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Friday, April 24, 2026
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व्हाट्सअप की दुनिया में किडनी का अक्षय पात्र

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(विवेक रंजन श्रीवास्तव-विनायक फीचर्स)

ज्यादा नहीं 30 बरस पहले एक सिद्ध बाबा अपने भक्तों को एक आशीर्वाद दिया करते थे , “बच्चा तुम्हें जीवन में इतना मिले कि तुम बांटते-बांटते थक जाओ पर खत्म न हो।” तब दुनिया को बाबा जी का आशीर्वाद समझ नहीं आता था। दरअसल बाबा जी 30 बरस बाद की भाषा में कहा करते थे। अब जाकर समझ आया कि बाबा दरअसल व्हाट्सएप के इन पवित्र संदेशों की बात करते थे, जो हर सुबह हमारे मोबाइल पात्र में बिन मांगे भर जाते हैं। यह वह अक्षय पात्र है जिसमें चित्रमयी, टंकित ज्ञान और वीडियो सूचनाएं कभी खत्म ही नहीं होतीं । बांटने वाले थक जाते हैं। डिजिटल दुनिया के कूड़ेदान में हर पल यह “पावन” सुनामी चल रही होती है । यह संदेश ज्ञान आपके डेटा को खा जाती है , आपकी तर्कशक्ति का भी सरेआम कत्लेआम कर देती है।

आज व्हाट्स अप एक ऐसा अद्भुत लोकतंत्र है जहाँ सूचना के नाम पर कुछ भी परोसा जा सकता है और लोग उसे प्रसाद समझकर लपक लेते हैं। आज सुबह व्हाट्सएप की कई गलियों में एक किडनी दान करने का संदेश फिर से अपनी लंगड़ी टांगों के साथ दौड़ रहा था, जो मेरे इनबॉक्स में कई समूहों में प्रगट हुआ। इस परमार्थ फॉरवर्ड से मुझे भरोसा हुआ कि दुनिया में अभी भी दया , धर्म , सहयोग वगैरह लुप्त नहीं हुए हैं। यह संदेश एक्सीडेंट में मृत डॉ. सुधीर के परिवार जनों समेत उनकी किडनी एवं अन्य अंगों के महान दान के सम्बन्ध में है। डॉ.सुधीर जी और उनकी पत्नी पिछले दस सालों से हर दूसरे महीने ब्रेन डेड घोषित हो रहे हैं और चार किडनियाँ उसी बाबा के आशीर्वाद की तरह खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही हैं।

जिस समाज में लोग अपने पड़ोसी को चीनी की एक कटोरी देने से पहले दस बार सोचते हैं, वही समाज डिजिटल दुनिया में अंगदान के लिए इतना व्याकुल है कि बिना सोचे-समझे मैसेज फॉरवर्ड करने को ही सबसे बड़ी समाज सेवा मान बैठा है। फॉरवर्ड करने वालों का मनोविज्ञान भी किसी शोध का विषय होना चाहिए। इनका दिल इतना बड़ा है कि ये किसी भी अनजान व्यक्ति की मौत पर तुरंत एक “दुखी इमोजी” चिपका देते हैं और फिर उसी अंगूठे से उस झूठ को कापी पेस्ट कर हजार लोगों तक पहुँचा देते हैं। उनके लिए यह संदेश भेजना एक तरह का “डिजिटल मोक्ष” है। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने यह मैसेज फॉरवर्ड नहीं किया तो शायद ब्रह्मांड की धुरी घूमना बंद कर देगी या किसी मरीज की जान की जिम्मेदारी सीधे उनके ब्रॉडबैंड कनेक्शन पर आ जाएगी।

