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Sunday, May 10, 2026
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राम भरोसे स्वास्थ्य सेवाएं ! एंबुलेंस में ऑक्सीजन खत्म होने से मरीज की तड़प-तड़पकर मौत

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पाली: राजस्थान में पाली (Pali) जिले के सबसे बड़े बांगड़ अस्पताल (Bangar Hospital) से एक बड़ी खबर आई है। सिस्टम की लापरवाही ने एक युवा की जिंदगी छिन ली। पाली से जोधपुर रेफर किए गए 20 साल के सावन कुमार (patient) की एंबुलेंस में तड़प-तड़पकर मौत हो गई। वजह सिर्फ इतनी थी कि एंबुलेंस का ऑक्सीजन सिलेंडर बीच रास्ते में जवाब दे गया। इस घटना के बाद आक्रोशित परिजनों ने अस्पताल के बाहर जमकर हंगामा किया और एम्बुलेंस चालक व प्रशासन पर लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए।

नया गांव सांसी बस्ती के रहने वाले सावन को किडनी की बीमारी थी। रविवार को हालत बिगड़ने पर उसे जोधपुर के एमडीएम (MDM) अस्पताल रेफर किया गया। सावन को 108 एंबुलेंस में ऑक्सीजन सपोर्ट पर लिटाया गया। अभी एंबुलेंस पाली से महज 20 किलोमीटर दूर रोहट के पास ओम बन्ना मंदिर तक ही पहुंची थी कि ऑक्सीजन सप्लाई अचानक बंद हो गई। सावन का दम फूलने लगा। और उसने भाई की गोद में ही दम तोड़ दिया।

मृतक के भाई देवाराम का रो-रोकर बुरा हाल है। उसने बताया, जैसे ही ऑक्सीजन बंद हुई, मैंने ड्राइवर से मिन्नतें कीं। उसने कहा कि दूसरा सिलेंडर मंगवा लिया है। लेकिन जब तक सिलेंडर आता, मेरा भाई चला गया। गुस्साए परिजनों ने सावन की बॉडी को वापस बांगड़ अस्पताल लाकर मॉर्च्युरी के बाहर धरना दे दिया।

इस पूरे मामले में 108 एंबुलेंस के डिस्ट्रिक्ट मैनेजर मंथन शर्मा ने अजीब सफाई दी है। उनका कहना है कि सिलेंडर में ऑक्सीजन खत्म नहीं हुई थी, बल्कि उसकी चूड़ी में खराबी आ गई थी जिससे सप्लाई रुक गई। दूसरी तरफ, सीएमएचओ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए ड्राइवर के खिलाफ जांच और कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया है।

ऋषिकेश-बद्रीनाथ नेशनल हाईवे पर यात्रियों से भरी बस पलटी, यूपी की एक महिला समेत 7 घायल

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टिहरी गढ़वाल: उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में शिवपुरी के पास ऋषिकेश-बद्रीनाथ नेशनल हाईवे (Rishikesh-Badrinath National Highway) पर यात्रियों से भरी एक बस अनियंत्रित होकर सड़क पर ही पलट गई। गनीमत यह रही कि इस हादसे में किसी की जान नहीं गई, लेकिन इस हादसे में 7 लोग घायल (Injured) हुए हैं। जिसमें यूपी की एक महिला भी गंभीर रूप से घायल हो गई है।

जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी के मुताबिक बस में ड्राइवर और कंडक्टर सहित कुल 25 यात्री सवार थे। ये सभी यात्री बद्रीनाथ धाम के दर्शन कर हरिद्वार लौट रहे थे। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि बस की एक खिड़की अचानक खुल गई थी, जिसे बंद करने की कोशिश में ड्राइवर का ध्यान भटक गया और उसने वाहन पर से अपना नियंत्रण खो दिया। इस वजह से बस बीच सड़क पर ही पलट गई।

मुनि की रेती थाना पुलिस और बचाव दल ने मौके पर पहुंचकर राहत कार्य शुरू किया। हादसे में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर की रहने वाली तनु गुप्ता घायल हुई हैं। उन्हें तत्काल 108 एम्बुलेंस सेवा की मदद से ऋषिकेश के सरकारी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों के अनुसार, तनु गुप्ता की हालत फिलहाल खतरे से बाहर है और अन्य सभी यात्री सुरक्षित बताए जा रहे हैं।

