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Monday, July 13, 2026
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फरीदकोट में 3 तस्कर गिरफ्तार, 586 ग्राम हेरोइन, ₹60,400 की ड्रग मनी और मोबाइल बरामद

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फरीदकोट: फरीदकोट (Faridkot) सी.आई.ए. स्टाफ ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 3 लोगों को गिरफ्तार (arrested) किया है। जानकारी के अनुसार सहायक थाना प्रभारी हाकम सिंह के नेतृत्व में सी.आई.ए. स्टाफ की पुलिस टीम दाना मंडी फरीदकोट में संदिग्ध व्यक्तियों की जांच कर रही थी, उनके पास से ड्रग और ड्रग जप्त किया गया है।

खबर हैं कि पुलिस को एक कार खड़ी दिखाई दी, जिसमें 2 व्यक्ति भी नजर आए। संदेह के आधार पर जब उनकी तलाशी ली गई तो रमणदीप सिंह और गुरप्रीत सिंह, दोनों निवासी महावा, जिला अमृतसर के कब्जे से 515 ग्राम हैरोइन, 60 हजार रुपए की ड्रग मनी तथा 2 मोबाइल फोन बरामद हुए। पुलिस ने दोनों आरोपियों को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया। इन दोनों से पूछताछ की जा रहीं है।

पूछताछ के दौरान गांव नूरपुर हकीमां, जिला मोगा निवासी पलविंदर सिंह को भी मामले में नामजद कर गिरफ्तार किया गया। उसके कब्जे से 71 ग्राम हैरोइन, एक मोबाइल फोन और 400 रुपए नकद बरामद किए गए। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ एन.डी.पी.एस. एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी है।

 

युवा भारत और रोजगार: डिग्री के साथ स्किल क्यों है सबसे बड़ी ताकत?

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प्रभात यादव
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। देश की बड़ी आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और यही युवा शक्ति आने वाले वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगी। लेकिन बदलते दौर में केवल डिग्री हासिल कर लेना अब अच्छी नौकरी की गारंटी नहीं रह गया है। उद्योग जगत की मांग तेजी से बदल रही है और कंपनियां अब ऐसे युवाओं को प्राथमिकता दे रही हैं जिनके पास डिग्री के साथ व्यावहारिक कौशल (स्किल), नई तकनीकों की समझ और समस्या समाधान की क्षमता भी हो।

कुछ वर्ष पहले तक नौकरी के लिए स्नातक या स्नातकोत्तर डिग्री को सबसे बड़ी योग्यता माना जाता था, लेकिन आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई ), डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा, क्लाउड कंप्यूटिंग, डिजिटल मार्केटिंग, ग्राफिक डिजाइन, कंटेंट क्रिएशन, ई-कॉमर्स और ऑटोमेशन जैसी नई तकनीकों ने रोजगार का स्वरूप बदल दिया है। कंपनियां ऐसे कर्मचारियों की तलाश में हैं जो नई तकनीक के साथ तेजी से काम कर सकें और लगातार सीखते रहें।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई ) ने रोजगार बाजार में सबसे बड़ा बदलाव लाया है। कई पारंपरिक कार्य अब ऑटोमेशन के जरिए पूरे हो रहे हैं, जबकि नई तकनीक से जुड़े हजारों नए रोजगार भी पैदा हो रहे हैं। डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, एआई प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित युवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है। इसका अर्थ यह नहीं कि पारंपरिक नौकरियां समाप्त हो जाएंगी, बल्कि अब हर क्षेत्र में तकनीकी समझ रखने वाले लोगों की आवश्यकता बढ़ेगी।