मैसेज भेजने वाले सज्जन नीचे अपना नाम ऐसे शान से लिखते हैं जैसे उन्होंने खुद अपनी लैब में वे किडनियाँ तैयार की हों। विसंगति का आलम यह है कि संदेश में लिखे नंबर या तो स्विच ऑफ होते हैं या फिर वह बेचारा कोई ऐसा व्यक्ति होता है जिसे खुद नहीं पता कि उसकी प्रोफाइल फोटो के साथ लोग किडनी का यह परमार्थ कर रहे हैं। एक जमाना था जब चिट्ठियाँ आती थीं तो लोग उसमें लिखी बातों की गहराई नापते थे, अब तो जमाना क्विक ‘क्लिक’ का है। बस अंगुली चली और जिम्मेदारी खत्म। लोग पढ़ते भी नहीं कि तारीख क्या है, स्थान क्या है या क्या यह वैज्ञानिक रूप से संभव भी है। उन्हें बस उस प्रभावी लाइन से मतलब होता है कि “हो सकता है किसी की मदद हो जाए”। इस एक लाइन ने दुनिया के आधे बेवकूफों को “मसीहा” बनने का लाइसेंस दे रखा है।

हैरानी की बात यह है कि जो लोग घर के रद्दी वाले से दस रुपये के लिए आधा घंटा बहस करते हैं, वे इंटरनेट पर बिना किसी वेरिफिकेशन के किसी भी फर्जी खबर पर अपना कीमती समय और डेटा लुटाने को तैयार रहते हैं। इनका मनोविज्ञान बड़ा ही मासूम मगर खतरनाक है। यह एक तरह का “इन्फो-डायरिया” है जहाँ सूचना पचती नहीं है, बस बाहर निकलने के लिए छटपटाती रहती है। फॉरवर्ड करने वाले की मानसिकता यह होती है कि मैं तो बस अच्छा काम कर रहा हूँ, अगर खबर झूठी भी निकली तो मेरा क्या जा रहा है। पर भाई साहब, आपका बहुत कुछ जा रहा है। आपकी साख जा रही है, आपकी समझदारी पर सवाल उठ रहे हैं और सबसे बड़ी बात, उस असली जरूरतमंद का हक मारा जा रहा है जो इस शोर के बीच कहीं खो गया है।

चिकित्सा विज्ञान के नियम कायदे एक तरफ और हमारे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के नियम एक तरफ। डॉक्टर चिल्ला-चिल्ला कर थक गए कि अंग प्रत्यारोपण की एक कानूनी प्रक्रिया होती है, मैचिंग होती है, सख्त प्रोटोकॉल होते हैं, पर हमारे फॉरवर्ड वीर कह रहे हैं कि नहीं बस फोन लगाओ और किडनी ले जाओ जैसे किसी मॉल में सेल लगी हो।

यह जो “परोपकार की खुजली” है, यह समाज को जागरूक बनाने के बजाय मानसिक रूप से पंगु बना रही है। लोग सोचते हैं कि ग्रुप में मैसेज डाल दिया तो गंगा नहा लिए। जमीन पर उतरकर किसी की मदद करने की हिम्मत नहीं है पर उंगलियों से क्रांति करने में हम सब अव्वल हैं।

इस पूरे खेल में सबसे मजेदार किरदार वह होता है जो इन मैसेज के नीचे ‘आमीन’ या ‘सादर’ लिखता है। वह उस झूठ को और ज्यादा पवित्र बना देता है। जब कोई पढ़ा-लिखा सॉफ्टवेयर इंजीनियर या डॉक्टर भी इस बहती गंगा में हाथ धो लेता है, तब लगता है कि डिग्री और बुद्धि का आपस में कोई खास लेना-देना नहीं है। यह एक सामूहिक मूर्खता का उत्सव है जिसे हम हर त्यौहार की तरह पूरी श्रद्धा के साथ सुबह सबेरे मना कर अपने काम पर निकलते हैं।

अगर वास्तव में मानवता बचानी है तो पहले उस विवेक को बचाइए जो इन संदेशों को पढ़कर सबसे पहले यह सवाल करे कि “क्या यह सच है?”। संवेदना का अर्थ यह नहीं है कि आप हर कूड़े को सोने की थाली में सजाकर दूसरों को परोसें। सच तो यह है कि फैक्ट चेक के अनुसार कथित सुधीर जी और उनकी पत्नी वाले संदेश को फैलते हुए भी बरसों हो चुके हैं, लेकिन उनकी किडनियों के नाम पर आज भी लाखों लोगों का दिमाग डेड किया जा रहा है। डिजिटल साक्षरता का मतलब सिर्फ ऐप चलाना नहीं है बल्कि यह समझना भी है कि हर चमकती चीज सोना नहीं होती और हर फॉरवर्ड किया हुआ मैसेज पुण्य नहीं होता।

