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Tuesday, June 30, 2026
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महिला और पुरुष चालकों का ड्राइविंग स्कोर लगभग एक समान रहा: ज़ूनो इंडिया रोड सेफ्टी रिपोर्ट 2026

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भारत में ड्राइविंग के लिए सबसे जोखिम भरा समय रात 9 से 10 बजे के बीच है

नई दिल्ली: नए ज़माने की डिजिटल बीमा कंपनी ज़ूनो जनरल इंश्योरेंस ने ‘इंडिया रोड सेफ्टी रिपोर्ट (आईआरएसआर) 2026’ जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, रात 9 बजे से 10 बजे के बीच का समय भारत में ड्राइविंग के लिए सबसे जोखिम भरा घंटा है। इस दौरान औसत ड्राइविंग स्कोर 86 दर्ज किया गया, जबकि दोपहर 1 बजे से 2 बजे के बीच का समय दिन का सबसे सुरक्षित घंटा रहा, जहां ड्राइविंग स्कोर 93 पाया गया।

यह रिपोर्ट ज़ूनो स्मार्टड्राइव ऐप का इस्तेमाल करने वाले 17 राज्यों के 27 हजार से अधिक सक्रिय यूज़र्स के डेटा पर आधारित है। इसके लिए 45 लाख से अधिक यात्राओं और 5.5 करोड़ किलोमीटर से ज़्यादा के ड्राइविंग व्यवहार का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि किसी व्यक्ति की जनसांख्यिकीय विशेषताओं (जैसे उम्र या जेंडर) की तुलना में उसके ड्राइविंग का पैटर्न सड़क के जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है। ये आंकड़े भारत भर में सड़क सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए लोगों की ड्राइविंग आदतों में बदलाव लाने वाले ठोस प्रयासों की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं।

इंडिया रोड सेफ्टी रिपोर्ट 2026 के मुख्य निष्कर्ष:

• महिला बनाम पुरुष ड्राइविंग: महिलाओं ने औसतन 92.86 का ड्राइविंग स्कोर दर्ज किया, जबकि पुरुषों का स्कोर 92.43 रहा। यह दर्शाता है कि दोनों के कुल ड्राइविंग व्यवहार में न के बराबर अंतर है।
• समय के अनुसार स्कोर: दिन के अधिकांश समय ड्राइविंग स्कोर स्थिर रहता है, लेकिन रात 8 बजे के बाद इसमें भारी गिरावट आती है।
• सबसे सुरक्षित और जोखिम भरा समय: रात 9 बजे से 10 बजे के बीच का समय सबसे जोखिम भरा (स्कोर: 86) है, जबकि दोपहर 1 बजे से 2 बजे का समय सबसे सुरक्षित (स्कोर: 93) है।
• कमज़ोर ड्राइविंग आदतें: भारतीय वाहन चालकों में अचानक ब्रेक लगाना (स्कोर: 87) और तेज़ी से एक्सीलेटर दबाना/रफ़्तार बढ़ाना (स्कोर: 91) सबसे कमज़ोर व्यावहारिक पैरामीटर के रूप में सामने आए हैं।
• मौसम का प्रभाव: ड्राइविंग व्यवहार पर मौसमी परिस्थितियों का बहुत सीमित प्रभाव देखा गया। गर्मी, बारिश और सर्दी के महीनों में औसत ड्राइविंग स्कोर काफी हद तक एक समान बना रहा।

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में 80% से अधिक मामलों के लिए व्यावहारिक कारक ज़िम्मेदार हैं। यह आंकड़ा जागरूकता, नियमों के सख्त पालन और तकनीक-आधारित उपायों के ज़रिए तेज़ रफ़्तार, ध्यान भटकने और असुरक्षित तरीके से वाहन मोड़ने या चलाने जैसी समस्याओं को ठीक करने के महत्व को रेखांकित करता है।