आज केवल तकनीकी ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है। अच्छी कम्युनिकेशन स्किल, टीम में काम करने की क्षमता, नेतृत्व, समय प्रबंधन, समस्या का समाधान खोजने की सोच और सकारात्मक दृष्टिकोण भी उतने ही महत्वपूर्ण बन चुके हैं। कई कंपनियां इंटरव्यू में डिग्री से अधिक उम्मीदवार की सोच, व्यवहार और सीखने की क्षमता को महत्व देती हैं।
भारत सरकार भी कौशल विकास पर लगातार जोर दे रही है। स्किल इंडिया मिशन, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी पहल का उद्देश्य युवाओं को उद्योगों की जरूरत के अनुसार प्रशिक्षित करना है। इन योजनाओं के माध्यम से लाखों युवाओं को विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण देकर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
रोजगार का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। अब केवल सरकारी नौकरी ही सफलता का एकमात्र रास्ता नहीं है। स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, डिजिटल कंटेंट, ऑनलाइन शिक्षा, ई-कॉमर्स, ऐप डेवलपमेंट, यूट्यूब, सोशल मीडिया, एग्री-टेक और गिग इकोनॉमी जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए अवसर लगातार बढ़ रहे हैं। इंटरनेट ने छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने का अवसर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में वे युवा सबसे आगे होंगे जो लगातार नई चीजें सीखते रहेंगे। आज हजारों ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कम लागत या निःशुल्क प्रशिक्षण उपलब्ध है। कोई भी युवा डिजिटल मार्केटिंग, प्रोग्रामिंग, ग्राफिक डिजाइन, वीडियो एडिटिंग, विदेशी भाषाएं, डेटा एनालिटिक्स या एआई जैसे विषयों में अपनी क्षमता विकसित कर सकता है। सीखने की यह आदत भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी बनेगी।
ग्रामीण भारत के युवाओं के लिए भी संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। कृषि आधारित उद्योग, फूड प्रोसेसिंग, डेयरी, मधुमक्खी पालन, ड्रोन तकनीक, सोलर एनर्जी, डिजिटल सेवा केंद्र और स्थानीय उद्यमिता के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने के अवसर बढ़े हैं। यदि आधुनिक तकनीक को पारंपरिक रोजगार से जोड़ा जाए तो गांवों में भी बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन हो सकता है।
हालांकि चुनौती यह भी है कि शिक्षा व्यवस्था और उद्योगों की आवश्यकताओं के बीच अभी भी अंतर मौजूद है। कई युवा डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन उनके पास उद्योगों की जरूरत के अनुरूप कौशल नहीं होता। इसलिए शिक्षा संस्थानों, उद्योगों और सरकार को मिलकर ऐसे प्रशिक्षण मॉडल विकसित करने होंगे, जिनसे पढ़ाई के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव भी मिले।
आज का समय केवल डिग्री का नहीं, बल्कि डिग्री + स्किल + निरंतर सीखने की क्षमता का है। जो युवा नई तकनीक अपनाएंगे, अपने कौशल को समय-समय पर बेहतर बनाएंगे और बदलती दुनिया के साथ खुद को ढालेंगे, वही भविष्य के रोजगार बाजार में सबसे आगे होंगे। आत्मविश्वास, मेहनत और सीखने की ललक ही आने वाले भारत की सबसे बड़ी ताकत होगी। युवा भारत के लिए यही सफलता का नया मंत्र है—”डिग्री जरूरी है, लेकिन स्किल ही असली पहचान है।”

महंगाई की नई मार: क्या बढ़ती कीमतें आम आदमी का बजट बिगाड़ देंगी?