 

युवा शक्ति को मिलेगा हुनर का साथ, उत्तर प्रदेश बनेगा देश का सबसे बड़ा ‘स्किल हब’

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योगी सरकार की नई पहल से 13 विभागों के युवाओं को मिलेगा उद्योग आधारित कौशल प्रशिक्षण

प्रदेश भर में मिशन मोड पर शुरू हुई रोजगारपरक प्रशिक्षण योजना

युवाओं को रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमशीलता से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है लक्ष्य

लखनऊ, 10 मई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार युवाओं को आत्मनिर्भर और रोजगार सक्षम बनाने की दिशा में लगातार बड़े कदम उठा रही है। इसी क्रम में प्रदेश के व्यावसायिक शिक्षा, कौशल विकास एवं उद्यमशीलता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) कपिल देव अग्रवाल के निर्देशन में उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन (यूपीएसडीएम) ने राज्य को देश का अग्रणी “स्किल हब” बनाने के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार की है। प्रदेश के 13 प्रमुख विभागों को कौशल विकास प्रशिक्षण का प्रस्ताव भेजते हुए आगामी तीन महीनों में बड़े स्तर पर युवाओं को रोजगारपरक और उद्योग आधारित प्रशिक्षण से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सरकार का लक्ष्य केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं को रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमशीलता से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है।

हर वर्ग तक पहुंचेगा कौशल विकास अभियान
इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत शहरी गरीब परिवारों, ग्रामीण युवाओं, महिला स्वयं सहायता समूहों, अल्पसंख्यक समुदाय, निर्माण श्रमिक परिवारों, विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों तथा कारागारों से जुड़े युवाओं को उनकी रुचि और उद्योगों की मांग के अनुरूप प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। योगी सरकार की यह पहल सामाजिक समावेशन और आर्थिक सशक्तिकरण के मॉडल के रूप में देखी जा रही है। विशेष रूप से गरीब और वंचित वर्गों के युवाओं को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए मिशन मोड में कार्य किया जा रहा है।

प्रदेश के हर जिले में तैयार होगी हुनरमंद युवा शक्ति
राज्य मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार कौशल विकास को युवाओं की आत्मनिर्भरता का सबसे प्रभावी माध्यम मानते हुए आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के प्रत्येक वर्ग तक कौशल प्रशिक्षण की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए विभागीय समन्वय के साथ तेज गति से कार्य किया जा रहा है। मिशन निदेशक पुलकित खरे द्वारा संबंधित विभागों को पत्र जारी कर प्रशिक्षण लक्ष्य एवं कार्ययोजना साझा करने का अनुरोध किया गया है। जून माह के प्रथम सप्ताह में प्रशिक्षण लक्ष्यों का आवंटन किए जाने की संभावना है। साथ ही सभी विभागों से नोडल अधिकारी नामित करने को कहा गया है, ताकि प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संचालन तेजी से किया जा सके।

जेलों में भी शुरू होगा कौशल प्रशिक्षण अभियान
योजना के अंतर्गत कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवाएं विभाग के माध्यम से जेलों में निरुद्ध युवाओं को भी कौशल प्रशिक्षण से जोड़ा जाएगा। सरकार का उद्देश्य उन्हें प्रशिक्षण देकर पुनर्वास और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाना है। इसके अलावा राज्य नगरीय विकास अभिकरण (सूडा), उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन, महिला कल्याण विभाग, समाज कल्याण विभाग और ग्राम्य विकास विभाग से जुड़े युवाओं को आधुनिक उद्योगों की मांग के अनुसार प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाएगा।

राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होगा प्रशिक्षण
पुलकित खरे ने बताया कि यूपीएसडीएम को राष्ट्रीय स्तर पर एनसीवीईटी द्वारा ‘अवार्डिंग बॉडी’ की मान्यता प्राप्त है, जिससे प्रशिक्षण और प्रमाणन की गुणवत्ता सुनिश्चित होती है। वर्तमान में मिशन से राजकीय संस्थानों के साथ प्रतिष्ठित निजी और औद्योगिक इकाइयां भी प्रशिक्षण पार्टनर के रूप में जुड़ी हुई हैं। सभी प्रशिक्षण कार्यक्रम भारत सरकार के ‘कॉस्ट कॉमन नॉर्म्स’ (सीसीएन) के अनुरूप संचालित किए जाएंगे, जिससे पारदर्शिता और गुणवत्ता दोनों सुनिश्चित होंगी।

