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Sunday, May 31, 2026
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कोलाघाट पुल पर बाइक सवार दम्पत्ति को पिकअप ने मारी टक्कर,पति की मृत्यु व पत्नी-पुत्र घायल

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मिर्ज़ापुर (शाहजहांपुर) शनिवार अपराह्न करीब चार बजे कोलाघाट पुल पर बाइक सवार 40 वर्षीय सुरजीत और उसकी पत्नी मीना व पुत्र सात वर्षीय लब्बू को लोडर वाहन पिकअप ने टक्कर मार दी। जिससे बाइक चालक सुरजीत की मौके पर ही मृत्यु होगी। जबकि उसकी पत्नी मीना और पुत्र लब्बू घायल हो गए।
मृतक की पत्नी मीना देवी ने रोते बिलखते हुए बताया कि वह अपने पति और पुत्र के साथ ननद के घर नगर पंचायत कटरा से बाइक पर अपने घर ग्राम पृथ्वीपुर लौट रहे थे। जब वह कोलाघाट पुल पर आए तभी सामने से आए लोडर वाहन पिकअप ने उसकी बाइक को टक्कर मार दी। जिससे पति,पत्नी और पुत्र तीनों घायल होकर रोड पर गिर गए।
प्रत्यक्षदर्शियों ने दुर्घटना की सूचना मिर्ज़ापुर पुलिस को दी। थाना मिर्ज़ापुर पुलिस के पहुंचने तक बाइक चालक सुरजीत पुत्र रामगोपाल ने दम तोड़ दिया। मृतक चार भाइयों में तीसरे नंबर का था। मृतक अपने पीछे दुर्घटना में घायल पत्नी मीना देवी,तीन पुत्र अरुण,रोहित,घायल मासूम लब्बू व दो बेटियों दुर्गा और वैष्णवी को रोते बिलखते छोड़ गया।

हजरत बेरी वाले बाबा का दो दिवसीय उर्स कल से

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-देश के नामी कव्वाल उर्स में करेंगे शिरकत, बिखेरेंगे फन का जादू

उरई : जनपद जालौन ही नहीं पूरे बुन्देलखण्ड में हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक माने जाने वाले सूफी परम्परा के अजीम बुजुर्ग
हजरत बेरी वाले बाबा के सालाना उर्स की तैयारियां जोरो पर चल रही है। आगामी एक जून से चादरपोशी की रस्म के साथ दो दिवसीय उर्स की बज़्म महफ़िले समां से शुरू होगी। इसके बाद बाबा के शागिर्दों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की कड़ी में तीन तारीख को इसका समापन होगा। दो दिन तक चलने वाले इस उर्स की तैयारियों में पूरे जिले का हुजूम इकट्ठा है। पहले दिन महफ़िले समां की शुरुआत हाफिज इमरान फैजी कुरआन की तिलावत से करेंगे। उर्स कमेटी के प्रभारी अध्यक्ष कोस्तुब चतुर्वेदी ने बताया कि उर्स की रात की बज्मों में पहले व दूसरे दिन मशहूर कव्वालो में अजीम नाजा पुना महाराष्ट्र, फैजान रजा अजमेरी, चांद कादरी व अनीस नवाब मुंबई कव्वाली पेश करेंगे। चीफ कंट्रोलर हाफिज अब्दुल जब्बार ने बताया कि हजरत बेरी वाले बाबा के उर्स मुबारक पर बाबा की मजार को अदब और एहतराम के साथ सजाया जा रहा है। हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक माने जाने वाले इस कार्यक्रम की व्यवस्था में रिजवान खान कोषाध्यक्ष, नजम हाशमी, फिरोज खान, पप्पू पठान, जुबेर खान, टिंकू शताब्दी, लियाकत चिश्ती, रईस खान (कल्लू), अकील अहमद, आरिफ खान, हाफिज अकबर अली, सद्दाम नगर पालिका, फ़जील अहमद, सलामत चिश्ती, हाफिज फिरोज मिर्जा, चंदू मालबल सहयोग कर रहे है।
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गृह मंत्रालय के नोटिस के बाद एक्शन में अलीगढ़ प्रशासन, पाक नागरिक की करोड़ों की भूमि पर चस्पा हुआ नोटिस

