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Tuesday, May 5, 2026
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हिमाचल प्रदेश: सिरमौर में सड़क हादसे में चार लोगों की मौत, मुख्यमंत्री ने शोक व्यक्त किया

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शिमला: हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के सिरमौर (Sirmaur) जिले में सोमवार सुबह एक सड़क हादसे में चार लोगों की मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल हो गया। यह हादसा हरिपुर धार के पास गट्टाधार रोड पर हुआ, जब एक कार तीखे मोड़ पर अनियंत्रित होकर सड़क से 200 मीटर नीचे गिर गई। तीन महिलाओं सहित चार लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। स्थानीय निवासी और पुलिस दल घटनास्थल पर पहुंचे और बचाव कार्य शुरू किया।

घायलों को नाहन के सरकारी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। मृतकों की पहचान गट्टाधार पंचायत के भोलना स्कूल की शिक्षिका अमरा देवी (52), उनकी बेटियों आराध्या (14), प्रियंका (14) और सज्जन सिंह (62) के रूप में हुई है, जबकि गंभीर रूप से घायल अजीत कुमार अमरा देवी का बेटा है। पुलिस ने मामला दर्ज कर दुर्घटना के सटीक कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है।

इस बीच, मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुखु ने सड़क दुर्घटना में चार लोगों की जान जाने पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने जिला प्रशासन से घटना की रिपोर्ट मांगी है। मुख्यमंत्री ने मृतक के परिवारों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की और दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना की।

बिहार में 7 मई को सम्राट कैबिनेट का बड़ा विस्तार

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गांधी मैदान में होगा भव्य शपथ ग्रहण समारोह

पटना। बिहार की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आ रहा है, जहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की नई सरकार का बहुप्रतीक्षित मंत्रिमंडल विस्तार 7 मई को राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित किया जाएगा। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा तैयार की गई मंत्रियों की सूची को दिल्ली में पार्टी आलाकमान से अंतिम मंजूरी मिल चुकी है, जिसके बाद अब इस कार्यक्रम को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक तैयारियां तेज कर दी गई हैं।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष संजय सरागवी ने जानकारी देते हुए बताया कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में होने वाले इस शपथ ग्रहण समारोह को भव्य और ऐतिहासिक बनाने की तैयारी की जा रही है। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के शीर्ष पदाधिकारी और कई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री भी शामिल होंगे, जिससे यह आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बनने जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, इस मंत्रिमंडल विस्तार में करीब 30 मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है। इनमें भाजपा के 12, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के 11, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के कुछ प्रतिनिधि तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा और हम (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) से एक-एक मंत्री शामिल किए जाने की संभावना है। गृह विभाग और विधानसभा अध्यक्ष का पद भाजपा अपने पास ही रख सकती है, जिससे पार्टी का शक्ति संतुलन स्पष्ट झलकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कैबिनेट विस्तार केवल पदों का बंटवारा नहीं बल्कि सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा नेतृत्व ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के तहत सभी वर्गों—विशेषकर युवा, महिलाएं और विभिन्न जातीय समूहों—को प्रतिनिधित्व देने पर जोर दे रहा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ‘नई विकास टीम’ में कई नए चेहरों को जगह मिलने के संकेत हैं, जबकि कुछ अनुभवी नेताओं की वापसी भी संभावित मानी जा रही है।
इधर, पूर्व डिप्टी सीएम विजय सिन्हा की कथित नाराजगी और भूमिहार समाज में उठ रहे असंतोष ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। पार्टी इस समीकरण को साधने के लिए कोई बड़ा फैसला ले सकती है। वहीं, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता दिलीप जायसवाल को लेकर भी सस्पेंस बना हुआ है, लेकिन उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें दोबारा मंत्री बनाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।
कुल मिलाकर, 7 मई का दिन बिहार की राजनीति के लिए बेहद अहम साबित होने जा रहा है, जब नई कैबिनेट के जरिए एनडीए सरकार अपने भविष्य की दिशा और प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत देगी।