आठ लाख से अधिक युवाओं को मिला प्रशिक्षण
मिशन निदेशक ने बताया कि यूपीएसडीएम का उद्देश्य 14 से 35 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं को अल्पकालीन, रोजगारपरक एवं उद्योग आधारित प्रशिक्षण उपलब्ध कराना है। पिछले 9 वर्षों में मिशन द्वारा 8,09,494 युवाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जिनमें से 3,04,810 युवाओं को रोजगार एवं सेवायोजन के अवसरों से जोड़ा गया है। यह उपलब्धि योगी सरकार की उस सोच को दर्शाती है जिसमें युवा शक्ति को प्रदेश की आर्थिक प्रगति का सबसे बड़ा आधार माना गया है। सरकार का लक्ष्य उत्तर प्रदेश को केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं, बल्कि प्रशिक्षित मानव संसाधन और रोजगार सृजन के क्षेत्र में भी देश का अग्रणी राज्य बनाना है।

13 विभागों के साथ मिलकर चलेगा अभियान
उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन द्वारा माध्यमिक शिक्षा विभाग, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग, राज्य नगरीय विकास अभिकरण (सूडा), संयुक्त आयुक्त उद्योग कार्यालय, राज्य पेयजल एवं स्वच्छता मिशन, उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन, भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड, कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवाएं विभाग, महिला कल्याण विभाग, समाज कल्याण विभाग, ग्राम्य विकास विभाग, पर्यटन विभाग तथा हथकरघा एवं वस्त्रोद्योग निदेशालय को प्रशिक्षण प्रस्ताव भेजा गया है। प्रदेश सरकार को उम्मीद है कि विभागीय समन्वय से संचालित यह अभियान लाखों युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसरों के द्वार खोलेगा।

15 साल बाद जनगणना: आँकड़ों से तय होगी अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज की नई दिशा

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(सुभाष आनंद-विभूति फीचर्स)

