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Sunday, June 7, 2026
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UP Police Constable की लिखित परीक्षा कल से होगी शुरू, लखनऊ-गोरखपुर रूट पर चलेगी स्पेशल ट्रेन

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती (UP Police Constable) लिखित परीक्षा 2026 का आयोजन 8, 9 और 10 जून 2026 को किया जाएगा। परीक्षा को देखते हुए रेलवे ने विशेष इंतजाम किए हैं। 7 से 10 जून तक परीक्षार्थियों के लिए स्पेशल ट्रेनें चलाई जाएंगी। लखनऊ-गोरखपुर रूट (Lucknow-Gorakhpur route) पर स्पेशल ट्रेनें चलेंगी, सभी स्पेशल ट्रेनों में 12 कोच लगाए जाएंगे। लाखों अभ्यर्थियों की सुविधा के लिए ये व्यवस्था की गई है।

बता दें कि बीते दिनों उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड (UPPRPB) ने इस संबंध में सूचना जारी की थी। आधिकारिक नोटिस के अनुसार, ये परीक्षा राज्य भर के विभिन्न परीक्षा केंद्रों पर हर दिन दो पालियों (shifts) में आयोजित होगी। जारी नोटिस में लिखा गया है कि यह सूचना अभ्यर्थियों के सूचनार्थ प्रकाशित की जा रही है। अभ्यर्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अग्रेतर महत्वपूर्ण निर्देशों हेतु उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड, लखनऊ की वेबसाइट http://uppbpb.gov.in का अवलोकन करते रहें।

यह भी सूचित किया जाता है कि अभ्यर्थियों को परीक्षा सम्बन्धी समस्त सूचना/ निर्देश बोर्ड की वेबसाइट के माध्यम से ही प्रदत्त की जाएगी। विज्ञापन के तहत कुल 32,679 पदों पर भर्तियां की जाएगी. इसके लिए प्रदेश के 75 जिलों के 1180 परीक्षा केंद्रों पर आयोजित की जाएगी। परीक्षा में लगभग 28.86 लाख उम्मीदवारों के शामिल होने की उम्मीद है। बोर्ड ने उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं।

 