अगली बार जब कोई ऐसा संदेश आए तो रुकिए, सोचिए, बुद्धि को थोड़ा विश्राम दीजिए। मानवता तब ज्यादा सुखी होगी जब हम झूठ को फैलाने के बजाय उसे वहीं दफन करना सीख जाएंगे। वरना यह चार किडनियाँ और सुधीर जी का परिवार अगले पचास सालों तक इसी तरह व्हाट्सएप के आईसीयू में भर्ती रहेगा और हम सब इस मजाक के मूक गवाह बने रहेंगे।

समझदारी इसी में है कि हम संदेश वाहक न बनकर सत्य के पहरेदार बनें। जिस दिन हम अपनी “बुद्धि का अंगदान” करने से मना कर देंगे, उसी दिन ऐसे फर्जी संदेशों की मौत हो जाएगी। फिलहाल तो आलम यही है कि दुनिया भर की किडनियाँ सलामत रहें या न रहें, लेकिन हमारा यह फॉरवर्ड करने का शौक अमर रहे। आखिर डिजिटल परोपकार का यह नशा ही तो हमें महान होने का भ्रम देता है और इस भ्रम को पालने के लिए सुधीर जी जैसे न जाने कितने काल्पनिक किरदार हर रोज शहीद किए जाते रहेंगे। अब तो ए आई के फेक वीडियो किरदार भी सोशल मीडिया में आ गए हैं, जिन्हें फांसी से बचाने राष्ट्रपति ट्रंप तक इस भ्रम जाल का शिकार होकर ईरान से बात करने को तैयार हैं,आम लोगों की क्या बिसात । *(विनायक फीचर्स)*

योगी सरकार ने बुजुर्गों को दिया सुरक्षा कवच, हर जिले में वृद्धाश्रमों से बेघर और असहाय बुजुर्गों को मिल रहा सहारा

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प्रदेश के सभी जिलों में संचालित वृद्धाश्रमों में बेघर और निराश्रित बुजुर्गों को मिला सुरक्षित आश्रय

नाश्ता, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा और देखभाल की व्यवस्था से बुजुर्गों को मिल रहा सम्मानजनक जीवन

लखनऊ, 24 अप्रैल। योगी सरकार प्रदेश के बुजुर्गों को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन देने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। सरकार द्वारा समाज कल्याण विभाग के माध्यम से प्रदेश के सभी 75 जिलों में वृद्धाश्रम संचालित किए जा रहे हैं, जहां बेघर, निराश्रित और असहाय बुजुर्गों को आश्रय, भोजन, चिकित्सा और देखभाल जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रहीं हैं। इस व्यवस्था से वर्तमान समय में 6055 बुजुर्गों को सुरक्षा और सहारा मिल रहा है।

नाश्ते से लेकर भोजन तक पौष्टिक खानपान

प्रदेश सरकार का उद्देश्य केवल आश्रय देना नहीं, बल्कि बुजुर्गों को सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना है। वृद्धाश्रमों में रहने वाले बुजुर्गों के लिए सुबह नाश्ते से लेकर दोपहर और रात के भोजन तक पौष्टिक खानपान की व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही साफ-सुथरे वस्त्र, स्वच्छ बिस्तर और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रहीं हैं। वहीं वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों की चिकित्सा सुविधा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। नियमित स्वास्थ्य जांच, आवश्यक दवाएं, डॉक्टरों की परामर्श सेवा और आपातकालीन स्थिति में तत्काल उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। इससे उन बुजुर्गों को राहत मिली है, जो आर्थिक तंगी या पारिवारिक उपेक्षा के कारण इलाज नहीं करा पाते थे।