आजादी के बाद हर 10 साल में होने वाली जनगणना इस बार 15 साल के लंबे अंतराल के बाद हो रही है। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। नियमों के मुताबिक अगली जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन कोरोना महामारी के चलते तब इसे टाल दिया गया। 2025 में अधिसूचना जारी होने के बाद अब 2026 में जनगणना की प्रक्रिया शुरू हुई है। अब सारे देश में जोर शोर से जनगणना की प्रक्रिया चल रही है।
एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत की जनसंख्या अब 1.60 अरब के करीब पहुँच चुकी है। हम आबादी के मामले में चीन को पछाड़कर दुनिया में पहले स्थान पर आ गए हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि जिस रफ्तार से जनसंख्या बढ़ी है, उस अनुपात में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और आधारभूत ढाँचे की योजनाएँ नहीं बनीं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि माँग और आपूर्ति का चक्र बिगड़ चुका है। बेरोजगारी 2011 के मुकाबले दोगुनी हो गई है। अगर समय रहते जनसंख्या वृद्धि रोकने के लिए ठोस राष्ट्रीय नीति नहीं बनी तो संसाधनों पर दबाव और बढ़ेगा और आम नागरिक का जीवन मुश्किल हो जाएगा।
जनगणना का सबसे बड़ा राजनीतिक असर परिसीमन पर पड़ेगा। 2011 के आँकड़ों के आधार पर लोकसभा सीटें बढ़ाने का बिल लाया गया था, जिसका विपक्ष ने विरोध किया। विपक्ष की माँग थी कि 2026 की जनगणना को आधार बनाया जाए। अब 15 साल बाद हो रही गणना से संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन होगा। जिन राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी है, वहाँ लोकसभा और विधानसभा सीटें बढ़ेंगी। दक्षिण के राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण का खामियाजा उन्हें सीटें गंवाकर भुगतना पड़ेगा इसीलिए परिसीमन 2026 के बाद कराने पर सहमति बनी थी।
इस बार की जनगणना की सबसे बड़ी खासियत जातियों की गिनती है। 1931 के बाद पहली बार देश में जातिगत आँकड़े जुटाए जा रहे हैं। सरकार का तर्क है कि इससे ओबीसी, एससी, एसटी और अन्य वर्गों के लिए बेहतर योजनाएँ बनेंगी। सामाजिक न्याय मजबूत होगा।
वहीं आलोचकों का कहना है कि इससे समाज जातियों में और बँट सकता है। आरक्षण की नई माँगें उठेंगी। कई प्रदेशों में पहले से चल रही जातिगत राजनीति को और हवा मिलेगी फिर भी बड़े दल मानते हैं कि नीति-निर्माण के लिए सही डेटा जरूरी है।
2011 की जनगणना में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 907 से बढ़कर 921 हुई थी। इस बार के आँकड़े बताएँगे कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों का जमीन पर कितना असर हुआ। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान जैसे राज्यों में लिंगानुपात अभी भी चिंता का विषय है।
साक्षरता दर के भी नए आँकड़े भी आएँगे। 2011 में केरल 94% के साथ शीर्ष पर था और बिहार 61.8% के साथ सबसे नीचे। अब देखना होगा कि बिहार, यूपी, एमपी, राजस्थान में कितना सुधार हुआ। डिजिटल इंडिया और नई शिक्षा नीति का असर कितना पड़ा, यह भी साफ होगा।
गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वालों की सही संख्या भी सामने आएगी। केंद्र की उज्ज्वला योजना, फ्री राशन, महिलाओं को मासिक सहायता जैसी योजनाओं ने गरीबी कितनी घटाई, इसका आकलन होगा। आर्थिक विशेषज्ञों का आरोप है कि सरकारें आँकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं। जनगणना से असली तस्वीर सामने आएगी।
भारत में जनगणना की जड़ें ब्रिटिश शासन से जुड़ी हैं। पहला प्रयास 1865 से 1872 के बीच हुआ। 1881 में पहली बार पूरे अविभाजित भारत में एक साथ जनगणना कराई गई। आजादी के बाद 1951 में पहली जनगणना हुई और फिर हर 10 साल का क्रम चला। 1872 की जनगणना में सिर्फ 17 सवाल थे। 1901 में पूछा गया कि कौन अंग्रेजी जानता है। 2011 में प्रजनन, कामकाज, पलायन, दिव्यांगता जैसे मुद्दे जुड़े। जनगणना हमेशा समाज का आईना रही है। वह बताती है कि देश किन समस्याओं से जूझ रहा है।
1997 में आई.के. गुजराल की सरकार के समय लोकसभा में जनसंख्या पर दो दिन लगातार बहस हुई थी। तब सभी दलों ने माना था कि यह राष्ट्रीय समस्या है और इस पर राजनीति से ऊपर उठकर सोचना होगा। आज फिर वैसी ही बहस की जरूरत है।
अच्छी बात यह है कि जनसंख्या नियंत्रण पर सभी दलों में मोटे तौर पर सहमति है। अगर केंद्र और राज्य मिलकर गंभीरता से काम करें तो अगले 10-15 साल में जनसंख्या स्थिरता का लक्ष्य पाया जा सकता है।
जनसंख्या नियंत्रण से शिक्षा, स्वास्थ्य और लिंग असमानता जैसी सामाजिक समस्याओं का समाधान भी आसान होगा। एक मजबूत और सभ्य समाज के लिए जनसंख्या का संतुलन में होना जरूरी है।
2026 की जनगणना सिर्फ लोगों की गिनती नहीं है। यह भारत का एक्स-रे है। यह बताएगा कि हम विकसित भारत के लक्ष्य से कितनी दूर हैं और हमें कहाँ मेहनत करनी है। यह डेटा अगले 10 साल की नीतियों की बुनियाद बनेगा। इसलिए इसका निष्पक्ष और समयबद्ध होना बेहद जरूरी है। (विभूति फीचर्स)

भारत की साझी संस्कृति के सूत्रधार डॉ. ज़ाकिर हुसैन

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(ओंकारेश्वर पांडेय -विनायक फीचर्स)