रिपोर्ट के बारे में, ज़ूनो जनरल इंश्योरेंस की एमडी और सीईओ, शनाई घोष ने कहा, “सड़क सुरक्षा भारत की सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक चुनौतियों में से एक बनी हुई है, जो जीवन, आजीविका और आर्थिक उत्पादकता को प्रभावित करती है। ‘ज़ूनो स्मार्टड्राइव’ के माध्यम से, हमें लाखों यात्राओं के दौरान ड्राइविंग व्यवहार को बेहद करीब से देखने का मौका मिला है, और एक बात साफ तौर पर सामने आती है: सड़क दुर्घटनाएं अक्सर ऐसे व्यावहारिक पैटर्न की वजह से होती हैं जिन्हें पहचाना और मापा जा सकता है।

‘इंडिया रोड सेफ्टी रिपोर्ट 2026’ यह दर्शाती है कि कैसे डेटा, ड्राइविंग पैटर्न और टेक्‍नोलॉजी, इंफ्रास्ट्रक्चर, कानून के पालन और वाहन सुरक्षा उपायों के साथ मिलकर सुरक्षित सड़कें बनाने में और ज़्यादा कारगर हो सकती है। जैसे-जैसे भारत अपने सड़क सुरक्षा लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है, ड्राइविंग व्यवहार के प्रति अधिक जागरूकता पैदा करना और सुरक्षित आदतों को बढ़ावा देना, मौतों को कम करने और बेहतर परिणाम हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।”

भारत में हर साल लगभग 1.73 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं, जो वैश्विक स्तर पर सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का लगभग 11% है। सड़क दुर्घटनाओं के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर जीडीपी के 3 से 5% के बराबर आर्थिक बोझ पड़ता है। दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों में से लगभग दो-तिहाई लोग 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के होते हैं।

कुल मौतों में 44% हिस्सेदारी दोपहिया वाहन चालकों की है, जबकि लगभग 19% मौतें पैदल चलने वालों की होती हैं, जो सड़क पर सबसे असुरक्षित लोगों पर पड़ने वाले अत्यधिक प्रभाव को दिखाता है।

अब जब भारत स्टॉकहोम घोषणापत्र के तहत 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को 50% तक कम करने की अपनी प्रतिबद्धता की दिशा में काम कर रहा है, यह रिपोर्ट बुनियादी ढांचे, प्रवर्तन और व्यवहार संबंधी हस्तक्षेपों में समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।

PoK में बगावत, सप्लाई बहाल करो, वरना पकड़ लेंगे दूसरा रास्ता, 38 सूत्रीय मांगें पूरी करने की चेतावनी दी

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इस्लामाबाद: पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में चल रहे सरकार विरोधी आंदोलन के बीच हालात दिन ब दिन बिगड़ते बिगड़ते बद्दतर होता जा रहा है। पाकिस्तान सरकार (Government of Pakistan) इतनी ओछी हरकत पर उतर आई है कि प्रदर्शन को दबाने की कोशिश में आंदोलन के बीच खाद्य सामग्री, ईंधन और दवाओं की सप्लाइ पर रोक लगा दी। बीते 9 जून से प्रदर्शन हो रहा है। PoK में भारी विरोध-प्रदर्शन और बगावत अपने चरम पर पहुंच गई है।

PoK में लोगों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। आंदोलन के दौरान एक लोकल लीडर ने चेतावनी दी है कि अगर इस्लामाबाद खाने की सप्लाई रोकता रहा, तो लोग दूसरी राह पकड़ सकते हैं। ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तानी सेना और शहबाज सरकार को अल्टीमेटम देते हुए अपनी 38 सूत्रीय मांगें पूरी करने की चेतावनी दी है।

पाकिस्तान की स्थिति लगातार खराब हो रही है, लोगों का गुस्सा मुख्य रूप से भारी मंहगाई, बेतहाशा बिजली बिल, और आटे की कीमतों को लेकर है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हिंसक कार्रवाई में दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और समर्थकों को हिरासत में लेकर गंभीर धाराओं में मामले दर्ज किए गए हैं।

प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तानी प्रशासन को कड़ा रुख अपनाते हुए अल्टीमेटम दिया था. मांगे पूरी न होने की स्थिति में रावलकोट से मुजफ्फराबाद तक एक लाख से अधिक लोगों के विशाल मार्च की चेतावनी दी गई है। प्रदर्शन के बढ़ते हुए दबाव की वजह से यहां पर सरकार ने खाने की सप्लाई को रोक दिया है। इस संघर्ष में अब महिलाओं और स्कूली बच्चों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया है।

