प्रकाश से दूर रखा जाए। इसके बावजूद बाजारों में इस नियम का खुलेआम उल्लंघन देखने को मिलता है।

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने पर प्लास्टिक की संरचना प्रभावित हो सकती है। इससे सूक्ष्म प्लास्टिक कण यानी माइक्रोप्लास्टिक पानी में मिलने की आशंका बढ़ जाती है। हाल के वर्षों में दुनिया भर में हुए अध्ययनों ने यह संकेत दिया है कि बोतलबंद पानी में बड़ी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद हो सकते हैं। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन शरीर के भीतर पहुंचकर विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक का लंबे समय तक शरीर में प्रवेश सूजन, हार्मोनल असंतुलन, हृदय रोगों और कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकता है। हालांकि इस संबंध में अभी व्यापक वैज्ञानिक शोध जारी है, लेकिन उपलब्ध संकेत चिंताजनक हैं। यही वजह है कि विकसित देशों में भी प्लास्टिक प्रदूषण को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए उभरते खतरे के रूप में देखा जा रहा है।

भारत में भारतीय मानक ब्यूरो और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पैकेज्ड पानी की गुणवत्ता के लिए नियम बनाए हैं। इनमें पानी की शुद्धता, बैक्टीरिया की अनुपस्थिति और रासायनिक तत्वों की सीमा तय की गई है। लेकिन वास्तविक चुनौती भंडारण और परिवहन की है। यदि बोतलें निर्माण के बाद लंबे समय तक धूप में रखी जाएं, तो उनकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

विडंबना यह है कि जिस पानी को लोग स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए खरीदते हैं, वही पानी गलत तरीके से संग्रहित होने पर चिंता का विषय बन सकता है। बाजारों में धूप में रखी पानी की बोतलों पर शायद ही कभी किसी की नजर जाती हो। न उपभोक्ता सवाल पूछता है और न ही अधिकांश दुकानदार इस जोखिम को गंभीरता से लेते हैं।

अब समय आ गया है कि प्रशासन, खाद्य सुरक्षा विभाग और उपभोक्ता सभी इस मुद्दे को गंभीरता से लें। पानी बेचने वाली कंपनियों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके उत्पाद सही परिस्थितियों में संग्रहित और वितरित हों। साथ ही उपभोक्ताओं को भी धूप में लंबे समय तक रखी हुई या अत्यधिक गर्म बोतलों को खरीदने से बचना चाहिए।

स्वच्छ पानी हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन यदि वही पानी धूप में तपकर प्लास्टिक के प्रभाव को अपने भीतर समेटने लगे, तो यह केवल उपभोक्ता का नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी बड़ा सवाल बन जाता है। इसलिए अगली बार जब आप बोतलबंद पानी खरीदें, तो केवल ब्रांड और सील ही नहीं, यह भी देखें कि वह बोतल कहां और कैसे रखी गई है।फोटो कैप्शन:
“तेज धूप में रखी पानी की बोतलें स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा रही हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अत्यधिक गर्मी प्लास्टिक से जुड़े जोखिमों को बढ़ा सकती है।”