अराजक तत्वों और आवारा जानवरों के अड्डे बन गये आवास विकास कालोनी के पार्क

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फर्रुखाबाद। आवास विकास कालोनी के विभिन्न पार्कों में अराजकता का माहौल और आवारा गौवंश का खौफ जारी बना हुआ है। क्षेत्रीय निवासियों के कई बार शिकायत किए जाने के बावजूद भी इन पार्कों की देखरेख में कोई अंतर नहीं आया। उधर नगर पालिका भी इस विषय को लेकर मूक बनी हुई है।
बताते चलें कि शहर की पाश कॉलोनी कही जाने वाली आवास विकास कॉलोनी के विभिन्न सेक्टर में बच्चों के खेलने के लिए पार्क बनाए गए थे मगर यह पार्क कहीं पर तो आसपास के निवासियों के तबेले बना दिए गए जहां उनके पालतू जानवर बधते हैं तो कहीं पर यदि खाली है तो इन पार्कों का कोई मेंटेन और देखरेख नहीं होती जिसके चलते बड़ी-बड़ी घास होगी हुई है तो कहीं पर फाटक टूटे होने के कारण आवारा गोवंश इनमें घुस जाते हैं और वहां आराम फरमाते हैं इन पार्कों में कई स्थानों पर शराबी शरण लेते हैं और वहां पर जुआ भी खेले जाने की खबरें हैं। कुल मिलाकर कहें तो बच्चों के खेलने बच्चों के खेलने और बुजुर्गों के टहलने के लिए बनाए गए पार्क उनके लिए अन्य उपयोगी हो गए हैं और आवारा जानवरों का अराजक तत्वों के लिए शरणस्थल बने हुए हैं।
पार्को में बच्चों के खेल होते हैं लेकिन अभी तक इनमें सफाई की व्यवस्था नहीं की गई है।यहां पर आवारा गोवंश अपना पड़ाव डाले रहते हैं ।जिस उद्देश्य के लिए इन पार्कों का निर्माण किया गया वह उद्देश्य पूरा ही नहीं हो रहा है आवास विकास परिषद और नगर पालिका किसी ने इन पार्कों की दुर्दशा पर कोई भी कार्रवाई नहीं की । नागरिकों ने मांग उठाई कि इन पार्कों का सुंदरीकरण कराया जाए ताकि बच्चे इनमें खेल सकें और बुजुर्गों के टहलने का स्थान सुरक्षित हो सके और जिस उद्देश्य से यह पार्क बनाए गए हैं वह पूरा हो सके।