प्रोटेस्ट कर रहे लोगों ने ये भी ऐलान किया कि PoJK पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। PoK के लोग कह रहे है कि शायद पाकिस्तान भूल गया है कि हमें इनकी जरूरत नहीं है बल्कि हमारी जरूरत उन्हें है। आपको बताते चले कि 5 जून से इंटरनेट सर्विस बंद हैं। इस कदम से उन लोगों का गुस्सा और बढ़ गया है। कई हफ्तों से अशांति बढ़ती जा रही है।

पाकिस्तान की सीनेट में अपोजिशन लीडर महमूद अचकजई और पूर्व प्राइम मिनिस्टर शाहिद खाकन अब्बासी को PoK में प्रोटेस्टर्स से मिलने की इजाजत नहीं मिली। सेना और रेंजर्स की कार्रवाई में कई कार्यकर्ताओं की मौत और सैकड़ों लोगों के घायल होने की खबरें हैं। पिछले कुछ हफ्तों में, प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों के दौरान हिंसक घटनाओं की भी खबरें आई हैं।

मुंबई में दर्दनाक हादसा, स्कूल बस पर पेड़ गिरने से 11 वर्षीय छात्र की मौत, 11 बच्चे घायल

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मुंबई: मुंबई (Mumbai) के चेंबूर इलाके में मंगलवार दोपहर एक दर्दनाक हादसा (Tragic accident) हो गया, जब एक प्राइवेट स्कूल बस पर अचानक सड़क किनारे खड़े पेड़ की भारी शाखाएं गिर गईं। इस हादसे में बस में सवार 11 वर्षीय छात्र विहान श्रीवास्तव की इलाज के दौरान मौत हो गई, जबकि अन्य 11 बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालकर अस्पताल में भर्ती कराया गया।

जानकारी के अनुसार, स्कूल की छुट्टी के बाद निजी बस रोज की तरह बच्चों को उनके घर छोड़ने जा रही थी। इसी दौरान रोड नंबर 11, चेंबूर में सड़क किनारे मौजूद एक बड़ा पेड़ अचानक बस पर गिर पड़ा। पेड़ की भारी डालियां बस की छत पर आ गिरीं, जिससे बस का अगला और बीच का हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।

हादसे के तुरंत बाद बस के अंदर से बच्चों की चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग मौके पर पहुंचे। स्थानीय नागरिकों, पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम ने संयुक्त रूप से राहत अभियान चलाया। मशीनों और कटर की मदद से पेड़ को हटाकर बच्चों को बाहर निकाला गया गंभीर रूप से घायल विहान श्रीवास्तव को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उपचार के दौरान डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

हादसे की सूचना मिलते ही बच्चों के परिजन घटनास्थल पर पहुंच गए। अपने बच्चों की सलामती की चिंता में कई परिजन भावुक नजर आए। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था संभालते हुए इलाके की घेराबंदी की और ट्रैफिक को नियंत्रित किया, ताकि राहत कार्य में कोई बाधा न आए। मुंबई में 23 जून को मानसून की दस्तक के बाद लगातार बारिश और तेज हवाओं का दौर जारी है।

24 जून को भारी बारिश के चलते अंधेरी सब-वे में जलभराव हो गया था, जबकि विक्रोली वेस्ट में एक रिटेनिंग वॉल गिरने और कई इलाकों में पेड़ उखड़ने की घटनाएं भी सामने आई थीं। मौसम की खराब स्थिति के कारण शहर में लगातार दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता जा रहा है। इस हादसे के बाद सड़क किनारे जर्जर और कमजोर पेड़ों की समय पर छंटाई एवं रखरखाव को लेकर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों ने मांग की है कि भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए जोखिम वाले पेड़ों की पहचान कर समय रहते आवश्यक कार्रवाई की जाए।

 

शादी घर में मचा हड़कंप, AC के आउटडोर में ब्लास्ट से लगी आग, दमकल विभाग ने पाया काबू