मानसिक गुलामी का नया दौर…

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(विवेकानंद-विनायक फीचर्स)
ऐसा लगता है, जैसे अति गोपनीय स्थान पर बन रहा पेपर, टेस्ट से कुछ रोज पहले अचानक निकला और कोचिंग मालिकों के पास पहुंचकर बोला-लीजिए मुझे लीक कर दीजिए क्योंकि जिम्मेदारों से न तो कोई सवाल पूछ रहा है और न वे जवाबदेही लेने के इच्छुक दिखाई दे रहे हैं।
उसकी मानसिकता क्या होगी जो अपने ही बच्चों के पक्ष में उठ रहे सवालों को भ्रमित करने का जोर लगा रहा है और सवाल उठाने वालों के लिए जहर की बोलत लेकर घूम रहा है। क्या यही मानसिक गुलामी नहीं है?
सवाल किसी पेपर के लीक होने का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी के बाद 50-60 परीक्षाओं का पेपर लीक होने से नहीं रोक पाई। निश्चित तौर पर इसमें कोचिंग माफिया का बड़ा रोल रहा होगा। लेकिन क्या यह बिना उनके बिके संभव है, जिनके ऊपर पेपर की गोपनीयता बनाए रखने की जिम्मेदारी है? क्या उन्हें पेपर लीक के सवाल से मुक्त कर देना चाहिए? क्या सरकारों की कोई जिम्मेदारी नहीं है?
अफसोस होना चाहिए जब देश के किशोरे, युवा किसी पेपर लीक जैसी घटना के बाद आत्महत्या कर लेते हैं, किसी परीक्षा का रिजल्ट रुक जाने से सदमे में आकर आत्महत्या कर लेते हैं, सड़कों पर नारेबाजी करते हैं, लाठियां खाते हैं और सरकारें युवा दिवस मनाने की बात करती हैं। सवाल पूछने वालों पर देशद्रोह की तोहमत जड़ दी जाती है। जहां पेपर लीक जैसी अव्यवस्था से नौजवान आत्महत्या कर रहे हों, वहां किसी और प्रयास की क्या जरूरत है?
लेकिन अफसोस एकतरफा नहीं है। उस समाज के विषय में भी उतना ही अफसोस होना चाहिए जो अपने ही बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ होता देखकर खामोशी ओढ़े हुए है। जो अपने ही बेरोजगार युवाओं पर देशद्रोह की तोहमत मंजूर कर लेता है, जो अपने ही किसानों में विदेशी साजिश सूंघ लेता है।
नीट पेपर लीक कोई अलबेला मामला नहीं है। दुखदायी यह है कि युवाओं का भविष्य सुरक्षित करने की बजाए उनकी चिंता का पांखड अधिक सुर्खियों में है। ऐसी कार्रवाईयों पर अभिनंदन बरसाने के आग्रह किए जा रहे हैं, जिनकी आवश्यकता होनी ही नहीं चाहिए। सूचना तंत्र हर कार्रवाई और फैसले को ऐतिहासिक बता रहा है। परीक्षा पर चर्चा के लिए ‘एरर लेस’ व्यवस्था होती है और परीक्षाओं में एरर ही एरर मिल रहे हैं।
2024 में जब पेपर लीक का मामला सामने आया था तब ऐसे दावे किए गए थे कि अब सब चाकचौबंद हो जाएगा। लेकिन न परीक्षा की व्यवस्था सुधरी न पकड़े गए आरोपियों को अब तक सजा मिली। यह केवल एक मामले की कहानी नहीं है, अधिकांश मामलों के आरोपियों को सजा नहीं हुई। उल्टा लटका देंगे, सीधा कर देंगे जैसी सड़कछाप बयानबाजियों से सुर्खियों बटोरने वाले नेता अपने राजनीतिक एजेंडे में मग्न हैं। जिन पर सवाल पूछने की जिम्मेदारी है,वह बहस को इस तरह डिजाइन कर रहा है कि उसकी रस्म भी निभ जाए और आकाओं की जिम्मेदारी की ओर लोगों का ध्यान भी न जाए।
2024 के पेपर लीक मामले में सीबीआई ने 45 आरोपियों को चिन्हित किया था। करीब डेढ़ सौ लाभार्थियों की पहचान भी की। राकेश रंजन, संजीव कुमार सिंह सहित कई लोग गिरफ्तार भी हुए थे। संजीव मुखिया पर तीन लाख रुपए का इनाम घोषित था। एजेंसियों ने बड़े सबूत जुटाने के दावे किए, लेकिन अब तक किसी को सजा नहीं मिली। कुछ न्यायिक हिरासत में हैं कुछ जमानत पर बाहर आ गए हैं। इतनी सख्त कार्रवाई से पेपर लीक जैसी घटनाएं रुकेंगी?
क्या यह कम शर्म की बात है कि एक 12वीं कक्षा का छात्र भारी-भरकम सीबीएससी बोर्ड की व्यवस्था की पोल खोल दे? क्या पूरे बोर्ड के जिम्मेदार जिनके फैसलों से लाखों बच्चों की मेहतन से खिलवाड़ किया गया अस्तित्व में रहने लायक है? जिन्होंने ऑनस्क्रीन मार्किंग पर काम किया होगा क्या उनकी लापरवाहियां किसी तरह माफी योग्य हैं? नीट पेपर लीक में अब तक कम से कम 14 बच्चों द्वारा आत्महत्या करने की खबरें हैं। इनकी मौत का इल्जाम किसके सिर होगा? परीक्षा तो दोबारा करा लोगे मेरी बच्ची को वापस ला पाओगे, एक मां के इस सवाल का जवाब किसी के पास है? आधी-अधूरी सुविधाओं में भी एमबीबीएस की सीटें बढ़ाने का श्रेय लेने वाले आगे आकर इसकी जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते?
बच्चों के साथ जिस बेरहमी से प्रयोग किए जा रहे हैं वह शर्मनाक हैं। स्कूलों में बच्चों के लिए सुविधाएं बढ़ाने की बजाए राजनीतिक दखल बढ़ाए जा रहे हैं। नेता स्कूलों में जाते हैं, वहां शिक्षा व्यवस्था की बातें कम करते हैं, अपनी सरकारों के काम अहसान की तरह गिनाते हैं। अयोध्या से लेकर पाकिस्तान तक की बातें की जाती हैं। कोई इतना मासूम नहीं है कि उसे 18 साल की उम्र में पहुंचने वाले युवा को वोटरों में तब्दील करने के प्रयास दिखाई न देते हों। फिर भी अजीब खामोशी है। यही मानसिक गुलामी है? (विनायक फीचर्स)