विपक्ष का ईवीएम पर “सेटिंग” का शोर एक भ्रम

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– ऐसा होता तो सिराथू से हार नहीं जाते राजनेता केशव प्रसाद मौर्य जैसे दिग्गज राजनीतिकार
शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की सियासत में हर चुनाव के बाद एक पुराना सवाल फिर जिंदा हो जाता है क्या ईवीएम में “सेटिंग” होती है? 2022 विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद यह बहस और तेज हुई, जब भाजपा के बड़े ओबीसी चेहरे और तत्कालीन डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य खुद सिराथू सीट से करीब 7 हजार वोटों से चुनाव हार गए। यह हार सिर्फ एक सीट की हार नहीं थी, बल्कि उस पूरे नैरेटिव पर सवाल थी जिसमें दावा किया जाता है कि चुनावी मशीनों से नतीजे तय होते हैं।
अगर सीधी बात करें तो आंकड़े खुद कहानी बताते हैं। भाजपा को लगभग 41 प्रतिशत वोट शेयर मिला, समाजवादी पार्टी को करीब 32 प्रतिशत। कई सीटों पर हार-जीत का अंतर 2 से 5 हजार वोट तक रहा। यानी मुकाबला बेहद करीबी था। ऐसे में यह तर्क कमजोर पड़ जाता है कि अगर “सेटिंग” होती तो सत्ता पक्ष अपने सबसे बड़े नेताओं को क्यों हारने देता? केशव प्रसाद मौर्य की हार इस बहस का सबसे बड़ा उदाहरण बन गई।
ईवीएम को लेकर आरोप 2014 के बाद से लगातार उठते रहे हैं, लेकिन हर बार चुनाव आयोग ने तकनीकी आधार पर इन दावों को खारिज किया है। आयोग का साफ कहना है कि ईवीएम किसी नेटवर्क से जुड़ी नहीं होती, इसमें वन-टाइम प्रोग्रामिंग चिप होती है और हर वोट का VVPAT स्लिप से मिलान संभव है। सुप्रीम कोर्ट भी VVPAT गिनती बढ़ाने के बाद इस सिस्टम को बरकरार रख चुका है। यानी अब तक कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया जो बड़े पैमाने पर गड़बड़ी साबित कर सके।
असल सवाल मशीन नहीं, जमीन का है। यूथ इंडिया की पड़ताल में सामने आया कि कई सीटों पर सत्ता विरोधी लहर, टिकट वितरण में असंतोष, स्थानीय नेताओं की नाराजगी और जातीय समीकरणों का बदलना हार की बड़ी वजह बने। बूथ मैनेजमेंट में छोटी चूक भी हजारों वोट का फर्क पैदा करती है। सिराथू में भी यही फैक्टर निर्णायक माने गए।
दूसरी तरफ भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह को उनकी चुनावी पकड़ और माइक्रो मैनेजमेंट के कारण “कलयुग का चाणक्य” कहा जाता है। उन्होंने बूथ स्तर तक संगठन खड़ा किया, डेटा आधारित रणनीति लागू की और कार्यकर्ताओं का नेटवर्क मजबूत किया। यही वजह है कि भाजपा लगातार बड़े चुनाव जीतती रही। लेकिन जब हार होती है, तो वही सिस्टम सवालों के घेरे में आ जाता है यही राजनीति की विडंबना है।
सीधी सच्चाई यह है कि चुनाव मशीन नहीं, गणित और मैनेजमेंट जीतता है। अगर ईवीएम ही सब कुछ तय करती, तो बड़े-बड़े मंत्री, सांसद और मुख्यमंत्री तक चुनाव नहीं हारते। भारतीय चुनाव प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें करोड़ों वोट पड़ते हैं और हजारों कर्मचारी जुड़ते हैं। इतनी बड़ी व्यवस्था में बिना ठोस सबूत के “सेटिंग” का दावा करना सियासी रणनीति ज्यादा और तथ्य कम नजर आता है।
युवा मतदाताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि लोकतंत्र का असली खेल बूथ से शुरू होता है जहां एक-एक वोट तय करता है कि सत्ता किसके हाथ में जाएगी। ईवीएम पर बहस जारी रह सकती है, लेकिन केशव प्रसाद मौर्य की हार एक सीधा संदेश देती है,जनता जब फैसला करती है, तो सबसे मजबूत नेता भी हार सकता है। यही लोकतंत्र की असली ताकत है, और यही उसकी सबसे बड़ी सच्चाई है।