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भरत चतुर्वेदी
देश में महंगाई एक बार फिर चिंता का विषय बन गई है। जून 2026 में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर है। यह पिछले 17 महीनों में पहली बार है जब महंगाई केंद्रीय बैंक के लक्ष्य से आगे निकली है। खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतें, मानसून की अनिश्चितता तथा पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने महंगाई के दबाव को बढ़ा दिया है।
महंगाई का सबसे अधिक असर आम परिवारों की रसोई पर दिखाई दे रहा है। सब्जियां, दालें, दूध, खाद्य तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसके साथ ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों का प्रभाव परिवहन लागत पर पड़ता है, जिससे लगभग हर वस्तु महंगी हो जाती है। बाजार में बढ़ी लागत का बोझ आखिरकार उपभोक्ताओं की जेब पर ही आता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार महंगाई केवल घरेलू कारणों से नहीं बढ़ी है। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। दूसरी ओर, कई राज्यों में मानसून की असमान बारिश से कृषि उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है। यदि आने वाले महीनों में वर्षा सामान्य नहीं रही तो खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है और खाद्य महंगाई और तेज हो सकती है।
महंगाई बढ़ने का सीधा असर भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर भी पड़ सकता है। यदि कीमतों में तेजी लगातार बनी रहती है तो आने वाले महीनों में ब्याज दरें बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है। ब्याज दर बढ़ने का अर्थ है कि घर, वाहन और व्यक्तिगत ऋण महंगे हो सकते हैं तथा EMI का बोझ बढ़ सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय आर्थिक परिस्थितियों और आगामी आंकड़ों पर निर्भर करेगा।
मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के लिए यह स्थिति सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण है। एक ओर आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही, वहीं दूसरी ओर रोजमर्रा का खर्च लगातार बढ़ रहा है। रसोई का बजट बिगड़ रहा है, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन पर खर्च बढ़ रहा है। ऐसे में परिवारों को अपनी बचत और खर्च के बीच नया संतुलन बनाना पड़ रहा है।
व्यापार और उद्योग भी इससे अछूते नहीं हैं। कच्चे माल और परिवहन की लागत बढ़ने से उत्पादन महंगा हो रहा है। छोटे और मध्यम उद्योगों पर इसका अधिक दबाव पड़ता है, क्योंकि वे बढ़ी हुई लागत को पूरी तरह ग्राहकों पर नहीं डाल पाते। इससे उनके लाभ पर असर पड़ सकता है और नए निवेश की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।
कृषि क्षेत्र के लिए आने वाले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि मानसून सामान्य रहता है और फसल अच्छी होती है तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन यदि बारिश कमजोर रही या प्राकृतिक आपदाएं बढ़ीं तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। इसलिए सरकार के लिए खाद्यान्न आपूर्ति, भंडारण और वितरण व्यवस्था को मजबूत रखना आवश्यक होगा।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर आम जनता को राहत देना और दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति बनाए रखना। यदि ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण, आवश्यक वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत रखने जैसे कदम प्रभावी ढंग से उठाए जाते हैं, तो महंगाई पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
महंगाई केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि हर परिवार के दैनिक जीवन से जुड़ा मुद्दा है। जब आवश्यक वस्तुएं महंगी होती हैं तो उसका असर सीधे रसोई, बच्चों की पढ़ाई, इलाज और भविष्य की बचत पर पड़ता है। आने वाले महीनों में सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और मौसम तीनों की भूमिका यह तय करेगी कि महंगाई पर लगाम लगती है या आम आदमी का बजट और अधिक दबाव में आता है।

डिजिटल इंडिया में साइबर ठगी का बढ़ता खतरा: कैसे बचें?

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रीना डी रेज

डिजिटल इंडिया अभियान ने देश को तेज़ी से ऑनलाइन सेवाओं से जोड़ा है। आज बैंकिंग, खरीदारी, नौकरी के आवेदन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी सेवाओं का बड़ा हिस्सा इंटरनेट के माध्यम से संचालित हो रहा है। लेकिन जितनी तेजी से डिजिटल सुविधाएं बढ़ी हैं, उतनी ही तेजी से साइबर अपराध भी बढ़े हैं। ऑनलाइन जॉब फ्रॉड, फर्जी निवेश योजनाएं, यूपीआई स्कैम, ओटीपी ठगी, डिजिटल अरेस्ट, फर्जी कस्टमर केयर और सोशल मीडिया हैकिंग जैसे अपराध आम लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। सबसे अधिक निशाने पर युवा, विद्यार्थी, नौकरी तलाशने वाले और वरिष्ठ नागरिक हैं।

राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के अनुसार, हर दिन हजारों लोग साइबर ठगी की शिकायत दर्ज करा रहे हैं। अपराधी अब केवल तकनीकी खामियों का फायदा नहीं उठाते, बल्कि लोगों की भावनाओं, लालच और डर का इस्तेमाल कर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं। कभी नौकरी दिलाने का झांसा दिया जाता है, तो कभी बैंक अधिकारी बनकर खाते की जानकारी मांगी जाती है। कई मामलों में पुलिस, सीबीआई या ईडी का अधिकारी बनकर वीडियो कॉल के जरिए लोगों को डराया जाता है और पैसे ट्रांसफर करा लिए जाते हैं।

