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Monday, March 30, 2026
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व्यापारिक संगठन में आंतरिक कलह ने मचाया शोर, प्रदेश अध्यक्ष सहित सामूहिक इस्तीफों की लगी लाइन

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लखनऊ: यूपी की राजधानी लखनऊ (Lucknow) में सक्रिय व्यापारिक संगठनों (trade union) के भीतर बढ़ती गुटबाजी खुलकर सामने आई है। भारतीय जन उद्योग व्यापार मंडल में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच बीते रविवार को प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र प्रताप सिंह सहित कई पदाधिकारियों ने सामूहिक रूप से अपने पदों और सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इस घटनाक्रम ने संगठन की कार्यप्रणाली और नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र प्रताप सिंह, प्रदेश महामंत्री सुशील कुमार सिंह, प्रदेश मंत्री विनोद सिंह, प्रदेश उपमंत्री आरके सिंह, प्रदेश मीडिया प्रभारी किशन सिंह, विधि सलाहकार दीपक सिंह, जिला महामंत्री पवन सिंह तोमर, जिला संगठन मंत्री सुमित महाराज, जिला विधि सलाहकार अनिल सिंह चौहान, जिला उपाध्यक्ष दिलीप मौर्या तथा अजहर इकाई के मंत्री बबलू मौर्या ने अपने पद से इस्तीफा दिया है।

पदाधिकारियों ने संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एसडी सिंह वैश्वारा को भेजे अपने त्यागपत्र में स्पष्ट लिखा है कि वे लंबे समय से संगठन के साथ जुड़े रहे हैं और उसके विकास के लिए निरंतर कार्य करते आए हैं, लेकिन हाल के समय में कुछ लोगों द्वारा अपनाई जा रही तानाशाही और एकतरफा कार्यशैली संगठन के लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में कार्य करना उनके लिए असहज हो गया है और आत्मसम्मान से समझौता करना संभव नहीं है। हालांकि यह पत्र एसडी सिंह वैश्वारा को उनके पूर्व पद प्रदेश संरक्षक/ संयोजक के नाम से संबोधित किया गया है।

गौरतलब है कि संगठन में असंतोष की स्थिति नई नहीं है। इससे पहले 16 फरवरी को प्रदेश संरक्षक एसडी सिंह वैश्वारा ने भी उपेक्षा और गुटबाजी का आरोप लगाते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद संगठन में इस्तीफों की श्रृंखला शुरू हो गई थी। हालांकि, 26 फरवरी को आयोजित आम बैठक में संगठन ने असंतोष दूर करने का दावा करते हुए नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया था।

इस बैठक में एसडी सिंह वैश्वारा को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया, जबकि सौरभ तिवारी को राष्ट्रीय संरक्षक, हनुमंत सिंह को राष्ट्रीय प्रभारी और विवेक शुक्ला को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया था। साथ ही प्रदेश कार्यकारिणी को भंग कर नई टीम का गठन करते हुए देवेंद्र प्रताप सिंह को पुनः प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

हालांकि, नई कार्यकारिणी में कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों को स्थान न मिलने से असंतोष और गहरा गया था। संगठन की नींव रखने वाले नेताओं में शामिल सुशील सिंह और विनोद सिंह ने बैठक को नियम विरुद्ध बताते हुए संगठन पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि कार्यकारिणी गठन के नाम पर संगठन को कमजोर करने की साजिश की जा रही है।

व्यापारिक संगठनों में बढ़ती इस तरह की गुटबाजी को लेकर व्यापारी वर्ग में चिंता बढ़ रही है। व्यापारियों का मानना है कि आपसी टकराव और नेतृत्व की खींचतान के कारण उनकी मूल समस्याएं पीछे छूटती जा रही हैं। विशेषज्ञों का भी कहना है कि यदि संगठन अपने मूल उद्देश्यों से भटकते रहे, तो व्यापारी हितों की सामूहिक आवाज कमजोर पड़ जाएगी, जिसका सबसे अधिक असर छोटे और मध्यम व्यापारियों पर पड़ेगा।

 

ओडिशा में राकेश टिकैत की कथित गिरफ्तारी के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों का उग्र हुआ प्रदर्शन

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हापुड़/बुलंदशहर: भारतीय किसान संघ (बीकेयू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) की ओडिशा में कथित गिरफ्तारी के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश (western Uttar Pradesh) के कई हिस्सों में तनाव बढ़ गया। इसके जवाब में, बीकेयू कार्यकर्ताओं ने सोमवार शाम से हापुड़ जिले में कई पुलिस थानों का घेराव करते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।स्थानीय बीकेयू नेताओं के अनुसार, कार्यकर्ताओं ने हापुड़ सर्कल के तीन पुलिस थानों का अनिश्चितकालीन घेराव शुरू कर दिया। प्रदर्शन का नेतृत्व जिला अध्यक्ष दिनेश खेड़ा ने किया, जो दर्जनों समर्थकों के साथ गिरफ्तारी के विरोध में स्थानीय पुलिस स्टेशन पर जमा हुए।