बलिया का शेर: सत्ता नहीं, उद्देश्य के लिए जीने वाले राजनेता की विरासत

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लखनऊ/बलिया। देश की राजनीति में जहां सत्ता के लिए होड़ आम बात है, वहीं कुछ ऐसे नेता भी हुए जिन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर इसी विरासत के प्रतीक रहे—एक ऐसे नेता जिन्हें “बलिया का शेर” कहा गया और जिन्होंने पूरी जिंदगी उद्देश्य के लिए संघर्ष किया, सत्ता के लिए नहीं।
यह विशेष लेख उनकी भतीजी रचना सिंह द्वारा लिखे संस्मरणों पर आधारित है, जिसमें चंद्रशेखर के व्यक्तित्व के कई अनछुए पहलू सामने आए हैं—जेल से लेकर गांव की चाय दुकान तक, और रसोई से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक।
जेल में जन्मा नाम, विचारों की आज़ादी कायम
आपातकाल के दौरान जब चंद्रशेखर जेल में थे, तब भी उनका मस्तिष्क स्वतंत्र था। उसी दौरान उन्होंने अपनी नवजात भतीजी का नाम रखा। यह घटना बताती है कि बंदी जीवन भी उनके विचारों को कैद नहीं कर सका। उनके लिए छोटे-छोटे कार्य भी सृजन और आशा के प्रतीक थे।
1980 के दशक में बलिया के एक दौरे के दौरान चंद्रशेखर ने सड़क किनारे एक साधारण दुकान पर चाय पी। जहां उनके साथ आए लोगों ने साफ-सफाई पर सवाल उठाए, वहीं उन्होंने बिना किसी हिचक के चाय का आनंद लिया।
यह घटना उनकी सादगी और आम जनता से जुड़ाव को दर्शाती है। आंकड़ों के अनुसार, उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल (1990-91) में भी उन्होंने सरकारी खर्चों में कटौती और सादगी पर जोर दिया था।
एक यात्रा के दौरान उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि “गांव की पहचान गधों से होगी।” कुछ देर बाद सच में गांव के बाहर गधे दिखे, जिससे सभी हैरान रह गए। यह उनका अंदाज था—गंभीर राजनीति के बीच हल्के-फुल्के अंदाज में संवाद करना।
चंद्रशेखर केवल भाषण देने वाले नेता नहीं थे, बल्कि काम करके दिखाने में विश्वास रखते थे। कई बार वह खुद रसोई में उतरकर खाना बनाते थे। उनके लिए नेतृत्व का मतलब था हर काम में आगे रहना।
विश्लेषकों के मुताबिक, यह व्यवहार उस दौर के नेताओं में दुर्लभ था, जब राजनीति तेजी से प्रोटोकॉल और दिखावे की ओर बढ़ रही थी।
हर जन्मदिन पर समानता का संदेश
परिवार में हर जन्मदिन पर वह बच्चों के साथ खुद केक बांटते थे। हर व्यक्ति को बराबर हिस्सा देना उनका सिद्धांत था।
राजनीतिक तौर पर भी उन्होंने हमेशा सामाजिक न्याय और समानता की वकालत की चाहे वह संसद हो या सड़क।
उनका मानना था कि सच्ची ताकत को साबित करने की जरूरत नहीं होती। वह बिना दिखावे के अपनी उपस्थिति से प्रभाव छोड़ते थे।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यही कारण था कि सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।
आज जब राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप और सत्ता की दौड़ तेज है, ऐसे में चंद्रशेखर का जीवन युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश है।
देश 2027 में चंद्रशेखर की जन्मशती की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या उनकी सादगी और सिद्धांतों वाली राजनीति को फिर से जीवित किया जा सकेगा, या वह केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएगी?

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत में मध्यप्रदेश के नेताओं की भागीदारी

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(पवन वर्मा-विभूति फीचर्स)

