शरद कटियार
उत्तर प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र में पारित निंदा प्रस्ताव केवल एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि मौजूदा राजनीति की दिशा और सोच का आईना बनकर सामने आया है। महिला सशक्तीकरण जैसे संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर जहां एक ओर सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता दिखाई, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और सत्ता के बीच तीखी वैचारिक खाई भी खुलकर सामने आई।
सवाल यह है कि क्या यह पूरा घटनाक्रम वास्तव में महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम है, या फिर यह भी राजनीति के उसी पुराने खेल का हिस्सा है जहां असली मुद्दे बहस में दब जाते हैं और आरोप-प्रत्यारोप सुर्खियां बन जाते हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह मजहबी आधार पर आरक्षण का विरोध करते हुए विपक्ष पर हमला बोला, वह भाजपा की वैचारिक लाइन के अनुरूप जरूर है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस बहस ने मूल मुद्दे—महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी—को कहीं न कहीं पीछे धकेल दिया। नारी शक्ति वंदन अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में मजबूत भागीदारी देना है, लेकिन इसके क्रियान्वयन की गति और वास्तविक प्रभाव पर अब भी कई सवाल खड़े हैं।
अगर आंकड़ों की बात करें तो देश और प्रदेश की विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी अभी भी 10-15 प्रतिशत के आसपास ही सिमटी हुई है। उत्तर प्रदेश जैसी विशाल आबादी वाले राज्य में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि केवल विधेयक पास कर देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की ठोस रणनीति बनाना भी उतना ही जरूरी है।
विपक्ष पर लगाए गए आरोप—कि उन्होंने मजहबी आरक्षण के नाम पर महिलाओं के अधिकारों को बाधित किया राजनीतिक रूप से तीखे जरूर हैं, लेकिन इस पर भी गंभीर विश्लेषण की जरूरत है। क्या वास्तव में यह विरोध महिलाओं के हितों के खिलाफ था, या फिर यह सामाजिक प्रतिनिधित्व के व्यापक सवाल से जुड़ा हुआ मुद्दा था?
यहीं पर राजनीति और नीति के बीच का फर्क सामने आता है। सत्ता पक्ष इसे “राष्ट्रीय कर्तव्य” और “द्रोह” जैसे शब्दों में पेश कर रहा है, जबकि विपक्ष इसे सामाजिक न्याय के नजरिए से देखता है। लेकिन इस टकराव में सबसे बड़ा नुकसान उस महिला वर्ग का होता है, जिसके नाम पर यह पूरी बहस खड़ी की जाती है।
1947 के विभाजन का संदर्भ देकर मुख्यमंत्री ने जिस तरह भावनात्मक और वैचारिक आधार तैयार किया, वह राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जरूर है, लेकिन वर्तमान समय की चुनौतियां अलग हैं। आज की महिला शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे ठोस मुद्दों से जूझ रही है। इन समस्याओं का समाधान केवल वैचारिक बहसों से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और जमीनी क्रियान्वयन से ही संभव है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यह है कि महिला सशक्तीकरण का मुद्दा फिर एक बार राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार होता दिख रहा है। सत्ता और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि महिलाओं का अधिकार कोई चुनावी हथियार नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का आधार है।
यूथ इंडिया के नजरिए से सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह सत्र महिलाओं को वास्तविक शक्ति देगा, या फिर यह भी एक राजनीतिक संदेश बनकर रह जाएगा?
जब तक महिलाओं की भागीदारी पंचायत से लेकर संसद तक वास्तविक रूप से नहीं बढ़ेगी, तब तक ऐसे प्रस्ताव और बहसें केवल कागजी उपलब्धियां ही मानी जाएंगी। महिला सशक्तीकरण का असली अर्थ तभी पूरा होगा, जब राजनीति से ऊपर उठकर नीति बनाई जाएगी और उसे जमीन पर उतारा जाएगा।