हताश विपक्ष की कुंठा का फ्लॉप शो

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(डॉ. सुधाकर आशावादी -विनायक फीचर्स)

भले ही विश्व भर में संचार क्रांति का डंका बज रहा हो, किन्तु आभासी और वास्तविक स्थिति में जमीन आसमान का अंतर होता है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, यू ट्यूब चैनल्स में यदि अधिक शक्ति होती, तो वह मनमाने प्रचार से विश्व के अनेक देशों में सत्ता परिवर्तन करा देते तथा सस्ती लोकप्रियता के लिए यू ट्यूबर मन गढंत विमर्श प्रस्तुत करके सत्ता के लिए नित्य चुनौतियाँ खड़ी करते रहते, किन्तु ऐसा व्यवहार में भला कब होता है।
आभासी जगत भले ही चंद लोगों के विचारों को लाइक करके करोड़ों की संख्या में फॉलोवर्स पैदा कर दे, किन्तु धरातल पर फॉलोवर्स कहीं नजर नहीं आते। विगत 6 जून को दिल्ली के जंतर मंतर पर आयोजित किए गए प्रदर्शन के लिए भी सोशल मीडिया पर अत्यधिक प्रचार किए जाने पर भी पर्याप्त भीड़ नहीं जुट सकी तथा नीट पेपर के लीक होने का दोषी ठहराए जाने वाले शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग ने भी जोर नहीं पकड़ा, जिससे कि आंदोलन का बड़ा स्वरूप सरकार को गंभीर निर्णय लेने के लिए विवश करता। यह फ्लॉप प्रदर्शन अनेक राजनीतिक दलों के मिले जुले विमर्श तथा मात्र सत्ताधारी राजनीतिक दल तथा एक राष्ट्रवादी संगठन के विरोध तक सीमित रहा, जिससे इस प्रदर्शन की मंशा स्पष्ट हो गई, कि यह प्रदर्शन उन राजनीतिक दलों की हताशा और कुंठा का विषवमन है, जिन दलों को देश का जनमानस अस्वीकार कर चुका है। यूँ तो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, किन्तु जनसाधारण को भ्रमित करने का अधिकार प्रदान नहीं करता।
वस्तुस्थिति यह है कि इस धरने प्रदर्शन का फ्लॉप होना यह दर्शाता है, कि इस मिशन का समर्थन करने वाले निराश व हताश राजनीतिक दलों के मंसूबे बार बार असफल हो रहे हैं। विदेशी धरती से भारत की व्यवस्था को ध्वस्त करने के प्रयासों को भारत की अधिसंख्य जनता स्वीकार नहीं करती, भले ही अराजक शक्तियां कितने ही मुखौटे बदल कर आएं। अराजक तत्वों के मंसूबे विफल होने पर यह समझना चाहिए, कि भारत का नागरिक आभासी दुनिया की कुत्सित चालों को समझ चुका है। उसे किसी भी प्रकार विरोधी दुष्प्रचार से भ्रमित नहीं किया जा सकता। (विनायक फीचर्स)