सभी जिलों में संचालित हैं वृद्धाश्रम

योगी सरकार में यूपी के सभी 75 जिलों में 150 क्षमता वाले वृद्धाश्रम संचालित हैं जहां नाश्ते में चाय, हलवा, चना, नमकीन दलिया, नमकीन पूड़ी, पोहा और मीठी दलिया दी जाती है। वहीं दिन के खाने में अरहर दाल, राजमा, मिक्स वेज, मौसमी सब्जी, कढ़ी, रोटी, सब्जी, चावल और सलाद निर्धारित दिनों के अनुसार दिया जाता है। इसी तरह रात्रि के भोजन में रसेदार सब्जी, तहड़ी, खिचड़ी, पूड़ी, रोटी, चावल और खीर दी जाती है।

योगी सरकार में बुजुर्गों को मिला नया जीवन

योगी सरकार की इस बेहतर व्यवस्था से कई ऐसे बुजुर्गों को नया जीवन मिला है, जो पहले सड़कों, रेलवे स्टेशनों या सार्वजनिक स्थानों पर बेसहारा जीवन जीने को मजबूर थे। उन्हें सुरक्षित छत, समय पर भोजन और देखभाल मिल रही है। कई वृद्धाश्रमों में मनोरंजन, योग, भजन-कीर्तन और सामूहिक संवाद जैसी गतिविधियां भी कराई जाती हैं, जिससे बुजुर्ग मानसिक रूप से प्रसन्न और सक्रिय बने रहें।

1 हजार रुपए वृद्धापेंशन दे रही सरकार

समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वृद्धाश्रमों की व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए समय-समय पर निरीक्षण, समीक्षा और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। जहां जरूरत है, वहां अतिरिक्त सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं। इसके अलावा प्रतिमाह बुजुर्गों को 1 हजार रुपए वृद्धापेंशन और आयुष्मान कार्ड के जरिए 5 लाख तक निशुल्क इलाज दिलवाने का काम भी विभाग के द्वारा किया जा रहा है।

सबसे ज्यादा संख्या बरेली में

लखनऊ में 128, मैनपुरी में 116, प्रयागराज में 120, हमीरपुर में 107, मुरादाबाद में 127, बरेली में 134, गोरखपुर में 107, कानपुर देहात में 116, जालौन में 114, गौतमबुद्ध नगर में 104 बुजुर्ग रह रहे हैं।

फतेहगढ़ रेलवे स्टेशन को ‘फतेहगढ़ कैंट’ बनाने की मांग

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– सेना की तीन यूनिट, बंद पार्सल ऑफिस और रणनीतिक महत्व का हवाला

– केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की अपील

– कानपुर व फर्रुखाबाद सांसद से मांग

फर्रुखाबाद/फतेहगढ़। ऐतिहासिक और सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण फतेहगढ़ को अब “कैंट” का दर्जा दिलाने की मांग जोर पकड़ रही है। स्थानीय बुद्धिजीवियों, पूर्व सैनिकों और पत्रकारों ने संयुक्त रूप से केंद्र सरकार से अपील की है कि फतेहगढ़ रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘फतेहगढ़ कैंट’ किया जाए, ताकि क्षेत्र की पहचान और सुविधाएं दोनों सुदृढ़ हों।

मांग रखने वालों का कहना है कि फतेहगढ़ सिर्फ एक सामान्य कस्बा नहीं, बल्कि यहां राजपूत रेजिमेंट, सिख लाइट रेजिमेंट और 114 टीए (टेरिटोरियल आर्मी) जैसी महत्वपूर्ण सैन्य इकाइयां स्थापित हैं। इनमें राजपूत रेजिमेंट देश की सबसे बड़ी और गौरवशाली रेजिमेंट्स में गिनी जाती है, जिससे फतेहगढ़ का राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्व और बढ़ जाता है।