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डीडीयू नगर (मुगलसराय): नगर के कैलाशपुरी मोहल्ले (Kailashpuri neighborhood) में मंगलवार की शाम एक मकान में लगे एयर कंडीशनर (AC) के आउटडोर यूनिट में अचानक हुए ब्लास्ट से आग लग गई। ब्लास्ट के बाद निकली चिंगारियों से घर में रखे कंबल, कपड़े और अन्य सामान ने आग पकड़ ली, जिससे कुछ देर के लिए इलाके में अफरा-तफरी मच गई। सूचना मिलते ही मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड की टीम ने करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद आग पर पूरी तरह काबू पा लिया। राहत की बात यह रही कि घटना में कोई जनहानि या घायल होने की सूचना नहीं है।

जानकारी के अनुसार कैलाशपुरी निवासी राजकुमार सरैया के पुत्र यथार्थ का विवाह दो दिन पूर्व ही संपन्न हुआ था। शादी के चलते पूरा घर झालरों और अन्य सजावटी सामग्री से सजा हुआ था। मंगलवार की शाम परिवार के सदस्य विवाह समारोह से लौटे ही थे कि करीब साढ़े पांच बजे घर के गलियारे में लगे एसी के आउटडोर यूनिट में अचानक तेज धमाके के साथ ब्लास्ट हो गया। ब्लास्ट से निकली चिंगारियां पास में रखे कपड़ों, कंबलों और अन्य सामान पर गिर गईं, जिससे आग फैल गई।

घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय लोगों ने तत्काल दमकल विभाग को जानकारी दी। मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड की टीम ने तेजी से राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया और कुछ ही देर में आग पर पूरी तरह नियंत्रण पा लिया। आग लगने की सूचना पर आसपास के लोगों की भीड़ भी मौके पर जुट गई। घटना के संबंध में सभासद प्रतिनिधि चंद्रकांत तिवारी ने बताया कि एसी के आउटडोर यूनिट में ब्लास्ट होने से आग लगी थी। उन्होंने बताया कि किसी प्रकार की कोई जनहानि नहीं हुई है।

दमकल विभाग की टीम समय पर पहुंच गई थी और आग पर सफलतापूर्वक काबू पा लिया गया। उन्होंने यह भी बताया कि मकान में दो दिन पहले ही शादी हुई थी, इसलिए घर पूरी तरह सजाया गया था। फिलहाल आग लगने के कारणों की जांच की जा रही है। प्रारंभिक तौर पर एसी के आउटडोर यूनिट में तकनीकी खराबी या शॉर्ट सर्किट की आशंका जताई जा रही है।

 

फ़ोटोग्राफी में बाज़ जैसी दृष्टि विकसित करें — डॉ. भूपेश चंद्र लिटिल

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लखनऊ। परख अकादमी ऑफ फ़ोटोग्राफी द्वारा आयोजित विशेष फोटोग्राफी सेमिनार में देश के प्रख्यात फोटोग्राफर एवं शिक्षाविद् डॉ. भूपेश चंद्र लिटिल ने विद्यार्थियों एवं फोटोग्राफी प्रेमियों को संबोधित करते हुए कहा कि “एक फोटोग्राफर की दृष्टि बाज़ की तरह पैनी, सजग और दूरदर्शी होनी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट फोटोग्राफी केवल एक अच्छे कैमरे पर निर्भर नहीं करती, बल्कि फोटोग्राफर की सोच, अवलोकन क्षमता और सही क्षण को पहचानने की कला ही उसे विशिष्ट बनाती है। एक सफल फोटोग्राफर वही है, जो साधारण दृश्यों में भी असाधारण कहानी खोजने की क्षमता रखता हो।

सेमिनार के दौरान प्रतिभागियों को चित्र संरचना (कम्पोज़िशन), प्रकाश व्यवस्था (लाइटिंग), दृश्य कथन (विज़ुअल स्टोरीटेलिंग) तथा व्यावसायिक फोटोग्राफी के विभिन्न पहलुओं की विस्तृत जानकारी दी गई। कार्यक्रम में लगभग 35 प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
इस अवसर पर राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट) की प्रोफेसर तुलिका साहू, सुदन चंदोला, अविनाश चंद्र लिटिल, योगेश आदित्य सहित अनेक गणमान्य अतिथि एवं परख अकादमी ऑफ फ़ोटोग्राफी के विद्यार्थी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने डॉ. भूपेश चंद्र लिटिल के साथ समूह छायाचित्र खिंचवाया तथा उनके प्रेरणादायी एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान के लिए हार्दिक आभार व्यक्त किया।
रीइग्नाइट क्लब (लखनऊ कॉलेज ऑफ आर्ट्स के पूर्व छात्र-छात्राओं का समूह का कार्यक्रम मे सहयोग रहा।