“वे इक़बाल के सपनों के पूर्ण मुसलमान थे। उनमें अरबों का जन्मजात उत्साह था और ईरानियों का वह कोमल स्वभाव जिसकी दुनिया कायल है। वे निजी मुलाकातों में अत्यंत सौम्य थे, लेकिन कार्यक्षेत्र में सक्रियता की मिसाल। वे उस ओस की बूंद की तरह थे जो गुलाब के दिल की आग को ठंडक पहुँचाती है और उस तूफान की तरह भी, जो समंदर का दिल दहला दे… वे जानते थे कि तूफानों के बीच चिराग को कैसे जलाए रखा जाता है।”
ये शब्द किसी कांग्रेसी नेता या उनके किसी करीबी सहयोगी के नहीं, बल्कि भारतीय जनसंघ के तत्कालीन दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी के हैं। आज के दौर में, जहाँ राजनीतिक संवाद अक्सर तीखे और विभाजित होते हैं, एक वैचारिक विरोधी द्वारा दी गई यह भावपूर्ण श्रद्धांजलि डॉ. ज़ाकिर हुसैन के उस विराट व्यक्तित्व का प्रमाण है, जिसने सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र के चरित्र का निर्माण किया।
इतिहास भले ही उन्हें भारत के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में याद रखे, लेकिन डॉ. हुसैन की वास्तविक विरासत उनके राष्ट्रपति भवन पहुंचने से बहुत पहले ही लिखी जा चुकी थी। वे मूलतः एक शिक्षक थे, जिनके लिए स्कूल की कक्षाएं राष्ट्र निर्माण की प्राथमिक प्रयोगशालाएं थीं। उनका मानना था, “राष्ट्रीय प्रगति का रास्ता स्कूल की इमारतों से होकर गुजरता है।” इसी अटूट विश्वास के साथ उन्होंने 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ की नींव रखी।
उनके नेतृत्व में जामिया केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि ‘बौद्धिक संप्रभुता’ का एक प्रयोग बन गया। ब्रिटिश सहायता को ठुकराकर और जन-सहयोग पर निर्भर रहकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय शिक्षा आधुनिक भी हो सकती है और स्वदेशी भी। महात्मा गांधी के साथ मिलकर ‘नई तालीम’ (बुनियादी शिक्षा) पर उनका काम रटने वाली शिक्षा के विरुद्ध एक क्रांति थी, जिसका उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण था।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन का जीवन ‘साझा राष्ट्रवाद’ (Composite Nationalism) का जीवंत उदाहरण था। सूफी परंपराओं से गहरे जुड़े एक धर्मनिष्ठ मुस्लिम होने के बावजूद, उन्होंने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को बौद्धिक स्तर पर पूरी तरह खारिज कर दिया। 1935 में उन्होंने कहा था “इसी देश की मिट्टी से हमारा निर्माण हुआ है और इसी मिट्टी में हमें वापस लौट जाना है।”
1947 के विभाजन की त्रासदी के दौरान उनके साथ हुई एक घटना उनके मानवतावाद को रेखांकित करती है। जालंधर रेलवे स्टेशन पर एक उग्र भीड़ ने उन्हें घेर लिया था, लेकिन उनकी जान एक हिंदू सज्जन कुंदन लाल कपूर और एक सिख स्टेशन मास्टर ने अपनी जान जोखिम में डालकर बचाई। डॉ. हुसैन ने इस घटना को कभी कड़वाहट के रूप में नहीं देखा, बल्कि वे इसे भारतीय समाज की उस ‘अविनाशी मानवता’ के प्रमाण के रूप में पेश करते रहे, जो सांप्रदायिक नफरत से कहीं अधिक मजबूत है।
डॉ. हुसैन की विद्वत्ता तीन महान धाराओं का संगम थी। जर्मनी से प्राप्त अर्थशास्त्र की डॉक्टरेट, इस्लामी दर्शन का गहन ज्ञान और गांधीवादी मूल्यों के प्रति अटूट निष्ठा। इसी समन्वय ने उन्हें अभिजात वर्ग और हाशिए पर खड़े समाज, दोनों से समान रूप से संवाद करने की शक्ति दी। उन्होंने राष्ट्र को सिखाया कि लोकतंत्र केवल मतदान नहीं, बल्कि एक नैतिक साधना है। राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय उनके शब्द “संपूर्ण भारत मेरा घर है और इसके लोग मेरा परिवार हैं।”आज भी भारतीय संविधान की आत्मा को प्रतिध्वनित करते हैं।
आज के वैश्विक राजनीतिक माहौल में, जहाँ पहचान की राजनीति और सोशल मीडिया के शोर ने समाज को बांट दिया है, डॉ. हुसैन का ‘सौम्य प्रभाव’ (Soft Power) एक महत्वपूर्ण विकल्प प्रदान करता है। उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान को कभी भी अपनी देशभक्ति के आड़े नहीं आने दिया, और न ही राजनीतिक लाभ के लिए उसका इस्तेमाल किया। वे उस ‘मध्यमार्ग’ के पथिक थे, जिसकी गुंजाइश आज के विमर्श में सिमटती जा रही है।
उनके पौत्र सलमान खुर्शीद के शब्द कि “उनके आदर्श हमें विनम्र रहने और ईमानदारी से राष्ट्र की सेवा करने की याद दिलाते हैं।” आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। हुसैन का जीवन इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र का स्वास्थ्य उसकी संस्थाओं की गरिमा और उसके नेताओं के व्यवहार की शालीनता से मापा जाता है।
3 मई, 1969 को कार्यालय में रहते हुए उनका निधन हो गया। वे भारत के पहले राष्ट्रपति थे जिनका निधन पद पर रहते हुए हुआ। डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने केवल उच्च पद को सुशोभित नहीं किया, बल्कि उन्होंने ‘भारत’ के विचार को और ऊंचा उठाया। एक ऐसा भारत जो बहुलवादी, मानवीय और अपनी विविधता में एकजुट है। आज, जब राष्ट्र आधुनिकता और सामाजिक एकजुटता के बीच संतुलन खोज रहा है, डॉ. हुसैन का ‘शिक्षक-राजनेता’ वाला मॉडल एक अनिवार्य मार्गदर्शिका है। उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि भारत की असली ताकत नागरिकों की एकरूपता में नहीं, बल्कि एक प्रबुद्ध और साझा भविष्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में निहित है। (विनायक फीचर्स)