इस मुद्दे को पहले भी उठाया जा चुका है। सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कटियार, जिनका गृह जनपद फतेहगढ़ है, से भी उनके कार्यकाल के दौरान इस मांग को प्रमुखता से रखा था। अब उनके रिटायर होने के बाद स्थानीय स्तर पर फिर से यह आवाज तेज हो गई है।

मांग के पीछे एक बड़ा कारण रेलवे सुविधाओं की गिरती स्थिति भी है। फतेहगढ़ रेलवे स्टेशन पर पार्सल ऑफिस बंद हो चुका है, जिससे व्यापार और छोटे कारोबारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि पहले रोजाना सैकड़ों क्विंटल सामान पार्सल के जरिए आता-जाता था, लेकिन अब यह सुविधा खत्म होने से परिवहन लागत और समय दोनों बढ़ गए हैं।

वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर कटियार ने स्थानीय गणमान्य लोगों के साथ मिलकर इस मुद्दे को उठाया है और सांसद मुकेश राजपूत एवं सांसद कानपुर रमेश अवस्थी से भी इस पर पहल करने की मांग की है। उनका कहना है कि “जब देश के कई सैन्य क्षेत्रों के रेलवे स्टेशनों को ‘कैंट’ का दर्जा मिला है, तो फतेहगढ़ को इससे वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है।”

भ्रष्टाचार और फर्जी मुकदमों के विरोध में रेवेन्यू बार एसोसिएशन की हड़ताल जारी

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फर्रुखाबाद

 

जनपद की तहसील कायमगंज में रेवेन्यू बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। एसोसिएशन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार अधिवक्ता बीते 17 अप्रैल हड़ताल पर हैं और यह विरोध प्रदर्शन भ्रष्टाचार तथा कथित रिश्वतखोरी के खिलाफ किया जा रहा है। अधिवक्ताओं का आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर अनियमितताएं बढ़ रही हैं और न्याय व्यवस्था प्रभावित हो रही है, जिससे आम जनता, किसान और वादकारियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि उपजिलाधिकारी कायमगंज अतुल कुमार सिंह द्वारा एक घटना को आधार बनाकर रेवेन्यू बार एसोसिएशन के कई अधिवक्ताओं अवनीश कुमार गंगवार, इन्द्रेश कुमार गंगवार, सर्वेश कुमार यादव समेत अन्य के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया है। अधिवक्ताओं का कहना है कि यह कार्रवाई एकतरफा और दुर्भावनापूर्ण है, जिसका उद्देश्य अधिवक्ताओं की आवाज को दबाना है। इस मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद से अधिवक्ताओं में गहरा रोष व्याप्त है।

अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि उन्होंने इस पूरे प्रकरण की शिकायत जिलाधिकारी फर्रुखाबाद, पुलिस अधीक्षक, पुलिस महानिरीक्षक कानपुर जोन, मुख्यमंत्री कार्यालय और अन्य उच्च अधिकारियों को पत्र के माध्यम से दी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इसके चलते अधिवक्ताओं ने न्याय की मांग को लेकर हड़ताल जारी रखने का निर्णय लिया है।

प्रेस विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि कुछ अधिकारी मनमाने तरीके से न्यायालय में बैठकर अधिवक्ताओं से धन वसूली कर रहे हैं, जो न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है बल्कि गरीब और जरूरतमंद वादकारियों के लिए भी बड़ी समस्या बन गया है। अधिवक्ताओं का कहना है कि वे इस मुद्दे को लेकर लगातार आवाज उठा रहे हैं, ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित हो सके।रेवेन्यू बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि जब तक दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती और दर्ज मुकदमों की निष्पक्ष जांच नहीं कराई जाती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने समाचार माध्यमों से अपील की है कि इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाए, ताकि संबंधित अधिकारियों पर दबाव बन सके और आम जनता को न्याय मिल सके।