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार का बनना किसी एक चुनाव, एक चेहरे या एक रणनीति का परिणाम नहीं है। यह एक दीर्घकालिक राजनीतिक साधना का निष्कर्ष है। जहां संगठन की गहराई, नेतृत्व की व्यापकता और चुनावी प्रबंधन की सूक्ष्मता एक साथ मिलकर काम करती है। इस पूरी प्रक्रिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, पूर्व अध्यक्ष जेपी नड्डा जैसे नेताओं की अभूतपूर्व भूमिकाओं के साथ ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय जैसे कई नेताओं का योगदान भी रहा। यह जीत भाजपा के एक ऐसे मॉडल की सफलता है, जिसमें संगठन को केंद्र में रखकर नेतृत्व और रणनीति को उसके इर्द-गिर्द विकसित किया गया। भाजपा के यहां पर प्रभावशाली होने में मध्य प्रदेश के भाजपा संगठन और नेताओं की भी भागीदारी महत्वपूर्ण रही है।
एक समय ऐसा था जब पश्चिम बंगाल में भाजपा की उपस्थिति नाममात्र की थी। पार्टी न तो राजनीतिक विमर्श में प्रभावी थी और न ही संगठनात्मक रूप से मजबूत। ऐसे समय में मध्य प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय को बंगाल का प्रभार सौंपा गया। कैलाश विजयवर्गीय उस वक्त भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव थे तब उन्हें बंगाल का प्रभारी बनाया गया था। उन्होंने यहां चुनावी जीत को लक्ष्य बनाने से पहले संगठन को खड़ा करने पर जोर दिया। यह समझना जरूरी है कि बिना संगठन के कोई भी राजनीतिक दल केवल अवसरों का लाभ उठा सकता है, लेकिन स्थायी विस्तार नहीं कर सकता। विजयवर्गीय ने इसी बुनियादी सत्य को आधार बनाकर काम शुरू किया। उन्होंने मध्यप्रदेश में सफल रहे पन्ना प्रभारी मॉडल को बंगाल में लागू किया। मतदाता सूची के हर पन्ने को एक कार्यकर्ता से जोड़ना, यह रणनीति केवल आंकड़ों का प्रबंधन नहीं, बल्कि मतदाता के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने का प्रयास थी। इसके साथ ही बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत किया गया और कार्यकर्ताओं को स्पष्ट जिम्मेदारियां दी गईं। यह काम आसान नहीं था। बंगाल की राजनीतिक परिस्थितियां अक्सर हिंसक और तनावपूर्ण रही हैं। विजयवर्गीय को भी विरोध, हमलों और पुलिस के मामलों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय संगठन को और मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया। इसका परिणाम भी सामने आया। भाजपा जहां 2016 के चुनाव में 3 सीटों पर थी वह 2021 में बढ़कर 77 सीटों तक पहुंची। यह भाजपा के लिए एक मजबूत राजनीतिक आधार का निर्माण था।
विजयवर्गीय द्वारा खड़ा किया गया संगठन केवल चुनावी मशीनरी नहीं था, बल्कि एक जीवंत तंत्र था। बाद में परिस्थिति बदली और विजयवर्गीय केंद्रीय संगठन से वापस मध्य प्रदेश की राजनीति में भेजे गए लेकिन उनका बंगाल में तैयार किया गया तंत्र समय के साथ और विकसित हुआ। पन्ना प्रभारी के साथ-साथ गली प्रमुख जैसी व्यवस्थाएं जोड़कर संगठन को और सूक्ष्म स्तर तक पहुंचाया गया। इसका मतलब यह था कि भाजपा अब केवल बड़े मुद्दों पर नहीं, बल्कि हर गली, हर मोहल्ले और हर परिवार तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। यह वही कार्यशैली थी, जिसने मध्यप्रदेश में भाजपा को लगातार मजबूती दी है।
बंगाल में भाजपा की जीत को राष्ट्रीय नेतृत्व से अलग करके नहीं देखा जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों के जरिए एक व्यापक संदेश दिया। जिसमें विकास, राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक स्थिरता जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे संगठनात्मक स्तर पर लागू किया। उनकी रणनीति बूथ स्तर तक केंद्रित रही। जहां हर वोट की गणना और हर कार्यकर्ता की भूमिका तय की गई। उन्होंने चुनाव को केवल प्रचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे एक सुसंगठित अभियान में बदला। उन्होंने दोनों चरणों की वोटिंग के दौरान वहां पर अपने कार्यकर्ताओं से सीधे संपर्क में रहकर यह बताया कि भाजपा किसी भी मोर्चे को हल्के रूप में नहीं ले रही है। नए नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन जैसे नेताओं ने इस पूरी प्रक्रिया में बेहतरीन समन्वयक की भूमिका निभाई। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि शीर्ष नेतृत्व की रणनीति और जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत के बीच कोई अंतराल न रहे। इस सबके साथ बंगाल के भाजपा नेता और कार्यकर्ताओं का भी अभूतपूर्व योगदान और लंबे अरसे का संघर्ष भी इस जीत का मजबूत आधार बना।