क्या लखनऊ अब भी मुस्कुराता है? एक शहर, जो आज भी अपने लोगों से पहचाना जाता है

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– मोहित धवन

रविवार की शाम को लखनऊ में आयोजित इस कार्यक्रम में सभागार में हल्की-सी हँसी गूँजती है। मंच पर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री डॉ. ब्रजेश पाठक बोल रहे हैं। वे नवाबों के दौर का एक पुराना किस्सा सुनाते हैं—एक बार नवाब साहब की ट्रेन इसलिए छूट गई क्योंकि जूते पहनाने वाला समय पर नहीं पहुँचा। श्रोता मुस्कुरा देते हैं। लेकिन वह केवल एक हास्य प्रसंग नहीं था। उस छोटे-से किस्से में पुराने लखनऊ की पूरी जीवन-दृष्टि समाई हुई थी—एक ऐसा शहर जहाँ जल्दबाज़ी से अधिक महत्व सलीके, रिश्तों और ठहराव को दिया जाता था।
यहीं से शुरू होता है “भारत Talks – Lucknow 2026 : शहर, लोग और कहानियाँ” का सफर। भारत डायलॉग्स के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम में शहर को इतिहास, साहित्य, पत्रकारिता, समाज और संस्कृति की अनेक दृष्टियों से समझने का प्रयास किया गया। यह केवल भाषणों का मंच नहीं था, बल्कि लखनऊ की आत्मा को टटोलने की एक सामूहिक कोशिश थी।
डॉ. ब्रजेश पाठक ने अपने संबोधन में एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने याद दिलाया कि कभी लगभग 25 लाख की आबादी वाला लखनऊ आज 65 लाख से अधिक लोगों का शहर बन चुका है। शहर का आकार बदला है, रफ्तार बदली है, लेकिन इसके बावजूद उसकी तहज़ीब और सांस्कृतिक पहचान आज भी जीवित है। शायद यही लखनऊ की सबसे बड़ी ताकत है कि बदलावों के बीच भी उसने अपनी मूल आत्मा को पूरी तरह खोने नहीं दिया।
कार्यक्रम के संस्थापक विवेक सत्य मित्रम् मंच पर आए और केवल एक वाक्य कहा—“क्या आप लखनऊ में हैं? तो मुस्कुराइए।” यह कोई नारा नहीं था, बल्कि उस पूरे आयोजन का सार था। लगा मानो लखनऊ की सबसे छोटी और सबसे सुंदर परिभाषा यही है कि यहाँ मुस्कुराना अभी भी संस्कृति का हिस्सा है।
इसके बाद वक्ता बदलते रहे, लेकिन चर्चा बार-बार उसी शहर पर लौट आती रही, जो नक्शे पर जितना बड़ा है, यादों में उससे कहीं अधिक विशाल है।
इतिहासकार रवि भट्ट ने कहा कि लखनऊ ने दुनिया को गंगा-जमुनी तहज़ीब और धर्मनिरपेक्ष सांस्कृतिक दृष्टि की विरासत दी है। उन्होंने याद दिलाया कि किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों या स्मारकों से नहीं बनती। शहर को उसकी आत्मा साहित्यकार देते हैं, संगीतकार देते हैं, कलाकार देते हैं और वे सामान्य लोग देते हैं जो रोज़मर्रा की जिंदगी में संस्कृति को जीते हैं।
जब यूनिवर्सल बुक डिपो के संचालक चंद्र प्रकाश अपने पिता लाला गोविंद राम का उल्लेख कर रहे थे, तब वह केवल एक किताबों की दुकान की कहानी नहीं थी। वह उस समय का स्मरण था जब पुस्तकें बेचना भी समाज को शिक्षित करने का माध्यम माना जाता था। उन्होंने बताया कि वर्ष 1930 में उनके पिता लखनऊ आए और पुस्तकों तथा पत्रिकाओं के माध्यम से कई पीढ़ियों को पढ़ने की संस्कृति से जोड़ा। यह प्रसंग बताता है कि किसी शहर की बौद्धिक विरासत केवल विश्वविद्यालयों में नहीं, बल्कि उन छोटी-छोटी दुकानों में भी बसती है जहाँ पीढ़ियाँ किताबों से दोस्ती करना सीखती हैं।