लघुकथा: ममत्व की छांव

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(आर . सूर्य कुमारी -विनायक फीचर्स)

बात उन दिनों की है जब में कालेज में पढ़ा करती थी । बी . ए . फाइनल की परीक्षा थी । सेंटर कॉलेज से काफी दूरी पर दिया गया था । ट्रेन से एक घंटे का रास्ता था । स्टेशन पर उतरकर रिक्शे पर लगभग पंद्रह – बीस मिनट का रास्ता था । उस स्टेशन का नाम था पुरूलिया , जो पश्चिम बंगाल में आता था ।
दो परीक्षाएं तो मैंने दे दी , उसके बाद एक दिन परीक्षा हाल में ही तबियत बिगड़ गई । मैंने किसी तरह सम्हाला और पेपर पूरा किया । फिर स्टेशन के पास की रेलवे डिस्पेंसरी से मैंने दवाइयां दी । एक परिचित चिकित्सा कर्मी के घर में विश्राम लिया । बताया गया कि अत्यंत श्रम के कारण , नींद पूरी न होने के कारण तबियत बिगड़ी है । जब पांच छः उल्टियां भी हो गईं तो डिहाइड्रेशन हो गया है ।
और इस पूरे जद्दोजहद के पीछे मेरी ट्रेन कब छूट गयी , पता ही नहीं चला । अब बाद वाली ट्रेन मैंने पकड़ी । गाड़ी के अंदर लाइट भी नहीं थी । किसी तरह यात्रा शुरू हुई, हम आद्रा में रहते थे , और ट्रेन रात आठ बजे आद्रा पहुंची ।
मैं अंदर ही अंदर कुढ़ रही थी । एक तो बाद वाले पेपर की तैयारी करनी थी । मन में आ रहा था कि आजकल किसी से उम्मीद नहीं करनी चाहिए । भैया अपनी पढ़ाई में व्यस्त । माता जी पर घर की देख – रेख का पूरा दायित्व था । कौन आएगा मुझे लेने । मैं मर भी जाऊंगी , तो भी कोई पूछने वाला नहीं । उस समय शाम छः सात बजे के बाद लड़कियां अकेली आना जाना नहीं करती थीं । कोई बंदिश तो नहीं थी , मगर वे स्वयं ही घबराती थीं ।
और तमाम अंतर्द्वंद्व के बाद जब मैं गाड़ी से उतरी और निकासी की ओर गई , मैंने वहां माता जी को इंतजार करते पाया । मेरा मन खुशी से भर गया और एक समाधान भी मिल गया कि किसी से उम्मीद की जाए या नहीं माता-पिता जब तक हैं , बच्चों को नाउम्मीद नहीं होना चाहिए । (विनायक फीचर्स)