त्याग, सेवा और परोपकार की आध्यात्मिक साधना है पौधारोपण

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(विजय कुमार शर्मा -विनायक फीचर्स)
प्रकृति और मानव का संबंध अत्यंत प्राचीन, गहरा और अविभाज्य है। मानव जीवन की प्रत्येक आवश्यकता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति पर निर्भर करती है। वृक्ष और पौधे न केवल हमें शुद्ध वायु, फल, फूल, औषधियां और छाया प्रदान करते हैं, बल्कि वे पृथ्वी पर जीवन के संरक्षण का आधार भी हैं। भारतीय संस्कृति में पौधरोपण को केवल पर्यावरण संरक्षण का साधन नहीं माना गया, बल्कि इसे आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत पुण्यकारी कार्य माना गया है।
भारतीय धर्मग्रंथों में वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। वेद, पुराण, उपनिषद तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में वृक्षों की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह समझ लिया था कि वृक्षों के बिना जीवन संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने वृक्षारोपण को धर्म, सेवा और पुण्य से जोड़ दिया। कहा गया है कि जो व्यक्ति एक वृक्ष लगाता है और उसका संरक्षण करता है, वह अनेक यज्ञों के समान पुण्य का भागी बनता है।
सनातन धर्म में पीपल, बरगद, नीम, तुलसी, आंवला और बेल जैसे वृक्षों को विशेष रूप से पूजनीय माना गया है। पीपल के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास माना गया है, जबकि बरगद को दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। तुलसी को माता का स्वरूप मानकर घर-घर में स्थापित किया जाता है। इन मान्यताओं के पीछे केवल धार्मिक भावनाएं ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का गहरा संदेश भी छिपा हुआ है। जब लोग वृक्षों को पूजनीय मानते हैं, तब वे उनकी रक्षा भी करते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो पौधरोपण एक निस्वार्थ सेवा है। जब कोई व्यक्ति एक पौधा लगाता है, तब वह केवल अपने लिए नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कार्य करता है। वृक्ष वर्षों तक मानवता की सेवा करते हैं और बदले में कुछ नहीं मांगते। यह त्याग, सेवा और परोपकार की वही भावना है जिसे सभी धर्मों में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसलिए पौधरोपण को एक आध्यात्मिक साधना भी कहा जा सकता है।
ब्रह्माकुमारीज सहित अनेक आध्यात्मिक संस्थाएं भी पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण को मानव सेवा का महत्वपूर्ण माध्यम मानती हैं। उनका मानना है कि जब मनुष्य के विचार शुद्ध होते हैं, तब वह प्रकृति के प्रति भी संवेदनशील बनता है। शुद्ध चेतना और स्वच्छ पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए आध्यात्मिक जागरण के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जाता है।
धार्मिक अनुष्ठानों में भी पौधरोपण का विशेष महत्व है। कई स्थानों पर जन्मदिन, विवाह, पुण्यतिथि, धार्मिक उत्सव तथा अन्य शुभ अवसरों पर पौधे लगाने की परंपरा विकसित हो रही है। यह परंपरा न केवल पर्यावरण की रक्षा करती है, बल्कि धार्मिक कार्यों को समाज और प्रकृति के हित से भी जोड़ती है। आज के समय में यह परंपरा और अधिक प्रासंगिक हो गई है।
वर्तमान युग में बढ़ता प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण पूरी मानवता के लिए चिंता का विषय है। ऐसे समय में पौधरोपण केवल एक सामाजिक अभियान नहीं, बल्कि एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य बन गया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति वर्ष में कम से कम एक पौधा लगाए और उसकी देखभाल करे, तो पर्यावरण संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
पौधरोपण केवल धरती को हरा-भरा बनाने का कार्य नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक चेतना, धार्मिक आस्था और मानवता की सेवा का श्रेष्ठ माध्यम है। वृक्ष जीवन के प्रतीक हैं और उनका संरक्षण भविष्य की सुरक्षा है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को पौधरोपण को एक पुण्य कार्य, एक धार्मिक कर्तव्य और एक आध्यात्मिक साधना के रूप में अपनाना चाहिए। तभी हम प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रख सकेंगे तथा आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और समृद्ध वातावरण प्रदान कर पाएंगे। (विनायक फीचर्स)

तोड़ी जा रही दुकान की दीवार अचानक भरभराकर गिरी, चपेट में आए 2 मजदूर, एक की मौत, दूसरे का इलाज जारी

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डीडीयू नगर: जीटी रोड (GT Road) स्थित काली मंदिर के समीप शनिवार देर रात सड़क चौड़ीकरण कार्य के दौरान एक दर्दनाक हादसा हो गया। तोड़ी जा रही एक दुकान (shop) की दीवार अचानक भरभराकर गिर गई, जिसके मलबे में दबकर दो मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उपचार के दौरान एक मजदूर की मौत हो गई, जबकि दूसरे का इलाज जारी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, जीटी रोड चौड़ीकरण परियोजना के तहत संबंधित विभाग द्वारा कई दुकानों और भवनों को आंशिक रूप से ध्वस्त किया गया था। इसके बाद भवन स्वामी अपने स्तर पर शेष हिस्सों को हटवाने का कार्य करा रहे थे। इसी दौरान काली मंदिर के पास स्थित एक दुकान की दीवार अचानक ढह गई और वहां काम कर रहे दो मजदूर उसकी चपेट में आ गए।

हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई. स्थानीय लोगों और प्रशासन की मदद से राहत एवं बचाव कार्य चलाकर दोनों मजदूरों को मलबे से बाहर निकाला गया। घायलों को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां सद्दाम (20 वर्ष), पुत्र इजराइल, निवासी बजरडीहा की उपचार के दौरान मौत हो गई। वहीं मो. अली (30 वर्ष), पुत्र लियाकत अली, निवासी बजरडीहा का उपचार जारी है।

घटना की जानकारी देते हुए एसडीएम राजीव मोहन सक्सेना ने बताया कि भवन स्वामी अपने मकान के ऊपरी हिस्से को हटवा रहे थे। इसी दौरान एक दीवार अचानक गिर गई, जिसके नीचे दो मजदूर दब गए। दोनों को तत्काल अस्पताल भेजा गया, लेकिन एक मजदूर को बचाया नहीं जा सका। वहीं मुगलसराय कोतवाली प्रभारी विजय प्रताप सिंह ने एक मजदूर की मौत की पुष्टि करते हुए बताया कि दूसरे घायल मजदूर का इलाज चल रहा है घटना के बाद स्थानीय लोगों ने सड़क चौड़ीकरण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए जिम्मेदार अधिकारियों से जांच की मांग की है। प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी है और हादसे के कारणों का पता लगाया जा रहा है।

 

सेवा और वात्सल्य के एक युग का अंत: नहीं रहीं डॉ. रजनी सरीन

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फर्रुखाबाद की ‘भाभी जी’ ने ली अंतिम सांस, शोक में डूबा जनपद

फर्रुखाबाद। चिकित्सा सेवा, समाजसेवा और मानवीय मूल्यों की जीवंत मिसाल रहीं वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. रजनी सरीन का निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही फर्रुखाबाद में सेवा, करुणा और वात्सल्य के एक युग का अंत हो गया। शहर में “भाभी जी” और “डॉक्टर मैडम” के नाम से लोकप्रिय डॉ. सरीन ने अपना पूरा जीवन मरीजों, जरूरतमंदों और समाज के वंचित वर्गों की सेवा को समर्पित कर दिया था।
गंभीर बीमारी से जूझने के बावजूद डॉ. सरीन ने अपने कर्तव्य से कभी समझौता नहीं किया। निधन से मात्र एक दिन पहले तक उन्होंने अपने निःशुल्क रविवार क्लीनिक में मरीजों का उपचार किया। जीवन की अंतिम सांस तक सेवा का व्रत निभाने वाली डॉ. सरीन का यह समर्पण उन्हें असाधारण बनाता है।
किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने पांच दशक से अधिक समय तक स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं दीं। फर्रुखाबाद और आसपास के क्षेत्रों में हजारों बच्चों ने उनके हाथों जन्म लिया। कई पीढ़ियां ऐसी हैं जिनका इलाज उन्होंने किया और जिनके परिवारों का वे अभिन्न हिस्सा बन गईं।
बाढ़ राहत कार्यों से लेकर निःशुल्क चिकित्सा शिविरों, महिला स्वास्थ्य जागरूकता, दिव्यांग पुनर्वास, कैंसर जांच, सामुदायिक रसोई और गरीबों की सहायता तक, डॉ. सरीन ने हर क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी। कोविड महामारी के दौरान भी उन्होंने जरूरतमंदों तक दवाइयां और राहत सामग्री पहुंचाने का कार्य किया।
डॉ. सरीन एक सफल चिकित्सक ही नहीं बल्कि शिक्षाविद्, लेखिका, कवयित्री और समाजसेवी भी थीं। उन्होंने अनेक सामाजिक संस्थाओं का नेतृत्व किया और शिक्षा तथा महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।
डॉ. रजनी सरीन के निधन से चिकित्सा जगत, सामाजिक संगठनों, राजनीतिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में शोक की लहर है। हजारों परिवारों ने अपनी डॉक्टर, मार्गदर्शक और शुभचिंतक को खो दिया है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए सेवा, संवेदना और समर्पण की प्रेरणा बना रहेगा।