इसी बीच, विरोध प्रदर्शन पड़ोसी बुलंदशहर जिले में भी फैल गया, जहां बीकेयू (टिकैत गुट) के कार्यकर्ताओं ने खुर्जा कोतवाली पुलिस स्टेशन को घेर लिया। आंदोलन का नेतृत्व जिला अध्यक्ष चौधरी अरब सिंह ने किया, जिन्होंने गिरफ्तारी की निंदा करते हुए इसे “तानाशाही कार्रवाई” करार दिया। प्रदर्शनकारियों को संगठित करने में युवा नेताओं ने भी अहम भूमिका निभाई। जीते चौहान ने बहादुरगढ़ पुलिस स्टेशन में एक समूह का नेतृत्व किया, जबकि ज्ञानेश्वर त्यागी ने सिंभाओली पुलिस स्टेशन में प्रदर्शनों का नेतृत्व किया।

पत्रकारों से बात करते हुए दिनेश खेड़ा ने बताया कि टिकैत ने स्थिति स्पष्ट करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया है। उनके अनुसार, ओडिशा के किसान 22 मार्च से राज्य की राजधानी भुवनेश्वर की ओर विभिन्न मांगों को लेकर पैदल मार्च कर रहे थे। टिकैत एक जनसभा में शामिल होने जा रहे थे, तभी ओडिशा पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। खेड़ा ने आरोप लगाया कि यह गिरफ्तारी एक “दमनकारी नीति” को दर्शाती है और उन्होंने राज्य सरकार पर किसानों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का आरोप लगाया। अन्य नेताओं ने भी इसी तरह की भावनाएं व्यक्त कीं।

जीते चौहान ने कहा कि टिकैत को सम्मानपूर्वक रिहा किए जाने तक विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा, वहीं ज्ञानेश्वर त्यागी ने जोर देकर कहा कि “कोई भी सरकार किसानों की आवाज को दबा नहीं सकती।” बीकेयू नेताओं ने टिकैत और सैकड़ों किसानों की गिरफ्तारी को “लोकतंत्र की हत्या” बताया और चेतावनी दी कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं, विरोध प्रदर्शन जारी हैं और किसानों ने अपने नेता की रिहाई तक आंदोलन जारी रखने का संकल्प लिया है।

लोकसभा में नक्सलवाद पर गरमाई बहस, गृह मंत्री अमित शाह का दावा : देश नक्सलमुक्ति की ओर

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नई दिल्ली। लोकसभा में नक्सलवाद के मुद्दे पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि देश में नक्सलवाद अब लगभग समाप्ति की ओर है और आदिवासी क्षेत्रों में वास्तविक न्याय और विकास पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव 2014 के बाद केंद्र सरकार की सख्त नीति, प्रभावी सुरक्षा अभियानों और व्यापक विकास योजनाओं के कारण संभव हो सका है।
गृह मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार ने नक्सलियों से बातचीत के बजाय सख्ती का रास्ता अपनाया। उन्होंने कहा कि जो भी हथियार उठाएगा, उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। शाह ने दावा किया कि नक्सलियों का केंद्रीय नेतृत्व, पोलित ब्यूरो और प्रमुख कमेटियां अब खत्म हो चुकी हैं—कई मारे गए, कई ने आत्मसमर्पण किया और कुछ फरार हैं।
उन्होंने जानकारी दी कि “बुढ़ा”, “थंडरस्टॉर्म” और “ब्लैक फॉरेस्ट” जैसे बड़े ऑपरेशनों के जरिए भारी मात्रा में हथियार, आईईडी फैक्ट्रियां और अन्य संसाधन बरामद किए गए। छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा के कई इलाके अब नक्सल प्रभाव से बाहर आ चुके हैं। उन्होंने सुरक्षा बलों और स्थानीय पुलिस की भूमिका को इस सफलता का मुख्य आधार बताया।
गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलवाद की जड़ विकास की कमी और एक विशेष विचारधारा रही है, जिसने भोले-भाले आदिवासियों को बहकाकर उनके हाथों में हथियार थमाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले के दौर में इन क्षेत्रों में सरकारी पहुंच कमजोर थी, जिसका फायदा उठाकर रेड कॉरिडोर तैयार किया गया।
इस दौरान अमित शाह ने कांग्रेस और यूपीए सरकार पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती सरकारों के समय नक्सलवाद को बढ़ावा मिला और कुछ संगठनों व नेताओं के कथित संबंध भी सामने आए। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा राजनीतिक बहस का विषय रहेगा और जनता के सामने सच्चाई रखी जाएगी।
संसद में उन्होंने राहुल गांधी पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उनके राजनीतिक करियर में नक्सल समर्थकों से जुड़ाव के कई उदाहरण सामने आए हैं। हालांकि, इन आरोपों पर विपक्ष की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया भी देखने को मिली।
गृह मंत्री ने सरकार की रणनीति का उल्लेख करते हुए बताया कि “ऑल एजेंसी अप्रोच” के तहत केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया गया। साथ ही, सरेंडर नीति लागू कर आत्मसमर्पण करने वालों के पुनर्वास की व्यवस्था की गई।
उन्होंने कहा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से विकास कार्य किए गए हैं—हजारों किलोमीटर सड़कों का निर्माण, मोबाइल टावरों की स्थापना, बैंकिंग सुविधाएं, डाकघर, एकलव्य विद्यालय, आईटीआई और कौशल विकास केंद्र खोले गए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि विकास ही नक्सलवाद को समाप्त करने का सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ है।
अंत में गृह मंत्री ने भरोसा दिलाया कि सरकार आगे भी सख्ती और विकास दोनों मोर्चों पर काम जारी रखेगी। उन्होंने कहा कि अब देश बंदूक नहीं, बल्कि संविधान के रास्ते पर चलेगा और यही असली जीत है।