आज सबसे तेजी से बढ़ रहे अपराधों में ऑनलाइन जॉब फ्रॉड शामिल है। बेरोजगार युवाओं को सोशल मीडिया, व्हाट्सएप, टेलीग्राम या ई-मेल के माध्यम से आकर्षक वेतन वाली नौकरियों का प्रस्ताव भेजा जाता है। इसके बाद रजिस्ट्रेशन फीस, सिक्योरिटी डिपॉजिट, मेडिकल टेस्ट या ट्रेनिंग शुल्क के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं। भुगतान करने के बाद न तो नौकरी मिलती है और न ही पैसा वापस आता है।

इसी तरह फर्जी निवेश योजनाएं भी लोगों को तेजी से अपना शिकार बना रही हैं। अपराधी शेयर बाजार, क्रिप्टोकरेंसी, गोल्ड बॉन्ड या म्यूचुअल फंड में कम समय में दोगुना-तीन गुना मुनाफा देने का दावा करते हैं। शुरुआत में छोटे लाभ दिखाकर भरोसा जीतते हैं और बाद में बड़ी रकम निवेश कराकर गायब हो जाते हैं।

यूपीआई भुगतान प्रणाली ने लेनदेन आसान बनाया है, लेकिन साइबर अपराधियों ने इसे भी निशाना बना लिया है। फर्जी क्यूआर कोड भेजना, स्क्रीन शेयरिंग ऐप डाउनलोड कराना, भुगतान प्राप्त करने के बहाने “पेमेंट रिक्वेस्ट” स्वीकार करवाना या बैंक अधिकारी बनकर ओटीपी और यूपीआई पिन पूछना आज आम ठगी के तरीके बन चुके हैं। याद रखें, पैसा प्राप्त करने के लिए कभी भी यूपीआई पिन दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होती।

ओटीपी ठगी अभी भी सबसे खतरनाक साइबर अपराधों में से एक है। बैंक, मोबाइल कंपनी या सरकारी संस्था के नाम पर फोन या संदेश भेजकर लोगों से ओटीपी, कार्ड नंबर, सीवीवी और इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी मांगी जाती है। एक बार यह जानकारी मिलते ही खाते से पूरी रकम कुछ ही मिनटों में निकाल ली जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराध से बचने के लिए कुछ सरल सावधानियां बेहद प्रभावी हैं। किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करें। ओटीपी, यूपीआई पिन, बैंक पासवर्ड या सीवीवी किसी के साथ साझा न करें। केवल आधिकारिक वेबसाइट या मोबाइल ऐप का ही उपयोग करें। मोबाइल और बैंकिंग ऐप को नियमित रूप से अपडेट रखें। सोशल मीडिया पर निजी जानकारी सीमित साझा करें और हर खाते के लिए मजबूत एवं अलग पासवर्ड रखें।

यदि कोई व्यक्ति साइबर ठगी का शिकार हो जाए तो सबसे पहले अपने बैंक को तुरंत सूचित करें, संबंधित कार्ड या यूपीआई सेवा को ब्लॉक कराएं और बिना देर किए राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं। साथ ही राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज की जा सकती है। समय पर शिकायत करने से कई मामलों में राशि को रोका या वापस दिलाने की संभावना बढ़ जाती है।

स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाना भी समय की आवश्यकता है। तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, अपराधी भी उतनी ही तेजी से नए तरीके खोज रहे हैं। इसलिए केवल कानून ही नहीं, बल्कि डिजिटल जागरूकता भी सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है।

डिजिटल इंडिया की सफलता तभी सार्थक होगी जब हर नागरिक डिजिटल रूप से सुरक्षित भी रहेगा। थोड़ी-सी सतर्कता, सही जानकारी और समय पर कार्रवाई लाखों रुपये की ठगी से बचा सकती है। आज के दौर में यह याद रखना जरूरी है कि ऑनलाइन दुनिया में सुविधा के साथ सावधानी भी उतनी ही आवश्यक है। साइबर सुरक्षा केवल सरकार या बैंकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर इंटरनेट उपयोगकर्ता का व्यक्तिगत दायित्व भी है।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील: समझौता क्यों अटका और देश को क्या होगा फायदा?