नवभारत टाइम्स के रेजिडेंट एडिटर सुधीर मिश्रा ने एक ऐसा वाक्य कहा, जो देर तक मन में गूंजता रहा—“लखनऊ आपको आपके अतीत से नहीं, बल्कि आपके वर्तमान से पहचानता है।” शायद यही कारण है कि यह शहर बाहर से आने वाले लोगों को भी अपनेपन का एहसास करा देता है।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी ने लखनऊ को एक उत्सव बताया। उन्होंने आग्रह किया कि “पुराना लखनऊ” कहना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि शहर की असली आत्मा आज भी उन्हीं गलियों में साँस लेती है जिन्हें हम अक्सर पुराने शहर के नाम से पुकारते हैं।
साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के पौत्र प्रो. चंद्रशेखर वर्मा ने लखनऊ की पहचान उसकी सहज मुस्कान में खोजी। उन्होंने कहा कि कई शहरों में लोग बिना किसी कारण गंभीर दिखाई देते हैं, लेकिन लखनऊ आज भी मुस्कुराकर संवाद शुरू करना जानता है। शायद यही मुस्कान इस शहर की सबसे बड़ी सांस्कृतिक धरोहर है।
सामाजिक कार्यकर्ता माधवी कुकरेजा ने लखनऊ को किसी इतिहास की पुस्तक से नहीं, बल्कि उसकी गलियों, प्रसिद्ध बाजपेयी पूड़ी, मोहर्रम के ताज़ियों और रोजमर्रा के जीवन के माध्यम से याद किया। उनके शब्दों में लखनऊ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि जीने का एक अंदाज़ बनकर सामने आया।
कार्यक्रम के अंतिम वक्ताओं में शामिल प्रसिद्ध लेखक डॉ. हिमांशु बाजपेयी ने जैसे पूरे संवाद को एक वाक्य में समेट दिया। उन्होंने कहा, “लखनऊ मेरे लिए केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक ख़्वाब और एक विचार है।” लेकिन उसी के साथ उन्होंने एक चिंता भी व्यक्त की। उनका कहना था कि आधुनिक जीवनशैली के बीच मोहल्लों का अपनापन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसके लोगों के बीच बने रिश्तों से होती है। यदि वे रिश्ते कमजोर पड़ते हैं, तो शहर केवल भूगोल बनकर रह जाते हैं।
करीब तीन घंटे तक चले इस संवाद में अनेक विचार सामने आए, लेकिन सभी का निष्कर्ष एक ही था—लखनऊ को समझना हो तो उसके स्मारकों से पहले उसके लोगों को समझना होगा।
कार्यक्रम समाप्त हुआ। लोग सभागार से बाहर निकलने लगे। बाहर वही भागता-दौड़ता महानगर था—तेज़ ट्रैफिक, हॉर्न और व्यस्त ज़िंदगी। लेकिन भीतर एक सवाल अब भी ठहरा हुआ था—
क्या लखनऊ आज भी हमारे भीतर बसता है, या वह केवल किस्सों और यादों में सिमटता जा रहा है?
शायद इसका उत्तर किसी इतिहास की किताब में नहीं मिलेगा। उसे खोजने के लिए चौक की गलियों में टहलना होगा, किसी पुराने किताबघर में बैठना होगा, किसी चाय की दुकान पर अनजान लोगों से बात करनी होगी और किसी मुस्कुराते चेहरे से मिलना होगा।
क्योंकि शहर इमारतों से नहीं बनते।
शहर अपने लोगों से बनते हैं।
और शायद इसी कारण, लखनऊ आज भी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति, एक एहसास और एक ख़ूबसूरत विचार बना हुआ है।