बेटियों ने लहराया सफलता का परचम, उच्च अंक पाकर नगर का नाम किया रोशन

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शमशाबाद। क्षेत्र में इस वर्ष हाईस्कूल और इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। प्रयागराज बोर्ड द्वारा आयोजित वर्ष 2025-26 की परीक्षाओं में चंद्रकुमारी ज्वाला शंकर रायजादा बालिका इंटर कॉलेज, शमशाबाद की छात्राओं ने उत्कृष्ट प्रदर्शन कर न केवल विद्यालय बल्कि पूरे नगर का नाम रोशन किया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार हाईस्कूल वर्ग में छात्रा अंजलि ने 88 प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्रथम स्थान हासिल किया। वहीं फिरदौस ने 85 प्रतिशत अंक पाकर द्वितीय स्थान प्राप्त किया और महक ने 82.22 प्रतिशत अंक के साथ तृतीय स्थान हासिल कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

इसी क्रम में इंटरमीडिएट वर्ग की छात्राओं ने भी शानदार प्रदर्शन किया। अलका ने 75 प्रतिशत अंक प्राप्त कर विद्यालय का नाम ऊंचा किया, जबकि अंशिका ने 74 प्रतिशत अंक हासिल कर अपनी मेहनत का परिणाम सबके सामने रखा।

विद्यालय के प्रबंधक सुभाष चंद्र सक्सेना और प्रधानाचार्य सोनाली (सोनाक्षी) ने इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए सभी छात्राओं को आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि बेटियों की इस सफलता पर पूरे विद्यालय परिवार को गर्व है और यह उपलब्धि अन्य छात्राओं के लिए प्रेरणास्रोत बनेगी।

इस अवसर पर मेधावी छात्राओं ने अपने भविष्य के लक्ष्यों को भी साझा किया। इंटर की छात्रा अलका ने बताया कि वह चिकित्सक बनकर समाज सेवा करना चाहती हैं, जबकि अंशिका ने प्रशासनिक अधिकारी बनकर देश और समाज के लिए कार्य करने की इच्छा व्यक्त की।

विद्यालय प्रबंधन ने सभी छात्राओं के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि हमारे विद्यालय में इतनी प्रतिभाशाली छात्राएं अध्ययनरत हैं। उच्च अंक प्राप्त कर नगर का नाम रोशन करने वाली सभी बेटियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी गईं।

सिंचाई के लिए गई महिला से अभद्रता, विरोध पर विवाद बढ़ा—ऑपरेटर मौके से फरार

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शमशाबाद। क्षेत्र में एक महिला के साथ नलकूप ऑपरेटर द्वारा कथित अभद्रता का मामला सामने आया है। सिंचाई के लिए पानी मांगने पहुंची महिला के साथ अशोभनीय टिप्पणी किए जाने का आरोप है। विरोध करने पर मामला इतना बढ़ गया कि गाली-गलौज और हाथापाई की नौबत आ गई। घटना के बाद आरोपी ऑपरेटर मौके से फरार हो गया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर के एक मोहल्ला निवासी महिला की मक्के की फसल नलकूप संख्या 44 (रामलीला मैदान के निकट) के पास स्थित है, जो पिछले कई दिनों से सिंचाई के अभाव में सूखने की कगार पर थी। शुक्रवार को महिला अपने पुत्र के साथ नलकूप पर पहुंची और ऑपरेटर सरवन कुमार से पानी देने का अनुरोध किया।

पीड़िता के अनुसार, ऑपरेटर ने पानी देने के बजाय अश्लील इशारे करते हुए अभद्र टिप्पणी की। महिला द्वारा इसका विरोध किए जाने पर दोनों पक्षों में कहासुनी शुरू हो गई, जो देखते ही देखते गाली-गलौज में बदल गई।

महिला ने घटना की जानकारी अपने पति को दी, जिसके बाद आक्रोशित पति बाइक से मौके पर पहुंच गया। पति को आता देख आरोपी ऑपरेटर घबरा गया और नलकूप छोड़कर मौके से फरार हो गया।

पीड़ित महिला ने आरोपी ऑपरेटर के खिलाफ शमशाबाद थाना पुलिस को लिखित तहरीर देकर सख्त कार्रवाई की मांग की है। वहीं पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं और जल्द ही आवश्यक कार्रवाई करने की बात कही है।