बार-बार उच्च अधिकारियों की फटकार के बाद भी कई टीमें, डॉग स्क्वायड और आधुनिक तकनीक लगाने के बावजूद एसओजी और सर्विलांस यूनिट हत्यारों तक पहुंचने में पूरी तरह नाकाम
फर्रुखाबाद
थाना जहानगंज क्षेत्र अंतर्गत गांव कोरीखेड़ा में 10 वर्षीय मासूम आशुतोष की निर्मम हत्या का मामला अब पुलिस की कार्यशैली पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है। घटना को करीब साढ़े चार माह बीत जाने के बावजूद पुलिस अब तक इस सनसनीखेज हत्याकांड का खुलासा नहीं कर सकी है, जिससे पीड़ित परिवार के साथ-साथ पूरे क्षेत्र में आक्रोश व्याप्त है।गांव निवासी किसान चंद्रप्रकाश गुप्ता का बेटा आशुतोष बीते 10 दिसंबर की शाम घर से कुछ दूरी पर स्थित मंदिर की ओर गया था, लेकिन देर शाम तक वापस नहीं लौटा। परिजनों की चिंता बढ़ी तो उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर खेतों, रास्तों, आसपास के गांवों और रिश्तेदारों के यहां काफी तलाश की, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं लगा। इसके बाद थाना जहानगंज में गुमशुदगी की तहरीर दी गई। पुलिस ने औपचारिकताएं निभाते हुए सीसीटीवी कैमरे खंगाले और कन्नौज से डॉग स्क्वायड टीम भी बुलवाई, लेकिन परिणाम शून्य ही रहा।
चार दिन बाद 14 दिसंबर को आशुतोष का शव घर से करीब 600 मीटर दूर भरतापुर-झंसी मार्ग किनारे एक आलू के खेत में पड़ा मिला। शव को आलू की बेल से ढकने की कोशिश की गई थी और शरीर पर चोट के गंभीर निशान थे। प्रथम दृष्टया यह साफ प्रतीत हुआ कि मासूम की हत्या कर शव को यहां फेंका गया। सिर पर किसी भारी वस्तु से वार किए जाने की आशंका भी जताई गई थी। यह दृश्य इतना भयावह था कि जिसने भी देखा, उसकी रूह कांप उठी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक आरती सिंह ने कई टीमें गठित कीं। एसओजी और सर्विलांस टीम को भी लगाया गया, लेकिन विडंबना यह रही कि इतने संसाधनों और दावों के बावजूद पुलिस आज तक हत्यारे तक नहीं पहुंच सकी। कई बार एडीजी और डीआईजी स्तर से भी इस मामले में जवाब-तलब किया गया, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।
लापरवाही के आरोप में तत्कालीन थाना अध्यक्ष राजेश राय को लाइन हाजिर कर दिया गया, लेकिन इसके बाद भी जांच की दिशा नहीं बदली। वर्तमान थाना प्रभारी पूनम अवस्थी भी अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई हैं। यह स्थिति साफ तौर पर दर्शाती है कि पुलिस की जांच या तो कमजोर है या फिर इस जघन्य हत्याकांड को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक मासूम बच्चे के अपहरण और हत्या जैसे संवेदनशील मामले में भी पुलिस खाली हाथ क्यों है? क्या तकनीकी संसाधनों, डॉग स्क्वायड और विशेष टीमों का इस्तेमाल सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है? या फिर कहीं न कहीं जांच में भारी चूक हुई है, जिसे छिपाने की कोशिश की जा रही है?
पीड़ित परिवार आज भी न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है, लेकिन पुलिस की ढीली कार्यप्रणाली उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रही है। क्षेत्रीय लोगों में भी पुलिस के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है और अब यह मामला कानून-व्यवस्था की साख से जुड़ता नजर आ रहा है।
यदि जल्द ही इस हत्याकांड का खुलासा नहीं हुआ तो यह न सिर्फ पुलिस की कार्यक्षमता पर सवाल खड़े करेगा, बल्कि आम जनता के भरोसे को भी गहरी चोट पहुंचाएगा। अब देखना यह होगा कि पुलिस इस चुनौती को कब तक टालती है या फिर वास्तव में दोषियों को बेनकाब कर पीड़ित परिवार को न्याय दिला पाती है।