मोहन यादव: सीमित समय, लेकिन प्रभाव की गहराई
इस व्यापक अभियान में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका एक विशेष आयाम लेकर सामने आती है। मध्यप्रदेश में प्रशासनिक और राजनीतिक व्यस्तताओं के चलते उन्हें बंगाल में प्रचार के लिए बहुत अधिक समय नहीं मिल पाया। वे केवल दो चरणों में कुछ चुनिंदा सीटों पर ही प्रचार कर सके। लेकिन यही सीमित समय उनके प्रभाव को और अधिक सघन बना गया। उन्होंने जिन 6 विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार किया, उनमें से 5 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की। क्रिकेट की भाषा में कहें तो यह लगभग 90 प्रतिशत का स्ट्राइक रेट है। यह उनके प्रभावी संवाद और मतदाताओं से जुड़ने की क्षमता का प्रमाण है। उनकी राजनीति की विशेषता उनकी सादगी और सहजता है। वे किसी आक्रामक छवि के बजाय एक आत्मीय और संवादात्मक नेतृत्व प्रस्तुत करते हैं। उनकी मोहक मुस्कान, सहज भाषा और बिना बनावट का व्यवहार, यह सब उन्हें मतदाताओं के बीच स्वीकार्य बनाता है। बंगाल में भी उन्होंने यही छाप छोड़ी। उनकी सभाएं भाषण कम और संवाद अधिक लगती थीं। वे स्थानीय संदर्भों को समझते हुए अपनी बात रखते थे, जिससे मतदाताओं के साथ एक सीधा संबंध स्थापित होता था।
मोहन यादव ने अपने पहले दौरे में छतना, बांकुरा, बरजोरा और ओंडा में प्रचार किया, और चारों सीटों पर भाजपा को जीत मिली। बांकुरा में 54 हजार से अधिक वोटों का अंतर, छतना में 47 हजार से अधिक का अंतर ये केवल जीत नहीं, बल्कि मोहन यादव के प्रभाव को भी दिखाते हैं। दूसरे चरण में उन्होंने खड़गपुर सदर और कमरहाटी में प्रचार किया। खड़गपुर में भाजपा ने जीत दर्ज की, जबकि कमरहाटी में हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उनका कुल प्रदर्शन प्रभावशाली रहा।
विजयवर्गीय की अनुपस्थिति लेकिन प्रभाव की निरंतरता
इस चुनाव में कैलाश विजयवर्गीय को बंगाल नहीं भेजा गया। उनके खिलाफ दर्ज मामलों को देखते हुए संगठन ने यह निर्णय लिया। लेकिन उनकी अनुपस्थिति ने यह भी साबित किया कि उन्होंने जो संगठन खड़ा किया था, वह अब आत्मनिर्भर हो चुका है। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद उनका भावुक होना इस बात का प्रतीक था कि यह जीत केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उन जैसे कई नेताओं की एक लंबी यात्रा और संघर्ष का परिणाम है।

जीत कैसे गढ़ी गई
पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह सफलता एक दीर्घकालिक राजनीतिक साधना का परिपक्व परिणाम है। बंगाल में जिस धैर्य और दूरदृष्टि से संगठन की नींव रखी, उसने भाजपा को एक स्थायी आधार प्रदान किया। इसी आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनस्वीकार्यता, अमित शाह की रणनीतिक सटीकता, नितिन नबीन का संगठनात्मक संतुलन और कई नेताओं का समन्वय एक व्यापक राजनीतिक ऊर्जा में परिवर्तित हुआ। इसी क्रम में डॉ. मोहन यादव की भूमिका यह दर्शाती है कि सीमित अवसर भी यदि स्पष्टता और आत्मीयता के साथ उपयोग किए जाएं, तो वे गहरे प्रभाव छोड़ सकते हैं। उन्होंने अपने संक्षिप्त प्रचार के दौरान जिस सहजता, सादगी और संवाद की शक्ति का परिचय दिया, उसने यह सिद्ध किया कि राजनीति केवल आक्रामकता का नहीं, बल्कि विश्वास अर्जित करने का भी माध्यम है। यह जीत उस समवेत प्रयास की अभिव्यक्ति है, जिसमें संगठन की जड़ें गहरी हों, नेतृत्व बहुआयामी हो और कार्यकर्ता का समर्पण अविचल हो, तो सबसे जटिल राजनीतिक परिदृश्य भी परिवर्तन की दिशा में ढलने लगता है। यही इस जीत का वास्तविक अर्थ है, और यही उसकी स्थायी प्रासंगिकता। (विभूति फीचर्स)