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पाकिस्तान जाकर बसे मोहम्मद नासिर की अतरौली स्थित जमीन शत्रु संपत्ति घोषित

मोहम्मद आकिब खांन

यूथ इंडिया न्यूज़, अलीगढ़: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में शत्रु संपत्तियों को लेकर प्रशासनिक गलियारों में एक बार फिर बड़ी हलचल शुरू हो गई है। देश के विभाजन के समय पाकिस्तान जाकर बसे एक परिवार की करोड़ों रुपये मूल्य की अतरौली तहसील स्थित करीब डेढ़ हेक्टेयर जमीन को सरकारी नियंत्रण में लेने यानी ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित करने की विधिक प्रक्रिया तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत शत्रु संपत्ति अभिरक्षक कार्यालय द्वारा इस संबंध में औपचारिक नोटिस जारी किए जाने के बाद स्थानीय जिला और तहसील प्रशासन पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय के शत्रु-संपत्ति अभिरक्षक कार्यालय द्वारा पाक नागरिक मोहम्मद नासिर के नाम दर्ज अतरौली तहसील के ग्राम औरेनी दलपतपुर की गाटा संख्या 152 (0.17 हे.) और 180 (1.142 हे.) भूमि को शत्रु संपत्ति के रूप में दर्ज करने का नोटिस जारी किया गया है, जिसे स्थानीय अतरौली तहसील प्रशासन ने संबंधित संपत्ति पर चस्पा कर आगे की विधिक कार्रवाई तेज कर दी है।
गौरतलब है कि अलीगढ़ जनपद में वर्तमान में कुल 48 शत्रु संपत्तियां हैं, जिनमें से सर्वाधिक संपत्तियां कोल, शहर और अतरौली विधानसभा क्षेत्रों में स्थित हैं, और इस नई जमीन के आधिकारिक रूप से शत्रु संपत्ति अभिरक्षक में निहित होने के बाद जिले में इसकी कुल संख्या और बढ़ जाएगी।