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राज
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद अभी तक अंतिम सहमति नहीं बन सकी है। हालांकि दोनों पक्ष बातचीत जारी रखने और एक संतुलित समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की बात कह रहे हैं, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद अब भी बरकरार हैं।

भारत और अमेरिका दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है और लक्ष्य आने वाले वर्षों में इसे कई गुना बढ़ाना है। ऐसे में यह व्यापार समझौता केवल दो देशों के आर्थिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यापार और निवेश के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

समझौता इसलिए अटका है क्योंकि भारत चाहता है कि भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर टैरिफ (आयात शुल्क) का लाभ मिले। साथ ही भारत यह भी चाहता है कि समझौते के बाद अमेरिका भविष्य में अचानक नए शुल्क न लगाए। दूसरी ओर अमेरिका अपने उत्पादों, विशेषकर कृषि, डेयरी और अन्य क्षेत्रों के लिए भारतीय बाजार में अधिक पहुंच चाहता है। इन मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अभी सहमति नहीं बन पाई है।

भारत का सबसे बड़ा आग्रह कृषि क्षेत्र को लेकर है। देश का मानना है कि यदि कृषि बाजार को बिना पर्याप्त सुरक्षा के पूरी तरह खोल दिया गया तो करोड़ों छोटे किसानों पर दबाव बढ़ सकता है। इसी कारण भारत इस क्षेत्र में जल्दबाजी में कोई समझौता नहीं करना चाहता। सरकार का प्रयास है कि किसानों के हितों से समझौता किए बिना व्यापारिक अवसरों का विस्तार किया जाए।
यदि यह समझौता सफल होता है तो भारतीय उद्योगों को बड़ा लाभ मिल सकता है। वस्त्र उद्योग, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, ऑटो पार्ट्स, आईटी सेवाएं, रत्न एवं आभूषण तथा कई अन्य निर्यात क्षेत्रों को अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी अवसर मिल सकते हैं। इससे निर्यात बढ़ेगा, विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि होगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
भारतीय स्टार्टअप और विनिर्माण क्षेत्र को भी इस समझौते से लाभ मिलने की उम्मीद है। यदि व्यापारिक बाधाएं कम होती हैं तो विदेशी निवेश बढ़ सकता है, नई तकनीक भारत आ सकती है और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई गति मिल सकती है। इससे वैश्विक कंपनियां भारत को उत्पादन केंद्र के रूप में और अधिक महत्व दे सकती हैं।
हालांकि समझौते का दूसरा पक्ष भी है। यदि अमेरिकी उत्पादों को भारतीय बाजार में अधिक छूट मिलती है तो कुछ घरेलू उद्योगों और छोटे कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए भारत ऐसा संतुलित समझौता चाहता है जिसमें उद्योग, किसान और उपभोक्ता तीनों के हित सुरक्षित रहें।
हाल के वर्षों में भारत ने ब्रिटेन सहित कई देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत किए हैं और अन्य साझेदारों के साथ भी समझौते आगे बढ़ाए हैं। इससे भारत की वैश्विक व्यापारिक स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है। यही कारण है कि भारत किसी भी समझौते को जल्दबाजी में अंतिम रूप देने के बजाय अपने दीर्घकालिक आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है।
व्यापार सचिव राजेश अग्रवाल ने हाल में कहा कि भारत और अमेरिका के बीच वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और समझौते के लिए एक रूपरेखा तैयार है। हालांकि अंतिम हस्ताक्षर उचित समय पर ही होंगे। वहीं केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने उन खबरों का खंडन किया है जिनमें कहा गया था कि भारत जानबूझकर समझौते में देरी कर रहा है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता केवल आयात-निर्यात का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक रणनीति, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और भविष्य की विकास यात्रा से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम है। यदि दोनों देश संतुलित और पारस्परिक हितों वाला समझौता करने में सफल होते हैं तो इसका लाभ उद्योग, व्यापार, निवेश, रोजगार और अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि विकास की इस दौड़ में किसानों, छोटे उद्योगों और घरेलू बाजार के हितों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहे।

मानसून की चाल और खेती की चिंता: किसान क्या करें?