माइक्रोप्लास्टिक का जहर, हम हर घूंट के साथ बीमारी पी रहे

0

– आज बढ़ रहे गाँव गाँव, गली गली कैंसर रोगी

आज जब कोई व्यक्ति बाजार से पानी की बोतल खरीदता है तो उसे लगता है कि वह शुद्ध और सुरक्षित पानी पी रहा है। लेकिन विज्ञान की नई खोजों ने इस भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुनिया भर के वैज्ञानिकों की रिपोर्ट बता रही हैं कि हम केवल पानी नहीं पी रहे, बल्कि उसके साथ लाखों सूक्ष्म प्लास्टिक कण भी अपने शरीर में पहुंचा रहे हैं। यही माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक अब मानव स्वास्थ्य के लिए नई चुनौती बनकर उभर रहे हैं।
वर्ष 2024 में प्रकाशित एक चर्चित अध्ययन में पाया गया कि एक लीटर बोतलबंद पानी में औसतन लगभग 2.4 लाख (240,000) प्लास्टिक कण मौजूद हो सकते हैं। इनमें लगभग 90 प्रतिशत नैनोप्लास्टिक थे, जो इतने सूक्ष्म हैं कि रक्त प्रवाह और शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंच सकते हैं। यह संख्या पहले के अनुमानों से 10 से 100 गुना अधिक पाई गई।
चिंता की बात यह है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल पानी तक सीमित नहीं हैं। वैज्ञानिक इन्हें समुद्री भोजन, नमक, शहद, दूध, फलों, सब्जियों और यहां तक कि मानव रक्त तथा शरीर के अन्य ऊतकों में भी खोज चुके हैं। प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग और उसका पर्यावरण में विघटन इस समस्या को लगातार बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में सूजन, कोशिकीय क्षति और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह आशंका भी जताई गई है कि लंबे समय तक इन कणों के संपर्क में रहने से कैंसर, प्रजनन संबंधी विकार, तंत्रिका तंत्र की समस्याएं और हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि मनुष्यों पर अंतिम और निर्णायक निष्कर्षों के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है।
भारत में कैंसर का बोझ भी तेजी से बढ़ रहा है। सरकारी और चिकित्सा संस्थानों के अनुमान बताते हैं कि देश में हर वर्ष लगभग 14 से 15 लाख नए कैंसर मरीज सामने आ रहे हैं और आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रदूषण, रासायनिक पदार्थों का बढ़ता संपर्क, अस्वास्थ्यकर जीवनशैली और पर्यावरणीय विषैले तत्व इस वृद्धि के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। माइक्रोप्लास्टिक को भी अब संभावित जोखिम कारकों में गिना जाने लगा है, हालांकि इसके प्रत्यक्ष प्रभावों पर अभी व्यापक शोध जारी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस खतरे से बचा जा सकता है? वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि एकल उपयोग वाली प्लास्टिक बोतलों का प्रयोग कम किया जाए, स्टील या कांच की बोतलों को प्राथमिकता दी जाए, प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म भोजन न रखा जाए और प्लास्टिक कचरे के उपयोग तथा निस्तारण को लेकर अधिक जिम्मेदार रवैया अपनाया जाए।
माइक्रोप्लास्टिक का संकट केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, उद्योग और हमारी जीवनशैली से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जिस तरह कभी धूम्रपान और एस्बेस्टस के खतरों को समझने में दशकों लग गए थे, उसी तरह माइक्रोप्लास्टिक के प्रभावों को लेकर भी दुनिया अभी शोध के शुरुआती दौर में है। लेकिन उपलब्ध संकेत इतने गंभीर हैं कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यदि समय रहते प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां शायद स्वच्छ पानी नहीं, बल्कि प्लास्टिक घुला हुआ भविष्य पीने को मजबूर होंगी।

 

कर्नाटक कांग्रेस में हलचल: मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने दिया इस्तीफा

0

 

बेंगलुरु। कर्नाटक की राजनीति में उस समय हलचल मच गई जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता और मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने मंत्री पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। बताया जा रहा है कि वह अपनी पसंद का मंत्रालय नहीं मिलने से नाराज थे, जिसके बाद उन्होंने यह कदम उठाया।

रामलिंगा रेड्डी ने हालांकि स्पष्ट किया कि उनका इस्तीफा केवल मंत्री पद से है और वह कांग्रेस पार्टी के साथ मजबूती से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा, “मैं अभी भी कांग्रेस पार्टी में हूं और पिछले 53 वर्षों से पार्टी का कार्यकर्ता हूं।”

रेड्डी ने अपने लंबे राजनीतिक अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने राज्य के कई मुख्यमंत्रियों की कैबिनेट में काम किया है और हमेशा संगठन तथा जनता के हितों को प्राथमिकता दी है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कभी किसी से मंत्री पद की मांग नहीं की और जो भी जिम्मेदारी मिली, उसे पूरी निष्ठा के साथ निभाया।