जब भीड़ का अंग बनोगे तो हिन्दू मानेंगे

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जवाहर सिंह गंगवार

भारत की सभ्यता की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता, विचारशीलता और प्रश्न पूछने की परंपरा रही है। यह वह भूमि है जहां ऋषियों ने देवताओं तक से प्रश्न किए, शिष्यों ने गुरुओं से तर्क किया और ज्ञान को अंधस्वीकार नहीं, बल्कि विमर्श के माध्यम से आगे बढ़ाया। लेकिन आधुनिक समय में एक चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है—विचार की जगह भीड़ और तर्क की जगह शोर को महत्व मिलने लगा है।
आज समाज के अनेक हिस्सों में यह धारणा बनती जा रही है कि यदि आप भीड़ के साथ खड़े हैं, नारे लगा रहे हैं, बिना प्रश्न किए हर बात स्वीकार कर रहे हैं, तब आपकी पहचान सुरक्षित है। लेकिन जैसे ही आप किसी मुद्दे पर सवाल उठाते हैं, किसी निर्णय की आलोचना करते हैं या किसी सामाजिक बुराई की ओर ध्यान दिलाते हैं, आपकी नीयत, निष्ठा और पहचान पर प्रश्नचिह्न लगाने की कोशिश शुरू हो जाती है।
विडंबना यह है कि हिन्दू धर्म की मूल आत्मा ही प्रश्न और चिंतन पर आधारित रही है। उपनिषदों से लेकर गीता तक, हर जगह संवाद और जिज्ञासा दिखाई देती है। यहां ज्ञान को अंतिम सत्य नहीं माना गया, बल्कि सत्य की खोज को महत्व दिया गया। फिर ऐसा कैसे हो गया कि प्रश्न पूछने वालों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा?
असल समस्या धर्म में नहीं, बल्कि भीड़ मानसिकता में है। भीड़ को विचारशील व्यक्ति पसंद नहीं होता। भीड़ को अनुयायी चाहिए, जिज्ञासु नहीं। भीड़ को समर्थन चाहिए, सत्य नहीं। इसलिए जब कोई व्यक्ति समाज, राजनीति, धर्म या व्यवस्था के भीतर मौजूद कमियों पर बात करता है, तो उसका उत्तर तर्क से कम और भावनाओं से अधिक दिया जाता है।
आज सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। किसी विषय पर गहराई से चर्चा करने के बजाय लोगों को दो खेमों में बांट दिया जाता है। यदि आप किसी गलती की ओर इशारा करें तो आपको विरोधी खेमे का बताया जाता है। यदि आप किसी सुधार की बात करें तो आपको परंपरा विरोधी कह दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और पहचान की राजनीति आगे आ जाती है।
एक स्वस्थ समाज की पहचान यह नहीं है कि वहां सब एक जैसी बात करें। स्वस्थ समाज वह है जहां अलग-अलग विचारों को सुनने का धैर्य हो। जहां आलोचना को दुश्मनी नहीं, सुधार का अवसर माना जाए। जहां प्रश्न पूछने वाले को देशद्रोही, धर्मद्रोही या समाज विरोधी बताने के बजाय उसकी बात पर विचार किया जाए।
हिन्दू धर्म की महानता भी इसी में रही है कि उसने विचारों को स्थान दिया। यहां चार्वाक जैसे नास्तिक दर्शन भी विकसित हुए और वेदांत जैसे आध्यात्मिक दर्शन भी। यहां शंकराचार्य के शास्त्रार्थ भी हुए और बुद्ध का चिंतन भी स्वीकार किया गया। यदि हमारी परंपरा इतनी व्यापक रही है, तो फिर आज असहमति से डर क्यों?
समाज को यह समझना होगा कि किसी भी विचार, संस्था या नेतृत्व से प्रश्न पूछना उसका विरोध नहीं होता। कई बार प्रश्न ही सुधार की पहली सीढ़ी बनते हैं। जो समाज प्रश्न पूछना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे जड़ता का शिकार हो जाता है।
इसलिए आवश्यकता भीड़ का हिस्सा बनने की नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक बनने की है। धर्म का अर्थ आंख बंद करके चलना नहीं, बल्कि विवेक के साथ चलना है। आस्था का अर्थ तर्क का अंत नहीं, बल्कि तर्क और विश्वास के बीच संतुलन स्थापित करना है।
यदि किसी समाज में पहचान का आधार केवल भीड़ के साथ खड़ा होना रह जाए और विचार व्यक्त करना अपराध बन जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी समाज का होता है। क्योंकि भीड़ क्षणिक होती है, लेकिन विचार स्थायी होते हैं।
हिन्दू होने का अर्थ केवल किसी समूह का हिस्सा होना नहीं है। हिन्दू होने का अर्थ उस परंपरा का उत्तराधिकारी होना है जिसने ज्ञान, प्रश्न, सहिष्णुता और आत्ममंथन को जीवन का आधार बनाया।
और शायद यही वह बात है जिसे आज फिर से याद करने की आवश्यकता है।

रोज पेपर लीक होना कहीं प्रतिभाओं की हत्या या भ्रष्टाचारियों की फसल उगाने की सुनियोजित खेती तो नहीं?

