भाजपा नेता डॉ. युवराज सिंह ने किसानों को किया सम्मानित, विशेषज्ञों ने बताई जैविक खेती की आधुनिक तकनीकें
अमृतपुर, फर्रुखाबाद
खेती की बढ़ती लागत, घटती भूमि उर्वरता और रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों के बीच किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से ग्राम भुसेरा स्थित जी.एस. चौहान पैलेस में दो दिवसीय प्राकृतिक खेती कार्यशाला का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आयोजक भाजपा नेता डॉ. युवराज सिंह रहे, जिन्होंने क्षेत्र के विभिन्न गांवों से पहुंचे किसानों एवं कृषक महिलाओं का सम्मान करते हुए प्राकृतिक खेती को आत्मनिर्भर और समृद्ध किसान का आधार बताया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे भाजपा जिला अध्यक्ष फतेहचंद राजपूत ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री एवं प्रदेश सरकार किसानों को प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। प्राकृतिक खेती से न केवल उत्पादन लागत कम होती है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलती है। उन्होंने किसानों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर जैविक एवं प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने का आह्वान किया। कार्यशाला में कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. खलील खान, मृदा विशेषज्ञ एस.एम. सुनील पांडे, मौसम विशेषज्ञ डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह परिहार, सीनियर रिसर्च फेलो प्रशांत सिंह परिहार तथा चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के पूर्व शोध निदेशक डॉ. एच.जी. प्रकाश ने किसानों को प्राकृतिक खेती की नवीनतम तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी। विशेषज्ञों ने बताया कि प्राकृतिक खेती केवल खेती की पद्धति नहीं, बल्कि मिट्टी, जल और पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावी माध्यम भी है।विशेषज्ञों ने किसानों को जीवामृत, घन जीवामृत तथा गोबर आधारित किंवित जैविक खाद तैयार करने की विधि समझाई। उन्होंने बताया कि किसान अपने घरों पर उपलब्ध संसाधनों से ही गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद तैयार कर सकते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर होने वाला खर्च काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह खाद बुवाई से 7 से 10 दिन पूर्व खेत में डालने के साथ-साथ खड़ी फसल में भी प्रयोग की जा सकती है।
कार्यक्रम के दौरान जैविक खाद के वैज्ञानिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह खाद बड़े पैमाने पर कंप्रेस्ड बायोगैस प्लांट में फसलों, सब्जियों, पौधों एवं पशुओं से प्राप्त अपशिष्ट पदार्थों को वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से तैयार की जाती है। इस खाद में 12 से 25 प्रतिशत कार्बनिक पदार्थ, 1 से 3 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.5 से 2.5 प्रतिशत फास्फोरस, 1 से 3 प्रतिशत पोटाश तथा 15 से 25 प्रतिशत नमी पाई जाती है, जो भूमि की संरचना को बेहतर बनाने और फसल उत्पादन बढ़ाने में सहायक होती है।कार्यशाला में उपस्थित कृषक महिलाओं ने भी प्राकृतिक खेती के प्रति विशेष रुचि दिखाई और विशेषज्ञों से विभिन्न तकनीकी जानकारियां प्राप्त कीं। किसानों ने कहा कि प्राकृतिक खेती अपनाकर न केवल उत्पादन लागत कम की जा सकती है बल्कि स्वस्थ एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न का उत्पादन भी संभव है।कार्यक्रम के अंत में डॉ. युवराज सिंह ने सभी वैज्ञानिकों, अतिथियों एवं किसानों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भविष्य में भी किसानों को नई कृषि तकनीकों से जोड़ने के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे। दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में बड़ी संख्या में किसानों, कृषक महिलाओं, कृषि विशेषज्ञों एवं जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति रही।