2027 का चुनाव देश और संविधान बचाने की लड़ाई : अखिलेश यादव

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लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को “देश और संविधान बचाने का चुनाव” बताते हुए भारतीय जनता पार्टी पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार ने उत्तर प्रदेश को “लूट का अड्डा” बना दिया है और पूरा शासन भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है।
सपा मुख्यालय में विभिन्न जिलों से आए कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि “भाजपा सरकार ने भ्रष्टाचार और लूट के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। पूरब से पश्चिम तक हर विभाग में कमीशनखोरी चरम पर है और विकास का पैसा सीधे नेताओं की जेब में जा रहा है।” उन्होंने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि 2027 का चुनाव 2024 के लोकसभा चुनाव से भी बड़े अंतर से जीतना है, जिसके लिए बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना होगा।
उन्होंने भाजपा पर चुनाव में “भ्रष्ट तरीकों से लोकतंत्र की पवित्रता को खत्म करने की साजिश” करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जनता अब सब समझ चुकी है और आने वाले चुनाव में जवाब देगी।
इस दौरान सिख समाज के एक प्रतिनिधिमंडल ने भी सपा अध्यक्ष से मुलाकात कर अपनी समस्याएं रखीं। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कुलदीप सिंह भुल्लर ने किया, जिन्होंने आरोप लगाया कि श्री ज्ञान गोदड़ी गुरुद्वारा को 1984 में हटाए जाने के बाद आज तक दोबारा स्थापित करने की अनुमति नहीं दी गई है। प्रतिनिधिमंडल में बाबा जसवीर सिंह, बाबा काला सिंह, कश्मीर सिंह, निर्मलजीत सिंह और जसप्रीत सिंह सहित अन्य लोग शामिल रहे।
वहीं, कुशीनगर निवासी नौजवान चंदन यादव ने भी सपा अध्यक्ष से भेंट की। चंदन 23 मार्च से दौड़ते हुए 30 मार्च 2026 को लखनऊ पहुंचे, जिसे अखिलेश यादव ने युवाओं के जोश और बदलाव की भावना का प्रतीक बताया।

नीतीश युग का अंत- नीतीश का विधान परिषद से इस्तीफा, बिहार की सियासत में बदलाव के संकेत तेज

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पटना। बिहार की राजनीति में सोमवार को एक बड़ा और अहम मोड़ देखने को मिला, जब करीब दो दशकों तक प्रदेश की सत्ता के केंद्र में रहे Nitish Kumar ने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। सुबह लगभग सवा दस बजे उनके इस्तीफे की आधिकारिक पुष्टि हुई और दोपहर तक इसे स्वीकार भी कर लिया गया। हाल ही में राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के कारण संवैधानिक प्रावधानों के तहत उन्हें 14 दिनों के भीतर किसी एक सदन की सदस्यता छोड़नी थी, जिसके चलते उन्होंने यह कदम उठाया।