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प्रभात रंजन
भारत की कृषि आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। ऐसे में जब बारिश का पैटर्न बदलने लगे, कहीं अत्यधिक वर्षा हो और कहीं लंबे समय तक सूखा बना रहे, तो सबसे अधिक चिंता किसानों की बढ़ जाती है। इस वर्ष भी मौसम विभाग ने जुलाई में देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश और मानसून के असमान वितरण की संभावना जताई है। साथ ही अल नीनो (El Niño) के प्रभाव की आशंका भी बनी हुई है, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून की शुरुआत कमजोर रहने और बीच-बीच में लंबे शुष्क दौर आने से धान, दालें, मक्का, सोयाबीन और सब्जियों जैसी खरीफ फसलों पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है। यदि समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो बुवाई में देरी होगी, बीज अंकुरित नहीं होंगे और उत्पादन घटने का खतरा बढ़ जाएगा।
देश के कई राज्यों में किसान पहले ही मानसून की अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। कहीं तेज बारिश खेतों में जलभराव पैदा कर रही है, तो कहीं बारिश न होने से मिट्टी में नमी की कमी बनी हुई है। यह स्थिति किसानों के लिए दोहरी चुनौती है, क्योंकि अधिक बारिश भी नुकसान पहुंचाती है और कम बारिश भी।
सबसे अधिक चिंता धान की खेती को लेकर है। धान की रोपाई समय पर पानी मिलने पर ही सफल होती है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो रोपाई में देरी होगी और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसी प्रकार अरहर, उड़द और मूंग जैसी दालों की फसल भी वर्षा पर निर्भर करती है। सब्जियों की खेती में भी पानी की कमी या अत्यधिक वर्षा दोनों ही नुकसान का कारण बनती हैं, जिसका असर बाद में बाजार में बढ़ती कीमतों के रूप में दिखाई देता है।
सरकार और कृषि वैज्ञानिक लगातार किसानों को मौसम आधारित खेती अपनाने की सलाह दे रहे हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग नियमित मौसम पूर्वानुमान जारी कर रहा है, ताकि किसान उसी के अनुसार बुवाई, सिंचाई और फसल प्रबंधन की योजना बना सकें। सरकार ने राज्यों को जल संरक्षण, सिंचाई व्यवस्था मजबूत करने और आवश्यक बीज उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए हैं।
ऐसे समय में किसानों के लिए कुछ सावधानियां बेहद महत्वपूर्ण हैं। जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां पानी का संतुलित उपयोग करें। खेतों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था बनाएं। मौसम के अनुसार कम अवधि में तैयार होने वाली फसल किस्मों का चयन करें। कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्रों की सलाह के अनुसार ही उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग करें। यदि किसी क्षेत्र में भारी बारिश की चेतावनी हो तो खेतों से पानी निकासी की व्यवस्था पहले से कर लें।
जलवायु परिवर्तन भी मानसून के बदलते स्वरूप का बड़ा कारण माना जा रहा है। पहले जहां बारिश पूरे मौसम में संतुलित होती थी, वहीं अब कुछ दिनों में अत्यधिक वर्षा और फिर लंबे समय तक सूखा देखने को मिल रहा है। इससे खेती की पारंपरिक पद्धतियों में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। भविष्य में आधुनिक सिंचाई तकनीक, ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली, जल संरक्षण और मौसम आधारित कृषि ही किसानों के लिए अधिक सुरक्षित विकल्प बन सकते हैं।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मौसम पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को फसल विविधीकरण पर भी ध्यान देना चाहिए। एक ही फसल पर निर्भरता जोखिम बढ़ाती है, जबकि अलग-अलग फसलों की खेती नुकसान की स्थिति में भी आय का सहारा बन सकती है। इसके साथ ही फसल बीमा योजना का लाभ लेना भी किसानों के लिए सुरक्षा कवच साबित हो सकता है।
मानसून की अनिश्चितता केवल किसानों की समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश की खाद्य सुरक्षा, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। यदि खरीफ फसल प्रभावित होती है तो खाद्यान्न उत्पादन घट सकता है, जिससे बाजार में कीमतें बढ़ेंगी और आम जनता की रसोई पर भी असर पड़ेगा। इसलिए समय की मांग है कि सरकार, वैज्ञानिक और किसान मिलकर मौसम की चुनौतियों का सामना करें और आधुनिक कृषि तकनीकों को तेजी से अपनाएं।