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शरद कटियार

देश में आजकल दो चीजें सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं एक युवाओं का भविष्य और दूसरा भर्ती परीक्षाओं का प्रश्नपत्र। फर्क सिर्फ इतना है कि प्रश्नपत्र लीक होने की खबर अखबारों में छप जाती है, लेकिन लाखों युवाओं के टूटे सपनों की चीख किसी सरकारी फाइल में दर्ज नहीं होती।
हर बार वही कहानी, वही बयान और वही घिसे-पिटे तर्क। पेपर लीक हो गया, जांच बैठा दी गई, कुछ गिरफ्तारियां हो गईं, कुछ अधिकारियों का तबादला हो गया, कुछ नेताओं ने कड़ी कार्रवाई की बात कह दी और फिर अगले पेपर लीक की तैयारी शुरू हो गई। ऐसा लगता है जैसे देश में भर्ती परीक्षाएं नहीं, बल्कि पेपर लीक का वार्षिक महोत्सव आयोजित किया जा रहा हो।
सवाल यह है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है?
क्या वास्तव में व्यवस्था इतनी कमजोर है कि हर कुछ महीनों में कोई न कोई प्रश्नपत्र बाहर आ जाता है? या फिर व्यवस्था कमजोर नहीं, बल्कि कुछ लोगों के लिए जानबूझकर कमजोर रखी गई है?
जब कोई बैंक लाखों करोड़ रुपये सुरक्षित रख सकता है, जब मिसाइलों के गुप्त कोड सुरक्षित रखे जा सकते हैं, जब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रह सकते हैं, तब कुछ पन्नों के प्रश्नपत्र बार-बार बाहर कैसे आ जाते हैं?
यदि दस साल पहले किसी ने कहा होता कि भर्ती परीक्षाओं से पहले प्रश्नपत्र बिकेंगे, अभ्यर्थियों के लिए दरें तय होंगी, गिरोह बनेंगे और करोड़ों का कारोबार होगा, तो शायद लोग विश्वास नहीं करते। लेकिन आज यह एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है।
देश में पेपर लीक अब अपराध कम और उद्योग अधिक दिखाई देता है।
एक ऐसा उद्योग जिसमें कुछ लोग युवाओं की मेहनत खरीदते हैं, कुछ लोग व्यवस्था बेचते हैं और कुछ लोग आंखें बंद करके सब कुछ देखते रहते हैं।
सबसे दुखद बात यह है कि हर पेपर लीक के बाद सबसे ज्यादा सजा उसी को मिलती है जो सबसे कम दोषी होता है,अभ्यर्थी।
जिस छात्र ने दो साल तैयारी की, जिसने परिवार की आर्थिक परेशानियों के बीच किताबें खरीदीं, जिसने मोबाइल छोड़कर लाइब्रेरी में दिन-रात बिताए, जिसने दोस्तों की शादियां छोड़ीं, त्योहार छोड़े, नींद छोड़ी,सजा उसे मिलती है।
पेपर लीक होता है।परीक्षा रद्द होती है।भर्ती टलती है।उम्र सीमा आगे बढ़ती है।अवसाद बढ़ता है।
और फिर सरकारें युवाओं से धैर्य रखने की अपील करती हैं।
अजीब विडंबना है। चोरी कोई और करे, सजा कोई और भुगते।
अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि परीक्षा केंद्र पर पहुंचने से पहले अभ्यर्थी यह नहीं सोचता कि पेपर कैसा आएगा, बल्कि यह सोचता है कि कहीं यह परीक्षा भी रद्द न हो जाए।
यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
दरअसल पेपर लीक केवल प्रश्नपत्र की चोरी नहीं है। यह समान अवसर की अवधारणा पर हमला है। यह संविधान की उस भावना पर हमला है जो योग्यता के आधार पर अवसर देने की बात करती है। यह उन गरीब परिवारों के खिलाफ अपराध है जिनके पास रिश्वत देने के लिए पैसा नहीं होता लेकिन मेहनत करने का साहस होता है।
विडंबना देखिए।देश में भ्रष्टाचार विरोधी भाषणों की कमी नहीं है।
जीरो टॉलरेंस के दावे भी खूब सुनाई देते हैं।
लेकिन पेपर लीक माफिया हर बार किसी न किसी कोने से निकल आता है।
क्यों?क्योंकि भ्रष्टाचार केवल पैसे का लेन-देन नहीं होता। भ्रष्टाचार वह मानसिकता भी है जिसमें कुछ लोग यह मान लेते हैं कि व्यवस्था उनकी निजी जागीर है और जनता सिर्फ तमाशबीन।
आज जरूरत इस बात की नहीं कि छोटे-मोटे दलालों की तस्वीरें मीडिया में दिखाकर उपलब्धि का ढोल पीटा जाए। जरूरत इस बात की है कि यह पता लगाया जाए कि आखिर वे बड़े चेहरे कौन हैं जिनके संरक्षण में यह खेल वर्षों से फल-फूल रहा है।
क्यों हर बड़े पेपर लीक में छोटे खिलाड़ी पकड़ लिए जाते हैं लेकिन व्यवस्था के बड़े मगरमच्छ शायद ही कभी कानून के शिकंजे में दिखाई देते हैं?
क्यों हर बार जांच लंबी होती जाती है और युवाओं की उम्मीदें छोटी होती जाती हैं?
क्यों हर बार दोषियों से ज्यादा चर्चा अगली परीक्षा की तारीख पर होती है?
इन सवालों के जवाब देश का युवा मांग रहा है।
और उसे जवाब मिलना भी चाहिए।
क्योंकि यह सिर्फ नौकरी का प्रश्न नहीं है।
यह उस भरोसे का प्रश्न है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है।
यदि प्रतिभा की जगह पहुंच, मेहनत की जगह पैसे और योग्यता की जगह सिफारिश जीतने लगे तो समाज में निराशा पैदा होती है। फिर युवाओं के मन में यह भावना घर करने लगती है कि ईमानदारी मूर्खता है और व्यवस्था केवल प्रभावशाली लोगों के लिए बनी है।
यह भावना किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
सरकारें बदल सकती हैं।
अधिकारी बदल सकते हैं।
भर्ती बोर्ड बदल सकते हैं।
लेकिन यदि व्यवस्था की नीयत नहीं बदली तो पेपर लीक की खबरें भी नहीं बदलेंगी।
आज देश का युवा पूछ रहा है,
क्या प्रश्नपत्र लीक हो रहे हैं या फिर व्यवस्था का चरित्र?
क्या चोरी केवल पेपर की हो रही है या फिर करोड़ों युवाओं के भविष्य की?
और सबसे बड़ा प्रश्न,क्या पेपर लीक एक दुर्घटना है या फिर प्रतिभाओं को कुचलकर भ्रष्टाचारियों की फसल उगाने की सुनियोजित खेती?
जब तक इन प्रश्नों का ईमानदार उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक हर नया पेपर लीक सिर्फ एक खबर नहीं होगा, बल्कि व्यवस्था के माथे पर लगा एक और कलंक होगा।

उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से मिले पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत

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लखनऊ। वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत ने उत्तर प्रदेश सरकार के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या से शिष्टाचार भेंट की। इस दौरान प्रदेश और क्षेत्र से जुड़े विभिन्न समसामयिक तथा जनहित के मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।
भेंट के दौरान पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत ने क्षेत्रीय विकास, ग्रामीण आधारभूत सुविधाओं, सड़क, सिंचाई, शिक्षा एवं जनकल्याण से जुड़े विषयों पर अपने विचार रखे। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी जनहित के मुद्दों पर सरकार की प्राथमिकताओं को साझा करते हुए विकास कार्यों को गति देने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय तथा क्षेत्रीय विकास योजनाओं को लेकर भी चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, फर्रुखाबाद सहित आसपास के क्षेत्रों में चल रही विकास परियोजनाओं और भविष्य की योजनाओं पर भी बातचीत हुई।
पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत लंबे समय से क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। वहीं उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य प्रदेश में सड़क, ग्रामीण विकास और आधारभूत ढांचे से जुड़े कार्यों की नियमित समीक्षा कर रहे हैं।
इस मुलाकात को संगठनात्मक मजबूती और जनहित के मुद्दों पर संवाद की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों नेताओं ने प्रदेश के विकास और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए मिलकर कार्य करने पर जोर दिया।