इस घटनाक्रम के सामने आते ही बिहार के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई। सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक हर स्तर पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। हालांकि मुख्यमंत्री पद को लेकर अभी भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है। नियमों के अनुसार, विधान परिषद की सदस्यता छोड़ने के बावजूद Nitish Kumar छह महीने तक मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकते हैं। ऐसे में यह बड़ा सवाल बना हुआ है कि क्या वे तत्काल इस्तीफा देंगे या फिर कुछ समय तक पद पर बने रहकर राजनीतिक समीकरणों को साधेंगे।

इस पूरे घटनाक्रम की एक असाधारण तस्वीर भी सामने आई। मुख्यमंत्री स्वयं विधान परिषद नहीं पहुंचे, बल्कि परिषद के सभापति Avadhesh Narayan Singh उनके आवास पर पहुंचे और वहीं उनसे इस्तीफा पत्र प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने परिषद में जाकर सभी औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी कराईं। बिहार की राजनीति में इस तरह की घटना को बेहद दुर्लभ और असामान्य माना जा रहा है।

सुबह से ही इस्तीफे को लेकर अटकलों का बाजार गर्म था। जनता दल (यूनाइटेड) के नेताओं की ओर से पहले संकेत मिले, फिर पार्टी के एक सदस्य द्वारा परिषद में इस्तीफा पत्र दिखाए जाने की खबर सामने आई। इसके बाद वरिष्ठ नेताओं ने भी इस्तीफे की पुष्टि कर दी, जिससे स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो गई। इस घटनाक्रम ने यह संकेत दे दिया कि राज्य की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव दस्तक दे रहा है।

अब सबसे ज्यादा नजर इस बात पर है कि Nitish Kumar मुख्यमंत्री पद को लेकर क्या रुख अपनाते हैं। यदि वे इस पद से भी इस्तीफा देते हैं तो इसे बिहार की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा जाएगा। उनके नेतृत्व में राज्य ने लंबे समय तक एक स्थिर राजनीतिक दौर देखा है, और ऐसे में उनका हटना सत्ता संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है।

इसी बीच सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के भीतर नए नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। भारतीय जनता पार्टी और जदयू के बीच संभावित चेहरों को लेकर मंथन चल रहा है। कई नामों की चर्चा राजनीतिक हलकों में हो रही है, हालांकि अभी तक किसी भी नाम पर आधिकारिक मुहर नहीं लगी है। विपक्ष भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है और इसे अपने राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से देखने की कोशिश कर रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला केवल एक औपचारिक संवैधानिक प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ी राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में Nitish Kumar राष्ट्रीय राजनीति में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं और केंद्र स्तर पर अपनी नई पारी की शुरुआत कर सकते हैं। वहीं राज्य की राजनीति में वे एक मार्गदर्शक की भूमिका में नजर आ सकते हैं।

फिलहाल बिहार की राजनीति एक नए दौर की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है। सत्ता परिवर्तन, नए नेतृत्व का उदय और बदलते राजनीतिक समीकरण—इन सभी संभावनाओं के बीच आने वाले दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं। प्रदेश की जनता से लेकर राजनीतिक दलों तक, सभी की निगाहें अब अगली बड़ी घोषणा पर टिकी हुई हैं, जो बिहार की सियासत की दिशा और दशा तय कर सकती है।

ईरान पर संभावित परमाणु हमले के आरोप के बीच यूएन अधिकारी का इस्तीफा

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नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र के राजनयिक मोहम्मद सफा ने ईरान में संभावित परमाणु हमले की आशंका जताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मच गया है। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ शक्तिशाली ताकतें ईरान के खिलाफ परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की तैयारी कर रही हैं।
मोहम्मद सफा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए एक पत्र साझा किया, जिसमें उन्होंने कहा कि यह फैसला उन्होंने लंबे विचार-विमर्श के बाद लिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र के कुछ वरिष्ठ अधिकारी एक प्रभावशाली लॉबी के दबाव में काम कर रहे हैं, जो वैश्विक शांति के लिए खतरा बन सकती है।
इस घटनाक्रम के बाद संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह के आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल मध्य-पूर्व बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हो सकता है।
हालांकि, अभी तक इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस मामले ने वैश्विक कूटनीति में हलचल जरूर पैदा कर दी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर टिकी है कि संयुक्त राष्ट्र इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है और क्या कोई स्वतंत्र जांच कराई जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तरह की आशंकाएं सही साबित होती हैं, तो यह मानवता के खिलाफ एक बड़ा अपराध हो सकता है। फिलहाल, दुनिया भर के देश इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और स्थिति के स्पष्ट होने का इंतजार कर रहे हैं।